एआई एल्गोरिदम हर विषय का एक 'औसत' निकालता है और वही औसत ज्ञान हर स्क्रीन पर परोस दिया जाता है ।इस मशीनी कचरेके ढेर में किसी नए लेखक का मौलिक विचार, किसी पत्रकार की जमीनी रिपोर्टिंग या किसी विचारक का अनूठा कोण तब तक दफन रहेगा जब तक वह इंटरनेट के एल्गोरिदम में नहीं आएगा |असल में अब इंसान नहीं बोट्स इंटरनेट चला रहे हैं |साइबर सुरक्षा फर्म Imperva द्वारा जारी वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, आज इंटरनेट के कुल वेब ट्रैफिक का 49.6% हिस्सा बोट्स द्वारा संचालित होता है। यानी इंटरनेट पर आधी से अधिक गतिविधियाँ इंसानों की हैं ही नहीं। इसमें से 32% ट्रैफिक "बैड बोट्स" का है जो फर्जी लाइक्स, कमेंट्स और स्पैम के लिए जिम्मेदार हैं। यूरोपीय संघ की कानून प्रवर्तन एजेंसी यूरोपोल की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अनुमान लगाया गया है कि 2026 तक इंटरनेट पर उपलब्ध कुल ऑनलाइन कंटेंट का नब्बे प्रतिशत हिस्सा एआई द्वारा जनरेटेड हो सकता है।'न्यूज़गार्ड' के हालिया अध्ययन से खुलासा हुआ है कि इंटरनेट पर ऐसी सैकड़ों "एआई-जनरेटेड कंटेंट फार्म" वेबसाइट्स सक्रिय हो गई हैं, जो बिना किसी इंसानी संपादन के हर दिन हजारों फर्जी और सतही लेख पोस्ट करती हैं ताकि वे विज्ञापनों से कमाई कर सकें।
'डेड इंटरनेट थ्योरी' केवल कंटेंट तक सीमित नहीं है, यह समाज में एक गहरे अविश्वास को जन्म दे रही है ।जब इंटरनेट पर दिखने वाली आधी तस्वीरें, वीडियो और टेक्स्ट सिंथेटिक (एआई निर्मित) हैं, तो आम नागरिक का 'सत्य' पर से भरोसा उठने लगता है ।किसी भी प्रामाणिक घटना को आसानी से "एआई-जनरेटेड" या डीपफेक कहकर खारिज किया जा सकता है ।सभ्यताएँ केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान से नहीं, बल्कि आपसी सामाजिक विश्वास और ऐतिहासिक संचय से चलती हैं ।यदि इंटरनेट का उपयोग केवल बोट्स द्वारा बोट्स को जानकारी परोसने के लिए होने लगेगा, तो मानव समाज अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कट जाएगा ।हम एक ऐसे युग में पहुँच जाएंगे जहाँ जानकारी तो असीमित होगी, लेकिन सत्य की पहचान करना नामुमकिन हो जाएगा ।सभ्यता का कोई भी विकास इंसानी चेतना की कीमत पर नहीं होना चाहिए ।'डेड इंटरनेट थ्योरी' हमें चेतावनी देती है कि यदि हमने तकनीक के अनियंत्रित इस्तेमाल पर लगाम नहीं लगाई, तो हमारी डिजिटल दुनिया जल्द ही एक मृत और यांत्रिक मरुस्थल बनकर रह जाएगी ।
इस संकट से निपटने का रास्ता तकनीक को बंद करना नहीं, बल्कि "मानवीय प्रामाणिकता" को प्राथमिकता देना है ।मीडिया संस्थानों, प्रकाशकों और पाठकों को अब एआई-जनरेटेड सस्ते कंटेंट के बजाय हाड़-मांस के इंसान द्वारा लिखे गए मौलिक, शोधपरक और संवेदनात्मक लेखन का सम्मान करना होगा ।इंटरनेट को मशीनों की चौपाल बनने से रोकने के लिए इंसान को अपनी सोचने, सहेजने और लिखने की मौलिक क्षमता को दोबारा अपने हाथ में लेना होगा ।

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