Friday, June 26, 2015

बर्फ के पहाड़ों से सीखें जिंदगी का फलसफा

वैसे गर्मी की बात आते ही पहला ख्याल जो जेहन में उठता है वो है गर्मी की छुट्टियाँ तो इस बार छुट्टियों में मैं भी लद्दाख की यात्रा पर निकल गया ,मैं समझ गया आप क्या सोच रहे हैं यही न की मैं छुट्टी  पर गया तो इससे आप सबको क्या मतलब .बात सही है पर आप इतनी जल्दी अधीर क्यों हो जाते हैं मैं जानता हूँ कि मेरी लद्दाख यात्रा से आपको कोई मतलब नहीं है पर जो कुछ मैं आगे लिखने जा रहा हूँ उस कहानी का एक किरदार हम सब कहीं न कहीं हैं .अब देखिये न हम सब कहीं न कहीं एक यात्रा में तो ही न बच्चे से जवान और जवान से बूढ़े फिर मौत ये है हर इंसान की यात्रा का किस्सा है .तो आज हम अपनी लद्दाख यात्रा के बहाने जिन्दगी के फलसफे को समझने की कोशिश करते हैं .जब हम किसी भी यात्रा में चलते हैं तो सब कुछ थम सा जाता है भले ही ट्रेन या बस चल रही होती पर हमारे अन्दर सब कुछ कितना शांत हो जाता और हो भी क्यों न हों जब हम सफर में होते हैं तो बाकी की दुनिया से कट जाते हैं यानि अब उस दुनिया में होने वाली किसी भी हलचल से पर हमारा कंट्रोल नहीं होता है. वैसे जैसे ही हमारी यात्रा ख़त्म होती है हम फिर दुनिया में होने वाली घटनाओं से जुड़ जाते हैं.हर सफ़र की एक मंजिल होती है उसी तरह हमारे जीवन का अंतिम सत्य तो मौत ही न ,अरे भाई डरिये मत जब हम सफ़र में निकलते हैं तो हमें क्या पता होता है कि सफर कैसा बीतेगा अब मुझे ही ले लीजिये दिल्ली एयरपोर्ट पर तीन घंटे इंतज़ार करना पड़ा .आखिर सफर जो करना था.उसी तरह जिन्दगी की इस यात्रा में कब ,क्या और कहाँ मिलेगा किसी को पता नहीं होता तो जिन्दगी में कल क्या होगा इस बात की परवाह किये बगैर अपना सफ़र जारी रखिये.वैसे भी किसी यात्रा में चलना ही हमारे हाथ में होता है बाकी ट्रेन ,बस या उस माध्यम पर निर्भर करता है जिस से हम यात्रा कर रहे होते हैं.
जब हम लेह में उतरे तो वहां  हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड थी जब पूरा भारत जलाने वाली गर्मी से झुलस रहा था हम रजाई लपेटे आग से हाथ ताप रहे थे चूँकि पुरी तैयारी से गए थे इसलिए उस ठण्ड का सामना आसानी से कर लिया तो जिन्दगी में हर रंग के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए क्या पता कब कौन सा जिन्दगी का रंग सामने आ जाए.वैसे लेह में भले ही ठण्ड थी पर धूप भी बहुत चमकीली निकलती थी तो दिन में ठण्ड उतना नहीं सताती थी .क्या समझे अरे भाई अगर यात्रा में कुछ कठिनाई आती है तो उससे निकलने का रास्ता भी.पूरा लद्दाख सर उठाये ऊँचे  पहाड़ो से घिरा है .कभी आपने गौर किया बर्फ से ढंके ये पहाड़ हमें बताते हैं जिन्दगी की यात्रा में भले ही कितनी मुश्किलें क्यों न आयें हमें तनकर उनका सामना करना चाहिए. हम नुब्रा घाटी की तरफ चले वहां का एन्वायरमेंट कई मामलों में अनोखा था पहले सूखे पहाड़ जिस पर एक तिनका भी नहीं उगता उसके बाद बर्फ से ढंका खार्दुंग ला  जहाँ ऑक्सीजन की कमी से सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और उसके बाद आयी नुब्रा घाटी जहाँ एक और रेगिस्तान था तो दूसरी ओर पहाड़ों से पिघलती बर्फ का पानी.अब देखिये न हमारी जिन्दगी भी तो ऐसी ही है ,कभी सुख तो कभी दुःख और हाँ कभी एक नीरसता भी जिसका कोई कारण नहीं होता फिर भी हम जिन्दगी का सफर तय करते रहते हैं. 
फिर हम विश्व प्रसिद्ध पैन्गोंग झील की तरफ जहाँ तेज हवाएं चलती हैं और शाम के वक्त झील के पास न जाने की ताकीद की जाती है पर इतनी तेज हवाओं में भी झील का पानी एक दम शांत रहता है .सफलता पाना और सफलता को पचाना दो अलग अलग बातें हैं जिन्दगी में वही लोग लम्बे समय तक सफल होते हैं जिनके पाँव सफल होने पर भी जमीन पर टिके रहते हैं ठीक पेन्गोंग झील के पानी की तरह. तो आगे से जब भी किसी सफ़र पर निकालिएगा तो ये मत भूलियेगा कि ये जिन्दगी का सफ़र है और हर सफ़र की शुरुवात अकेले ही होती है लेकिन अंत अकेले नहीं होता साथ में कारवां होता है अपनों का अपने अपनों का यात्राएँ चाहे जीवन की हों या किसी दूर देश की या फिर घर से दफ्तर के बीच की ही क्यों न हो . सबकी यात्राओं का अपना अलग अलग सुख है .फिलहाल यह लेख लिखने  की अपनी इस  यात्रा को मैं  यहीं ख़तम करता हूँ ओर निकलता हूँ अपनी दूसरी यात्राओं की ओर.
आई नेक्स्ट में 26/06/15 को प्रकाशित 

2 comments:

ANITA RAJ said...

Sir aapne apne es article me yatra ko bahoot hi sundar artho se joda hai.jaise jindgi, maut aur fhir kbhi na khtm hone wala jindgi k karwa. jo sach me ham sbki jindgi se khi na khi,kisi na kisi roop me juda huwa hai.

arvind singh Yadav said...

Sir aisi jgh pe ghumna kisi janat or nai duniya s kam nhi hota bcz maine bhi barahmoola or uddi pura ghuma hi or woo issi trh barfoo s dhaka hu or log wha pe wait kr rhe hote hi sun kb dikhyga lekin bahut hi alag ek sunder nazara hota hi...

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