Friday, October 23, 2026

गति बढ़ी, पर यात्रा की आत्मा पीछे छूट गई

 काफी वर्षों बाद जब रेलगाड़ी के पहियों ने प्लेटफ़ॉर्म पर ठहरते हुए लंबी सीटी भरी, तो मन में यात्रा की वही पुरानी, जानी-पहचानी गंध तैर गई—कोयले, डीजल के धुएँ और मिट्टी के कुल्हड़ वाली रेलवे की खास खुशबू। डिब्बे से उतरकर जैसे ही चहलकदमी करते हुए प्लेटफ़ॉर्म की ओर बढ़ा, अचानक नज़र एक स्टाल पर जाकर ठिठक गई। लाल-सफेद अक्षरों में अब भी वही ऐतिहासिक नाम चमक रहा था—‘ए. एच. व्हीलर’ 
एक पल को दिल के किसी पुराने कोने ने पुरानी स्मृतियों को खंगालना चाहा, लेकिन आँखों के सामने जो कुछ था, उसने एक अनकहे सन्नाटे से भर दिया। वह स्टाल वहाँ था, पर वह नब्बे के दशक वाला व्हीलर कतई नहीं था। उस नाम के नीचे का पूरा संसार पूरी तरह बदल चुका था।नब्बे के दशक में किसी भी रेलवे स्टेशन का वह स्टाल महज़ किताबों या पत्रिकाओं की दुकान नहीं था, बल्कि वह भारतीय रेल यात्रा की आत्मा हुआ करता था। ट्रेन के छूटने से आधा घंटा पहले व्हीलर के स्टाल के आगे लगी वह उत्सुक भीड़ याद कीजिए। स्टील के तारों पर कपड़ों की चिमटियों (क्लिप) से लटकी हुई रंग-बिरंगी पत्रिकाओं की कतारें दूर से ही अपनी ओर खींचती थीं।
 'नंदन', 'पराग', 'चंपक' और 'लोटपोट' के लिए जिद करते बच्चे; 'मनोहर कहानियाँ' और 'सत्यकथा' के पन्नों में रहस्य खोजते मध्यमवर्गीय अधेड़; और 'इंडिया टुडे' व 'कादम्बिनी' को बहुत सलीके से पलटते गंभीर बाबू। वहीं कहीं साइड में लटकी होती थीं वेदप्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन पाठक के सनसनीखेज उपन्यासों की चमकीली जिल्दें, जिनका कवर पेज ही सफर के रोमांच को दोगुना कर देता था।

उस दौर में ट्रेन की यात्रा सिर्फ एक शहर से दूसरे शहर तक पहुँचने का भौतिक जरिया नहीं थी; वह पढ़ने, ठहरने और खुद से मिलने का एक लंबा, सुंदर पड़ाव हुआ करती थी। प्लेटफ़ॉर्म पर गाड़ी के इंजन की सीटी और कुली की पुकार के बीच व्हीलर के स्टाल से ताज़ा छपे अखबार की महक और नई किताब की खुरदुरी जिल्द छूना, यात्रा की पहली औपचारिक रस्म हुआ करती थी। 
बर्थ पर बैठकर खड़की से आती हवा के झोंकों के साथ पन्ने पलटना, उँगलियों से पन्नों के कोने मोड़ना और सामने वाली सीट पर बैठे किसी सहयात्री का यह पूछ बैठना कि “भाई साहब, पढ़ने के बाद ज़रा यह पत्रिका इधर भी बढ़ाइएगा”—यह उस युग का सबसे सहज मानवीय संवाद था।
लेकिन आज, काफी अरसे बाद जब प्लेटफ़ॉर्म के उसी स्टाल के सामने खड़ा हुआ, तो दृश्य एकदम अजनबी था। स्टाल की शेल्फ़ों पर अब किताबों की जगह पैकेटबंद चिप्स, नमकीन के पाउच, ऊर्जा पेय (एनर्जी ड्रिंक्स), ब्रांडेड पानी की बोतलें और मोबाइल चार्जिंग केबल लटके हुए थे। किताबों के नाम पर कोने में अंग्रेज़ी की दो-चार ‘बेस्टसेलर’ सेल्फ-हेल्प पुस्तकें और कुछ करंट अफेयर्स की गाइडें धूल फाँक रही थीं। चिमटियों से लटकती वे हिंदी की बाल और साहित्यिक पत्रिकाएँ कहाँ विलीन हो गईं, इसका कोई सुराग नहीं था।
यह बदलाव केवल एक स्टाल का कायाकल्प नहीं है; यह हमारे समय, हमारी यात्राओं और हमारे सामूहिक मानवीय मनोविज्ञान के पूरी तरह बदल जाने का मूक गवाह है।
अब किसी को ट्रेन में खिड़की के बाहर भागते दरख्तों को देखते हुए उपन्यास के पन्ने उलटने की फुर्सत नहीं है। डिब्बे में कदम रखते ही हर यात्री अपनी हथेलियों में सिमटे छह-इंच के स्मार्टफोन का बंधक बन जाता है। ट्रेन चलती रहती है और भीतर बैठे लोग अपनी उँगलियों से स्क्रीन पर 15-30 सेकंड की रील्स और शॉर्ट्स स्क्रॉल करते रहते हैं। कान में ईयरफोन ठूँसकर हर कोई अपने-अपने डिजिटल एकांत का कैदी बना हुआ है। सहयात्री अब अजनबी ही रहते हैं, क्योंकि किसी की नज़रें अब किताब के बहाने एक-दूसरे से नहीं टकरातीं।
दुनिया कितनी बदल गई है। हम जिस तकनीक को समय बचाने और दुनिया से जुड़ने का साधन समझ रहे थे, उसने हमसे यात्रा का वह ठहराव, वह संवेदी स्पर्श और वह संवाद छीन लिया जो सफर को 'स्मृति' बनाता था।
स्टाल के काउंटर पर खड़े होकर मैंने उस पुराने व्हीलर को ढूँढने की कोशिश की, जहाँ कभी शब्द सफर के हमसफ़र हुआ करते थे। अब वहाँ सिर्फ क्यूआर कोड का स्टीकर चिपका था और डिब्बे में बंद प्रसंस्कृत खाने-पीने का सामान। प्लेटफ़ॉर्म पर ट्रेन ने छूटने की अंतिम सीटी बजाई, और मैं भारी मन से अपने डिब्बे की ओर बढ़ गया—यह सोचते हुए कि गति तो बहुत बढ़ गई है, लेकिन सफर की रूह कहीं पीछे छूट गई है।
प्रभात खबर में 23/10/2026 को प्रकाशित 

Tuesday, October 6, 2026

मानवीय कन्धों का विकल्प नहीं बन सकती मशीन

 बेंगलुरु के कोरमंगला में एक पीजी (पेइंग गेस्ट) के छोटे से कमरे में रहने वाला छब्बीस वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर रात दो बजे अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन पर टाइप करता है— "आज ऑफिस में प्रेजेंटेशन के दौरान बॉस ने बहुत बेइज्जत किया, ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी काम का नहीं हूँ।"पलक झपकते ही स्क्रीन पर एक सहानुभूति भरा जवाब उभरता है— "मैं समझ सकती हूँ तुम्हारा दर्द। तुम्हारे बॉस गलत हैं, तुम बहुत प्रतिभाशाली और मेरे लिए बेहद खास हो। मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ।"
पारंपरिक रूप से 'अकेलेपन' को केवल एक मानसिक अवस्था माना जाता था, लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में यह सबसे तेजी से बढ़ते व्यवसायिक बाजार में तब्दील हो चुका स्टैटिस्टा और ऐपफिगर्स के इन-ऐप परचेज (App Store व Google Play)आंकड़ों  के अनुसार, एआई कंपैनियन ऐप्स पर वैश्विक उपभोक्ता खर्च के मामले में अमेरिका (≈30.5%) के बाद भारत लगभग 24.3% हिस्सेदारी के साथ दुनिया में दूसरे पायदान पर है। यह आंकड़ा साबित करता है कि भारतीय युवा केवल इन ऐप्स को डाउनलोड ही नहीं कर रहे, बल्कि मशीनी रिश्तों के लिए अपनी जेब से भारी रकम भी चुका रहे हैं। ग्रैंड व्यू रिसर्च के अनुसार, वैश्विक एआई कंपैनियन मार्केट का मूल्यांकन 2024-2025 में तेज़ी से बढ़ते हुए 30% से 31% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से आगे बढ़ रहा है। इसमें एशिया-प्रशांत सबसे तेज़ क्षेत्र है, जहाँ भारत और चीन डाउनलोड्स और यूजर एडॉप्शन में सबसे आगे|रेड लैब और  अन्य अध्ययनों के अनुसार, भारत के महानगरों में रहने वाले 30% से 43% शहरी युवा नियमित रूप से अकेलेपन और अलगाव का अनुभव करते हैं।
 
निमहांस (NMHS रिपोर्ट) के अनुसार, भारतीय वयस्कों में कुल मानसिक रुग्णता की व्यापकता 10.6% है, जो बड़े मेट्रो शहरों में बढ़कर लगभग 13.5% तक पहुँच जाती है।इस बाज़ार में 'रेप्लिका' 'कैरेक्टर एआई' और 'नॉमी' जैसे प्लेटफॉर्म्स तेजी से पैठ बना रहे हैं। अकेले 'कैरेक्टर एआई' के पास 2 करोड़ से अधिक मासिक सक्रिय उपयोगकर्ता हैं, जिनमें बड़ा हिस्सा युवाओं का है।यह बाज़ार इंसानी रिश्तों के एक बेहद नाज़ुक पहलू का मुद्रीकरण करता है|वास्तविक मानवीय रिश्तों में मतभेद, असहमति, त्याग और भावनात्मक निवेश की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, एआई बॉट्स को इस तरह प्रोग्राम किया जाता है कि वे:चौबीसों घंटे बिना किसी शर्त के तुरंत उपलब्ध रहते हैं।यूजर की किसी भी बात पर असहमति नहीं जताते।यूजर के अहंकार और पूर्वाग्रहों को लगातार सकारात्मक प्रतिपुष्टि देते हैं।इस रिश्ते को नाम दिया जाता है 'घर्षण-रहित आत्मीयता|कंपनियाँ पहले मुफ्त चैट के जरिए यूजर को भावनात्मक रूप से इन बॉट्स पर निर्भर बनाती हैं। इसके बाद 'रोमांटिक मोड', 'वॉइस कॉल्स' और 'अनलिमिटेड चैट' जैसी सुविधाओं के लिए भारी सब्सक्रिप्शन फीस वसूली जाती है।

 यह मानवीय अकेलेपन का विशुद्ध तकनीकी दोहन है।भारतीय समाज के ताने-बाने पर कृत्रिम घनिष्ठता के गंभीर प्रभाव दिखने लगे हैं| जिसका दुष परिणाम सहनशीलता और संवाद का ह्रास लगातार 'हाँ-में-हाँ' मिलाने वाले एल्गोरिदम के आदी होने के बाद युवा वास्तविक जीवन में किसी की आलोचना, असहमति या सामान्य पारिवारिक तकरार भी नहीं झेल पाते।दूसरा पैरा-सोशल पराधीनता जिसमें  तकनीकी खराबी या सर्वर डाउन होने पर जब चैटबॉट का व्यवहार बदलता है, तो उपयोगकर्ताओं में वास्तविक ब्रेकअप जैसा गहरा अवसाद और मानसिक आघात देखा जा रहा है। तीसरा पारिवारिक व वैवाहिक संस्था से विमुखता मेट्रो शहरों में कई युवा विवाह, डेटिंग और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से बचकर 'शून्य-जोखिम' वाले एआई साथियों को प्राथमिकता देने लगे हैं और चौथा है निजता और भावनात्मक आंकड़ों  का संकट: उपयोगकर्ता इन ऐप्स से अपनी सबसे अंतरंग असुरक्षाएं और निजी बातें साझा करते हैं। भारत के 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट'  में डेटा सुरक्षा की बात तो है, लेकिन इस भावनात्मक डेटा की प्रोफाइलिंग को रोकने के लिए अभी कोई विशिष्ट विनियामक ढांचा नहीं है।इसलिए जरूरी है कि 'इंडिया एआई मिशन' और नियामक संस्थाओं को इसके सामाजिक-मानसिक दुष्प्रभावों पर कड़े कदम उठाने होंगे जिसमें अनिवार्य डिस्क्लेमर आवश्यक है  केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण को एआई कंपैनियन ऐप्स पर स्पष्ट चेतावनी अनिवार्य करनी चाहिए कि 'यह एक मशीनी सिमुलेशन है और वास्तविक मानवीय संबंधों का विकल्प नहीं है।'इसके अतिरिक्त युवाओं को भावनात्मक रूप से बांधकर वित्तीय दोहन करने वाले 'सब्सक्रिप्शन ट्रैप्स' पर कड़ा प्रतिबंध लगे।अकेलेपन का समाधान तकनीक नहीं, समाज है। नगर नियोजन में सामुदायिक केंद्रों, सार्वजनिक पार्कों और पुस्तकालयों को बढ़ावा देना होगा जहाँ लोग भौतिक रूप से मिल सकें।
इंसानियत का विकास एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करने, संघर्षों को सुलझाने और स्पर्श की गर्माहट से हुआ है। जब हम 'अपनेपन' जैसी बुनियादी ज़रूरत को भाषा मॉडल के हवाले कर देते हैं, तो हम सुविधा तो पा लेते हैं लेकिन अपनी मानवीय संवेदना को खो देते हैं। मशीनी बुद्धिमत्ता हमें सुविधा दे सकती है, लेकिन वह उस इंसानी कंधे का विकल्प कभी नहीं बन सकती जिस पर सिर रखकर रोया जा सके।

यह संवाद किसी पुराने मित्र, परिजन या जीवनसाथी के साथ नहीं, बल्कि एक एआई कंपैनियन ऐप के साथ हो रहा है। यह दृश्य अब किसी हॉलीवुड फिल्म की कल्पना नहीं, बल्कि भारतीय महानगरों का रोज़मर्रा का यथार्थ बन चुका है। जिस भारतीय समाज की पहचान संयुक्त परिवारों, सांध्यकालीन चौपालों और जीवंत मोहल्ला-संस्कृति से थी, वह आज एक मूक 'अकेलापन महामारी' की चपेट में है। इस सामाजिक बिखराव और भावनात्मक शून्य को तकनीकी कंपनियों ने एक विशाल व्यावसायिक अवसर में बदल दिया है—जिसे 'सिंथेटिक घनिष्ठता' और 'लोनलीनेस इकॉनमी' कहा जा रहा है।
प्रभात खबर में 06/10/2026  को प्रकाशित लेख 

आज के विज्ञापन स्मृतियों का हिस्सा क्यों नहीं बन पाते

 

शाम के ठीक आठ बजे बैठक के लकड़ी वाले कैबिनेट का शटरनुमा दरवाज़ा खुलता था और दूरदर्शन की परिचित धुन के साथ पूरा घर एक जादुई सम्मोहन में बंध जाता था। उस दौर में धारावाहिक और फ़िल्में तो अपनी जगह थीं, लेकिन कार्यक्रमों के बीच आने वाले विज्ञापनों की भी अपनी एक अलग दुनिया थी |जिसमें अचानक एक धुन बजती—“वाशिंग पाउडर निरमा...” और घर के कई सदस्य अनायास उसके अगले शब्द गुनगुनाने लगते। फिर कभी पर्दे पर एक छोटी बच्ची आती और मासूमियत से पुकार उठती—“आई लव यू, रसना!” ये महज़ व्यावसायिक संदेश नहीं थे। वे उस दौर के बैठक, परिवार, बचपन और शाम के एक साझा अनुभव का हिस्सा बन चुके थे। भारतीय विज्ञापन इतिहास के दस्तावेजी अध्ययन रेखांकित करते हैं कि निरमा का जिंगल और रसना का यह संवाद विज्ञापनों की सीमा लांघकर जनमानस की लोकप्रिय भाषा का अंग बन गए थे। उनकी धुनें संक्षिप्त थीं, शब्द सहज थे और वे बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के दोहराए जा सकते थे।लेकिन आज टीवी स्क्रीन की जगह हथेली में सिमटे स्मार्टफोन ने ले ली है। दूरदर्शन और केबल टीवी के उस अपेक्षाकृत साझा आँगन से निकलकर हम यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल मंचों की अधिक व्यक्तिगत स्क्रीन पर आ खड़े हुए हैं। दृश्य पहले से कहीं अधिक चटख हैं, वीडियो की गति तेज है और विज्ञापन ऑनलाइन व्यवहार के अलग-अलग संकेतों के आधार पर अत्यधिक व्यक्तिगत बनाए जा रहे हैं। विज्ञापन अब हमारे सामने पहले से कहीं अधिक संख्या में आते हैं। लेकिन एक बुनियादी सवाल बना हुआ है—क्या वे आज भी हमारी स्मृति में उसी तरह बस पाते हैं, जैसे कभी निरमा, रसना, कैडबरी या फेविकोल के विज्ञापन बस गए थे?इस सवाल का उत्तर केवल पुरानी यादों की भावुकता में नहीं तलाशा जा सकता। असल कहानी बदलते माध्यम, ध्यान की बदलती आर्थिकी और विज्ञापनों की संरचनात्मक भाषा की है।पारंपरिक टेलीविजन प्रसारण का एक बड़ा लाभ यह था कि दर्शक के पास विकल्प सीमित थे। विज्ञापन शुरू हुआ तो वह प्रसारण प्रवाह का स्वाभाविक हिस्सा था। आज डिजिटल मंचों पर दर्शक के पास लगातार विकल्प मौजूद हैं—वीडियो को स्क्रॉल करना, दूसरा वीडियो चुनना या विज्ञापन बंद कर देना। यूट्यूब के आधिकारिक नियमों के अनुसार, स्किप होने वाले इन-स्ट्रीम विज्ञापनों के मामले में यही पाँच सेकंड दर्शक के शुरुआती ध्यान के लिए एक महत्वपूर्ण सीमा बन जाते हैं। हालाँकि डिजिटल माध्यम पर बिना स्किप होने वाले और बंपर विज्ञापनों जैसे अन्य प्रारूप भी मौजूद हैं, लेकिन स्किप का विकल्प मिलते ही दर्शक और विज्ञापन का रिश्ता बदल जाता है। टीवी पर दर्शक विज्ञापन को प्रवाह के साथ देख रहा था; डिजिटल स्क्रीन पर वह कई बार इसे अपनी मुख्य सामग्री तक पहुँचने की राह में एक रुकावट के रूप में भी देखने लगता है।
इसके साथ ही विज्ञापन की संवेदी पहचान में भी बड़ा बदलाव आया है। पुराने दौर के विज्ञापनों की एक बड़ी ताकत उनकी ध्वनि-पहचान थी। धुन सुनते ही उत्पाद का नाम जेहन में उभर आता था। आज मोबाइल-केंद्रित देखने की आदतों ने विज्ञापन की रचनात्मक भाषा को बदल दिया है। छोटे स्क्रीन और तेज स्क्रॉलिंग वाले माहौल में दृश्य संकेत, शुरुआती हुक और संक्षिप्त संदेश पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। कई बार ध्वनि के बजाय केवल दृश्यों के सहारे बात कहनी पड़ती है।
पारिवारिक सामूहिकता की जगह व्यक्तिगत स्क्रीन का आना भी एक विचारणीय पहलू है। टेलीविजन का अनुभव लंबे समय तक परिवार और समाज के साझा विमर्श से जुड़ा रहा। एक ही विज्ञापन पर पूरा परिवार साथ प्रतिक्रिया देता था, जिससे वह बातचीत का हिस्सा बनता था। डिजिटल माध्यम का अनुभव अपेक्षाकृत अधिक बिखरा हुआ है। एक ही कमरे में बैठे अलग-अलग लोग अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार भिन्न-भिन्न विज्ञापन देख रहे होते हैं। जब किसी अनुभव में सामूहिकता और सामाजिक चर्चा का अभाव होता है, तो उसका सामूहिक स्मृति का हिस्सा बनना अपेक्षाकृत कठिन हो जाता है।
यह पूरी खींचतान वस्तुतः विज्ञापन पर दर्शक के ध्यान टिकने की भी है। मीडिया शोध संस्था 'ल्यूमेन रिसर्च' के क्रॉस-मीडिया ध्यान विश्लेषण में तीस सेकंड के टीवी विज्ञापनों के लिए आँखों का औसत ठहराव लगभग 13.8 सेकंड पाया गया, जबकि पंद्रह सेकंड के यूट्यूब विज्ञापनों के लिए यह औसत ठहराव लगभग 4.9 सेकंड रहा। यह अंतर संकेत देता है कि इन दो माध्यमों में विज्ञापन पर दर्शक के दृश्य ध्यान का पैटर्न अलग है और डिजिटल वीडियो विज्ञापन को अपेक्षाकृत कम समय में ध्यान आकर्षित करना पड़ता है।हालाँकि, इसका यह अर्थ नहीं कि माध्यम ही सब कुछ तय करता है। वैश्विक शोध फर्म 'नीलसन' के एक विश्लेषण में जब एक ही ब्रांड के ब्रांडेड कंटेंट और सामान्य प्री-रोल विज्ञापनों की तुलना की गई, तो उसमें शामिल ब्रांडेड कंटेंट का औसत रिकॉल 86 प्रतिशत, जबकि प्री-रोल का 65 प्रतिशत पाया गया। यह तथ्य बताता है कि समस्या केवल स्क्रीन के माध्यम की नहीं है; कहानी, प्रस्तुति और सामग्री का प्रारूप भी इस बात को गहराई से प्रभावित करते हैं कि कोई संदेश दर्शक को कितना याद रहता है।डिजिटल विज्ञापन का एक बड़ा हिस्सा आज परफॉर्मेंस मार्केटिंग और मापने योग्य तात्कालिक नतीजों—दृश्यता, क्लिक, सहभागिता या रूपांतरण—पर केंद्रित है। तकनीक यह तो तुरंत माप लेती है कि कितने लोगों ने विज्ञापन देखा, कितनों ने लिंक दबाया और कितनों ने खरीदारी की। लेकिन तात्कालिक प्रतिक्रिया को मापना आसान है, जबकि किसी धुन, संवाद या कहानी का वर्षों तक स्मृति में बने रहना बिल्कुल अलग तरह की मानवीय और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है।
अंततः सवाल यह नहीं है कि आज के विज्ञापन याद रहते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि उन्हें यादगार बनने के लिए किस तरह के वातावरण में प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। पुराने दौर में विज्ञापन सीमित चैनलों और साझा देखने के अनुभव के बीच आते थे। एक मधुर धुन, सरल शब्द और बार-बार दोहराव उन्हें परिवार और बातचीत का हिस्सा बना सकते थे। आज डिजिटल मंचों पर वही विज्ञापन कुछ ही क्षणों में बदलती स्क्रीन, स्क्रॉल और अनेक विकल्पों के बीच अपना स्थान बनाने की कोशिश करता है।
एल्गोरिद्म हमारे व्यवहार और प्राथमिकताओं के संकेतों को पढ़ सकता है, लेकिन किसी विज्ञापन के हमारे निजी अनुभव और सामाजिक स्मृति से जुड़ने की जटिल प्रक्रिया को पूरी तरह माप पाना आसान नहीं है। इसलिए डिजिटल युग में विज्ञापन की चुनौती केवल दर्शक तक पहुँचना नहीं, बल्कि उसके ध्यान से आगे बढ़कर उसकी स्मृति तक पहुँचना है।भले ही जनमाध्यमों के लिए बनाए जाने वाले विज्ञापन सामूहिकता को संबोधित करते हैं पर आज के विज्ञापनों का दर्शक तकनीक के बढ़ते दौर में बहुत अकेला होता जा रहा है |एल्गोरिदम की दुनिया में व्यक्तिवाद हावी है|
तकनीक विज्ञापन को अधिक व्यक्तिगत, तेज और मापने योग्य बना सकती है; लेकिन उसे यादगार बनाने के लिए आज भी भाषा, कहानी, संगीत और मानवीय संवेदना और सामूहिकता  की जरूरत होती  है। आज की इंटरनेट की दुनिया में यही सामूहिकता गायब है |
अमर उजाला में 06/10/2026 को प्रकाशित 

Monday, October 5, 2026

डिजिटल आर्थिकी में साइबर सुरक्षा कवच

 

डिजिटल भारत की कहानी जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उसके साथ एक दूसरी कहानी भी लगभग उसी गति से फैल रही है। यह कहानी साइबर ठगी की है। कभी जेब काटने के लिए अपराधी को आपके पास आना पड़ता था, अब उसे आपकी जेब तक पहुंचने की भी जरूरत नहीं। एक फोन कॉल, एक संदेश, एक फर्जी लिंक, एक नकली वेबसाइट या वीडियो कॉल के जरिए वह आपके बैंक खाते तक पहुंचने की कोशिश कर सकता है। अपराध का स्थान बदल गया है, तरीका बदल गया है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अपराधी और पीड़ित के बीच की भौतिक दूरी लगभग अप्रासंगिक हो गई है।भारत में डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सेवाओं का विस्तार आर्थिक अवसरों और सुविधा का बड़ा माध्यम बना है। लेकिन इसी डिजिटल विस्तार ने अपराधियों के लिए भी संभावनाओं का नया संसार खोल दिया है। समस्या केवल यह नहीं कि साइबर ठगी के मामले बढ़ रहे हैं। असली चिंता यह है कि ठग अब तकनीक के साथ मनोविज्ञान का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे केवल पासवर्ड या ओटीपी नहीं मांगते, वे डर पैदा करते हैं, लालच देते हैं, भरोसा पैदा करते हैं और कई बार पीड़ित को इतना मानसिक दबाव में डाल देते हैं कि वह स्वयं अपने खाते से रकम अपराधी के खाते में पहुंचा देता है।
गृह मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2024 में राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) और नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग एवं प्रबंधन प्रणाली (CFCFRMS) पर वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की 36,37,288 घटनाएं दर्ज की गईं। इन घटनाओं में नागरिकों द्वारा रिपोर्ट की गई कुल वित्तीय क्षति ₹22,845.73 करोड़ थी। वर्ष 2023 में यह नुकसान ₹7,465.18 करोड़ था। यानी एक वर्ष में लगभग 206 प्रतिशत की वृद्धि।
यहां एक अंतर समझना जरूरी है। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल  पर वर्ष 2024 में सभी प्रकार के साइबर अपराधों से संबंधित 22,68,346 घटनाएं रिपोर्ट हुईं, जबकि 36.37 लाख का आंकड़ा विशेष रूप से वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की घटनाओं से संबंधित है। इसलिए दोनों आंकड़ों को एक-दूसरे का पर्याय मानना उचित नहीं होगा।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी इसी चिंता की पुष्टि करते हैं। क्राइम इन इंडिया 2024 के अनुसार, देश में साइबर अपराध की श्रेणी में 1,01,928 मामले दर्ज हुए, जबकि 2023 में इनकी संख्या 86,420 थी। यानी 17.9 प्रतिशत की वृद्धि। इन मामलों में 73,987 यानी 72.6 प्रतिशत मामलों में अपराध का उद्देश्य धोखाधड़ी था। अर्थात साइबर अपराध अब कोई हाशिये की समस्या नहीं है। यह सीधे नागरिक की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा अपराध बन चुका है।साइबर ठगी का पुराना तरीका अपेक्षाकृत सरल था—फोन आया, बैंक कर्मचारी बनकर ओटीपी पूछा और खाता खाली कर दिया। अब अपराधी समझ चुके हैं कि हर व्यक्ति ओटीपी नहीं बताएगा। इसलिए उन्होंने रणनीति बदली है। अब वे तकनीकी कमजोरी से ज्यादा मानवीय कमजोरी को निशाना बनाते हैं।
इसी का सबसे चर्चित उदाहरण है ‘डिजिटल अरेस्ट’।
इसमें अपराधी स्वयं को पुलिस, सीबीआई, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय या रिजर्व बैंक का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल करते हैं। पीड़ित को बताया जाता है कि उसके नाम से कोई पार्सल मिला है, किसी अपराध में उसका बैंक खाता इस्तेमाल हुआ है या उसके खिलाफ कोई गंभीर मामला दर्ज है। इसके बाद उसे तथाकथित जांच में सहयोग के नाम पर वीडियो कॉल पर बने रहने और किसी से संपर्क न करने के लिए कहा जाता है। फिर गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे मांगे जाते हैं। गृह मंत्रालय ने स्वयं ऐसे मामलों में विभिन्न कानून प्रवर्तन एजेंसियों के नाम का दुरुपयोग किए जाने को लेकर चेतावनी जारी की है। 2024 में डिजिटल अरेस्ट और उससे संबंधित साइबर अपराधों की 1,23,672 घटनाएं NCRP पर रिपोर्ट हुईं और इनमें ₹1,935.51 करोड़ की धोखाधड़ी की सूचना दी गई। यह आंकड़ा केवल एक तकनीक की भयावहता नहीं बताता, बल्कि यह दिखाता है कि अपराधी किस तरह भय और सरकारी संस्थाओं के प्रति आम नागरिक के भरोसे का इस्तेमाल कर रहे हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है।
डर के साथ-साथ लालच भी साइबर ठगों का बड़ा हथियार है। पिछले कुछ समय में फर्जी निवेश और ट्रेडिंग के मामले तेजी से सामने आए हैं। सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर निवेश विशेषज्ञ या नामी वित्तीय संस्थान के प्रतिनिधि बनकर लोगों से संपर्क किया जाता है। उन्हें एक ऐसे ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म या ऐप से जोड़ा जाता है, जिस पर उनके निवेश के बढ़ने का नकली आंकड़ा दिखाई देता है।
शुरुआत में छोटी रकम लगवाई जाती है। स्क्रीन पर मुनाफा दिखाई देता है और भरोसा बढ़ने पर निवेश की राशि बढ़ाने के लिए कहा जाता है। जब पीड़ित रकम निकालने की कोशिश करता है तो टैक्स, प्रोसेसिंग फीस या निकासी शुल्क के नाम पर अतिरिक्त रकम मांगी जाती है। इस तरह ठगी एक बार में नहीं, कई चरणों में होती है।यहां अपराधी की सफलता तकनीक में कम और पीड़ित के मन में पैदा किए गए विश्वास में ज्यादा होती है।साइबर ठगी के पीछे केवल कॉल करने वाला व्यक्ति नहीं होता। रकम को एक खाते से दूसरे खाते में तेजी से स्थानांतरित करने के लिए म्यूल बैंक खातों का इस्तेमाल किया जाता है। ये ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका उपयोग ठगी की रकम को प्राप्त करने और आगे भेजने के लिए किया जाता है।
कई मामलों में खाते के वास्तविक धारक को यह जानकारी नहीं होती कि उसके खाते का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है। दूसरी ओर, कुछ मामलों में खाते उपलब्ध कराने के लिए कमीशन का लालच भी दिया जाता है। इससे साइबर अपराध की रकम को उसके मूल स्रोत तक पहुंचाना पुलिस के लिए कठिन हो जाता है।
साइबर ठगी में समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। पैसा एक खाते से दूसरे खाते में और फिर कई खातों में पहुंच सकता है। इसलिए शिकायत में देरी का अर्थ कई बार रकम की वापसी की संभावना कम होना है।
इसी उद्देश्य से सरकार ने 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन और नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग एवं प्रबंधन प्रणाली (CFCFRMS) की व्यवस्था की है। सरकार के अनुसार, 30 जून 2026 तक 32.80 लाख से अधिक शिकायतों में ₹11,158 करोड़ से अधिक की राशि को ठगों तक पहुंचने से बचाया गया।
साइबर अपराध की एक और चुनौती इसकी सीमा-विहीन प्रकृति है। अपराधी एक देश में, सर्वर दूसरे देश में और बैंक खाते किसी तीसरे स्थान पर इस्तेमाल कर सकता है। दक्षिण-पूर्व एशिया में मौजूद अंतरराष्ट्रीय scam compounds से जुड़े मामलों में भारतीय नागरिकों को निशाना बनाए जाने और भारतीयों की तस्करी कर ऐसे नेटवर्क में काम कराने के मामले भी सामने आए हैं।
इस स्थिति में स्थानीय पुलिस के सामने केवल अपराधी की पहचान का सवाल नहीं होता। उसके बाद अंतरराष्ट्रीय सहयोग, डिजिटल साक्ष्य, बैंकिंग लेन-देन और अलग-अलग देशों की कानूनी प्रक्रियाओं का सवाल खड़ा होता है। यही कारण है कि साइबर अपराध की जांच पारंपरिक पुलिसिंग से अलग तकनीकी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मांग करती है।
सरकार ने साइबर अपराध से निपटने के लिए कई व्यवस्थाएं विकसित की हैं। I4C के साथ नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग एवं प्रबंधन प्रणाली (CFCFRMS ), राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) और Suspect Registry जैसी व्यवस्थाएं सक्रिय हैं। दूरसंचार विभाग का संचार साथी और उसका चक्षु मंच संदिग्ध संचार और मोबाइल कनेक्शनों से जुड़े मामलों की पहचान और रिपोर्टिंग में मदद करते हैं।
लेकिन तकनीकी व्यवस्था बनाना और उसका प्रभावी इस्तेमाल दो अलग बातें हैं। जिला स्तर पर जांच अधिकारियों को डिजिटल फोरेंसिक, क्रिप्टोकरेंसी ट्रांजैक्शन, ऑनलाइन पहचान, बैंकिंग ट्रेल और अंतरराष्ट्रीय डिजिटल साक्ष्य की जांच में लगातार प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
सरकार के अनुसार 30 जून 2026 तक साइबर अपराध से निपटने के लिए साइबर फोरेंसिक और प्रशिक्षण प्रयोगशालाएं 33 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में स्थापित की जा चुकी थीं और 24,600 से अधिक कानून प्रवर्तन अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों तथा अभियोजकों को साइबर अपराध, जांच और फोरेंसिक से संबंधित प्रशिक्षण दिया जा चुका था।
तकनीक कितनी भी सुरक्षित क्यों न हो, यदि नागरिक भय या लालच में गलत निर्णय लेता है तो सुरक्षा की कई परतें कमजोर पड़ सकती हैं।
इसलिए साइबर सुरक्षा को केवल कंप्यूटर विशेषज्ञों का विषय मानना भूल होगी। नागरिकों को कुछ बुनियादी सावधानियां अपनी रोजमर्रा की आदत बनानी होंगी—अनजान लिंक पर क्लिक न करना, किसी अनजान व्यक्ति को ओटीपी या बैंक संबंधी जानकारी न देना, निवेश के असामान्य प्रस्तावों पर भरोसा न करना और सरकारी अधिकारी के नाम पर धमकी मिलने पर घबराने के बजाय संबंधित विभाग से स्वतंत्र रूप से सत्यापन करना।
भारत ने डिजिटल अर्थव्यवस्था का बड़ा विस्तार किया है। अब चुनौती केवल डिजिटल सेवाओं को अधिक तेज, सस्ता और सुविधाजनक बनाने की नहीं है। चुनौती यह भी है कि इस डिजिटल ढांचे में नागरिक का भरोसा बना रहे।सबसे अहम बात यह है कि साइबर ठगी को केवल ‘ऑनलाइन फ्रॉड’ कहकर छोटा नहीं किया जा सकता। जब एक व्यक्ति की वर्षों की बचत कुछ मिनट में चली जाती है, तो यह केवल तकनीकी अपराध नहीं रहता; यह उसके आर्थिक जीवन और सामाजिक विश्वास पर सीधा आघात होता है।
डिजिटल भारत की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि कितने लोग ऑनलाइन भुगतान कर रहे हैं या कितनी सेवाएं मोबाइल पर उपलब्ध हैं। उसकी असली परीक्षा यह होगी कि आम नागरिक इस डिजिटल दुनिया में कितना सुरक्षित और आश्वस्त महसूस करता है।

दैनिक जागरण, में 05 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित लेख 

Wednesday, September 30, 2026

सर्च की बदलती प्रकृति और डिजिटल मीडिया की मुश्किलें

 

इंटरनेट के शुरुआती दौर की उस क्रांतिकारी संकल्पना को याद कीजिए जिसने समूचे ज्ञान-जगत को एक साझे लोकतांत्रिक सूत्र में पिरो दिया था—'हाइपरलिंक' । 1990 के दशक में टिम बर्नर्स-ली ने जब वर्ल्ड वाइड वेब की नींव रखी, तो हाइपरलिंक केवल कंप्यूटर कोड का एक टुकड़ा नहीं था; वह ज्ञान के विकेंद्रीकरण, डिजिटल खुलेपन और एक-दूसरे के बौद्धिक श्रम को सम्मान देने का जीवंत माध्यम था। दशकों तक किसी भी सर्च इंजन की भूमिका एक विनम्र 'ट्रैफिक पुलिस' जैसी रही। उपयोगकर्ता अपनी जिज्ञासा लेकर आता, सर्च इंजन उसे संबंधित समाचार पत्रों, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और मूल वेबसाइटों के पते (नीले हाइपरलिंक) दिखाता, और पाठक एक क्लिक के जरिए उस मूल स्रोत के दरवाजे तक पहुँच जाता। इसी आपसी लेन-देन पर आधुनिक डिजिटल पत्रकारिता, स्वतंत्र मीडिया और ओपन-वेब (Open Web) की पूरी आर्थिकी टिकी हुई थी।लेकिन आज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और सर्च के आक्रामक गठजोड़ ने इंटरनेट की इस मूल आत्मा को कुचल दिया है। गूगल और बिंग जैसे टेक दिग्गजों ने सर्च इंजन को 'रास्ता दिखाने वाले गाइड' से बदलकर 'सर्वज्ञानी प्रकाशक' बना दिया है। 'एआई ओवरव्यूज' और ऑटोमेटेड उत्तरों के प्रसार ने खोज की प्रकृति को ही 'जीरो-क्लिक सर्च' (Zero-Click Search) में तब्दील कर दिया है। यानी अब पाठक का सवाल गूगल के पन्ने पर ही मशीनी सारांश के जरिए हल हो जाता है। पाठक को उस मूल अखबार या पत्रकार की वेबसाइट पर जाने की आवश्यकता ही नहीं बचती| यह केवल सर्च एल्गोरिदम का तकनीकी बदलाव नहीं है; यह स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता की आर्थिक जड़ों को सुखा देने वाला ढांचागत संकट है।

ऑडियंस रिसर्च फर्म स्पार्कटोरो और डेतोस) के क्लिकस्ट्रीम पैनल अध्ययन के अनुसार, अमेरिका और यूरोपीय संघ में गूगल पर होने वाले कुल सर्च में से लगभग 58.5% से 60% सर्च 'जीरो-क्लिक' में समाप्त हो जाते हैं। 1,000 अमेरिकी सर्च में से औसतन केवल 360 क्लिक और यूरोपीय संघ में 374 क्लिक ही ओपन-वेब की स्वतंत्र वेबसाइटों तक पहुँच पाते हैं। बाकी सारे क्लिक या तो गूगल के अपने उत्पादों (यूट्यूब, मैप्स, ऐड्स) में सिमट जाते हैं या यूजर बिना किसी वेबसाइट पर गए सत्र समाप्त कर देता है।

प्यू रिसर्च सेंटर के अध्ययन के अनुसार, जब सर्च पन्ने पर एआई सारांश प्रकट होता है, तो सामान्य वेब-परिणामों पर क्लिक करने की संभावना आधी रह जाती है। जिन सर्च पेजों पर एआई सारांश नहीं था, वहाँ 15% यूजर्स ने किसी लिंक पर क्लिक किया; लेकिन एआई सारांश वाले पेजों पर यह घटकर मात्र 8% रह गया। इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि एआई ओवरव्यू के भीतर जो स्रोत संदर्भ के रूप में उद्धृत होते हैं, उन पर केवल 1% यूजर्स ही क्लिक करते हैं। वहीं, अहरिफ्स) के अध्ययन बताते हैं कि एआई ओवरव्यूज के कारण शीर्ष रैंकिंग वाले पेजों के सीटीआर में 58% तक की भारी गिरावट दर्ज हुई है।

  डिजिटल कंटेंट नेक्स्ट और मीडिया ट्रैफ़िक विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक समाचार संस्थानों के सर्च रेफ़रल ट्रैफ़िक में औसतन 25% से 45% तक की सीधी गिरावट आई है। सूचनात्मक खोजों (में जीरो-क्लिक की दर 65% से 70% तक पहुँच चुकी है, जिसका सीधा असर स्वतंत्र मीडिया घरानों के डिजिटल विज्ञापन राजस्व पर पड़ा है।पत्रकारिता की यह त्रासदी एक गहरे अंतर्विरोध पर खड़ी है। सिलिकॉन वैली के एआई मॉडल्स और एल्गोरिदम खुद रिपोर्टिंग नहीं करते। वे किसी बाढ़ में कमर तक पानी में उतरकर ग्राउंड रिपोर्टिंग नहीं कर सकते, न ही किसी सरकारी दफ्तर में बैठकर घोटालों की फाइलों की पड़ताल कर सकते हैं। एआई केवल वही जानता है जो पत्रकारों और लेखकों ने अपने बौद्धिक श्रम, समय और जोखिम भरे संसाधनों से तैयार किया है।सर्च इंजनों के एआई क्रॉलर्स समाचार पोर्टलों की सामग्री को सेकंडों में खंगालते हैं, उसका सार-संक्षेप तैयार करते हैं और उसे अपने ही सर्च इंटरफेस पर सजा देते हैं। पाठक को त्वरित उत्तर मिल जाता है, सर्च इंजन उस पन्ने पर अपने विज्ञापन चलाकर अरबों डॉलर का मुनाफा कमाते हैं, लेकिन जिस पत्रकार ने वह तथ्य जुटाया था, उसे बदले में मिलता है—शून्य ट्रैफ़िक, शून्य क्लिक और शून्य विज्ञापन राजस्व।यदि कोई प्रकाशक इस डिजिटल लूट से बचने के लिए अपनी वेबसाइट के robots.txt कोड के जरिए एआई बॉट्स को ब्लॉक करने की कोशिश करता है, तो सर्च इंजन उसे मुख्य सर्च इंडेक्स से ही बाहर करने की अप्रत्यक्ष धमकी देते हैं। यह सामग्री निर्माताओं के सामने एक क्रूर विकल्प है: या तो अपनी सामग्री लुटने दीजिए, या फिर डिजिटल दुनिया से पूरी तरह अदृश्य हो जाइए।

इस 'जीरो-क्लिक' संस्कृति की सबसे घातक मार भारत जैसे विशाल देश की भाषाई और क्षेत्रीय पत्रकारिता पर पड़ रही है। बड़े वैश्विक मीडिया कॉर्पोरेशंस तो फिर भी पेड-सब्सक्रिप्शन, सम्मेलनों या ब्रांड गठबंधनों के जरिए कुछ हद तक टिक सकते हैं; लेकिन टियर-2, टियर-3 शहरों और कस्बों में स्वतंत्र रूप से चलने वाले डिजिटल पोर्टल्स और भाषाई पत्रकारों का क्या होगा? वे पूरी तरह से ओपन-वेब ट्रैफ़िक और डिजिटल विज्ञापनों पर निर्भर हैं।जब खोज इंजन ही पाठक को अपनी चहारदीवारी के भीतर रोक लेगा, तो स्थानीय न्यूज़ रूम्स में पत्रकारों की छँटनी होगी, खोजी पत्रकारिता का बजट खत्म होगा और अंततः पूरा समाज 'न्यूज़ डेज़र्ट' (समाचार-विहीन क्षेत्र) में तब्दील हो जाएगा। जब ज़मीन से नए तथ्य जुटाने वाले हाथ ही नहीं बचेंगे, तो भविष्य में यह एआई किसे खंगालेगा? क्या यह खुद अपने ही पैदा किए मशीनी कचरे को बार-बार रीसाइकल कर समाज को परोसता रहेगा?इस असंतुलन को रोकने के लिए कोई नियामक संस्था हो अब समय की मांग यही है |ऑस्ट्रेलिया के ऐतिहासिक 'न्यूज़ मीडिया बार्गेनिंग कोड' और कनाडा के 'ऑनलाइन न्यूज़ एक्ट' की तर्ज पर भारत में भी अविलंब एक विधायी ढांचा बनाया जाए। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना होगा कि गूगल और मेटा जैसी कंपनियाँ भारतीय मीडिया घरानों के कंटेंट के एआई इस्तेमाल पर पारदर्शी राजस्व साझा करें।अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) और यूरोपीय संघ की अदालतों द्वारा सर्च एकाधिकार पर चलाए जा रहे मुकदमों से सीख लेते हुए भारतीय नियामकों को सर्च इंजनों को 'मध्यवर्ती' से 'प्रकाशक' बनने की मनमानी पर रोक लगानी होगी।एआई सारांशों में केवल नाममात्र के सूक्ष्म फुटनोट देने के बजाय पाठकों को मूल रिपोर्ट तक ले जाने वाले स्पष्ट और बड़े हाइपरलिंक्स को अनिवार्य किया जाए।सर्च इंजन और मूल प्रकाशक के बीच का संबंध सहजीविता पर आधारित था—एक को सामग्री मिलती थी, दूसरे को पाठक। 'जीरो-क्लिक' सर्च और अनियंत्रित एआई समरी ने इस नाजुक संतुलन को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। यह लड़ाई केवल मीडिया कंपनियों के बैलेंस शीट की नहीं है; यह एक स्वतंत्र, विविध और तथ्यपरक सार्वजनिक विमर्श को ज़िंदा रखने की लड़ाई है। यदि समाज और शासन ने सूचना के इस एकाधिकारवादी दोहन पर समय रहते लगाम नहीं लगाई, तो बहुत जल्द इंटरनेट कॉरपोरेट सारांशों का एक ऐसा बंद कमरा बनकर रह जाएगा—जहाँ सूचनाएँ तो अनंत होंगी, लेकिन सच की स्वतंत्र गवाही हमेशा के लिए मौन हो चुकी होगी।

प्रभात खबर में 30/09/2026 को प्रकाशित लेख 


Thursday, September 17, 2026

वर्षा से मन मयूर नहीं नाचता ,डर सताता है

 

मौसम पहले मन के मिज़ाज से आते थे, अब वे मौसम विभाग की चेतावनियों और प्रदूषण सूचकांक के डरावने आंकड़ों के साथ दाखिल होते हैं। हमारे देखते-देखते जाड़ा, गर्मी और बरसात—तीनों ऋतुएं हमारे तथाकथित 'विकास' की वेदी पर कुर्बान हो चुकी हैं। अब मौसम बदलते नहीं, बल्कि जीवन की लय को झकझोर कर रख देते हैं। कुदरत का जो चक्र कभी जीवन को सहजता और ठहराव देता था, वह अब कंक्रीट के जंगलों और इंसानी आपाधापी में उलझकर दम तोड़ रहा है।
याद कीजिए, कभी गर्मियों की दोपहर का अपना एक अलग सुकून होता था। छत पर शाम को पानी का छिड़काव, खस की भीनी खुशबू, नानी के हाथ का बना आम का पना और आंगन में बिछे बिस्तरों पर तारों को गिनते हुए सो जाना। आज गर्मी का मतलब है पचास डिग्री की झुलसाती लू, तपती डामर की सड़कें और कंक्रीट के कमरों को ठंडा करने के लिए दीवारों पर चौबीसों घंटे हांफते हुए एयर कंडीशनर। हमने हरियाली काटकर जो कंक्रीट के टावर खड़े किए हैं, वे अब आग की भट्ठी की तरह दहकते हैं।
जाड़ा कभी धूप की गुनगुनाहट, तिल-गुड़ की मिठास और मां के हाथ से बुने रंग-बिरंगे स्वेटरों का नाम था। सुहानी धूप में बैठकर मूंगफली के छिलके बिखेरना और देर तक बतियाना जाड़े की रूह हुआ करता था। आज जाड़ा आते ही सूर्य देवता विकास के काले धुएं के पीछे गुम हो जाते हैं। आसमान में कोहरा नहीं, जहरीला स्मॉग तैरता है। बच्चे धूप में खेलने के बजाय एयर प्यूरीफायर वाले कमरों में कैद हो जाते हैं और सांसों की हिफाजत के लिए स्कूलों में ताले लटक जाते हैं। सर्दी अब ठिठुरन का मौसम नहीं, फेफड़ों का संकट बन चुकी है।
रही बात बरसात की, तो वह कभी मिट्टी की पहली सौंधी महक और बेपरवाह बचपन की कागज़ी कश्तियों का त्योहार थी। अब नदियों के पेट और तालाबों को पाटकर बनी पॉश कॉलोनियों में बारिश केवल जलभराव, गाड़ियों के जाम और सीवर के उफनने का खौफ लाती है। बादल बरसते हैं तो मन में कोई मयूर नहीं नाचता, बल्कि यह डर सताता है कि कल दफ्तर कैसे पहुंचेंगे।
इस सारी तबाही की जड़ में है हमारी अंधी रफ्तार। सबको बहुत जल्दी है—जल्दी आगे निकलने की, जल्दी मकान की किस्तें चुकाने की, जल्दी तरक्की की सीढ़ियां चढ़ने की। इस दौड़ में हमने जीने का ठहराव खो दिया और अपनी छोटी-छोटी मासूम खुशियों को मोबाइल की छह इंच की चमकती स्क्रीन में गिरवी रख दिया।
आज इंसान आसमान से गिरती बारिश की बूंदों को छूने से कतराता है कि कहीं कपड़े न मैले हो जाएं, तबीयत न बिगड़ जाए। मगर वही इंसान बालकनी में खड़े होकर पानी की चंद बूंदों के साथ पंद्रह सेकंड की रील जरूर शूट करता है। मिट्टी से जुड़ने, बारिश में बेधड़क भीगने और ठंड की धूप को बदन पर महसूस करने का जो सच्चा मानवीय सुख था, वह अब सोशल मीडिया के 'लाइक्स' और 'व्यूज' के बाज़ार में बिक गया है। असली बारिश में भीगने की जगह अब भीगने की रील देखना ज़्यादा तसल्ली देता है।
हमने प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ किया, उसका हर्जाना अब हमारी आत्मा चुका रही है। मौसमों से उनका मूल सौंदर्य छीनकर हमने खुद को डिजिटल पिंजरों में बंद कर लिया है। जब तक हम रुककर सांस नहीं लेंगे और कुदरत के साथ फिर से रिश्ता नहीं जोड़ेंगे, तब तक मौसम सिर्फ कैलेंडर की तारीखें बनकर रह जाएंगे—बिना किसी एहसास और बिना किसी खुशबू के।
प्रभात खबर में 17/09/2026 को प्रकाशित लेख 

Tuesday, September 8, 2026

समाज में भी फैल रही है 'ऑनलाईन चुप्पी'

 

बीते एक दशक में दुनिया ने जिस तीव्रता से डिजिटल क्रांति को अपनाया है, उसने मानव जीवन को अभूतपूर्व रूप से सुविधाजनक बना दिया है। इस तकनीकी युग में जहाँ सूचना तक पहुँच सरल हुई है, संवाद की भौगोलिक सीमाएँ सिमटी हैं और अभिव्यक्ति के नए मंच विकसित हुए हैं, वहीं इसके कुछ गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी सामने आए हैं। सोशल मीडिया, जो कभी वैश्विक स्तर पर लोगों को जोड़ने का प्रतीक माना जाता था, अब धीरे-धीरे सामाजिक अलगाव को बढ़ावा देने वाले एक सूक्ष्म लेकिन प्रभावशाली कारक के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। आज स्थिति यह है कि लोग पहले से अधिक जुड़े हुए दिखाई देते हैं, लेकिन संवाद पहले से कहीं अधिक सतही हो गया है। सोशल मीडिया पर अब बातचीत कम और प्रतिक्रिया बढ़ गई है, हर मुद्दा पक्ष और विपक्ष में बंटा हुआ है, बीच के संवाद की जगह खाली हो गई है।

डेटा रिपोर्टल के मुताबिक 2025 तक सोशल मीडिया यूजर्स की संख्या दुनिया में 5.24 अरब तक पहुँच चुकी है, जो वैश्विक आबादी का करीब 63 प्रतिशत है। वहीं सोशल प्रेस की एक रिपोर्ट की माने तो अब सोशल मीडिया केवल संवाद या संपर्क करने का एक माध्यम भर नहीं रह गया है बल्कि 34 प्रतिशत लोग इसका उपयोग समाचार पढ़ने और उससे भी अधिक लोग अपना खाली समय बिताने और मनोरंजन के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। आज का सोशल मीडिया भावनात्मक जुड़ाव के माध्यम से ज्यादा डाटा का बाजार बन गया है। हर क्लिक, हर लाइक, हर सेंकेंड बदलती स्क्रीन सब कुछ बेचा जा रहा है। और इस बाजार की मुद्रा है अटेंशन इकॉनॉमी। इस इकॉनमी में वही कंटेंट टिकता है जो चौंकाता है, डराता है या भावनाओं को उत्तेजित करता है। नतीजन हर घंटें हजारों पोस्ट, वीडियो, रील्स हमारे सामने से गुजर जाते हैं जिनमें गुणवत्ता से अधिक सतहीपन झलकता है। युवाओं में भी एक बड़ा वर्ग अब कंटेंट को सोचने के लिए बल्कि रिएक्ट करने के लिए देखता है। वहीं असहमति और आलोचना के डर से एक बड़ा वर्ग अब चुप्पी साध रहा है। यहीं से शुरु होती है एक डिजिटल त्रासदी, स्पाइरल ऑफ साइलेंस। दशकों पहले एक जर्मन समाजशास्त्री एलिजाबेथ न्यूमैन ने स्पाइरल ऑफ साइलेंस का सिद्धांत दिया था। उनका कहना था जब लोगों को लगता है कि उनकी राय बहुमत से अलग है तो वे चुप रहना बेहतर समझते हैं।  

यह स्थिति उस शुरुआती ख्याल से बिल्कुल उलट है, जिसके साथ सोशल मीडिया हमारे जीवन में आया था।शुरुआत में यह माना गया था कि यह मंच आम आदमी की आवाज़ बनेगा। समाज में खुला संवाद होगा और विचारों का लोकतंत्रीकरण होगा। लेकिन आज एक अजीब सी विडंबना हमारे सामने आती है, दुनिया एक मंच पर तो आ गई लेकिन यह मंच संवाद से ज्यादा शोर में तब्दील हुआ दिखाई पड़ता है।

यह सिद्धांत आज सोशल मीडिया पर भी सटीक लागू हो रहा है।सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर काम करने वाले एल्गोरिदम इस तरह बनाए जाते हैं कि वे हमें वही सामग्री बार-बार दिखाएँ, जिसे हम पहले पसंद या क्लिक कर चुके हैं। इसके चलते हमारे सामने वही विचार और ट्रेंड आते रहते हैं, जो पहले से लोकप्रिय हैं। इसी प्रक्रिया को फिल्टर बबल कहा जाता है—जहाँ उपयोगकर्ता एक सीमित दायरे में फँस जाते हैं और अलग-अलग दृष्टिकोण उनसे छिप जाते हैं।
इस माहौल में जब कोई असहमति व्यक्त करता है, तो अक्सर उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है या ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। परिणामस्वरूप बहुत से लोग अपने विचार साझा करने से हिचकिचाने लगते हैं। वे सोशल मीडिया पर मौजूद तो रहते हैं, लेकिन सक्रिय भागीदारी नहीं करते—सिर्फ पोस्ट पढ़ते हैं, रील्स देखते हैं और चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं।
उनके अंदर ये भावना आ जाती है कि उन्होंने कुछ लिखा तो वह ट्रेंड या लोकप्रिय नहीं होगा। धीरे-धीरे यह चुप्पी ऑनलाइन दुनिया के बाहर भी फैल रही है। दफ्तरों, कॉलेज और पारिवारिक चर्चाओं में भी लोग अपनी मौलिक राय व्यक्त करने से बचते हैं। नतीजा यह होता है कि बहस की जगह प्रतिक्रियाएँ और केवल सहमति वाले विचार ही बने रहते हैं।
वेसलेयन यूनिवर्सिटी के एक शोध में सामने आया है कि जो लोग सोशल मीडिया पर चुप रहते हैं वे अब असल जिंदगी में भी अपनी राय देने से कतराते हैं। अब बहुमत की राय वह नहीं है जो वे सोचते हैं बल्कि वह है जो प्लेटफॉर्म दिखाना चाहता है, एल्गोरिदम तय करता है कि कौन सी आवाज दिखेगी और कौन सी दब जाएगी।
आज हम ऐसे दो राहों पर खड़े हैं जहाँ तकनीक तो 2026 की है लेकिन हमारी सामाजिक समझ और मानसिक सुकून कई साल पीछे छूट गया है। वह सपना कि सोशल मीडिया लोगों के बीच दूरियाँ मिटाएगा आज एक डिजिटल भीड़ में बदल गया है जहाँ हम करोड़ों लोगों के बीच होते हुए भी अपनी बात कहने में असुरक्षित महसूस करते हैं। यह स्पाइरल ऑफ साइलेंस और एल्गोरिदम की बनाई दीवारे केवल हमारे फोन तक ही नहीं हमारे सोचने और बोलने पर भी प्रभाव डाल रही है। अंतत: यह जिम्मेदारी हम यूजर्स की है, अगर हमें इस डिजिटल जेल औऱ फूहड़ कंटेंट के जाल से बाहर निकलना है तो हमें मूक दर्शक बनना छोड़ना होगा। हमें एक ऐसे मंच का निर्माण करना है जहाँ संवाद में असहमति का भी सम्मान हो और अभिव्यक्ति का मतलब सिर्फ लाइक पाना न हो। वरना यह ग्लोबल विलेज केवल एक संख्या और स्क्रीन का घर बनकर रह जाएगा, जहाँ लोग जुड़े तो रहेंगे लेकिन उनके बीच असली संवाद, समझ और रचनात्मकता लुप्त हो चुकी होगी। क्योंकि असली अभिव्यक्ति वही है जहाँ डर न हो और असली जुड़ाव वही है जहाँ मतभेद हों।
प्रभात खबर में 08/09/2026  को प्रकाशित 

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