Tuesday, June 27, 2017

सिक्किम यात्रा :पांचवां भाग

विदा गंगटोंक
अब गंगटोक से स्थायी रूप से विदा लेने की बारी थी सामान समेट कर गाड़ियों में भरा गया अब अगला ठिकाना पीलिंग था जहाँ हमें एक रात बितानी थी और पीलिंग घूमते हुए अगली शाम को ग्रेजिंग होते हुए दार्जिलिंग के लिए निकल जाना था |पीलिंग गंगटोंक से ज्यादा उंचाई पर है |पीलिंग की उंचाई 2,150 मीटर है और गंगटोंक से लगभग एक सौ तेरह किलोमीटर दूर है जहाँ पहुँचने में लगभग पांच घंटे लगने की उम्मीद थी |पीलिंग अपनी आबोहवा और सुन्दर दृश्यों के लिए मशहूर है |सुबह सात बजे के करीब हमने अपना होटल छोड़ दिया |धीरे –धीरे गंगटोंक पीछे छूट गया और अब हम थे और हरे भरे पहाड़ आधा रास्ता वही था जिन रास्तों में हम पिछले दो दिन से आ जा रहे थे पर उसके बाद सब कुछ बदल जाने वाला था |रास्ता लम्बा था इसलिए मेरी नजर पर सडक पर चल रही गतिविधियों पर थी |हम लगभग जंगल में चल रहे थे पर बीच-बीच  में अपनी एक मोटरसाइकिल के साथ पुलिस कभी कभार दिख जाती थी इसमें ख़ास बात यह थी कि इनमें ज्यादातर महिलाएं थी जो उस वीराने में बगैर किसी भय के अपनी ड्यूटी बजा रही थी न बैठने के लिए कुर्सी न आस –पास कोई आबादी पर वो मुस्तैद थीं |मैंने कहीं पढ़ा था हमें वैसी पुलिस मिलती है जैसा हमारा समाज होता है सच है सिक्किम का समाज डरा हुआ नहीं था और नियम को मानने वाला भी |उत्तर भारत में दिन के समय भी कोई जगह लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है पर यहाँ कोई समस्या नहीं है |
बुद्ध की एक सौ तीस फीट ऊँची मूर्ति 

स्कूल जल्दी ही बंद होने वाले थे यहाँ गर्मियों की छुट्टियाँ बारिश में शुरू होती हैं इस वक्त परीक्षा का मौसम चल रहा था रास्ते में दो तीन के झुण्ड में लड़के लड़कियां अपना प्रश्न पत्र और क्लिप बोर्ड लिए आते जाते दिख रहे थे |इस वीराने में जहाँ गाड़ियाँ भी ज्यादा नहीं चल रही थी वो आराम से हँसते खेलते हुए अपनी मंजिल की तरफ बढे जा रहे थे |रास्ते में पड़ने वाले गाँवों में आबादी ज्यादा नहीं थी पर एक चीज जो मुझे बार –बार मोहित कर रही थी यहाँ की लड़कियों के चेहरे पर छाई मुस्कान, इतनी अलहड़ और उन्मुक्त मुस्कान जिस पर मोहित हुए बगैर  नहीं रहा जा सकता |उनके पहनावे से यह अंदाजा लगाया जा सकता था कि यहाँ लड़कियों के पहनावे से उनके चरित्र की पहचान नहीं होती है हम नेशनल हाइवे से गुजर रहे थे और रास्ते में पड़ने वाली दुकानों में ज्यादातर लड़कियां ही थीं जो शॉर्ट्स और टी शर्ट में बड़े आराम से अपनी दुकान के सामने  बैठी थी या ग्राहकों को सामान बेच रही थी बगैर किसी हिचक के पूरे आत्मविश्वास के |
सूना पेट्रोल पम्प और पीछे कंचनजंघा की चोटियाँ 
यह मामला बता रहा है सिक्किम का समाज लैंगिक समानता के मामले में उत्तर भारत के अन्य राज्यों से कहीं आगे है |हम सिंगतम पार कर रहे थे यहाँ के पहाडी रास्तों की एक ख़ास बात मुझे समझ आयी कि क्यों यहाँ छोटी गाड़ियाँ भी बहुतायत से चलती हैं वो यह था कि आम तौर पर पहाड़ों पर एक तरफ पहाड़ होता है और दूसरी तरफ गहरी खाई जिसमें दुर्घटना होने पर गाडी कई फीट नीचे खाई में गिरती है अगर गाडी छोटी होती है तो जान जाने या चोटिल होने की आशंका रहती है पर सिक्किम के पहाड़ और यहाँ के रास्ते इस मायने में उत्तर भारत के पहाड़ों से अलग हैं यहाँ जिस तरफ खाई है उस तरफ भी बहुत पेड़ पौधे हैं जिससे गाड़ियों के नीचे गिरने का खतरा कम रहता है और अगर गिरी भी तो वो ज्यादा नीचे नहीं जा पाएंगी क्योंकि पहाड़ पर दूसरी तरफ भी बहुत से पेड़ हैं जिनमें साल और बांस की बहुतायत है |पहाड़ पूरी  तरह से यहाँ संजोये गए हैं और विकास का वह रोग अभी यहाँ नहीं पहुंचा है |सिक्किम में सीढ़ीदार खेतों में खेती होती है जिनमें बड़ी इलायची और संतरा प्रमुख हैं |खेतों में यूरिया का इस्तेमाल नहीं होता और सरकार भी ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देती है इसलिए यहाँ आपको खाने के लिए जो कुछ मिलेगा वह शुद्ध ही मिलेगा |प्रदुषण न होने से शुद्धता का स्तर कई गुना बढ़ जाता है |रास्ते में हमारे ड्राइवर ने बताया कि  रवानगला कस्बे में एक बुद्ध पार्क पड़ता है|बस  उसको देखने की इच्छा बलवती हो उठी गाडी घुमवाई गयी |एक सौ तीस फुट ऊँची बुद्ध की प्रतिमा दूर से ही दिखती है |
पीलिंग की वो सुहानी शाम 
बादलों की आवा जाही के बीच जब हम उस पार्क में पहुंचे तो बुद्ध प्रतिमा बादलों की छाँव में थी और हल्की बूंदा बांदी हो रही थी पर धीरे धीरे बादल चले गए और सूरज चमकने लग गया यह भी जल्दी बना पार्क है जिसका उदघाटन 2013 में बौद्ध गुरु दलाई लामा ने किया |मूर्ति के अन्दर पुजाग्रह है और इसके अंदर चलते चलते मूर्ति के सर तक पहुँच सकते हैं |जहाँ महात्मा बुद्ध के जीवन के कहानी को विशाल चित्रों में उकेरा गया है |शान्ति और शानदार मौसम यहाँ आप तन और मन से उस परालौकिक शक्ति से एकाकार हो सकते हैं |कई लोग वहां ध्यान कर रहे थे कुछ सो भी रहे थे ऐसा मुझे लगा हो सकता है वो ध्यान ही कर रहे हों पर हमारे पास इतना समय नहीं था इसलिए जल्दी ही हमने उस पार्क से विदा ली |करीब दिन के दो बजे हम पीलिंग के अपने होटल में पहुँच गए |पहली नजर में पीलिंग ने मुझे कुछ ख़ास आकर्षित नहीं किया हो सकता हो ये सफर की थकान हो या कुछ और उस वक्त धूप भी थी हमने फटाफट अपने कमरे में कब्ज़ा जमाया और एक चाय पी| यहाँ चाय के पाउच और बिजली की केतली हर होटल के कमरे में मिलेगी तो आपको बस पानी गर्म करना है और चाय कॉफ़ी जो पीना चाहें पीयें |कुछ देर सुस्ताने के बाद मैंने आस पास नजर डालने के लिए कमरे की खिड़की खोली थी तो देशी भाषा में अलबला गये इतने सुंदर द्रश्य की कल्पना नहीं की थी 

मेरे कमरे से बाहर का नजारा 
मेरे  पीछे हिमालय और आगे कंचनजंगा की चोटियाँ थी |मैंने सोचा जरा नहा कर सफर की थकान उतारी जाए पर पानी इतना ठंडा था कि हिम्मत जवाब सी देती दिखी लेकिन मैंने हथियार नहीं डाले और नहाया वो बात अलग है कि उस ठन्डे पानी से नहीं बल्कि गीजर के गर्म पानी से अब शाम गहरा रही थी और मैं पीलिंग की सड़कों पर था |मौसम का आलम यह था कि मुझे कोट डालना पड़ा सड़कें लोगों से भरी थी कुछ विदेशी भी थे पर शोर नाम की कोई चीज नहीं सब कुछ शांत मोटे तौर पर अगर लोगों को बदल दिया जाए तो मुझे एकबारगी लगा मैं यूरोप की किसी गली में घूम रहा था |एक स्थानीय निवासी से बात करने पर पता चला यहाँ कुछ भी नहीं है बस मौसम के कारण सैलानी आते हैं तो आपको सिर्फ होटल ही मिलेंगे पर पीलिंग की वो शाम आज भी मेरे जेहन में जीवंत है पहाड़ जब धीरे धीरे हरे से काले होते जा रहे थे सड़कों पर गाड़ियों की हेडलाईट चमक रही थीं और मैं जून के महीने में कोट डाले हुए देश के एक ऐसे हिस्से में जहाँ मैं अजनबी था यूँ ही भटक रहा था |भटक ही तो रहा हूँ और शायद तभी भटकते हुए पीलिंग आ पहुंचा |मै सडक की रौशनी से दूर जाकर उन काले पहाड़ों को देख रहा था जो न जाने क्या क्या अपने अंदर समेटे हुए हैं |उस रात मैंने आईपोड को स्पीकर मोड में डाला और अपने कान के पास रखकर सोया शायद  सत्तर के दशक के उन मधुर गानों की स्वर लहरी में हिमालय और कंचनजंघा के वो पहाड़ भी सोये होंगे जो सदियों से जग रहे हैं

3 comments:

Monika's world said...

Budh ki 130 foot ki pratima ki pic bhut sundar h....aur kanchanjangaa ki phadiya bhi....

Ankur Sharma said...

बहुत सुंदर दृश्टान्त बयां किया सर आपने

Pallavi Mishra said...

Ati sundar varnan ...mujhe bhi apne desh ki is prakritik khoobsurati ko dekhne ke liye prerit kar rahi hai...

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