Saturday, June 7, 2014

छोटे राज्य ज्यादा सफल

इतना बेबस हूँ कि उत्तर प्रदेश हूँ उत्तर प्रदेश की बेबसी का अंदाज़ा उसके आर्थिक पिछड़ेपन,बढते अपराध और प्रशासनिक अक्षमता से लगाया जा सकता है.उत्तराखंड के अलग होने के बाद भी उत्तर प्रदेश अभी भी जनसँख्या और क्षेत्रफल में भारत के बड़े राज्यों में से एक है.अब ये माना जाने लग गया है कि उत्तरप्रदेश के पिछडेपन के लिए इसका आकार जिम्मेदार है.लगभग बीस करोड की जनसँख्या वाला प्रदेश दुनिया के कई देशों से बड़ा है. यूपी में इस समय  देश में सबसे ज़्यादा यानी 75 ज़िले और 18 मंडल हैं.इतिहास बताता है कि छोटे राज्य विकास व प्रशासन के मामलों में बड़े राज्यों से बेहतर साबित होते हैं.छतीसगढ ,उत्तरांचल और झारखंड ने यह साबित भी कर दिखाया है कि कैसे यह अपने मूल राज्यों से अलग होने के बाद तरक्की की सीढीयां चढ़े हैं. आंकड़ों के लिहाज से भारत में लगभग  साढ़े तीन करोड़ लोग एक राज्य में निवास करते हैं जबकि ब्राजील के लिए यह संख्या 70लाखअमेरिका के लिए 60 लाख और नाइजीरिया के लिए 40 लाख है.भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में राज्य का बंटवारा एक चुनावी मुद्दा है। काफी लंबे वक़्त से इसे चार हिस्सों पूर्वाआँचल, बुंदेलखंड, हरित प्रदेश और अवध में बांटने की बात चल रही है। बहुजन समाजवादी पार्टी ने इसे पिछले चुनावों के दौरान अपने घोषणापत्र में भी शामिल किया था। छोटे राज्य प्रशासनिक दृष्टि से बेहतर माने जाते हैं। हालांकि हमारे देश में जब भी बँटवारे की बात होती है उसके गर्भ में राजनैतिक गुणा-भाग अधिक होता है और विकास की अवधारणा कम। स्वतंत्रता के तुरंत बाद से ही देश के भीतर भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन को लेकर कई देश के अलग-अलग हिस्सों से आवाज़ें उठने लगीं थीं। उस दौरान राज्यों के आकार एवं आर्थिक सामर्थ्य पर कोई चर्चा नहीं होती थी। राज्य के बँटवारे के विरोध में यह तर्क दिये जाते हैं कि इससे क्षेत्रवाद एवं प्रांतीयता को बढ़ावा मिलेगा जो कि अंततः देश की एकता एवं अखंडता के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। साथ ही यह तर्क भी दिया जाता है कि झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ का विकास उस गति से नहीं हुआ जैसा कि अपेक्षित था। परंतु यह उसी प्रकार का तर्क है कि जैसे यदि मनरेगा का लाभ वास्तविक लाभार्थियों को नहीं मिल रहा तो मनरेगा को ही समाप्त कर देना चाहिए। साथ ही यह तर्क आधारहीन भी है क्योंकि आज़ादी के बाद भी देश में कई नए राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, छतीसगढ़, झारखंड बने हैं पर उनकी वजह से देश की एकता या केन्द्रीय सरकार की सर्वोच्चता को कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नुकसान नहीं हुआ है।
छोटे राज्यों के गठन को हमें राजनैतिक नहीं अपितु व्यावहारिक दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। देश की आज़ादी के बाद भाषायी आधार पर बने राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हाल ही में विभाजित हुआ आंध्र प्रदेश आकार एवं जनसंख्या की दृष्टि से कई देशों से भी बड़े हैं। बाबा साहब अंबेडकर का मानना था कि राज्यों का विभाजन व्यावहारिकता के आधार पर होना चाहिए न कि भाषा के आधार पर। बड़े राज्यों के अंदर के छोटे क्षेत्रों जैसे उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड और महाराष्ट्र के विदर्भ की आर्थिक बदहाली छोटे राज्यों के गठन की बढ़ती मांग के मूल में है। साथ ही विगत कुछ वर्षों में जिस प्रकार राष्ट्रिय स्तर पर क्षेत्रीय पार्टियों का महत्व बढ़ा है उसने भी नए राज्यों के गठन की मांग को बल दिया है। देश के जो हिस्से देश की उन्नति का हिस्सा बनने से रह गए हैं वहाँ से आर्थिक एवं प्रशासनिक आधार पर नए राज्यों के गठन की मांग ज़ोर पकड़ रही है। छोटे राज्य बनने से सरकार जनता के करीब होगी। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कई ज़िला मुख्यालयों तक जाने के लिए 100 किलोमीटर तक का सफर तय करना पड़ता है जो कि सामान्य जन के लिए आर्थिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से काफी कठिन है। छोटे राज्यों के गठन से यह दूरी काफी कम हो जाएगी और प्रशासन तक सामान्य लोगों की पहुँच बढ़ जाएगी। छोटे राज्यों का प्रबंधन अधिक बेहतर ढंग से किया जा सकेगा। तेलंगाना के गठन के बाद भी भारत के राज्यों की औसत जनसंख्या 4 करोड़ से भी अधिक है। इसकी तुलना  यदि यूरोपियन यूनियन से की जाये तो वहाँ की उसमें 28 देश हैं जिनकी औसत जनसंख्या लगभग 18 करोड़ है। छोटे राज्यों में समरूपता भी अधिक होगी। यह राजनैतिक एवं प्रशासनिक दृष्टि से भी वांछनीय है क्योंकि अधिक विविधता निर्णय लेने की प्रक्रिया को जटिल बना देती है। यह विविधता केवल सांस्कृतिक एवं भाषायी नहीं है बल्कि आर्थिक एवं सामाजिक भी है। जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति बुंदेलखंड और विदर्भ की मुंबई एवं पुणे से पूर्णतः अलग है जिससे कि कई प्रशासनिक दिक्कतें आतीं हैं।
हालांकि छोटे राज्यों के गठन से नीति निर्माण से लेकर प्रशासन तक की सारी दिक्कतें दूर हो जाएंगी ऐसा भी नहीं है पर सैद्धान्तिक रूप से इनके गठन से फायदा ही अधिक होने की उम्मीद है और नुकसान कम। 
पत्रिका में 07/06/14 को प्रकाशित 

1 comment:

Suraj Verma said...

एक बात याद आ रही है की कम संतान,सुखी इंसान । मतलब सीमित परिवार होगा तो विकास,शिक्षा,पालन पोषड आदि अच्छे से होता है। ठीक उसी प्रकार राज्यो का भी है। इस लिए छोटे राज्य ज्यादा विकसित है।

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