Thursday, December 19, 2013

गरीब मास्टर की डायरी के कुछ पुराने पन्ने

 यादें भी अजीब होती हैं अब एल्बम का जमाना तो रहा नहीं पर पुराने स्टेटस देखना पुरानी यादों में जीना जैसा होता चार साल हुए इस वर्चुअल दुनिया को अपना हिस्सा बनाये हुए हम तो वहीं रहे पर कितने लोग आये और चले गए कमेन्ट ,लाईक और टैगिंग की सौगात देकर खोट मुझमें था या उनकी मजबूरियां कहना मुश्किल है सिलसिला जारी है पर मास्टर तो ठहरा मास्टर ज्ञान दे देता है लेना मुश्किल होता है| इस लेन देन के गुणा भाग में जिंदगी की रेखा गणित कब बीज गणित में तब्दील हो जाती है किसी को पता नहीं चलता |
(गरीब मास्टर की डायरी का पहला पन्ना ) 
"खड़िया" हाँ वो ही पहला शब्द था जिससे पहली बार जिंदगी ने कुछ सीखना शुरू किया था , "खड़िया" से शुरू हुआ सफर वर्चुअल दुनिया के की बोर्ड तक आ पहुंचा है पर वो खड़िया ही है जिसे मन आज तक नहीं भूला है जिंदगी की आपा धापी में बहुत कुछ भूला बहुत कुछ सीखा पर "खड़िया" का वो पहला पाठ जब आड़ी तिरछी रेखाओं से कुछ सीखने की शुरुवात की थी,आज भी मन को रोमांचित करती है |दुनिया कितनी भी बदल जाए "खड़िया" तुम मत बदलना क्योंकि जिंदगी की स्लेट तुम्हारे बिना खाली ही रहेगी |तुम सुन तो रही हो न......
(गरीब मास्टर की डायरी का दूसरा पन्ना )
ये आज तुम्हारे हैं पर हमेशा नहीं रहेंगे,गीता का ज्ञान है पर मुझे तो इनका होना पड़ता है बगैर किसी कारण भले ही ये मेरे कभी नहीं हो पाते,इस होने और न होने के बीच कट जाती है जिंदगी एक मास्टर की, और उनको पता भी नहीं पड़ता कि कभी कोई उनका हो जाता है |ये तो अपनी सुविधा से आपके होते हैं कोर्स खत्म रिश्ता खत्म हाँ आप भले ही यादों के सागर में कितने ही गोते लगाएं पर हासिल महज यादें ही होंगी वो तो चले जाते हैं आगे बढ़ने और मास्टर तो बेचारा मास्टर |
(गरीब मास्टर की डायरी का तीसरा पन्ना )
कैमरे की स्लो शटर स्पीड में आप गति को पकड़ सकते हैं पर जिंदगी की दौड में स्लो शटर स्पीड का कॉन्सेप्ट नहीं होता जिससे हम अपनी गलतियों की बारीकियों को जान पाते जो बीत जाता है वो बीत ही जाता है| सिर्फ जीतने की बातें करने से आप जीत नहीं सकते उसके लिए बहुत कुछ दांव पर लगाना पड़ता है |जब दांव भी आप अपनी मर्जी से लगाएंगे तो मुंह की खायेंगे, कुछ पाने के लिए प्राथमिकताएं तय करनी ही पड़ती हैं |
(प्राथमिकताओं की उधेड़ बुन में उलझे गरीब मास्टर की डायरी का चौथा पन्ना ) 
 हर साल चेहरे बदलते हैं किरदार नहीं क्लास का इतिहास बदलता है भूगोल नहीं, एक शिक्षक अपने विषय के अलावा कितना कुछ पढ़ रहा होता है ,क्लास में बनते बिगड़ते ग्रुप का अंकगणित कब समाजशास्त्र के बीजगणित में तब्दील हो जाता है और इससे शुरू हुआ राजनीति विज्ञान का सफर ना जाने कितनी लकीरें छोड़ जाता है ,उसका पता किसी को नहीं चलता|
(समाजशात्र की गणित में उलझे उस गरीब मास्टर की डायरी का पांचवां पन्ना, )
हर साल सेमेस्टर की परीक्षाओं के बीच कितना कुछ बदल जाता है दिसंबर के सेमेस्टर से जो संबंधों में गर्माहट आनी शुरू होती है वो गर्मी की परीक्षाओं तक पिघल चुकी होती है,वो अभी जाड़े को विदा भी नहीं कर पाया होता है कि गर्मी तपाने लगती है उसे तो यादों को सहेजने का मौका भी नहीं मिलता ,और उधर छात्रों को तो ज्ञान मिल चुका होता है पर मास्टर....... अपने ज्ञान के बोझ को ढोते हुए कब छात्रों के सामने सबसे बड़ा अज्ञानी साबित हो जाता इसकी गवाह छात्रों के बीच हुई कानाफूसी बनती हैं|
(जानते.. समझते... हुए अज्ञानी बनने का नाटक करते हुए भी ज्ञान बांटने का ढोंग करते गरीब मास्टर की डायरी का छठा पन्ना)
गर्मियों की छुट्टियों का आना और उनका चले जाना,परीक्षा हाल में छूटे नोट्स के साथ कहकहे लगाते छात्र मानो अपने संस्थान के साथ कपाल क्रिया (अंतिम संस्कार में की जाने वाली क्रिया जिससे मृतक अपने जन्म की यादों को भूल जाए )कर के जा रहे हों| कितने चेहरे घूम जाते हैं आँखों के सामने, अज्ञानी बनने की कोशिश करते सयाने ,सयाने बनने की कोशिश करते अज्ञानी|कौन कितना आगे जाएगा ये समय बताएगा | वे घर जायेंगे और धीरे धीरे सब कुछ भूल जायेंगे पर मास्टर को तो फिर आना है उन्हीं जगहों पर नयी कहानी लिखने| 
(छूटे हुए नोट्स और कहकहों के बीच क्या खोया क्या पाया, का हिसाब लगते गरीब मास्टर की डायरी का सातवां पन्ना ) 
 मैं ये करना चाहता हूँ, मैं वो करना चाहता ,हूँ पर करना क्या है? ये पता नहीं सच बोल देना कडुआ हो जाएगा और झूट बोलेंगे तो मीठी गोली देने की आदत है, क्योंकि जो कहा गया था वो हुआ नहीं |तुमने तो कह दिया ....पर मास्टर तो आज तक उन बातों को दिल से लगाए बैठा है कि गलती किसकी रही तुम जो कभी समझ नहीं पाए या उस मास्टर की जो समझा नहीं पाया |
(क्या सच है क्या झूठ उलझनों की सुलझन में उलझे गरीब मास्टर की डायरी की आठवां पन्ना )
एक मास्टर का जीवन बहुत छोटा होता है हर बैच के साथ वो जीता है और उसी के साथ खत्म होता है फिर नया बैच नया जीवन पर बच्चे बड़े नहीं होते वो तो हर बैच में बच्चे ही रहते हैं कुछ सेंटी ,कुछ चुप्पे, कुछ घुटे हुए ,कुछ तपे हुए ,कुछ निर्लिप्त पर मास्टर तो सबके लिए एक जैसा ही होता है तो सबक जो वो खुद नहीं सीख पाता है उसको सिखाने की कोशिश करता हुआ | "जाने वाले पे ना ऐतबार कर आने वाले का तू इंतज़ार कर, आज का ये दिन कल बन जाएगा कल पीछे मुड के न देख प्यारे आगे चल" 
(आने जाने के फेर में ऐतबार और इन्तजार के बीच में झूलते गरीब मास्टर की डायरी का नवां पन्ना )
मास्टर छात्रों की जिंदगी में अपनी मर्जी सी आता है पर जाने का फैसला उसके हाथ में नहीं,उनके हाथ में होता है, इस मामले में ये सभी बड़े निष्ठुर होते हैं |सर आप कितना अच्छा पढाते हैं, ये वाक्य हर बैच के साथ बदलता है पर नहीं बदलता तो उनका रवैया जिनको लगता है कि वो कितने समझदार हैं,  लेकिन मास्टर का आंकलन उसके दिए हुए ज्ञान से नहीं बल्कि छात्रों के बनाये गए बहानों को सच मानने से होता है |
(छात्रों के झूठ को जिंदगी का सच मान बैठे गरीब मास्टर की डायरी का दसवां पन्ना,जनता की बेहद मांग पर )
इसे मेरे ब्लॉग पर भी पढ़ सकते हैं

Tuesday, December 10, 2013

खामोशियाँ मुस्कुराने लगीं

आपने कभी सन्नाटे की आवाज सुनी है क्या ? सुनी तो जरुर होगी पर समझ नहीं पाए होंगे यूँ तो एक्सेस किसी भी चीज की बुरी होती है पर  लोग बिना बोले बहुत कुछ कह जाते हैं और कुछ लोग दिन भर बोलने के बाद भी मतलब का कुछ भी कम्युनिकेट नहीं कर पाते.वो गाना तो आपने भी सुना होगा न बोले तुम न मैंने कुछ कहा,तो भैया ये तो सिद्ध हुआ कि बगैर बोले भी बहुत कुछ कहा जा सकता है मगर कैसे ? बोलने का काम हमारी जबान ही नहीं करती बल्कि आँखों से लेकर पैर तक हमारे सभी अंग बोलते हैं तो कम्युनिकेशन में बॉडी लेंग्वेज का भी बड़ा इम्पोर्टेंट रोल है.दुनिया के बहुत से अभिनेताओं की खासियत यही रही है कि वे अपनी आँखों से बहुत कुछ कह देते हैं. प्रख्यात अभिनेता चार्ली चैपलिन ·को ही  लें, जिन्होंने अपनी मूक  फिल्मों ·के माध्यम से सालों तक  लोगों का मनोरंजन किया. उनकी  फिल्में देखते वक्त आपको  ·किसी संवाद ·की  आवयश्·ता ही महसूस नहीं होती. हमारी हिन्दी फिल्में भी अपने शुरुआती दौर में मू·क ही थीं लेकिन  उस दौर में भी उन्होंने लोगों ·का  खूब मनोरंजन ·किया और सराही गईं.
कई बार ज्यादा बोलने से शब्द अपना अर्थ खो देते हैं अरे अब आई लव यु को ही लीजिये फिल्मों में इस शब्द का इतना इस्तेमाल हुआ की अब मैं रील लाईफ या रीयल लाएफ़ में ये शब्द सुनता हूँ तो बस बेसाख्ता हंसी आ जाती है.प्यार एक फीलिंग है उसे एक शब्द में बाँधा या समेटा नहीं जा सकता वैसे फीलिंग से याद आया फीलिंग भी आजकल बिजली के बल्ब जैसी हो गयी है अचानक आती है और अचानक चली जाती है.जानते हैं ऐसा क्यूँ होता.चलिए मैं समझाता हूँ आपको,हम कुछ भी कहते हैं तो उससे पहले सोचते हैं ये बात अलग है की ये प्रोसेस इतना जल्दी होता है की हमें पता ही नहीं पड़ता की जो कुछ हम फटाफट बोले जा रहे हैं वो पहले हमारा दिमाग सोच रहा है उस सोच को शब्दों का लबादा ओढ़ा कर जब हम फीलिंग के साथ एक्सप्रेस करते हैं तो सुनने वाले पर असर होता है.लेकिन ये जरुरी भी नहीं की हर फीलिंग को एक्सप्रेस करने के लिए आपके पास शब्द हों ही तब क्या किया जाए जैसे खीज या फ्रस्टेशन.आप गुस्सा हैं तो चीख चिलाकर आप अपना गुस्सा निकाल सकते  हैं लेकिन  आप खीजे हुए हैं तो क्या बोलेंगे और जो कुछ भी बोलेंगे उसका मतलब सामने वाला समझेगा भी कि  नहीं,क्या पता और तब काम आता है मौन,मौन यानि साइलेंस.चुप्पी या सन्नाटा हमेशा कायरता की निशानी नहीं होती है.ये तो भावनाओं की भाषा होती है जो आप शब्दों से नहीं बोल सकते वो आप अपने मौन से बोल सकते हैं. पर हमें बोलने से कहाँ फुरसत बस बोले जा रहे हैं.सोशल नेटवर्किंग साईट्स ने हमें अपनी बात रखने का मंच दिया है पर क्या जरुरी है की  हम हर मुद्दे पर अपनी राय दें.मैं तुमसे प्यार करता हूँ ,मैं तुमसे गुस्सा हूँ ,मैं तुमसे खुश हूँ इतना काहे को बोलना कुछ सामने वाले को समझने भी दीजिये.एक्सप्रेशन जरुरी है पर उसके लिए हमेशा शब्दों पर निर्भर मत रहिये वैसे भी पर्सनाल्टी डेवेलपमेंट के इस युग में हमें बोलना जरुर सीखाया जाता है पर चुप रहना नहीं वैसे भी जब मौन बोलता है तो उसकी आवाज भले ही देर में सुनायी दे पर बहुत दूर तक सुनायी देती है.हम अपनी लाइफ से जब बोर हो जाते हैं, अपने आस पास के शोर शराबे से दूर भागने ·का मन करता है, ·किसी  से भी बात नहीं ·करना चाहते. तो क्या आपने ऐसे समय में ·भी खुद ·को  एकांत  में रखा है। अगर ऐसे समय में हम ·कहीं  बिलकुल  शांत जगह पर बैठ जायें तो हम बिना ·कुछ  कहे सुने खुद से ही बातें क·रने लगते हैं और फिर अपने आप ही हमें हमारी समस्याओं का समाधान सूझने लगता है.प्यार मुहब्बत के किस्सों में तो खामोशी से प्यार पैदा होने की बातें अक्सर होती रहती हैं.घर में आपका डौगी हो या कोई दूसरा जानवर कितनी जल्दी आपकी बॉडी लैंग्वेज से समझ जाता है कि आप खुश हैं या उदास.यानि एक  बात साफ है कि हम बगैर बोले अपनी फीलिंग्स को एक्सप्रेशन दे सकते हैं  और ऐसे एक्सप्रेशन बहुत ख़ास होते हैं. रिश्तों ·की  गर्माहट तो खामोशियों ·के  दौरान होने वाले कम्युनिकेशन से समझी जा सकती हैं.किसी ने क्या खूब कहा  कि खामोशियां मुस्कुराने लगी .... तन्हाईयां गुनगुनानी लगीं..
आईनेक्स्ट में 10/12/13 को प्रकाशित 

Monday, December 2, 2013

अंगदान की परम्परा शुरू करने की जरुरत


दुनिया की बड़ी आबादी वाले देशों में से एक भारत में में प्रतिवर्ष लगभग 5,00,000लोग वक़्त पर अंग न मिल पाने के कारण मौत का शिकार हो  जाते हैं।इन सारे लोगों को बचाया जा सकता था यदि भारत में स्वैच्छिक रूप से लोग अंगदान करते|ज्यादातर उन्हीं लोगों को समय रहते अंग मिल पाते हैं जो आर्थिक  रूप से संपन्न होते हैं|आर्थिक सम्पन्नता के इसी आधार के कारण मानव अंगों के अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलता है| एक व्यक्ति द्वारा किये गए अंगदान से सामान्य रूप में  लगभग सात व्यक्तियों को जीवनदान मिल सकता है।अंगदान में एक बड़ी समस्या अस्पतालों द्वारा समय से रोगी को मष्तिस्क मृत (ब्रेन डेड ) घोषित न कर पाना भी है जिससे मृतक व्यक्ति के अंग खराब होने लगते हैं| वर्ष 1994 में सरकार ने ‘मानवीय इंद्रियों के प्रत्यारोपण के लिए अधिनियम, 1994’ कानून बनाया ताकि विभिन्न किस्म के अंगदान और प्रत्यारोपण गतिविधियों को सुचारु रूप दिया जा सके। चिकित्सकीय कार्यों के लिए मानवीय इंद्रियों को निकालने, उनका भंडारण करने और उनके प्रत्यारोपण को नियमित करने के अलावा इस कानून का मकसद था कि इंद्रियों के व्यावसायिक लेन-देन को रोका जा सके, ब्रेनडेड को स्वीकार किया जाए और इन मरीजों को संभावित इंद्रियदाताओं के तौर पर प्रयुक्त किया जाए। ध्यान रहे कि प्रस्तुत अधिनियम ने पहली दफा ब्रेनडेड की अवधारणा को कानूनी जामा पहनाया। यह कानून अन्य देशों में प्रयोग में लाये जाने वाले क़ानूनों से कुछ अधिक कठोर है। किसी भी व्यक्ति को ब्रेन-डेड घोषित करने एवं उसके अंगों के प्रत्यारोपण का कार्य केवल चंद अधिकृत अस्पताल ही कर सकते हैं। किसी को ब्रेन-डेड घोषित करने के लिए कम से कम चार डॉक्टरों सहमति होनी आवश्यक है। साथ ही यह परीक्षण 6 घंटों के अंतराल पर करना होता है और समय के जरा सा भी अधिक हो जाने पर अंगदान मुश्किल हो जाता है। अन्य कई देशों में किसी को भी ब्रेन-डेड घोषित करने के लिए केवल दो डॉक्टरों की सहमति चाहिए होती है और दो परीक्षणों के मध्य कोई निश्चित अंतराल रखना भी आवश्यक नहीं है। 1994 में बने इस अधिनियम की कुछ खामियों को मानव अंग प्रत्यारोपण (संसोंधन) अधिनियम, 2011 में दूर करने की कोशिश की गयी है। इस अधिनियम के अंतर्गत नेशनल ऑर्गन एवं टिशू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (एन ओ टी टी ओ) की स्थापना की गयी। इसका मुख्य कार्य होगा देश भर में अंगदान से जुड़ी विभिन्न प्रक्रियाओं एवं गतिविधियों पर नजर  रखना। भारत में प्रति दस लाख  व्यक्ति अंगदान करने वालों की संख्या सिर्फ 0.8 है। यह संख्या विश्व के नया देशों की तुलना में नगण्य है। भारत में इस संख्या के कम होने के पीछे कई कारण हैं जैसे सही जानकारी का अभाव, धार्मिक मान्यताएँ, सांस्कृतिक भ्रांतियाँ और पूर्वाग्रह। विकसित देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स और जर्मनी में यह संख्या औसतन 10 से 30 के बीच है। स्पेन में प्रति दस लाख लोगों में 35.1 अंगदान करते हैं। इसका प्रमुख कारण है की स्पेन, बेल्जियम, सिंगापुर और कुछ अन्य देशों में अंगदान ऐच्छिक  न होकर अनिवार्य है। हालांकि भारत में ऐसा कर पाना फ़िलहाल  संभव नहीं है परंतु उचित जानकारी एवं  जागरूकता पैदा कर इस संख्या को बढ़ाया जा सकता है। हर साल देश में  50,000हजार हार्ट ट्रांसप्लांट , 2,00,000 लीवर ट्रांसप्लांट 30,000 बोन मैरो ट्रांसप्लांट एवं 15,00,00 किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है लेकिन इसका लाभ  दो  प्रतिशत मरीजों को भी नहीं मिल पाता  है |
हिंदुस्तान में 2/12/13 को प्रकाशित 

Thursday, November 28, 2013

बढ़ते ई कचरे से निपटने की चुनौती

सूचना क्रांति के इस युग में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बिना जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल है। मोबाइल,कम्प्युटर, लैपटॉप, टैबलेट, आदि अब आधुनिक मनुष्य के जीवन का अभिन्न अंग बन गए हैं। पर इन आधुनिक उपकरणों के साथ ई-कचरे के रूप में एक बड़ी समस्या भी हमारे सामने आ खड़ी हुई है। ई-कचरे के अंतर्गत वे सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आते हैं जिनकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार, के अनुसार ई-कचरे से तात्पर्य उन सभी इलैक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, पूर्ण अथवा टुकड़ों मेंतथा उनके उत्पादन और मरम्मत के दौरान निकले उन पदार्थों से, जो कि अनुपयोगी हैं, से है। विगत कुछ वर्षों में ई-कचरे की मात्रा में लगातार तीव्र वृद्धि हो रही है और प्रतिवर्ष लगभग 20 से 50 मीट्रिक टन ई-कचरा विश्व भर फेंका जा रहा है। ग्रीनपीस संस्था के अनुसार ई-कचरा विश्व भर में उत्पन्न होने वाले ठोस कचरे का लगभग पाँच प्रतिशत है। साथ ही विभिन्न प्रकार के ठोस कचरे में सबसे तेज़ वृद्धि दर ई-कचरे में ही देखी जा रही है क्योंकि लोग अब अपने टेलिविजन,कम्प्युटर, मोबाइल, प्रिंटर आदि को पहले से अधिक जल्दी बदलने लगे है। इनमें सबसे ज्यादा दिक्कत पैदा हो रही है कम्प्युटर और मोबाइल से क्योंकि इनका तकनीकी विकास इतनी तीव्र गति से हो रहा है कि ये बहुत ही कम समय में पुराने हो जाते हैं और इन्हें जल्दी बदलना पड़ता है। भविष्य में ई-कचरे की समस्या कितनी विकराल हो सकती है इस बात का अंदाज़ा इन कुछ तथ्यों के माध्यम से लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में विकसित देशों में कम्प्युटर और मोबाइल उपकरणों की औसत आयु घट कर मात्र दो  साल रह गई है। भारत में ट्राई की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 90 करोड़ मोबाइल उपभोक्ता हैं और यदि इसमें कम्प्युटर उपभोक्ताओं की भी संख्या जोड़ दी जाये तो हम आसानी से अंदाज़ा लगा सकते हैं की आने वाले वर्षों में ई-कचरे की समस्या कितनी भयावह होने वाली है। एसोचैम के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 30,000 मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा होता है और इसमें लगभग 25 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो रही है। एसोचैम का अनुमान है की वर्ष 2015 तक आते-आते यह मात्रा तकरीबन 50,000 मीट्रिक टन प्रतिवर्ष हो जाएगी। घटते दामों और बढ़ती क्र्य शक्ति के फलस्वरूप इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे मोबाइल, टीवी, कम्प्युटर, आदि की संख्या और प्रतिस्थापना दर में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है|जिससे निकला ई कचरा सम्पूर्ण विश्व में एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रहा है|भारत जैसे देश में जहाँ शिक्षा और जागरूकता का अभाव है वहां सस्ती तकनीक ई कचरे जैसी समस्याएं ला रही है|
घरेलू ई-कचरे जैसे अनुपयोगी टीवी और रेफ्रिजरेटर में लगभग 1000 विषैले पदार्थ होते हैं जो मिट्टी एवं भू-जल को प्रदूषित करते हैं। इन पदार्थों के संपर्क में आने पर सरदर्द, कै, मतली, आँखों में दर्द जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। ई-कचरा हमारे एवं हमारे वातावरण के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। ई-कचरे का पुनर्चक्रण एवं निस्तारण अत्यंत ही महत्वपूर्ण विषय है जिसके बारे में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। भारत सरकार ने ई-कचरे के प्रबंधन के लिए विस्तृत नियम बनाए हैं जो कि मई 2012 से प्रभाव में आ गए हैं। ई-कचरा (प्रबंधन एवं संचालन नियम) 2011 के अंतर्गत ई-कचरे के पुनर्चक्रण एवं निस्तारण के लिए विस्तृत निर्देश दिये गए हैं। हालांकि इन दिशा निर्देशों का पालन किस सीमा तक किया जा रहा है यह कह पाना कठिन है। जानकारी के अभाव में ई-कचरे के शमन में लगे लोग कई  प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त  हो रहे हैं। अकेले दिल्ली में ही एशिया का लगभग 85 प्रतिशत ई-कचरा शमन के लिए आता है परंतु इसके निस्तारण के लिए जरूरी सुविधाओं का अभाव है। आवश्यक जानकारी एवं सुविधाओं के अभाव में न केवल ई-कचरे के निस्तारण में लगे लोग न केवल अपने स्वास्थ्य को  नुकसान पहुंचा रहे हैं बल्कि पर्यावरण को भी दूषित कर  रहे हैं। ई-कचरे में कई जहरीले और खतरनाक रसायन तथा अन्य पदार्थ जैसे सीसा, कांसा, पारा,कैडमियम आदि शामिल होते हैं जो  उचित शमन प्रणाली के अभाव में पर्यवरण के लिए काफी खतरा पैदा करते हैं। एसोचैम की रिपोर्ट के अनुसार भारत अपने ई-कचरे के केवल 5 प्रतिशत का ही पुनर्चक्रण कर पाता है।
ई-कचरे के प्रबंधन की ज़िम्मेदारी उत्पादक, उपभोक्ता एवं सरकार की सम्मिलित हिस्सेदारी होनी चाहिए । उत्पादक की ज़िम्मेदारी है कि वह कम से कम हानिकारक पदार्थों का प्रयोग करें एवं ई-कचरे के प्रशमन का उचित प्रबंधन करें,उपभोक्ता की ज़िम्मेदारी है कि वह ई-कचरे को इधर उधर न फेंक कर उसे पुनर्चक्रण के लिए उचित संस्था को दें तथा सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह ई-कचरे के प्रबंधन के ठोस और व्यावहारिक नियम बनाए और उनका पालन सुनिश्चित करे.
अमर उजाला में 28/11/13 को प्रकाशित 

Tuesday, November 26, 2013

कन्फ्यूजन जी कन्फ्यूजन है

                 
टू बी ऑर नॉट टू बी हालांकि ये लाइन है तो एक विश्व प्रसिद्ध नाटक की पर मामला तो हमारी लाईफ से ही जुड़ा हुआ है.मेरे एक परिचित हैं जो कभी मुझसे बुरी तरह लड़कर अलग हो गए थे  अरसे बाद फिर लौटे हैं और मैं बहुत कन्फ्यूज हूँ कि क्या करूँ.यानि टू बी ऑर नॉट टू बी. कन्फ्यूजन बोलो तो संशय या अनिर्णय की स्थिति. मुझसे अक्सर लोग सलाह मांगते हैं और तब मुझे बड़ी परेशानी होती है की क्या मुझे वाकई सलाह देनी चाहिए ? हमारे एक मित्र एक शहर में अकेले रहते हैं एक दिन उन्होंने मुझसे सलाह माँगी कि वो मकान बदलना चाहते हैं.मैंने पूछा क्यूँ तो वो बोले कि उन्हें बहुत अकेलापन लगता है.मैंने कहा ठीक है अपने किसी दोस्त के साथ रह लो या किसी ऐसी जगह मकान ले लो जहाँ आपके परिचित रहते हों तब उनका जवाब था उन्हें ज्यादा दुलार पसंद नहीं है.जाहिर है वो कन्फ्यूज्ड हैं.वैसे भी कन्फ्यूजन एक ऐसी समस्या है जिसका इलाज समय रहते नहीं किया गया तो इसका सीधा असर हमारी पर्सनाल्टी पर पड़ता है.लेक्चर से आप बोर होते हैं और ज्ञान का खर्रा आपको और कन्फ्यूज करता है तो मैं जो कुछ कहूँगा वो आपकी लाईफ से ही रिलेट कर के कहूँगा.
जिन्दगी के किसी न किसी मोड़ पर हम कन्फ्यूजन का शिकार जरुर होते हैं.कभी रिश्तों में कभी करियर में तो कभी अपनी लाईफ में अक्सर ऐसा होता है और हमें कुछ समझ में नहीं आता कि किया क्या जाए.करियर में आपका इंटरेस्ट तो टीचिंग में है पर पेरेंट्स चाहते हैं कि आप  रेडियो में अपना करियर बनायें.शादी अपनी मर्जी से करना चाहते हैं पर पेरेंट्स को परेशानी होगी .चैटिंग से पढ़ाई में डिस्टर्बेंस होता है पर चैटिंग किये बिना हम रह भी नहीं पाते,वगैरह वगैरह वैसे आजकल स्टेटस अपडेट करने में भी कन्फ्यूजन हो जाता है,क्यूँ होता है न आपके साथ भी, जैसे जैसे जिंदगी आगे बढ़ती है वैसे हमारे कन्फ्यूजन का दायरा भी बढ़ता जाता है.
 बचपने में टॉफी खाई जाए या चॉकलेट तो टीनएज में कौन सा कपडा पहना जाए और फिर जवानी में रिश्ते से लेकर करियर तक न जाने कितने सवाल रोज परेशान करते हैं.क्या करूँ क्या न करूँ है कैसी मुश्किल है भाई.फेसबुक पर भी जब आपको कुछ नहीं समझ आता तो आप भी हम्मम्मम्म कर के रह जाते हैं.ये हम्मम्मम्म का मामला वाकई बड़ा कन्फयूजिंग है,इसका कोई न कोई  सल्यूशन तो होना चाहिए अब कन्फ्यूजन के सल्यूशन की तलाश में अगर किसी से सलाह मांगेंगे और उस पर अमल नहीं करेंगे तो सल्यूशन कैसे निकलेगा.अब ऐसा होता ही क्यूँ है.चलिए इस कन्फ्यूजन को दूर ही कर दिया जाए.कन्फ्यूजन अगर है तो उससे निपटने के दो रास्ते हैं पहला किसी की राय ले ली जाए पर अक्सर होता है कि लोग इतने लोगों से राय ले लेते हैं कि कन्फ्यूजन घटने की बजाय और बढ़ जाता है.ज्यादा लोगों से राय लेने का मतलब ये भी है कि आप जिससे सलाह ले रहे हैं उस पर आपको पूरा भरोसा नहीं है.जब भरोसा नहीं है तो सलाह लेने का क्या फायदा  और अगर सलाह ले रहे हैं  तो उसे मानना चाहिए.बार बार सलाह लेकर अगर आप मानेंगे नहीं तो कोई भी आपको सही सलाह नहीं देगा क्यूंकि उसे पता है कि आप किसी और के पास इस मुद्दे पर राय लेने जायेंगे.दूसरा तरीका है शांत दिमाग से उस समस्या के बारे में सोचा जाए जिसमें आपको कन्फ्यूजन है फिर अपनी लिमिटेशन को ध्यान में रखते हुए अपना आंकलन किया जाए और तब कोई निर्णय लिया जाए पर इसके लिए पहले आपको अपने आप पर पूरा भरोसा होना चाहिए क्यूंकि अपने निर्णय के लिए आप खुद जिम्मेदार होंगे वैसे जिन्दगी में फेसबुक स्टेटस अपडेट की तरह एडिट का कोई ऑप्शन नहीं होता जो बीत जाता है वो बीत ही जाता है.जब भी कभी कोई कन्फ्यूजन हो तो उससे आप ही अपने आप को बाहर निकाल सकते हैं चाहे किसी की सलाह लेकर या अपने आप पर भरोसा रखकर.
                  समझे क्या तो मैंने तो आपका कन्फ्यूजन दूर कर दिया है पर मैं अभी तक कन्फ्यूज्ड हूँ कि अपने उस दोस्त से फिर से दोस्ती करूँ या न करूँ तो आप क्या कहते हैं वैसे जो आप कहेंगे उसे मैं मानूंगा क्यूंकि मैं आप पर भरोसा करता हूँ .
आईनेक्स्ट में 26/11/13 को प्रकाशित 

Friday, November 8, 2013

ताकि बनी रहे रिश्तों में गर्माहट

अच्छा आपकी कभी कोई चीज खोयी है.हाँ खोयी तो होगी ही और उसके खोने का गम भी हुआ होगा.अच्छा कभी आपने सोचा कि हम किस चीज से ज्यादा डरते हैं सोचिये सोचिये जी हाँ कुछ खोने से चाहे वो लोग हों रिश्ते हों या चीजें पर ये एक ऐसा दर्द है जिसे जिंदगी के किसी न किसी मोड पर सबको भोगना ही पड़ता है.देखिये जिंदगी हैं इतना कुछ डेली सिखाती है पर हम ध्यान नहीं देते.खोना बुरा है पर अगर हम कुछ खोयेंगे नहीं तो पाने के सुख का एहसास नहीं कर पायेंगे और जो चीजें हमारे आस पास हैं उनकी कीमत नहीं समझ पायेंगे.अब जिंदगी का सबसे बड़ा सच तो मौत है. अरे हम थोड़ी न कह रहे हैं फिल्म मुकद्दर का सिकंदर ये गाना तो आप सबको याद ही होगा “जिंदगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी मौत महबूबा है मेरी साथ लेकर जायेगी”.फिर भी हम हैं कि मानते नहीं एक दम दिल है कि मानता नहीं टाईप भाई आप सबको खोने के दुःख का एहसास है पर जो चीजें हमारे पास हैं क्या हम उनकी कद्र करते हैं चीजों से मेरा मतलब सिर्फ मेटीरियल्सटिक नहीं है. वो आपने सुना तो  होगा न टेकेन फॉर ग्रांटेड वो हम अपने करीबी रिश्तों पर कितना मजबूती से एप्लाई कर देते हैं.अरे वो तो मेरा दोस्त है और न जाने क्या क्या पर जरा सोचिये जब ये रिश्ते न होंगे वो इंसान न होगा तब आप कैसा महसूस करेंगे.यानि जो तेरा है वो तेरा है और जो मेरा है वो मेरा है फिर रिश्ता चलेगा क्या? यानि रिश्ते भी लेन देन पर ही चलते हैं.भले ही वो लेन देन मेटीरियल्सटिक न हो पर आप किसी रिश्ते में तभी रहते हैं जब आपको कुछ अच्छा लगता है और फिर क्या उस एहसास को जीने के लिए आप कुछ भी कर सकते हैं तो ये टू वे प्रोसेस हुआ न. अब आप अगर ये मान कर चलें कि ये तो उसका फ़र्ज़ है क्यूंकि वो तो आपका फलां है तो आपको क्या लगता है कि रिश्ता चलेगा बिलकुल नहीं वो ढोया जाएगा .हम तो भैया जिंदगी से ही सीखते हैं ठण्ड या तो मौसम में अच्छी लगती है या दिमाग में बाकी सब जगह तो गर्मी का ही बोलबाला है तो रिश्ते गर्मी के एहसास  से ही चलते हैंजिससे अपनेपन की इनर्जी मिलती है तो  उनको टेकेन फॉर ग्रांटेड नहीं लिया जा सकता है और अगर आप ऐसा  किसी रिश्ते के साथ  कर रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप जल्दी ही फिर कुछ खोने वाले हैं जिसका दर्द आपको जीवन भर परेशान करेगा  मेटीरियल्सटिक चीजें खोती हैं तो उनका सबस्टीयूट मार्केट में मिल जाएगा पर अगर आपने कोई रिश्ता खोया तो उसका सबस्टीयूट किसी दूकान बाजार में नहीं मिलेगा. हम थोड़ी न कह रहे हैं अरे ये गाना भी तो यही कह रहा है कि “जिंदगी के सफर में बिछड जाते हैं जो मुकाम वो फिर नहीं आते” साईंस ने बहुत तरक्की कर ली है पर खोये हुए रिश्ते और बिछड़े लोग दुबारा जीवन में उसी रूप में नहीं आते आप फिर मेरी बात नहीं मानेंगे तो हम कहाँ कह रहे हैं रहीम दास जी ने लिखा था “रहिमन धागा प्रेम का मत तोडो चटकाय,टूटे से फिर न जुड़े,जुड़े गाँठ पड़ जाए”मौसम में ठंडी का मजा लीजिए पर रिश्तों की गर्मी को बचा कर रखिये पर ये कहना जितना आसान करना उतना ही मुश्किल रिश्तों की गर्मी पर अक्सर ईगो की ठंडक हावी हो जाती है और हम नफा नुकसान देखने लग जाते है अब किसी रिश्ते में ऐसा हो रहा है तो उनको खो ही जाने दीजिए पर जिनकी आपको कद्र है बगैर शर्तों को उनको रोक लीजिए मना लीजिए क्यूंकि क्या पता कल हो न हो क्या पता कल वो लोग ही खो जाएँ जिनसे आप कह सकें तुस्सी न जाओ तो मौसम में ठण्ड का पूरा लुत्फ़ उठाइये पर मुझे भरोसा दिलाइये कि आप अपने रिश्तों में अपने पन के एहसास को गर्म रखेंगे जिससे जाड़े की वो सुहानी शाम आपको याद रहेगी.
आई नेक्स्ट में 08/11/13 को प्रकाशित 

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