Sunday, April 14, 2013

गाँवों में सबको चढा आई पी एल का जोश


गर्मियों का मौसम छुट्टियों का मौसम खेलो का मौसम शहर में तो मैदान गुलजार रहते हैं क्रिकेट से पर अब गाँव भी उदारीकरण की बयार और टीवी के प्रसार से इससे अछूते नहीं रहे आई पी एल भले ही क्रिकेट में मनोरंजन का तडका हो पर अब ये गाँवों में भी इसका जादू सर चढ़कर बोल रहा है |बाजार में बदलती इस दुनिया के हिसाब से बुरा कुछ नहीं है दर्शक खुश है विज्ञापनदाता पैसे बना रहे हैं टीवी को दर्शक और विज्ञापन मिल रहे हैं पर यह सब किसकी कीमत पर हो रहा है ये सवाल महत्वपूर्ण है|गाँव से शहर आये दादी दादा माता पिता वहां से अपने खेल भी लाये थे चाहे  वो आईस पाईस (लुका छुपी ),गिल्ली डंडा,खो खो या कबड्डी|धीरे धीरे ये खेल शहरीकरण की आंधी में अपना वजूद सम्हाल नहीं पाए और कबड्डी कब फिस्सड्डी बन गया हमें पता ही नहीं चला दादा दादी की पीढ़ी यादों का हिस्सा बन गयी और उनके बाद की पीढ़ी शहरी हो गयी जिसके पास देने के लिए एक ही खेल बचा क्रिकेट बाकी खेल की जगह रीयल मैदान की जगह वर्चुअल कम्प्युटर की स्क्रीन ने ले ली |एक उम्मीद जरुर थी कि गाँव में इनका वजूद है और रहेगा पर गाँव जब शहर जैसे बनने लगे और वैश्वीकरण की हवा वहां से गुजरी तो सारे खेल क्रिकेट जैसे हो गए |ऐसे में गाँव के पारंपरिक खेल लट्टू घुमाना, रस्सा खींचरस्सी कूद,सिकडी  बस यादों में ही बचे हैं| आज से कुछ वर्ष पूर्व तक जहाँ ग्रामीण अंचल में पारंपरिक खेलों की धूम मचा करती थी अब उनके स्थान पर आधुनिक खेलों ने कब्जा जमा लिया है गर्मियों की दोपहर गांव के बच्चों की धमा चौकड़ी से गुलजार रहा करती थी इस तरह के खेल बच्चों की  शारीरिक क्षमता बढ़ाने में बहुत उपयोगी रहते थे  लेकिन जब से गांवों में क्रिकेट व टेलीविजन का प्रचलन बढ़ा है ये खेल बस यदा कदा खेलते हुए देखे जा सकते हैं | कभी शाम होते ही गाँव में कबड्डी-कबड्डी की आवाजें लोगों में  जोश और उत्साह से भरी दिया करती थी फिर क्या बच्चा,बूढा और जवान सब इस खेल का लुत्फ़ लेने में डूब जाया करते थे । बिना किसी प्रकार के ताम झाम वाले इस खेल में लोगों  को अपनी शारीरिक व मानसिक फुर्ती  का प्रदर्शन करना पड़ता है।पर  ग्रामीणों का यह प्रमुख खेल गावों की सामान्य  दिनचर्या का हिस्सा नहीं रहा|क्रिकेट के आगे  हारते इन ग्रामीण खेलों को जीतने के लिए कई मोर्चों पर जीतना होगा चुनौती मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं पर समस्या कहाँ से शुरू हुई इसको समझने की जरुरत है इसका बड़ा कारण वैश्वीकरण है जहाँ सब कुछ एक जैसा है जहाँ वैविध्य की कोई जरुरत नहीं बस वो बिकना चाहिए और हमारे खालिश खेल इससे बच नहीं पाए खेल जबसे बाजार का हिस्सा हुए है तब से इससे कोई मतलब नहीं रह गया कि मानव सभ्यता के इतिहास में इनका अस्तित्व क्यों रहा है इनमें इतना वैविध्य क्यूँ है सब कुछ नफे नुकसान के चश्मे से देखा जाने लग गया है| तेज़ गति और भरपूर रोमांच से भरा  फ़ॉर्मूला वन खेल हो या चौके छक्के पर ठुमका लगाती चीयर लीडर पिछले कुछ सालों  में ग्लैमर और पैसे वाले खेल भारत के शहरों में जगह बना रहे हैं पर अब गाँव भी पिछड़ने के डर से हर उस चीज को अपना लेना चाहते हैं जो शहरों में हो रहा है| कोई भी बड़ा बदलाव अवसर लाता है और चुनौती भी गाँव में भी क्रिकेट लोकप्रिय हो रहा है इसका कारण विश्वस्तर पर क्रिकेट में भारत का लगातार अच्छा प्रदर्शन रहा है जिससे उसे मीडिया और कॉर्पोरेट घरानों का साथ मिला पर गाँव के अन्य खेल इस चुनौती में टिक नहीं पाए अगर इन पारंपरिक खेलों को बचाना  है तो सरकारी और कॉरपोरेट मदद के साथ-साथ पुराने खेलों में मार्केटिंग के आधुनिक तरीके अपनाने होंगे| इसका प्रमुख कारण यह है कि ग्रामीण खेलों के प्रति बच्चों की रुचि जगाने वाली कोई संस्था नहीं है। लोगों के बीच इन खेलों की लोकप्रियता बढ़ाई नहीं गई। इन ग्रामीण खेलों को सिखाने के लिये क्रिकेट की तरह का कोई कोच भी नहीं है।ये मार्केटिंग का दबाव ही था कि पंजाब में जब कबड्डी का विश्वकप आयोजित हुआ था तो लोगों को कबड्डी के इस विश्व कप के बारे में बताने के लिए शाहरुख खान को बुलाना पड़ा जिससे यह आयोजन मीडिया का ध्यान केंद्रित कर पाया बहरहाल हमारे खेल अभी क्रिकेट से बुरी तरह हार रहे हैं और हम एक दर्शक के तौर पर इन खेलों की हार पर महज दर्शक ही बने हैं और यह परम्परागत खेल हमारी ओर उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं कि हमारा आधुनिक खेलों से कोई झगड़ा नहीं बस हमें तो हमारे हिस्से का मुट्ठी भर आकाश चाहिए |
गाँव कनेक्शन के 13 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित  

2 comments:

Sudhanshuthakur said...

कुछ वर्ष पूर्व गांव में जो व्यक्ति कुश्ती या कबड्डी का बढि़या खिलाड़ी होता था, उस पर पूरे गांव के साथ-साथ अन्य गांव के लोग भी गर्व करते थे कि उनके इलाके या गांव का लड़का बढि़या खिलाड़ी है। इतना ही नहीं गांव के लोग उस खिलाड़ी को दूध, लस्सी, घी व अन्य खाने-पीने की चीजें उपलब्ध करवाते थे ताकि वह और आगे बढ़ें, लेकिन आधुनिक दौर ने पुरानी खेलों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। आई पी एल के खेल ने तो देहाती खेलों को बुरी तरह से पछाड़ दिया है। गांवों का युवा आई पी एल देखने में रूचि नही रखते है वह सट्टे लगाने के वजह से आई पी एल देखता है यही कारण है गांवो में लोगो लो आई पी एल का जोश चढ़ रहा है ।

Saher Altaf said...

Jahan hum ek taraf bharat ke vikaas ki baat karte hain aur ma-baap apne bachcho ko angrezi khel, tareeqe wa rakh rakhav sikhane ke piche pade hue hain wahi doosri taraf ye blog padh kar mujhe khushi hai ki akeli hi nahin jisko wo purane khel pasand hain. Un khelon ko badhawa mile aur humare desh ki sanskriti ko bhi antarashtreeya level par samman mile, bas yahi choti si aasha hai. :)

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