Friday, April 24, 2026

ए आई के नक़्शे में भारत

 

वैश्विक अर्थव्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब केवल एक तकनीकी शब्द मात्र  नहींबल्कि 'चतुर्थ औद्योगिक क्रांति' (Industry 4.0) का मुख्य स्तंभ बन चुका है। हाल ही में बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) रिपोर्ट 2025 द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसारभारत 92% AI एडॉप्शन दर  के साथ विश्व के अग्रणी देशों की सूची में पहले स्थान  पर है। यह आंकड़ा  न केवल भारत की डिजिटल शक्ति  को दर्शाता हैबल्कि वैश्विक तकनीकी मानचित्र पर एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत भी देता है।रिपोर्ट के अनुसार भारत (92%) ने स्पेन (78%) और ब्राजील (76%) जैसे उभरते बाजारों को बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया है।आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका (64%) और जापान (51%) जैसे तकनीकी रूप से परिपक्व देश ए आई  एडॉप्शन की इस दौड़ में पिछड़ रहे हैं।उल्लेखनीय है कि यहाँ 'एडॉप्शनका अर्थ केवल ए आई के परिचय से नहींबल्कि सक्रिय उपयोग से है (कम से कम सप्ताह में कई बार)।भारत की इस बढ़त के पीछे कई तर्क दिए जा सकते हैं |जिसमें सबसे प्रमुख है भारत की विशाल युवा आबादी 'डिजिटल नेटिवहै।संज्ञानात्मक लचीलापन (Cognitive Flexibility) युवाओं में अधिक होता हैजिससे वे नई जटिल तकनीकों को शीघ्र आत्मसात कर लेते हैं और भारत इसमें अपवाद नहीं है|दूसरा है लीपफ्रॉगिंग (Leapfrogging) की प्रवृत्ति मतलब भारत ने कई पारंपरिक चरणों को छोड़कर सीधे उन्नत डिजिटल समाधानों को अपनाया है।
 ये उसी तरह का मामला है जैसे भारत ने लैंडलाइन फोन  के युग को छोड़कर सीधे मोबाइल क्रांति कीवैसे ही अब वह पारंपरिक सॉफ्टवेयर से सीधे AI-इंटीग्रेटेड सिस्टम की ओर बढ़ रहा है।तीसरा कारण: भारतीय श्रम बाजार में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का होना है। यहाँ AI को 'जॉब रिप्लेसमेंटके बजाय 'जॉब एनहांसमेंटटूल के रूप में देखा जा रहा हैजिससे व्यक्तिगत उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि होने की सम्भावना है।भारत की 'नंबर 1' रैंकिंग केवल उपयोग तक सीमित नहीं हैबल्कि यह 'AI रेडीनेस' (AI तत्परता) को भी रेखांकित करती है। भारत सरकार का 'IndiaAI' मिशननेशनल स्ट्रैटेजी फॉर  एआई   और प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों जैसे IITs और विश्वविद्यालय स्तर पर  एआई   पाठ्यक्रमों का समावेश इस तत्परता को आधार प्रदान कर रहा है। भारत मेंनीति आयोग का कहना है कि एआई को अपनाने से 2035 तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 957 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वृद्धि हो सकती है और देश की वार्षिक विकास दर में 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। भारत ने भी नीति आयोग द्वारा तैयार किए गए 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए राष्ट्रीय रणनीतिनामक एक चर्चा पत्र के माध्यम से एआई पारिस्थितिकी तंत्र को गति देने की अपनी रणनीति शुरू की है। भारत दुनिया का सबसे सस्ता और सबसे बड़ा डेटा उपभोक्ता है।  एआई   को प्रशिक्षित करने के लिए डेटा ही ईंधन है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है |जिस पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है

जापान और अमेरिका जैसे देशों में निम्न एडॉप्शन दर के पीछे 'संस्थागत जड़ताऔर 'सख्त नियामक ढांचे'  उत्तरदायी हैं। जिसमें  ए आई लिए जरुरी आवश्यक आंकड़ों की पूर्ति के लिए सख्त नियम हैं और वहां की जनसंख्या अपने आंकड़ों के लिए ज्यादा सजग है|दूसरा  वहाँ डेटा गोपनीयता (Privacy) और कॉपीराइट कानूनों की जटिलता ने तकनीक के मुक्त प्रसार को धीमा किया हैजबकि भारत में 'ओपन-सोर्स कल्चरऔर नवाचार के प्रति उदार दृष्टिकोण ने इसे गति दी है।आने वाले समय में भारत को भी ऐसे कई सवालों से दो चार होना पड़ेगा |सबसे जरुरी है कि भारत का ए आई इस्तेमाल में स्वरुप कैसा होगा?जिसे क्रियेटर बनाम कंज्यूमर के नजरिये से समझा जा सकता है | दुनिया में हुई  'सोशल मीडिया क्रांति' (2004-2015) के दौरान भारत एक 'इनोवेटर' (बनाने वाला) के बजाय केवल 'कंज्यूमर' (उपयोगकर्ता) बनकर रह गया था|ए आई के आने के बाद यह बहस भी जोरो पर थी क्या वैसी ही गलती कहीं भारत दुबारा तो नहीं दोहरा देगा |भारत केवल वैश्विक AI मॉडल्स जैसे चैट जी पी टी, गूगल जेमिनी,को-पाइलेट का उपभोक्ता बना रहेगाया हम अपने खुद  के 'लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स' (LLMs) विकसित कर पाएंगे? इस सवाल का जवाब समय के गर्भ में है |

हमें एल्गोरिथमिक बायस (Bias) और डेटा संप्रभुता पर शोध की ज्यादा आवश्यकता है। एल्गोरिथमिक बायस डेटा में छिपे सामाजिक पूर्वाग्रहों को दोहराता हैजिससे ए आई द्वारा भेदभावपूर्ण निर्णय संभव हैं जिसमें भारत जैसे विविधता वाले देश में किसी राज्य में कोई बात सही होती वहीं दूसरे राज्य या संस्कृति में हो सकता है वो सही बात गलत हो ऐसे में ए आई कई तरह की गलतियां कर सकता है । वहींडेटा संप्रभुता यह सुनिश्चित करती है कि भारतीयों का डेटा देश की सीमाओं और कानूनों के अधीन रहे। इन पर शोध अनिवार्य है ताकि तकनीक निष्पक्ष हो और डिजिटल उपनिवेशवाद से बचा जा सके।भारत अब डिजिटल विभाजन  के दूसरी ओर नहींबल्कि केंद्र में खड़ा है। 92% एडॉप्शन रेट इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था भविष्य की चुनौतियों के लिए न केवल तैयार हैबल्कि उन्हें आकार देने में सक्षम है। भारत का यह ' एआई   मोमेंटउसे आने वाले दशकों में उसे  वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था का केंद्र बिंदु बनाएगा या नहीं इसके लिए थोड़ा इन्तजार करना होगा |

अमर उजाला में 24/04/2026 को प्रकाशित 

 

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