Wednesday, February 25, 2015

खत्म होते प्रबंधन संस्थान

भारत की अर्थव्यवस्था में तेज़ी आने के साथ ही जगह जगह कुकुरमुत्तों की भांति प्रबंधन संस्थान उग आए थे। पर हाल ही के दिनों में अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने के साथ ही प्रबंधन गुरु पैदा करने का दावा करने वाले इन संस्थानों की दुकानों पर भी ताले लगने शुरू हो गए हैं। आल इंडिया काउन्सिल फॉर टेक्नीकल एजुकेशन (ए आई सी टी ई ) के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2012 से 2015 के दौरान लगभग तीन सौ  प्रबंधन संस्थानों की दुकानों पर ताला लग चुका है। इतनी तेज़ी से बंद होते इन संस्थानों के हालात इस बात की ओर इशारा करते हैं कि विगत कुछ वर्षों में भारतीय मध्यम  वर्ग पर प्रबंधन शिक्षा का जो खुमार चढ़ा था वह अब धीरे धीरे उतरने लगा है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के अनुसार आज की तारीख में भारत में प्रबंधन की डिग्री अथवा डिप्लोमा देने वाले 3217 संस्थान हैं जबकि वर्ष 2011-12 के दौरान यह आंकड़ा 3541 था। यह हमारे देश में प्रबंधन डिग्री की घटती लोकप्रियता की ओर इशारा है। केवल झारखंडबिहार और केरल को छोड़कर देश के सभी राज्यों में प्रबंधन संस्थानों की संख्या में गिरावट आई है। बंद होने वाले प्रबंधन संस्थानों की संख्या के मामले में महाराष्ट्र पहले स्थान पर है जहां चौबीस प्रबंधन संस्थानों ने अपना काम काज समेटा जबकि दूसरा स्थान तमिलनाडू का है जहां तेईस ऐसे संस्थानों पर ताला लगा। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के अनुसार वर्ष 2007 से वर्ष 2012 के दौरान हमारे देश में लगभग नौ सौ  से भी अधिक प्रबंधन संस्थान खुले। यह वह दौर था जब हमारी अर्थव्यवस्था की विकास दर सात प्रतिशत के करीब थी। पर जैसे ही पिछले कुछ सालों में अर्थव्यवस्था में मंदी आने लगी तो उसका असर इन प्रबंधन संस्थानों के ऊपर भी पड़ा और इन्हें मजबूरन अपना काम काज समेटना पड़ा। साथ ही कॉर्पोरेट जगत को भी यह बात समझ में आ गयी कि गली गली खुले इन प्रबंधन संस्थानों में से निकलने वाले विद्यार्थी उनके किसी काम के नहीं हैं। इसलिए उन्होने कुछ चुनिन्दा प्रबंधन संस्थानों से ही पढे विद्यार्थियों को ही लेने का निर्णय किया। वर्ष 2014 में भारत में प्रबंधन की शिक्षा पर आई एक रिपोर्ट में भारत के प्रबंधन संस्थानों में शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर काफी चिंता जाहिर की गयी है। इस रिपोर्ट के अनुसार चूंकि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद केवल अनुमोदन के लिए ही अधिकृत है और इन संस्थानों में पढ़ाये जाने वाले पाठ्यक्रम या पढ़ाने के तरीकों पर हस्तक्षेप करने का अधिकार उसे प्राप्त नहीं है इसलिए भी इन संस्थानों में शिक्षा का स्तर बनाए रखना मुश्किल है। इन प्रबंधन संस्थानों में शिक्षा के गिरते स्तर का एक कारण यह भी कि पिछले कुछ वर्षों में प्रबंधन की सीटों में जितना इजाफा हुआ है छात्रों का रुझान उतना ही कम हुआ है और इसी वजह से स्नातक की डिग्री रखने वाला कोई भी छात्र किसी न किसी प्रबंधन संस्थान में स्थान पा ही जाता है। एक अमेरिकी गैर सरकारी संस्था एसोशिएसन टू एडवांस कौलीजियेट स्कूल ऑफ़ बिजनेस  के अनुसार भारत में प्रबंधन की डिग्री प्रदान करने वाले संस्थानों की संख्या लगभग चार हजार है जो कि अमेरिका से लगभग दुगनी है। पर हमारे देश में मौजूद प्रबंधन संस्थानों की हालत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2015 में फ़ाइनेंशियल टाइम्स द्वारा जारी एक वैश्विक रैंकिंग में सिर्फ तीन भारतीय  संस्थान हैं जिनमें से दो सरकारी और एक गैर-सरकारी है। इनमें से कोई भी पहले दस में भी स्थान बनाने में सफल नहीं हुआ है और अहमदाबाद स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान - जो की देश में प्रबंधन की शिक्षा देने वाला  सर्वश्रेष्ठ संस्थान माना जाता है – सिर्फ छबीस्वें पायदान तक पहुँच पाया। क्रिसिल द्वारा वर्ष 2014 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय प्रबंधन संस्थानों में उपलब्ध सीटों में लगभग अस्सी प्रतिशत सीटें ऐसे संस्थानों के पास हैं जिनके पास न तो मूलभूत सुविधाएं हैं और न ही स्तरीय शिक्षक। ऐसे में इन संस्थानों से डिग्री प्राप्त करने वाले छात्रों के ज्ञान के स्तर का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। यही वजह है की इन संस्थानों के प्रति छात्रों का रुझान कम होता जा रहा है। इसी रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि वर्ष 2013-14 के दौरान  अधिकतर प्रबंधन संस्थानों में तीस प्रतिशत से चालीस  प्रतिशत तक  सीटें खाली रह गईं थीं। यदि इन शिक्षण संस्थानों की यही स्थिति रही तो आने वाले कुछ वर्षों में इनके लिए छात्र ढूंढ पाना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि अधिकतर छात्र या तो उन पेशेवर पाठ्यक्रमों का रुख करेंगे जो उन्हें नौकरी दिला सकें अथवा वे सिर्फ सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन संस्थानों में ही दाखिला पाने की कोशिश करेंगे। इन आंकड़ों से यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि यदि इन प्रबंधन संस्थानों ने अपने को बहतर नहीं बनाया तो आने वाले कुछ वर्षों में प्रबंधन की डिग्रियाँ बांटने वाले इन संस्थानों कि हालत और भी बदतर हो जाएगी। 
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 अमर उजाला में 25/02/15  को प्रकाशित 

1 comment:

Anjali Singh said...

hamare desh me har chij ka ek daur chlta hai.... pehle b.tech ka aisa hi kuch haal hua. . hr dusre ghr me ek bachha b.tech ka hota... fr management ka wahi hua... aur ab banking ka bhi kuch aisa hi haal hone wala hai...

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