सूचना के वैश्विक इतिहास में 'न्यू मीडिया' और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' का ये मिलन महज एक तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्रों का आम आदमी की हथेली की ओर विस्थापन भी है। आज जब हम सूचना समाज की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि भारत में यह क्रांति 'डिजिटल डिवाइड' को पाटते हुए 'भाषाई न्याय' की ओर बढ़ रही है |वास्तविकता यह है कि न्यू मीडिया अब भारत के उस अंतिम व्यक्ति का स्वर बन रहा है, जो दशकों से सूचना के तंत्र में मूक दर्शक बना हुआ था। इस सशक्तिकरण के पीछे 'एआई' की वह मूक भूमिका है जिसे हम 'भाषाई समावेशन' कहते हैं। है।भाषाई न्याय से तात्पर्य सुचना तकनीकी का लाभ उठाने के लिए सिर्फ अंग्रेजी भाषा के ज्ञान की अनिवार्यता नहीं है| भारत इस मौन क्रांति का नायक बन कर उभर रहा है | गूगल के नवीनतम शोध बताते हैं कि भारत में वॉयस सर्च (Voice Search) की वृद्धि दर वैश्विक औसत से 270 प्रतिशत अधिक है। वॉयस सर्च और क्षेत्रीय फॉण्ट के इस अनूठे मिश्रण ने इंटरनेट को भारत में 'अति-स्थानीय' (Hyper-local) बना दिया है, जहाँ अब साक्षरता या टाइपिंग की कुशलता सूचना प्राप्त करने में बाधक नहीं रही। IAMAI-Kantar 2024 की रिपोर्ट इस विस्थापन को प्रमाणित करती है, जिसके अनुसार भारत के 82.2 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी 44.2 करोड़ हो चुकी है, जो शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक गति से बढ़ रही है। यह डेटा इस पारंपरिक धारणा को ध्वस्त करता है कि तकनीक केवल शहरी संभ्रांत वर्ग की बपौती है।
तकनीक की इसी भाषाई सुगमता ने उस 'हाइपर-लोकल' कंटेंट को जन्म दिया है, जिसने जनसंचार का चेहरा बदल दिया है। जब डिजिटल फॉण्ट और एआई ने स्थानीय बोलियों की बाधा को खत्म किया, तो इसका सीधा परिणाम 'हाइपर-लोकल' कंटेंट के विस्फोट के रूप में सामने आया। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की वर्ष 2024 की रिपोर्ट (जो 2023 के आंकड़ों पर आधारित है) के अनुसार, यूट्यूब के रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र (Creative Ecosystem) ने भारतीय अर्थव्यवस्था में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया है। अध्ययन स्पष्ट करता है कि भारत में यूट्यूब के रचनात्मक तंत्र ने देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक मूल्य जोड़ा है। यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने देश में लगभग 9,30,000 पूर्णकालिक समकक्ष (Full-time equivalent) रोजगार के अवसरों का भी समर्थन किया है। यह बताता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब जीविकोपार्जन का एक गंभीर और सशक्त माध्यम बन चुका है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब तकनीक ने आम आदमी को उसकी अपनी भाषा का गौरव लौटाया, तो वह केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि एक स्वावलंबी 'सूचना-उद्यमी' बन गया। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के आंकड़े देश में एक बड़े डिजिटल बदलाव की ओर इशारा करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 24.1 GB डेटा की औसत खपत यह प्रमाणित करती है कि इंटरनेट अब केवल शहरी विलासिता नहीं, बल्कि ग्रामीण और कस्बाई भारत की जीवनरेखा बन चुका है। इस डेटा उपयोग का एक बहुत बड़ा हिस्सा स्थानीय सामग्री (Local Content) के निर्माण और उपभोग में व्यय हो रहा है। ।वही दूसरी ओर लाखों ऐसी देशी प्रतिभाओं के हुनर को सामने ला रहा है जो कल तक अनजान थी|कोई खांना बनाने के तरीके बता रहा है कोई यात्राएं कर रहा है|परम्परागत नजरिये से इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कोई बगैर कुछ किये भी बहुत कुछ कर रहा है | केपीएमजी (KPMG) और गूगल की इंडियन लैंग्वेजेस—डिफाइनिंग इंडियाज़ इंटरनेट" रिपोर्ट इस बात का पुख्ता प्रमाण पेश करती है कि भारत के डिजिटल भविष्य की भाषा अंग्रेजी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भाषाएँ हैं।
लेकिन इस भाषाई और स्थानीय सशक्तिकरण के ठीक समानांतर एक बड़ी चुनौती खड़ी है—बड़ी टेक कंपनियों का एकाधिकार (Corporate Monopoly)। हम अपनी भाषा में अपनी स्थानीय समस्याओं पर बोल तो सकते हैं, लेकिन जिस 'मंच' पर हम यह संवाद कर रहे हैं, उस पर कुछ मुट्ठी भर वैश्विक कंपनियों का अदृश्य नियंत्रण है। यह 'डिजिटल सामंतवाद' का एक नया स्वरूप है, जहाँ हमारे स्थानीय डेटा और हमारी राय को विदेशी 'एल्गोरिदम' के जरिए नियंत्रित किया जाता है। चुनौती यह है कि जब तकनीक का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) विदेशी कंपनियों के हाथ में होता है, तो हमारी 'भाषाई संप्रभुता' हमेशा जोखिम में रहती है।निक कौल्ड्री और यूलिसेस मेजियास ने अपनी पुस्तक " द कॉस्ट्स ऑफ कनेक्शन: हाउ डेटा इज़ कोलोनाइज़िंग ह्यूमन लाइफ एंड एप्रोप्रिएटिंग इट फॉर कैपिटलिज्म " में विस्तार से बताया है कि कैसे बड़ी टेक कंपनियां हमारे डेटा को उसी तरह नियंत्रित कर रही हैं जैसे पुराने समय में औपनिवेशिक शक्तियां संसाधनों को करती थीं। हम अपनी भाषा का उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन उसका आर्थिक लाभ और डेटा का नियंत्रण उन कंपनियों के हाथ में है जो मुनाफे को जन-सरोकार से ऊपर रखती हैं। यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र डिजिटल लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, या हम केवल एक वैश्विक कॉर्पोरेट पिंजरे में अपनी स्थानीय भाषा बोलने के लिए स्वतंत्र हैं?
न्यू मीडिया और एआई की यह जुगलबंदी केवल तब तक सार्थक है जब तक यह आम आदमी की 'सूचनात्मक संप्रभुता' को कॉर्पोरेट एकाधिकार से सुरक्षित रखती है। भविष्य का भारत वही होगा जहाँ तकनीक का व्याकरण केवल विदेशी सर्वरों पर नहीं, बल्कि भारतीय संवेदनाओं और स्थानीय नियंत्रण के साथ विकसित होगा। अंततः, इस पूरी प्रक्रिया की सार्थकता इसी में है कि तकनीक उस आम आदमी के जीवन में कितनी पारदर्शिता और वास्तविक न्याय सुनिश्चित करती है, जो आज डिजिटल क्रांति के इस नए अध्याय का असली नायक बनकर उभरा है। भारतीय भाषाएं अब वैश्विक इंटरनेट पर केवल जीवित नहीं हैं, बल्कि वे अग्रणी भूमिका में हैं, जो भविष्य के 'ग्लोबल' इंटरनेट को 'लोकल' बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।सूचना के वैश्विक इतिहास में 'न्यू मीडिया' और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' का ये मिलन महज एक तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्रों का आम आदमी की हथेली की ओर विस्थापन भी है। आज जब हम सूचना समाज की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि भारत में यह क्रांति 'डिजिटल डिवाइड' को पाटते हुए 'भाषाई न्याय' की ओर बढ़ रही है |वास्तविकता यह है कि न्यू मीडिया अब भारत के उस अंतिम व्यक्ति का स्वर बन रहा है, जो दशकों से सूचना के तंत्र में मूक दर्शक बना हुआ था। इस सशक्तिकरण के पीछे 'एआई' की वह मूक भूमिका है जिसे हम 'भाषाई समावेशन' कहते हैं। है।भाषाई न्याय से तात्पर्य सुचना तकनीकी का लाभ उठाने के लिए सिर्फ अंग्रेजी भाषा के ज्ञान की अनिवार्यता नहीं है| भारत इस मौन क्रांति का नायक बन कर उभर रहा है | गूगल के नवीनतम शोध बताते हैं कि भारत में वॉयस सर्च (Voice Search) की वृद्धि दर वैश्विक औसत से 270 प्रतिशत अधिक है। वॉयस सर्च और क्षेत्रीय फॉण्ट के इस अनूठे मिश्रण ने इंटरनेट को भारत में 'अति-स्थानीय' (Hyper-local) बना दिया है, जहाँ अब साक्षरता या टाइपिंग की कुशलता सूचना प्राप्त करने में बाधक नहीं रही।
IAMAI-Kantar 2024 की रिपोर्ट इस विस्थापन को प्रमाणित करती है, जिसके अनुसार भारत के 82.2 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी 44.2 करोड़ हो चुकी है, जो शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक गति से बढ़ रही है। यह डेटा इस पारंपरिक धारणा को ध्वस्त करता है कि तकनीक केवल शहरी संभ्रांत वर्ग की बपौती है।
तकनीक की इसी भाषाई सुगमता ने उस 'हाइपर-लोकल' कंटेंट को जन्म दिया है, जिसने जनसंचार का चेहरा बदल दिया है। जब डिजिटल फॉण्ट और एआई ने स्थानीय बोलियों की बाधा को खत्म किया, तो इसका सीधा परिणाम 'हाइपर-लोकल' कंटेंट के विस्फोट के रूप में सामने आया। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की वर्ष 2024 की रिपोर्ट (जो 2023 के आंकड़ों पर आधारित है) के अनुसार, यूट्यूब के रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र (Creative Ecosystem) ने भारतीय अर्थव्यवस्था में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया है। अध्ययन स्पष्ट करता है कि भारत में यूट्यूब के रचनात्मक तंत्र ने देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक मूल्य जोड़ा है। यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने देश में लगभग 9,30,000 पूर्णकालिक समकक्ष (Full-time equivalent) रोजगार के अवसरों का भी समर्थन किया है। यह बताता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब जीविकोपार्जन का एक गंभीर और सशक्त माध्यम बन चुका है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब तकनीक ने आम आदमी को उसकी अपनी भाषा का गौरव लौटाया, तो वह केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि एक स्वावलंबी 'सूचना-उद्यमी' बन गया। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के आंकड़े देश में एक बड़े डिजिटल बदलाव की ओर इशारा करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 24.1 GB डेटा की औसत खपत यह प्रमाणित करती है कि इंटरनेट अब केवल शहरी विलासिता नहीं, बल्कि ग्रामीण और कस्बाई भारत की जीवनरेखा बन चुका है। इस डेटा उपयोग का एक बहुत बड़ा हिस्सा स्थानीय सामग्री (Local Content) के निर्माण और उपभोग में व्यय हो रहा है। ।वही दूसरी ओर लाखों ऐसी देशी प्रतिभाओं के हुनर को सामने ला रहा है जो कल तक अनजान थी|कोई खांना बनाने के तरीके बता रहा है कोई यात्राएं कर रहा है|परम्परागत नजरिये से इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कोई बगैर कुछ किये भी बहुत कुछ कर रहा है | केपीएमजी (KPMG) और गूगल की इंडियन लैंग्वेजेस—डिफाइनिंग इंडियाज़ इंटरनेट" रिपोर्ट इस बात का पुख्ता प्रमाण पेश करती है कि भारत के डिजिटल भविष्य की भाषा अंग्रेजी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भाषाएँ हैं।
लेकिन इस भाषाई और स्थानीय सशक्तिकरण के ठीक समानांतर एक बड़ी चुनौती खड़ी है—बड़ी टेक कंपनियों का एकाधिकार (Corporate Monopoly)। हम अपनी भाषा में अपनी स्थानीय समस्याओं पर बोल तो सकते हैं, लेकिन जिस 'मंच' पर हम यह संवाद कर रहे हैं, उस पर कुछ मुट्ठी भर वैश्विक कंपनियों का अदृश्य नियंत्रण है। यह 'डिजिटल सामंतवाद' का एक नया स्वरूप है, जहाँ हमारे स्थानीय डेटा और हमारी राय को विदेशी 'एल्गोरिदम' के जरिए नियंत्रित किया जाता है। चुनौती यह है कि जब तकनीक का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) विदेशी कंपनियों के हाथ में होता है, तो हमारी 'भाषाई संप्रभुता' हमेशा जोखिम में रहती है।निक कौल्ड्री और यूलिसेस मेजियास ने अपनी पुस्तक " द कॉस्ट्स ऑफ कनेक्शन: हाउ डेटा इज़ कोलोनाइज़िंग ह्यूमन लाइफ एंड एप्रोप्रिएटिंग इट फॉर कैपिटलिज्म " में विस्तार से बताया है कि कैसे बड़ी टेक कंपनियां हमारे डेटा को उसी तरह नियंत्रित कर रही हैं जैसे पुराने समय में औपनिवेशिक शक्तियां संसाधनों को करती थीं। हम अपनी भाषा का उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन उसका आर्थिक लाभ और डेटा का नियंत्रण उन कंपनियों के हाथ में है जो मुनाफे को जन-सरोकार से ऊपर रखती हैं। यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र डिजिटल लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, या हम केवल एक वैश्विक कॉर्पोरेट पिंजरे में अपनी स्थानीय भाषा बोलने के लिए स्वतंत्र हैं?
न्यू मीडिया और एआई की यह जुगलबंदी केवल तब तक सार्थक है जब तक यह आम आदमी की 'सूचनात्मक संप्रभुता' को कॉर्पोरेट एकाधिकार से सुरक्षित रखती है। भविष्य का भारत वही होगा जहाँ तकनीक का व्याकरण केवल विदेशी सर्वरों पर नहीं, बल्कि भारतीय संवेदनाओं और स्थानीय नियंत्रण के साथ विकसित होगा। अंततः, इस पूरी प्रक्रिया की सार्थकता इसी में है कि तकनीक उस आम आदमी के जीवन में कितनी पारदर्शिता और वास्तविक न्याय सुनिश्चित करती है, जो आज डिजिटल क्रांति के इस नए अध्याय का असली नायक बनकर उभरा है। भारतीय भाषाएं अब वैश्विक इंटरनेट पर केवल जीवित नहीं हैं, बल्कि वे अग्रणी भूमिका में हैं, जो भविष्य के 'ग्लोबल' इंटरनेट को 'लोकल' बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।
दैनिक जागरण में 09 /07 /2026 को प्रकाशित लेख
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