Monday, October 28, 2013

अपने ही घर में नज़रअंदाजी झेल रहे बुजुर्ग

जनसंख्या की दृष्टि से दुनिया का दूसरा बड़ा देश होने के नाते भारत की आबादी पिछले 50 सालों में हर 10 साल में 20 फीसदी की दर से बढ़ रही है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की जनसंख्या 1 अरब 20 करोड़ से भी अधिक रहीजो दुनिया की कुल जनसंख्या का 17.5 प्रतिशत है। इस आबादी में आधे लोगों की उम्र 25 से कम है पर इस जवान भारत में   बूढ़े लोगों के लिए भारत कोई सुरक्षित जगह नहीं है,टूटते पारिवारिक मूल्यएकल परिवारों में वृद्धि  और उपभोक्तावाद की आंधी में घर के बूढ़े कहीं पीछे छूटते चले जा रहे हैं|'द ग्लोबल एज वॉच इंडेक्सने दुनिया के 91 देशों में बुज़ुर्गों के जीवन की गुणवत्ता का अध्ययन के अनुसार बुज़ुर्गों के लिए स्वीडन दुनिया में सबसे अच्छा देश है और अफगानिस्तान सबसे बुरा,इस इंडेक्स में चोटी के20 देशों में ज़्यादातर पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमरीका के हैंसूची में  भारत 73वें पायदान पर है| वृद्धावस्था में सुरक्षित आय और स्वास्थ्य जरूरी है|उम्र का बढ़ना एक अवश्यंभावी प्रक्रिया है| इस प्रक्रिया में व्यक्ति का शारीरिकमानसिक एवं सामाजिक बदलाव होता है| पर भारत जैसे देश  में जहाँ मूल्य और संस्कार के लिए जाना जाता है वहां ऐसे आंकड़े चौंकाते नहीं हैरान करते हैं कि इस देश में बुढ़ापा काटना क्यूँ मुश्किल होता जा रहा है |बचपने में एक कहावत सुनी थी बच्चे और बूढ़े एक जैसे होते हैं इस अवस्था में सबसे ज्यादा समस्या अकेलेपन के एहसास की ,भारतीय समाज संक्रमण के दौर से गुजर रहा |डब्लूएचओ के अनुमानित आंकड़े के अनुसार भारत में वृद्ध लोगों की आबादी 160 मिलियन (16 करोड़) से बढ़कर सन् 2050में 300 मिलियन (30 करोड़) 19 फीसद से भी ज्यादा आंकी गई है. बुढ़ापे पर डब्लूएचओ की गम्भीरता की वजह कुछ चैंकाने वाले आंकड़े भी हैं. जैसे 60 वर्र्ष की उम्र या इससे ऊपर की उम्र के लोगों में वृद्धि की रफ्तार 1980 के मुकाबले दो गुनी से भी ज्यादा है| 80 वर्ष से ज्यादा के उम्र वाले वृद्ध सन 2050 तक तीन गुना बढ़कर 395 मिलियन हो जाएंगे| अगले वर्षों में ही 65 वर्ष से ज्यादा के लोगों की तादाद वर्ष तक की उम्र के बच्चों की तादाद से ज्यादा होगी. सन् 2050 तक देश में 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों की तुलना में वृद्धों की संख्या ज्यादा होगी. और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह कि अमीर देशों के लोगों की अपेक्षा निम्न अथवा मध्य आय वाले देशों में सबसे ज्यादा वृद्ध होंगें. पुराने ज़माने के संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार लेते जा रहे हैं जिससे भरा पूरा रहने वाला घर सन्नाटे को ही आवाज़ देता है बच्चे बड़े होकर अपनी दुनिया बसा कर दूर निकल गये और घर में रह गए अकेले माता –पिता चूँकि माता पिता जैसे वृद्ध भी अपनी जड़ो से क्त कर गाँव से शहर आये थे इसलिए उनका भी कोई अनौपचारिक सामजिक दायरा उस जगह नहीं बन पाता जहाँ वो रह रहे हैं तो शहरों में यह चक्र अनवरत चलता रहता है गाँव से नगर, नगर से महानगर वैसे इस चक्र के पीछे सिर्फ एक ही कारण होता है बेहतर अवसरों की तलाश ये बात हो गयी शहरों की पर ग्रामीण वृद्धों का जीवन शहरी वृद्धों के मुकाबले स्वास्थ्य सेवाओं के संदर्भ में और ज्यादा मुश्किल है वहीं अकेलापन तो रहता ही है |बेटे बेटियां बेहतर जीवन की आस में शहर चले गए और वहीं के होकर रह गयें गाँव में माता –पिता से रस्मी तौर पर तीज त्यौहार पर मुलाक़ात होती हैं कुछ ज्यादा ही उनकी फ़िक्र हुई थी उम्र के इस पड़ाव पर एक ही इलाज है उन वृद्धों को उनकी जड़ों से काट कर अपने साथ ले चलना |ये इलाज मर्ज़ को कम नहीं करता बल्कि और बढ़ा देता है |जड़ से कटे वृद्ध जब शहर पहुँचते हैं तो वहां वो दुबारा अपनी जड़ें जमा ही नहीं पाते औपचारिक सामजिकता के नाम पर बस अपने हमउम्र के लोगों से दुआ सलाम ऐसे में उनका अकेलापन और बढ़ जाता है |इंटरनेट की आदी यह पीढी दुनिया जहाँ की खबर सोशल नेटवर्किंग साईट्स लेती है पर घर में बूढ़े माँ बाप को सिर्फ अपने साथ रखकर वो खुश हो लेते हैं कि वह उनका पूरा ख्याल रख रहे हैं पर उम्र के इस मुकाम पर उन्हें बच्चों के साथ की जरुरत होती है पर बच्चे अपनी सामाजिकता में व्यस्त रहते हैं उन्हें लगता है कि उनकी भौतिक जरूरतों को पूरा कर वो उनका ख्याल रख रहे हैं पर हकीकत में वृद्ध जन यादों और अकेलेपन के भंवर में खो रहे होते हैं | महत्वपूर्ण ये है कि बुढ़ापे में विस्थापन एक गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या है जिसको नजरंदाज नहीं किया जा सकता है मनुष्य यूँ ही एक सामाजिक प्राणी नहीं है पर सामाजिकता बनाने और निभाने की एक उम्र होती है|विकास की इस दौड़ में अगर हमारी जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा यूँ ही बिसरा दिया जा रहा है तो ये यह प्रवृति एक बिखरे हुए समाज का निर्माण करेगी |

गाँव कनेक्शन साप्ताहिक 27/10/13 के अंक में प्रकाशित 

10 comments:

deepanker sharma said...

bharat me sahri vridh avasth ki dayniye halaat ke karan ye bhi ho sakte hai ki nagaro aur mahanagro me samajik sanchaar ka abhaav sa aane laga hai ,hum kisi se jaldi vartalaap nahi karna chate hai,apne hi ghar me hum kush rehte hai hume baki ki duniya se matlab nahi rehta hai,hum dusro ki baat bhi nahi sunna cahte hai,. Gramin jagaho par to 40 saal me hi bhudapa maan liya jata hai , kehne ko to bharat me swasthy seway bahut sasti hai aur isiliye sasti gudwatta bhi hai jiske karan gramin vridhi ki tirth yatra hospital se hi suru hoti hai aur hospital me hi aakar khatam hoti hai

deepanker sharma said...

bharat me sahri vridh avasth ki dayniye halaat ke karan ye bhi ho sakte hai ki nagaro aur mahanagro me samajik sanchaar ka abhaav sa aane laga hai ,hum kisi se jaldi vartalaap nahi karna chate hai,apne hi ghar me hum kush rehte hai hume baki ki duniya se matlab nahi rehta hai,hum dusro ki baat bhi nahi sunna cahte hai,. Gramin jagaho par to 40 saal me hi bhudapa maan liya jata hai , kehne ko to bharat me swasthy seway bahut sasti hai aur isiliye sasti gudwatta bhi hai jiske karan gramin vridhi ki tirth yatra hospital se hi suru hoti hai aur hospital me hi aakar khatam hoti hai

shalu awasthi said...

aj kal ke log apne maa baap ko bhoolne me jara bi dr nhi lagate ...maa baap apni icchae bhool kar apne baccho ko paalte hain par jarurat aane par yahi bacche unhe chhodh ke chale jaate hain...yathaarth likha h aapne, yahi chal rha hai jamane mein

rachna rishi said...

Our culture recognizes the status of the parents as that of God. A moral duty is put on the children to take care of their parents. But nowadays what we are observing in our society is that the children are not willing to take care of their parents, they do not want to spend money on them, they are treating their parents as aliens, they do not want to share an emotional bond with parents. There are acts and laws pertaining to welfare of parents and senior citizens but can money help the lonely parents. Constant reminder about our duties and responsibilities is necessary to keep our society on track. Else the day is not far when nani ki kahaniya and dadi ke gharelu nuskhe would become history.

Shainda Warsi said...

HR EK CHIS KI SIMAYE HOTI HAI.AGR WO SIMA KISI NE LANGHI TO USE ISKA KHAMIYAZA BHUGATNA HOGA
AISE HI HMARI SNSKRITI HAI JISE HM PURI TRH SE BHUL KR WESTENISATION KI TRAF BADH RHE HAI
ZAEEF HOTE HUE MAA BAAP KO OLD HOUSE BHEJ DIYA JATA HAI GHRO ME HASI K THAHAKO KI JGAH WATSAPP
OR FACEBOOK K MSGS KI AWAZO NE LE LI HAI.SOCIAL SITES PE GROUP BNANE KI TO FURSAT HAI PR
GHR K FRD SE KHAIRIYAT PUCHNE KA WAQT NIYE KIS RAH CHL RHE HMM.........
JAHA HAMARE PAS HMARE VALIDAIN K LIYE WAQT NHI.

Dimple Badlani said...

Neend apni bhula ke sulaya hmko,Aansu apney gira ke hasaya hmko.Dard kabhi na dena un hastiyo ko, khuda ne "maa"," baap" banana jinko.Everyone should respect their parents from the core of heart.They r very precious nd no one can take their place in this universe.

Fatima Lubna said...

Our nation is progressing but our morals are devaluing. we forget the importance of elders and the role which they have played in our lives, their sacrifices. We tend to forget the reason we our in this world is because of our parents whatever we have achieved is because of them. Elders just want to feel the loved which once they shared with their children. Forget about love, what we are doing is beating them, dragging them to court for inherit property. Every parent want to see there child grow and be successful but they don't want to be treat as unnecessary burden.

Navneet verma said...

eak kahavat hai...
old is gold
hum apnay BUJURG dwara kiye gaye kaarya or unke anuvhav ko lay ka or aaj ka samay k gyaan ko milakar hum apne or desh ko unnati ki ore le ja sakt hai.
is tarah hum uno ko NAZAR ANDAAZ say door rakh sakte hai.

Shivanshu Gupta said...

भारत एक दोहरी मानसिकता वाला देश है यहाँ एक ही चीज को देखने के लिए अलग अलग चश्मे की जरूरत पडती है , हमारे घरों में बुजुर्गों का जीवन बीत कुछ सालों में इतनी तेज़ी से बदला है जिसे स्वीकारना उनके लिए काफी कठिन है| भौतिक सुख की चाह और जीवन की गुणवत्ता को हद से ज्यादा बेहतर बनाने की जुगत में सबने अपनी जड़ों से कटना और बुजुर्गों को उनकी जड़ों से काट के रख दिया है| इन बदलावों का दंश वो बच्चे झेल रहे है जो आज बिना माँ बाप दादा दादी के बजाय आया के गोद में अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण समय गुजार रहे हैं| हम आज उस दौर में है जब हम बुजुर्गों को अधिकतर लोग उनकी जायदाद की लालच में रखा हुआ है और कुछ ने अपनी संस्कार की लाज रखने के लिये |

Sudhanshuthakur said...

अपने ही बच्चों के शिकार बुजुर्ग
पेड़ों, पत्थरों से लेकर जानवरों तक को पूजने वाला भारत अपने बुजुर्गों का ही ख्याल नहीं रख रहा. कभी मां बाप को भगवान मानने वाले भारत के बेटे अब उन्हें बोझ मानने लगे हैं और उन पर अत्याचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं

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