Tuesday, May 13, 2014

एक रुपये में 10 गोलगप्पे और डबल डेकर बस की सवारी

आइये आपको एक कहानी सुनाते हैं,लखनऊ की कहानी,हमारे लखनऊ की कहानी, एक ऐसे कहानी जो हमारे आस पास कल तक थी पर आज इतिहास है| होश सम्हालते लखनऊ की जो पहली तस्वीर मेरे जेहन में उभरती है वो है सड़कों पर चलते टैम्पो जिन्हें उन दिनों गणेश जी कहा जाता था कारण आगे से वे काफी लम्बे हुआ करते थे.आलमबाग से चारबाग का किराया साठ पैसे |सड़कों पर कार और बाईक कम ही थी सड़कों पर  ज्यादातर स्कूटर या साइकिल सवार ही दिखा करते थे|कार की बात तो छोडिये बाईक होना स्टेटस सिम्बल माना जाता था|सड़क से चलिए आइये उन दिनों के घरों की तरफ ले चलूँ.वो भी क्या दिन हुआ करते थे,जब छत हम सबकी जिन्दगी का अहम् हिस्सा हुआ करती थीं  मौसम कोई भी हो जाड़ा गर्मी या बरसात छतें  हमेशा गुलजार रहा करती थीं बस उनका समय बदला करता था|जाड़े में जब तक छत पर धूप हो गर्मी में शाम होते ही छतों की धुलाई शुरू हो जाती थी क्यूंकि रात को सुहानी बनाने का यही एक तरीका था जब पूरा घर छत पर ही सोता था तब एसी और कूलर लक्जरी हुआ करते थे,बारिश में छत पर भीगने का अपना एक अलग लुत्फ़ हुआ करता था .उन दिनों लखनऊ में डबल डेकर बस भी चला करती थी उसका रूट शायद चारबाग से सिंगार नगर हुआ करता था.इस बस की ऊपर वाली मंजिल पर बैठने का सौभाग्य मुझे भी मिला आज भी उसके रोमांच को मैं महसूस कर सकता हूँ|तब लखनऊ में साप्ताहिक बाजारों का बड़ा महत्व था आलमबाग का  मंगल बाजार हो या निशातगंज का बुध बाजार लोग हर हफ्ते इन बाजारों के लगने के इन्तजार करते थे, तब के  सुपर मार्केट और मॉल्स यही साप्ताहिक बाजार हुआ करते थे|कुल्फी का मतलब सिर्फ प्रकाश कुल्फी होता था जिसका विज्ञापन नियमित रूप से लखनऊ विविध भारती पर चित्रलोक में बजा करता था |कोई अमीनाबाद गया और उसने प्रकाश कुल्फी नहीं खाई तो उसका अमीनाबाद जाना बेकार ही रहा|सड़कों से गुजरते वक्त अगर किसी सुरीले गाने की आवाज़ कानों में पड़े तो समझ लीजिये कि कहीं रेडिओ पर विविधभारती बज रहा है या कोई बड़ा संगीत दीवाना अपने टेपरिकॉर्ड बजा रहा है|पेट्रोल सात रुपैये लीटर ,एक रुपये के दस गोल गप्पे और दस पैसे की औरेंज आईसक्रीम|.हाँ पानी पाउच या बिसलरी की बोतल में नहीं मिलते थे दस पैसे खर्च कीजिये और एक गिलास पानी पीजिये |आलमबाग के लोकोशेड के साइरन से आधा लखनऊ घड़ी मिलाता था .घर के कबाड़ को  मीठी पट्टी  के बदले,बदला जा सकता था|छतों पर लगे एंटीना देखकर अंदाज़ा लगाया जाता था की इस घर में टीवी है कि नहीं और जब डीडी मेट्रो शुरू हुआ तो घर के एक तथाकथित जिम्मेदार लड़के का नियमित काम एंटीना को सही पोजीशन करना और छत से लगातर ये पूछना आया कि नहीं और नीचे से जोर से आवाज़ आती बस्सस्स आ गया मतलब अब तस्वीर साफ़ आ रही है|वैसे जो बीत जाता है वो बीत ही जाता है पर यादों का क्या कभी भी आ जाती हैं बिन यादों के भी कोई जीवन हो सकता है भला वो दिन अलमस्ती के दिन होते थे जब जेब खाली होती थी पर दिल लोगों के ख़ुलूस और प्यार से भरे रहते थे |पतंग के मांझे से हाथ जरुर कटते थे पर पतंगे दिल जोड़ दिया करती थी.
हिनुस्तान लखनऊ लाईव में प्रकाशित संस्मरण 

7 comments:

RJ Rashi said...

Very nice picturization padh kr laga ki mere samne koi picture chal rahi hai ab to soch rahe hai ki kash pehle ke lucknow ko dekh sakte
-Rajsi swaropp

Nikita Sareen said...


सर , सच कहा आपने लेकिन आप एक बात लिखना भूल गए , उन दिनों जब लाइट जाती थी तो पूरा मोहल्ला घरो से बाहर आ जाता था । खूब गपशप और मौज़ मस्ती होती थी । काश वो दिन फिर आ सकते , लेकिन मुझे पता है ये मुमकिन नहीं क्योंकि आज के युग में कंप्यूटर और मोबाइल ने लोगो को अपनों से दूर कर दिया है । लेकिन सच तो ये है कि " अच्छे दिन " वही थे ।

Naincy Kashyap said...

vo bhi kya din the sb khush rhte the ab to log busy stress or paisa kamane ki hodh m lage hua h agr mood fresh krna ho to social networking sites .

Fatima Lubna said...

The Good Old Days.The Lucknow which you have mentioned in your article seems to be so beautiful, Wish those days could come back and our generation also gets the chance to live in Lucknow which sir your article talks about. Now we all are so involved in our lives and have such a hectic schedule that we tend to ignore the small things which makes our life easy and beautiful. Definition of happy lives has changed,now its about earning money but earlier it was in those small things like gup shup with neighbours or watching movie with whole colony on VCR. We are ignoring all those things which gives us contentment.

NITYANAND GUPTA said...

पुराने दिनों की बात ही कुछ और थी ,वो बारिश की बूंदे ,वो चाय की चुस्किया ,आस -पड़ोस के लोगो से मिलना ,एक दूसरे की कहानियाँ सुनना ,चिलचिलाती धुप में भी खेलने निकल जाना कितने हसीन दिन थे वो ,आज कल तो लोगों को एक दूसरे के लिए ही समय नहीं होता की वो एक दूसरे से बात करे अपनी बातो को कह सके और ज़िन्दगी को खुल के जी सके जैसे पहले हुआ करता था ,मैं भी अपने पुराने दिनों को याद करता हूँ तो बहुत अच्छा लगता है ,धन्यवाद आपका आपने हमें वो दिन फिर से याद दिलाया /

menitya said...

पुराने दिनों की बात ही कुछ और थी ,वो बारिश की बूंदे ,वो चाय की चुस्किया ,आस पड़ोस के लोगो से मिलना ,एक दूसरे की कहानियाँ सुनना ,चिलचिलाती धुप में भी खेलने निकल जाना कितने हसीन दिन थे वो ,आज कल तो लोगों को एक दूसरे के लिए ही समय नहीं होता की वो एक दूसरे से बात करे अपनी बातो को कह सके और ज़िन्दगी को खुल के जी सके जैसे पहले हुआ करता था ,मैं भी अपने पुराने दिनों को याद करता हूँ तो बहुत अच्छा लगता है ,धन्यवाद आपका आपने हमें वो दिन फिर से याद दिलाया /

Vaishali Gupta said...

Ab to aisa ho ki pahele ke din to jaise ki ek sapne ban gye h.

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