Wednesday, July 1, 2015

औरतों पर ज्यादा कहर बरपाती हैं आपदाएं

प्राकृतिक आपदाओं के संदर्भ में आम धारणा यही  है कि इनमें हर किसी का बराबर नुकसान होता है यानि आपदा कम से कम लिंग के आधार पर भेद नहीं करती । पर जमीनी हकीकत कुछ और ही  है? आंकड़े तो कम से कम ऐसा नहीं मानते हैं। यह बात सामने आ चुकी है कि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं को ज्यादा समस्याओं का सामना करना पड़ता  है। वर्ष  2007 में लंदन स्कूल ऑफ इक्नोमिक्स और एसेक्स विश्वविद्यालया के शोधकर्ताओं द्वारा किए १४१ देशों में किए गए गए एक अध्ययन के अनुसार वर्ष १९८१ से लेकर वर्ष २००२ तक हुई प्राकृतिक आपदाओं के दौरान मरने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या से काफी अधिक थी। साथ ही इस शोध में यह तथ्य भी सामने आया कि जैसे-जैसे प्राकृतिक आपदा की विभीषिका बढ़ती गयी वैसे-वैसे पुरुष और महिला मृत्यु-दर के बीच का फासला भी बढ़ता गया। नेपाल में अभी हाल ही में आये भूकम्प के बाद से जो  ताज़ा आंकड़े मिले हैं उनके मुताबिक भीषण भूकंप से प्रभावित होने वाले तेरह लाख लोगों में से लगभग तिरपन प्रतिशत महिलाएं हैं। वैसे तो यह आंकड़ा बहुत बड़ा नहीं है पर यह इतना नगण्य भी नहीं है कि इसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाये। जैसे-जैसे स्थिति और साफ होती जाएगी इस खाई के और गहरा होने की संभावना है। एक्शन एड द्वारा विकसित विमेन रेजिलयेन्स इंडेक्स - एक मापदंडजो किसी भी प्राकृतिक आपदा के दौरान किसी भी देश की महिलाओं की सुरक्षा और बचाव को लेकर किए गए उपायों की उपादेयता दर्शाता है - के अनुसार नेपाल को १०० में से सिर्फ ४५.२ अंक मिले हैं जबकि जापान के लिए यही आंकड़ा 80.6 है। पाकिस्तान को इस इंडेक्स ने १०० में से २७.८ अंक दिये हैं जबकि भारत को लगभग नेपाल बराबर ही रखा गया है।इस इंडेक्स के मुताबिक़ यदि कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो जापान के मुकाबले भारत ,पाकिस्तान और नेपाल में महिलाओं के प्रभावित होने  की संभावना ज्यादा है |
 आपदा के बाद के राहत और बचाव कार्यों के दौरान यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है। वर्ष २००८ में हिन्द महासागर में आई सुनामी के दौरान महिलाओं की मृत्यु-दर पुरुषों की अपेक्षा चार  गुना अधिक थी। भूकंप या सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की स्थिति के अधिक ख़राब होने की कई वजहें हैं। इनमें सामाजिक एवं जैविक दोनों ही  प्रकार की वजहें शामिल हैं। उदाहरण के लिए वर्ष १९९३ में महाराष्ट्र में और वर्ष २००१ में गुजरात में भूकंपों के दौरान १०००० एवं २०००० लोग काल का ग्रास बने थे। इनमें महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत काफी अधिक थी। इसके पीछे यह तर्क यह है  कि भूकंप के वक़्त ज़्यादातर महिलाएं घरों के अंदर थीं जबकि पुरुष घरों से बाहर खुले स्थानों पर थे। तात्कालिक बचाव एवं राहत कार्यों के समाप्त हो जाने के बाद भी महिलाओं के प्रति भेदभाव खत्म नहीं होता है।वर्ष २००१ में गुजरात में आए भूकंप के दौरान विकलांग होने वाले लोगों की संख्या काफी ज्यादा थी। इनमें से ज़्यादातर महिलाएं थीं क्योंकि वे उस आपदा के वक़्त वे अपने-अपने घरों के अंदर थीं। इस प्रकार की आपदाओं के दौरान विकलांग हो जाने वाली महिलाओं की स्थिति और भी दयनीय हो जाती है क्योंकि यदि वे विवाहित हैं और उनके पति जीवित बच जाते हैं तो वे उन्हें छोड़ सकते हैं। यदि वे अविवाहित हैं तो उनके विवाह में काफी कठिनाई आती है। जहां पर भी समाज का ढांचा पित्रासत्तात्मक अथवा पुरुष-प्रधान हैं वहाँ यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है। इस प्रकार के समाजों में प्राकृतिक आपदाओं के बाद का वक़्त सबसे खतरनाक होता है क्योंकि उस वक़्त उनकी सुरक्षा का जो थोड़ा-बहुत ढांचा इस प्रकार के समाजों में होता है वह भी ध्वस्त हो चुका होता है। इस प्रकार आपदा के बाद महिलाओं का जीवन और भी दुश्वार हो जाता है। नेपाल की त्रासदी से सबक लेते हुए आने वाले समय में हमें आपदा प्रबंधन करते वक़्त महिलाओं की समस्यों एवं जरूरतों का खास खयाल रखना होगा। ऐसा करने से विश्व की आधी आबादी के प्रति हम अपने कर्तव्यों को पूर्ण कर पाएंगे। 
हिंदुस्तान में 01/07/15 को प्रकाशित 

6 comments:

anjali said...

ha ji shi kehre ho ap mujhe toh andaza bhi nhi tha ki ye sab bhi kbhi problem ho skta hai bdiya soch...

akanksha gupta said...

Pehli bar is naye topic pe aise article padha hai.....abhi tak is tarah ki samasya pe logo ka dhyan hi nai gaya

arvind singh Yadav said...

U r right sir bcz logo ka sochna hota hi ladies kaam nhi kr skti or karna chahti bhi hai to krne nhi dete unhe dbaa diya jata hi badhawa nhi milta..

Karishma Lalwani said...

Its a wrong mentality of people who think women are made for domestic work. Your post is an eyeopening to those who think.women stand no where to men or are below them. Its a world where everyone should be given equal opportunities. This post is a reality to these problems. A good post

ANKIT Yadav said...

this is ryt that disasters affect women much more than men ... according to researches it is found that between 1981 to 2002 natural disasters killed significantly more women than men.....
women are far more likely than men thats why they die from natural disaster due to their health and safety issues..

Sudhanshuthakur said...

आपदा कोई भी हो, सूखा, बाढ़, भूकंप या फिर दंगा-फसाद, जातीय हिंसा. उसका सबसे अधिक शिकार भी औरतें ही होती हैं। यूएनडीपी ने 140 देशों की स्टडी में यह पाया है कि आपदाओं की स्थिति में औरतों की लाइफ एक्सपेंट्सी यानी जीवन संभाव्यता पुरुषों के मुकाबले बहुत कम होती है। उनकी मौत की आशंका भी पुरुषों की अपेक्षा 14 गुना अधिक होती है। अगर आपदाओं की स्थिति में वे बच भी जाती हैं तो उन पर शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक दबाव सबसे ज्यादा होता है.

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