एक दिन आप सोकर उठे हैं और देखें कि आपके मोबाईल पर अपने किसी ऐसे प्रियजन का वायस नोट या वीडियो नोट उन्हीं के मोबाईल नंबर से आपको मिले जो अब इस दुनिया में नहीं हैं तो आपको कैसा लगेगा |इंटरनेट आज एक वास्तविकता है लेकिन कल तक किसी ने नहीं सोचा था इंटरनेट मृत्यु के बाद भी हमारे जीवन से जुड़ा रहेगा |पढ़ने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन भारत में मृत व्यक्तियों के एआई अवतार बनाने और 'ग्रीफ टेक' का बाजार बहुत तेजी से फैल रहा है |हाल ही में राजस्थान के अजमेर शहर में रहने वाले कपड़ा व्यापारी जयदीप शर्मा के विवाह समारोह के रिसेप्शन में स्क्रीन पर जयदीप के स्वर्गीय पिता प्रकट हुए, । उन्होंने न केवल नए जोड़े को शादी की शुभकामनाएं और आशीर्वाद दिया, बल्कि वहां मौजूद मेहमानों से भी बात की ।जयदीप ने स्थानीय टेक-क्रिएटर को खोजा था, जिसने उनके पिता की कुछ पुरानी तस्वीरों, पुराने वॉयस नोट्स और उनके व्यवहार के तौर-तरीकों का अध्ययन करके, एक मिनट का 'एआई डीपफेक अवतार' तैयार किया था।
वैश्विक स्तर पर 'हियरआफ्टर एआई'और 'स्टोरीफाइल' जैसी कंपनियां अब बाकायदा इस 'ग्रीफ टेक' (शोक तकनीक) को एक संगठित बिजनेस मॉडल में बदल चुकी हैं। ये कंपनियां किसी व्यक्ति के पुराने चैट्स, वॉयस मैसेज और सोशल मीडिया डेटा के आधार पर उनका डिजिटल भूत या 'घोस्ट बॉट' तैयार कर रही हैं। और भारत भी इस मामले में अपवाद नहीं हैं|प्रथम दृष्टया यह किसी भावुक परिवार का अपने दिवंगत प्रियजनों के प्रति अगाध प्रेम और तकनीकी चमत्कार लग सकता है|लेकिन जहां भावनाएं तीव्र होती हैं, वहां बाजार सबसे पहले अपनी जड़ें जमाता है।
ग्लोबल मार्केट रिसर्च फर्म 'ग्रैंड व्यू रिसर्च' (होराईजन डाटा बुक ) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 'एंड-ऑफ-लाइफ प्लानिंग' और 'डिजिटल लेगेसी सर्विसेज' (जिसमें एआई अवतार और डिजिटल यादें सहेजना शामिल है) का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। साल 2023 में भारतीय बाजार का कुल आकार 1,737.1 मिलियन डॉलर था। रिपोर्ट का अनुमान है कि यह बाजार 7.4% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़ते हुए साल 2030 तक 2,820.20 मिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा। इस अभूतपूर्व वृद्धि दर के साथ भारत इस क्षेत्र में एशिया-पैसिफिक का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार बन चुका है।ये मामला सिर्फ बाजार का नहीं बल्कि इसके अनेक मनोवैज्ञानिक और विधिक पहलू भी हैं |जिन पर लोगों का ध्यान काम जा रहा है |
मनोविज्ञान के अनुसार, किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद 'शोक मनाना' एक बेहद जरूरी मानसिक और उपचारात्मक प्रक्रिया है। इंसान पहले रोता है, तड़पता है, इनकार की स्थिति से गुजरता है और अंत में उस शून्यता और सत्य को स्वीकार कर जीवन में आगे बढ़ता है। लेकिन 'ग्रीफ टेक' इंसान को शोक की पहली अवस्था यानी 'इनकार' में ही हमेशा के लिए अटका कर रख देती है।
जब आपके पास एक ऐसा 'घोस्ट बॉट' या डिजिटल क्लोन हो जो मृत व्यक्ति की तरह ही आपके व्हाट्सएप पर मैसेज कर सके, उसकी हूबहू आवाज में फोन पर बात कर सके या वीडियो कॉल पर दिख सके, तो मानव मस्तिष्क कभी उस मृत्यु को स्वीकार ही नहीं कर पाएगा। यह तकनीक इंसान को एक अंतहीन अवसाद और 'अवास्तविक दुनिया' में धकेल सकती है । भारतीय संस्कृति में मृत्यु को एक महायात्रा माना गया है। जहां 'तर्पण', 'श्राद्ध' और 'अंतिम संस्कार' के जरिए मृत आत्मा को सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है और उसकी स्मृतियों को दिल में एक पवित्र धरोहर के रूप में सहेजा जाता है। लेकिन एआई तकनीक मृत व्यक्ति को एक 'इंटरैक्टिव प्रोडक्ट' में बदल रही है, जिसे कुछ रुपये देकर कस्टमाइज किया जा सकता है। यह तकनीक हमें अमरता का एक ऐसा भयावह छलावा दे रही है जो वास्तव में हमारी मानवीय गरिमा को तहस नहस कर सकती है भारत का 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' मुख्य रूप से जीवित नागरिकों के डेटा अधिकारों की बात करता है। लेकिन मृत व्यक्ति के व्यक्तिगत के आंकड़ों का कैसा और कहाँ तक इस्तेमाल हो सकता है ?क्या किसी मृत व्यक्ति के पुराने जीमेल, इंस्टाग्राम पोस्ट और व्हाट्सएप चैट्स को खंगालकर उसकी 'डिजिटल आत्मा' को फिर से बनाने का अधिकार टेक कंपनियों या उनके परिवार को होना चाहिए, यह बड़ा सवाल है|
मौजूदा भारतीय कानूनी ढांचे में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी मृत व्यक्ति के 'डिजिटल अवतार' के निर्माण के लिए उसकी मरणोपरांत सहमति को अनिवार्य बनाता हो या यह स्पष्ट करता हो किन परिस्थितियों में उनका डिजीतल अवतार बनाया जा सकता है । यह स्थिति पहचान की चोरी और ब्लैकमेलिंग के रास्ते खोलती है। पश्चिमी देशों में 'प्रोजेक्ट दिसंबर' और 'सीयांस एआई' जैसी कंपनियां सस्ते में चैट लॉग्स के आधार पर मृतकों के टेक्स्ट बॉट बना रही हैं।जो चैट जी पी टी जैसे मॉडल्स पर चलता है। और बॉट मृत व्यक्ति की स्टाइल में बात करता है।इनका उद्देश्य उद्देश्य शोक में मदद करना है, लेकिन इनसे उपजी चिंताएं ज्यादा गहरी हैं। कल को अगर ये कंपनियां दिवालिया हो जाएं या इस डेटा को किसी तीसरे पक्ष को बेच दें, तो मृत व्यक्ति की गरिमा और निजता का क्या होगा।
ए आई बॉट असली व्यक्ति नहीं है। वह कभी गलत, बढ़ा चढ़ा कर या अपमानजनक जवाब दे सकता है, बॉट को किसी और के द्वारा गलत इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें मजाक, अश्लील समाग्री , और राजनीतिक दुरुपयोग जैसे मुद्दे हो सकते हैं |वैसे भी मृत व्यक्ति खुद को बचा नहीं सकता। उस की "डिजिटल छवि" को तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। इससे पहले कि यह समस्या गंभीर हो यह नीति नियंताओं की जिम्मेदारी है कि केवल कानूनी स्तर पर 'मरणोपरांत भूल जाने के अधिकार' को कड़ाई से परिभाषित किया जाए, बल्कि एक संवेदनशील समाज के रूप में हम यह भी समझें कि अपनों को खोने का दर्द सहना और उन्हें सम्मान के साथ विदा करना ही इंसान होने की पहली शर्त है। स्मृतियां पुरानी तस्वीरों, संस्मरणों और दिलों में ही अच्छी लगती हैं न कि कोडिंग के जरिए कृत्रिम रूप से जिंदा किए गए 'डिजिटल भूतों' में ।
अमर उजाला में 23/05/2026 को प्रकाशित

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