Tuesday, August 25, 2026

मशीनों की चौपाल बनता इंटरनेट

 
इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में जब इंटरनेट का विस्तार भारत के गाँव-गाँव और कस्बों तक पहुँचा, तो इसे सभ्यता के इतिहास की सबसे बड़ी 'डिजिटल चौपाल' कहा गया ।यह एक ऐसा लोकतांत्रिक मंच था जहाँ इंसान अपनी अनुभूतियाँ, विचार, कला और मौलिक साहित्य को साझा कर सकता  था ।लेकिन वर्ष 2026 में, जनरेटिव एआई  और स्वचालित बोट्स के अनियंत्रित प्रसार ने इस चौपाल के मूल स्वरूप को बदलकर रख दिया है समाजशास्त्रियों और तकनीकी विश्लेषकों के बीच आज जिस थ्योरी की सबसे गंभीर चर्चा है, वह है—'डेड इंटरनेट थ्योरी' मृत इंटरनेट सिद्धांत’  की अवधारणा पहली बार वर्ष 2021 में अगोरा रोड्स अगोरा’ नामक एक ऑनलाइन मंच पर "इल्यूमिनाती पाइरेट" नाम के अनाम विचारक ने प्रस्तुत की थी। बाद में अमेरिकी पत्रिका द अटलांटिक’ में पत्रकार केटलिन टिफ़नी के लेख से इसे वैश्विक पहचान मिली। हालांकि, इसकी जड़ें वर्ष 2016-2017 से मानी जाती हैं, जब स्वचालित बोट्स और कॉर्पोरेट एल्गोरिदम ने वेब पर हावी होना शुरू किया। यह सिद्धांत बताता है कि आज इंटरनेट पर अधिकांश सामग्री इंसानों द्वारा नहीं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बोट्स द्वारा बनाई और सराही जा रही है।  इस प्रक्रिया में वास्तविक मनुष्य, उसकी रचनात्मकता और उसकी भाषा लगातार अदृश्य होती जा रही है 'डेड इंटरनेट थ्योरी' का मूल विचार यह है कि लगभग 2016-2017 के बाद से इंटरनेट अपनी "जीवंतता" खो चुका है ।पहले जिसे हम एक स्वाभाविक और इंसानी संवाद का माध्यम मानते थे, उसे अब कॉर्पोरेट एल्गोरिदम, एआई मॉडल्स और सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन के जरिए नियंत्रित किया जा रहा है ।जनरेटिव एआई के आगमन के बाद स्थिति यह हो गई है कि इंटरनेट अब "रोबोटिक कचरे का गोदाम" बन चुका है ।इसकी तुलना आप  रेडियो पर गाने सुनने और स्पॉटफाई पर अपनी प्ले लिस्ट के गाने सुनने से कर सकते हैं जैसे रेडियो पर कौन गाना कब बजेगा आपको पता नहीं होता पर स्पॉटफाई अप बनी आपकी प्ले लिस्ट में अनिश्चितता का तत्त्व  गायब रहता  है अगर आप इसे शफल न करें तो आप आँकलन लगा सकते हैं कि अब अमुक गाना बजेगा| उसी  तरह आज आप जब  गूगल सर्च करते हैं , इंस्टाग्राम रील्स देखते हैं या  एक्स (ट्विटर) के थ्रेड्स पढ़ें—हर जगह एक ही तरह के पैटर्न में लिखा गया, कृत्रिम रूप से सजाया गया कंटेंट दिखाई देता है वो अनिश्चितता का तत्त्व गायब हो गया है|इंटरनेट एक ऐसी जगह बन गया है जहां सब कुछ निश्चित है आपकी आँखों के सामने जो कुछ या रहा है वो एल्गोरिदम का परिणाम है |

एआई एल्गोरिदम हर विषय का एक 'औसत' निकालता है और वही औसत ज्ञान हर स्क्रीन पर परोस दिया जाता है ।इस मशीनी कचरेके ढेर में किसी नए लेखक का मौलिक विचार, किसी पत्रकार की जमीनी रिपोर्टिंग या किसी विचारक का अनूठा कोण तब तक दफन रहेगा जब तक वह  इंटरनेट के एल्गोरिदम में नहीं आएगा |असल में अब इंसान नहीं बोट्स इंटरनेट चला रहे हैं |साइबर सुरक्षा फर्म Imperva द्वारा जारी वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, आज इंटरनेट के कुल वेब ट्रैफिक का 49.6% हिस्सा बोट्स द्वारा संचालित होता है। यानी इंटरनेट पर आधी से अधिक गतिविधियाँ इंसानों की हैं ही नहीं। इसमें से 32% ट्रैफिक "बैड बोट्स" का है जो फर्जी लाइक्स, कमेंट्स और स्पैम के लिए जिम्मेदार हैं। यूरोपीय संघ की कानून प्रवर्तन एजेंसी यूरोपोल की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अनुमान लगाया गया है कि 2026 तक इंटरनेट पर उपलब्ध कुल ऑनलाइन कंटेंट का नब्बे प्रतिशत हिस्सा एआई द्वारा जनरेटेड हो सकता है।'न्यूज़गार्ड' के हालिया अध्ययन से खुलासा हुआ है कि इंटरनेट पर ऐसी सैकड़ों "एआई-जनरेटेड कंटेंट फार्म" वेबसाइट्स सक्रिय हो गई हैं, जो बिना किसी इंसानी संपादन के हर दिन हजारों फर्जी और सतही लेख पोस्ट करती हैं ताकि वे विज्ञापनों से कमाई कर सकें।

'डेड इंटरनेट थ्योरी' केवल कंटेंट तक सीमित नहीं है, यह समाज में एक गहरे अविश्वास को जन्म दे रही है ।जब इंटरनेट पर दिखने वाली आधी तस्वीरें, वीडियो और टेक्स्ट सिंथेटिक (एआई निर्मित) हैं, तो आम नागरिक का 'सत्य' पर से भरोसा उठने लगता है ।किसी भी प्रामाणिक घटना को आसानी से "एआई-जनरेटेड" या डीपफेक कहकर खारिज किया जा सकता है ।सभ्यताएँ केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान से नहीं, बल्कि आपसी सामाजिक विश्वास और ऐतिहासिक संचय से चलती हैं ।यदि इंटरनेट का उपयोग केवल बोट्स द्वारा बोट्स को जानकारी परोसने के लिए होने लगेगा, तो मानव समाज अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कट जाएगा ।हम एक ऐसे युग में पहुँच जाएंगे जहाँ जानकारी तो असीमित होगी, लेकिन सत्य की पहचान करना नामुमकिन हो जाएगा ।सभ्यता का कोई भी विकास इंसानी चेतना की कीमत पर नहीं होना चाहिए 'डेड इंटरनेट थ्योरी' हमें चेतावनी देती है कि यदि हमने तकनीक के अनियंत्रित इस्तेमाल पर लगाम नहीं लगाई, तो हमारी डिजिटल दुनिया जल्द ही एक मृत और यांत्रिक मरुस्थल बनकर रह जाएगी

इस संकट से निपटने का रास्ता तकनीक को बंद करना नहीं, बल्कि "मानवीय प्रामाणिकता" को प्राथमिकता देना है ।मीडिया संस्थानों, प्रकाशकों और पाठकों को अब एआई-जनरेटेड सस्ते कंटेंट के बजाय हाड़-मांस के इंसान द्वारा लिखे गए मौलिक, शोधपरक और संवेदनात्मक लेखन का सम्मान करना होगा ।इंटरनेट को मशीनों की चौपाल बनने से रोकने के लिए इंसान को अपनी सोचने, सहेजने और लिखने की मौलिक क्षमता को दोबारा अपने हाथ में लेना होगा

अमर उजाला में 25/08/2026 को प्रकाशित 

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