Monday, February 25, 2013

रेडियो ही गाँव के लोगों का अपना माध्यम है


सूचना क्रांति का शहर केंद्रित विकास देश के सामाजिक आर्थिक ढांचे में डिजीटल डिवाईड को बढ़ावा दे रहा है ऐसे में रेडियो ही एक ऐसा जनमाध्यम है जो ग्रामीण भारत की सूचना जरुरत को पूरा करने में सक्षम है पर मुनाफे की इस दुनिया में भारत के उन लोगों की आवाज़ हाशिए पर ही है जो गाँवों से आते हैं .इसका एक अच्छा विकल्प सामुदायिक रेडियो हो सकता है. देश की जनसँख्या, और सांस्कृतिक विशिष्टताओं के हिसाब से यह संख्या नाकाफी है. भारत के दो छोटे  पडोसी देश नेपाल और श्रीलंका का रिकोर्ड सामुदायिक रेडियो के संदर्भ में  बहुत बेहतर है. संभावनाओं के लिहाज़ से सरकार ने इसके विकास पर ध्यान नहीं दिया है. इस समय भारत में एक सौ छबीस सामुदायिक रेडियो स्टेशन प्रसारण कर रहे हैं सरकार ने सामुदायिक रेडियो आंदोलन को बढ़ावा  देने के लिए 12वीं पञ्च वर्षीय  योजना में सौ करोड़ रुपये उपलब्ध कराएगी.इस  योजना अवधि के दौरान पांच सौ नये सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की स्थापना का प्रस्ताव है.  जिसमे वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए नब्बे  करोड़ रुपये का प्रस्तांव किया गया हैजबकि प्रशिक्षणक्षमता निर्माण और सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की जागरूकता संबंधी गतिविधियों के लिए दस करोड़ रुपयों का प्रस्ताव किया गया है. इस क्षेत्र को अनुसंधान ओर नवीकरण के लिए अनुदान देने हेतु भी प्रावधान किये गये  हैं.देर से सही पर यह सही दिशा में उठाया गया कदम है. केन्द्र सरकार सामुदायिक रेडियो ऑपरेटरों से लिया जाने वाला वार्षिक स्पैक्ट्रम शुल्क भी  पूरी तरह से समाप्त करने पर विचार कर रही है भारत में सामुदायिक रेडियो का इतिहास बहुत पुराना नहीं है एक लंबे अरसे तक रेडियो तरंगों पर सरकारी अधिपत्य रहा है. सुप्रीम कोर्ट का फरवरी 1995 में दिया गया आदेश निर्णायक रहा जिसके अनुसार   ध्वनि तरंगे   सार्वजनिक सम्पति है और यहीं से भारत में  रेडियो के बहुआयामी विकास का रास्ता खुला यह तथ्य अलग है कि सरकार ने रेडियो के पूर्णता व्यावसायिक पक्ष पर ध्यान दिया और एफ एम् रेडियो स्टेशन शहर केंद्रित रहे . सामुदायिक रेडियो स्टेशन पचास वॉट की शक्ति वाले ट्रांसमीटर की सहायता से  पांच से पंद्रह किलोमीटर के कवरेज क्षेत्र तक पंहुचने वाले ऐसे छोटे रेडियो स्टेशन हैं जो ऍफ. एम. बैंड पर प्रसारण करते हैं एफ एम् बैंड पर प्रसारण करने के कारण इनकी आवाज़ गुणवत्ता पारम्परिक रेडियो प्रसारण से बहुत बेहतर होती है . इन सामुदायिक स्टेशनों को व्यवसायिक एफ.एम. रेडियो स्टेशन  की तरह उन्मुक्त विज्ञापन सुविधा का लाभ नहीं दिया जाता. इनकी स्थापना का मुख्य  उद्देश्य  सिर्फ  मनोरंजन न होकर शिक्षा,स्वास्थ्यपर्यावरण  पर जनजागृति लाना और लोकसंस्कृति के संरक्षण विकास   के लिए कार्य करना है. यह सीमित मात्रा में ही विज्ञापन ले सकते हैं.
भारत बदल रहा है पर गाँव तकनीक के तारों से उतनी तेजी से नहीं जुड़े जनमाध्यम का दावा करने वाले समस्त माध्यम शहर केंद्रित ही रहे सिर्फ रेडियो ही एक ऐसा माध्यम है जो गाँव के लोगों का अपना माध्यम रहा पर तकनीकी गुणवत्ता के लिहाज से ये प्रसारण उतने श्रवणीय नहीं रहे दूसरे देश में हुई मोबाईल क्रांति ने हर हाथ में रेडियो पहुंचा दिया पर मोबाईल रेडियो की समस्या यह है कि यह सिर्फ एफ एम् बैंड पर ही काम करते हैं ऐसे में आकाशवाणी का पारम्परिक प्रसारण इस तकनीक को गाँवों में आगे नहीं बढ़ा पाया.ऐसे बदलाव की प्रक्रिया में सामुदायिक रेडियो की तरक्की का रास्ता खुला जो अपने विशेषीकृत कार्यक्रमोंसे भौगोलिक और समान  रुचि के श्रोताओं की सेवा कर सकते हैं. वे ऎसी सामग्री का प्रसारण करते हैं जो कि किन्हीं स्थानीय/विशिष्ट श्रोताओं में लोकप्रिय हैजिनकी अनदेखी महज इसलिए कर दी जाती है कि वे व्यवसायिक रूप से मुनाफा नहीं दे सकते इनका सञ्चालन सामुदायिक स्तर पर होता है जो लाभ कमाने के लिए नहीं होता,यह व्यक्ति विशेषसमूह और समुदायों की अपनी परम्पराओं, अनुभवों को    श्रोताओं तक बांटने की प्रक्रिया को आसान बनाते हैं.भारत के गाँवों के लिए यह रेडियो सही मायने में जनमाध्यम की भूमिका निभा सकते हैं सरकार को इस दिशा में और ठोस प्रयास करने की जरुरत है कम से कम हर ब्लॉक में एक सामुदायिक रेडियो की स्थापना होनी चाहिए जिसके संचालन का जिम्मा पंचायतों के द्वारा किया जाना चाहिए.गाँवों में सूचना प्राप्ति का बड़ा माध्यम अभी भी रेडियो ही है तकनीक के लिहाज से गाँवों की क्या स्थिति है इसकी बानगी ये आंकड़े करते हैं इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिकभारत की ग्रामीण जनसंख्या का दो प्रतिशत ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहा है. इस वक्त ग्रामीण इलाकों के कुल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से 18 प्रतिशत को इसके इस्तेमाल के लिए 10 किलोमीटर से ज्यादा का सफर करना पड़ता है.
गाँव कनेक्शन 24/02/13 के साप्ताहिक अंक  में प्रकाशित लेख

2 comments:

Bhawna Tewari said...

sir, radio gaanv hi nahin shaihron me rehne waalo ka bhi apnaa hi madhyam hai bs swaroop bdl gya h

Navneet verma said...

saamudaiek redio mai manoranjan,shiksha,swvasthya and paryavaran ka sath sath unka hit mai bani sarkari yojnaaien ke sahi sahi jaankari bhi uplabdh karai jaye.
ise Raajneeti or vyavasayic prachaaro say mukt rakhha jaye...

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