Thursday, August 20, 2015

नेटवर्क की मेमोरी में गुम हो रही यादाश्त

इंटरनेट ने उम्र का एक चक्र पूरा कर लिया है। इसकी खूबियों और इसकी उपयोगिता की चर्चा तो बहुत हो ली, अब इसके दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान जाने लगा है। कई देशों के न्यूरो वैज्ञानिक व मनोवैज्ञानिक, लोगों पर इंटरनेट और डिजिटल डिवाइस से लंबे समय तक पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं। मुख्य रूप से इन शोधों का केंद्र युवा पीढ़ी पर नई तकनीक के संभावित प्रभाव की ओर झुका हुआ है, क्योंकि वे ही इस तकनीक के पहले और सबसे बड़े उपभोक्ता बन रहे हैं। साल 2011 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलंबिया द्वारा किए गए रिसर्च में यह निष्कर्ष निकाला गया था की युवा पीढ़ी किसी भी सूचना को याद करने का तरीका बदल रही है, क्योंकि वह आसानी से इंटरनेट पर उपलब्ध है। वे कुछ ही तथ्यों को याद रखते हैं, बाकी के लिए इंटरनेट का सहारा लेते हैं। इसे गूगल इफेक्ट या गूगल-प्रभाव कहा जाता है।
इसी दिशा में कैस्परस्की लैब ने साल 2015 में डिजिटल डिवाइस और इंटरनेट से सभी पीढ़ियों पर पड़ने वाले प्रभाव के ऊपर शोध किया है। कैस्परस्की लैब ने ऐसे छह हजार लोगों की गणना की, जिनकी उम्र 16-55 साल तक थी। यह शोध कई देशों में जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन आदि देशों के 1,000 लोगों पर फरवरी 2015 में ऑनलाइन किया गया। शोध में यह पता चला की गूगल-प्रभाव केवल ऑनलाइन तथ्यों तक सीमित न रहकर उससे कई गुना आगे हमारी महत्वपूर्ण व्यक्तिगत सूचनाओं को याद रखने के तरीके तक पहुंच गया है। शोध बताता है कि इंटरनेट हमें भुलक्कड़ बना रहा है, ज्यादातर युवा उपभोक्ताओं के लिए, जो कि कनेक्टेड डिवाइसों का प्रयोग करते हैं, इंटरनेट न केवल ज्ञान का प्राथमिक स्रोत है, बल्कि उनकी व्यक्तिगत जानकारियों को सुरक्षित करने का भी मुख्य स्रोत बन चुका है।
इसे कैस्परस्की लैब ने डिजिटल एम्नेशिया का नाम दिया है। यानी अपनी जरूरत की सभी जानकारियों को भूलने की क्षमता के कारण किसी का डिजिटल डिवाइसों पर ज्यादा भरोसा करना कि वह आपके लिए सभी जानकारियों को एकत्रित कर सुरक्षित कर लेगा। 16 से 34 की उम्र वाले व्यक्तियों में से लगभग 70 प्रतिशत लोगों ने माना कि अपनी सारी जरूरत की जानकारी को याद रखने के लिए वे अपने स्मार्टफोन का उपयोग करते है। इस शोध के निष्कर्ष से यह भी पता चला कि अधिकांश डिजिटल उपभोक्ता अपने महत्वपूर्ण कांटेक्ट नंबर याद नहीं रख पाते हैं।
एक यह तथ्य भी सामने आया कि डिजिटल एम्नेशिया लगभग सभी उम्र के लोगों में फैला है और ये महिलाओं और पुरुषों में समान रूप से पाया जाता है। ज्यादा प्रयोग के कारण डिजिटल डिवाइस से हमारा एक मानवीय रिश्ता सा बन गया है, पर तकनीक पर अधिक निर्भरता हमें मानसिक रूप से पंगु भी बना सकती है। इसलिए इंटरनेट का इस्तेमाल जरूरत के वक्त ही किया जाए।
हिन्दुस्तान में 20/08/15 को प्रकाशित 

11 comments:

kuldeep thakur said...

आप की लिखी ये रचना....
23/08/2015 को लिंक की जाएगी...
http://www.halchalwith5links.blogspot.com पर....


anjali said...

ye baat toh shi hai ki internet hamein bhulakkar bna ra hai,lkin agr hm sirf internet tbhi use krne lge jab humko zrurat hai toh humein aur cheezo ke bare mein jaankare nhi ho payege jo hm kbhi bhi internet khol k search kr skte hai...aisa mujhe lgta hai

Khan Kajal said...

People are turning out to be more robotic zombies rather then Humane some restriction should be cmpsed regarding Internet it's usage

meghna singh said...

Internet in today's era is rapidly increasing circle which has possessed the limited thinking of individuals, making one effortless. The regular use of Internet has trapped the people and made them numb. All the content related to one's research and materials are easily available on internet so it became convenience for peeps to "GOOGLE" rather than brainstorming. On the other hand saves their time too, due to which one is dependent on Internet nowadays.

Karishma Lalwani said...

Very true lines. Today internet is used so widely that people can't even remember small things they used to remember before. I feel internet is both good and bad in its own way. Where it has made people dependent, it has also given a social plattform to people to interact with theur loved ones and stay connected.

akanksha gupta said...

Lekin Internet kareebi rishto se dur le ja rhi hai logo ko....jaurut se jyada Internet ko time hum log social networking sites ke liye dete hai.....jisse hum bahari duniya se to aware hote hai lekin apni pehchan kahi na kahi kam krte ja rhe hai

ANITA RAJ said...

right Sir logon ne apne yaad dast ko network ki memori ke sath set kr diya hai

varun said...

this is an important artical in my view ,,, kuki dimaag duniya me single aisi chiz hai jo khrch krne pr bdti hai ,,, internet hme hr chiz ke bare me bta to deta hai,,, but kya ye shi hai ,,, agr hr questions ka answer asani se mil jaye to hmari imagination power ka kya hoga hum apne dimaag ka istemal km krenege jisse hmari mental ability kum develope hogi ,,, beacuse in my view kisi bhi chiz ko deeply smjhne ke liye imagination power develope krni chihiye ,,, many years before bhi invention hue hai tb internet nhi tha ,,, log apni imagination power ka hi istemal krte the ,, hume shayd wo sb invention aaj asan lge but aisa nhi hai kuki agr hme koi chiz pta na ho ki iske pichhe ye work ho rha hai or duniya me hume koi us concept ke baare me na bta paye to us concept ko invent krna bhot muskil hai ,,, modification krna aaasan hota hai but invention krna tough hota hai

Sudhanshuthakur said...

गूगल ने ज़िन्दगी को काफी आसान तो बना दिया लेकिन हमारी सोचने की छमता को मुश्किल में डाल दिया ।।

Suraj Verma said...

इंटरनेट ने लोगों का सोचना बंद कर दिया है,यही कारण है की आज कल हमे कोई भी बात याद नहीं रहती जल्दी,जनरल नोव्लेज को कमजोर कर दिया है । क्योंकि हमें कुछ भी पता करना या जानना होता ,हम इंटरनेट की मदद लेते है। हमने किताबे पढ़ना बन्द कर दिया । यही वजह है कि हम भुलक्कड़ होते जा रहे है ।

Anonymous said...

सर ये बात तो सच है कि आज लोग छोटे से छोटे काम के लिए इटरनेट का प्रयोग कर रहे है हमे कुछ भी पता करना या जानना होता है तो हम इटरनेट कि मदद लेते है लेकिन यह भी कडवा सच है कि इटरनेट हमारे रिश्‍तो को दूर ले जा रहा है हम सोशल नेटवर्क पर बहुत समय देते है जिससे हम अपने परिवार से दूरिया बनती जा रही है Vivek kashyap

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