Wednesday, October 9, 2019

रीजनल लेंग्वेजेज की इंटरनेट से गहरी दोस्ती

इंटरनेट ने सही मायने में भारत को एक ग्लोबल विलेज के रूप में तब्दील कर दिया है.लम्बे समय तक भाषा एक बड़ी समस्या थी अगर आपको अंग्रेजी नहीं आती तो इंटरनेट पर आप सिर्फ तस्वीरें ही देख सकते थे पर स्पीच रिकग्नीशन टूल और यूनीकोड फॉण्ट ने वह समस्या भी दूर कर दी आपको बस अपने कंप्यूटर या स्मार्ट फोन  में कुछ सोफ्टवेयर या एप डाउनलोड करना है और आप इंटरनेट के विशाल सागर में गोते लगाने के लिए तैयार हैं वह भी अपनी भाषा में  .पर इंटरनेट में कुछ क्षेत्र अभी भी ऐसे हैं जहाँ बाजार न होने के कारण उसमें शोध और उन्नयन उस गति से नहीं हुआ जितना अंग्रेजी भाषा के साथ हुआ और यूनिकोड फॉण्ट उनमें से एक ऐसा ही क्षेत्र है .यूनिकोड फॉण्ट ऐसे फॉण्ट होते हैं कि उनमें लिखने पढने के लिए आपको अलग से उस फॉण्ट विशिष्ट को डाउनलोड करने की जरुरत नहीं होती और यह फॉण्ट इंटरनेट को सपोर्ट करते हैं .इंटरनेट में हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ  का विस्तार इसी फॉण्ट के ज़रिये लगातार गति पा रहा है पर यूनिकोड फॉण्ट की शैली में शब्दों के भावों को वयक्त करने के लिए जो विशिष्टता और विविधता हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओँ के फॉण्ट में होनी चाहिए हिन्दी के पारम्परिक फॉण्ट  (चांदनी ,कुर्ती देव ,खलनायक आदि ) के मुकाबले में वह नहीं है और इसी कारण हिन्दी की तमाम वेबसाईट प्रस्तुतीकरण में एक जैसी ही  दिखती है  और अगर इसकी तुलना अंग्रेज़ी के फॉण्ट से  की जाए तो हिन्दी के यूनीकोड फॉण्ट कहीं नहीं ठहरते पर तथ्य यह भी है कि हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं ने अंग्रेजी को भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ता भाषा के रूप में पहले ही दूसरे स्थान पर ढकेल दिया  है . गूगल और के पी एम् जी की रिपोर्ट के मुताबिक इंटरनेट पर भारतीय भाषाओँ के साल 2011 में 42 मिलीयन प्रयोगकर्ता थे जो साल 2016 में बढ़कर 234 मिलीयन हो गए हैं और यह सिलसिला लगातार बढ़ ही रहा है पर फॉण्ट की विविधता और वैशिष्ट्य  में अंग्रेजी अभी भी कहीं आगे है.ये फॉण्ट ही हैं जो वेबसाईट्स के कंटेट की द्र्श्यता में विविधता लाते हैं .जो पाठकों से विश्वास का सम्बन्ध बनाते हैं .पाठक उनके फॉण्ट से वेबसाईट का नाम तक पहचान लेते हैं .हिन्दी के ज्यादातर अखबार मुद्रित माध्यम में अपने लिए एक अलग प्रकार का फॉण्ट इस्तेमाल करते हैं पर मुद्रित माध्यम में वे पारम्परिक फॉण्ट का इस्तेमाल करते हैं और यूनिकोड फॉण्ट का छपाई में इस्तेमाल न के बराबर होता है .अंग्रेज़ी के फॉण्ट इस तरह की किसी भी सीमा से मुक्त हैं यानि जो फॉण्ट छपाई में इस्तेमाल होता है वही वेबसाईट या कंप्यूटर में भी इस्तेमाल किया जा सकता है .
लाखों करोडो वेबसाईट में फॉण्ट कंटेंट के प्रस्तुतीकरण के  नजरिये से अहम् भूमिका निभाते हैं .ऐसा ही कुछ अखबारों के साथ भी होता है पर वहां हिन्दी के पारम्परिक फॉण्ट इस्तेमाल किये जाते हैं जिनमें यूनीकोड के मुकाबले ज्यादा विविधता है पर इंटरनेट पर हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओँ की वेबसाईट फॉण्ट के नजरिये से एकरसता लिए हुए दिखती हैं .यूनीकोड फॉण्ट में विविधता की कमी के कारण मीडिया के अन्य माध्यमों जैसे समाचार पत्र ,फिल्म और टेलीविजन में यूनीकोड फॉण्ट का इस्तेमाल न होकर हिन्दी के पारम्परिक फॉण्ट का इस्तेमाल होता है जिनका प्रयोग करना यूनीकोड के मुकाबले कठिन होता है और इसके लिए जिस भाषा का वह फॉण्ट है आपको उस भाषा की पारम्परिक टाइपिंग आनी आवश्यक है जबकि यूनीकोड इस तरह की समस्याओं से परे  है आप जो कुछ भी किसी भारतीय भाषा में कहना चाह रहे हैं आपको उसे बस रोमन में लिखना होता है और वह उस भाषा में अपने आप परिवर्तित हो जाता है पर अब भारतीय भाषाओँ के यूनिकोड फॉण्ट में भी बदलाव दिख रहा है और उसका बड़ा कारण हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ  का बढ़ता आधार है  .इंटरनेट पर 55.8 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में हैजबकि दुनिया की पांच प्रतिशत से भी कम आबादी अंग्रेजी का इस्तेमाल अपनी प्रथम भाषा के रूप में करती है। इसके बरक्स अरबी या हिंदी जैसी भाषाओं मेंजो दुनिया में बड़े पैमाने पर बोली जाती हैंइंटरनेट सामग्री क्रमश: 0.8 और 0.1 प्रतिशत उपलब्ध है। बीते कुछ वर्षों में इंटरनेट और कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स जिस तरह लोगों की अभिव्यक्ति व अपेक्षाओं का माध्यम बनकर उभरी हैंवह उल्लेखनीय जरूर है.एक टाईप” ग्रुप  के पंद्रह लोगों की टीम ने भारतीय भाषाओँ के लिए छ: ऐसे यूनिकोड फॉण्ट विकसित किये हैं जो भारत की क्षेत्रीय भाषाओँ को एक ही तरीके से लिखे जा सकते हैं  इस ग्रुप के द्वारा विकसित मुक्ता देवनागरी फॉण्ट प्रधानमंत्री कार्यालय समेत लगभग पैतालीस हजार वेबसाईट के द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है .इसी का बालू फॉण्ट दस भारतीय भाषाओँ में उपलब्ध है जिनमें मलयालम,कन्नड़ और उड़िया जैसी भाषाएँ शामिल हैं .फॉण्ट संदेश प्रसार में कुछ ऐसा ही काम करते हैं जैसे आवाज का इस्तेमाल बोलने में होता है फॉण्ट शब्द के भावों को पाठकों तक ले जाते हैं और हर भाव के लिए एक ही फॉण्ट संदेश की गुणवत्ता को प्रभावित करता है .आज की पीढी इतना ज्यादा वक्त कम्प्यूटर पर बिता रही है तो पाठन एक अच्छे अनुभव में तब्दील होना चाहिए .
हिन्दी में शुरुवात में यूनिकोड फॉण्ट के लिए मंगल ही एक विकल्प हुआ करता था पर धीरे –धीरे उसका यह एकाधिकार टूटा .एरियल यूनिकोड फॉण्ट के आने से हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ के फॉण्ट में एकरसता को विराम मिला है पर एरियल यूनीकोड  विंडोस टेन ऑपरेटिंग सिस्टम पर ही चलेगा और मंगल विंडोस सेवन पर   .गूगल के यूनिकोड में बत्तीस फॉण्ट हैं पर उसकी तकनीकी सीमायें हैं वो क्रोम पर ही काम करेंगे .मैक ऑपरेटिंग सिस्टम का देवनागरी फॉण्ट गूगल को सपोर्ट नहीं करेगा .बड़े संस्थान अपने लिए बाजार में विशेषीकृत यूनिकोड फॉण्ट पैसे देकर विकसित करा सकते हैं पर ऐसे में वो छोटे वेब प्रकाशक पिछड़ जाते हैं जो सीमित संसाधनों में अपनी वेबसाईट चला रहे हैं और उन्हें ओपन सोर्स के मुफ्त फॉण्ट पर निर्भर रहना पड़ता है जो अंग्रेजी के मुकाबले बहुत ही कम हैं .
जिसतरह भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा था उस गति से हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ की वेबसाईट की डिजाइन और प्रस्तुतीकरण में वैविध्य का अभाव दिखता था उम्मीद की जानी चाहिए कि यूनीकोड फॉण्ट के ओपन सोर्स  में शुरू हुआ यह प्रयास जारी रहेगा और हिन्दी समेत अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में भी कंटेंट के साथ फॉण्ट में भी विविधता बढ़ती जायेगी .
दैनिक जागरण /आई नेक्स्ट में 09/10/2019 को प्रकाशित 
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