Wednesday, July 15, 2026

डाक टिकटों के झरोखों से दुनिया देखना

 

आज सुबह अलमारी के सबसे ऊपरी खाने से पुरानी किताबों को हटा रहा था, तो अचानक धूल से सनी एक डायरी नीचे आ गिरी । यह कोई साधारण डायरी नहीं थी, बल्कि मेरी 'स्टैम्प कलेक्शन बुक' (डाक टिकट संग्रह पुस्तिका) थी । पन्ने पलटे तो देखा कि आखिरी डाक टिकट संभवतः सन् 1994 में लगाया गया था । उसे छूते ही बीते वक्त की एक सोंधी सी महक कमरे में तैर गई । मन स्मृतियों के उस गलियारे में चला गया जहाँ जीवन स्क्रीन की रफ़्तार से नहीं, बल्कि सब्र और सुकून के सुरों में ढला था ।

आज की सोशल मीडिया वाली पीढ़ी जब पूछती है कि "आपकी हॉबी क्या है?" तो उनका आशय ऑनलाइन गेमिंग, नेटफ्लिक्स बिंज-वॉचिंग या रील्स स्क्रॉलिंग से होता है । लेकिन हमारे दौर में शौक का मतलब वर्चुअल दुनिया के 'लाइक और व्यूज' बटोरना नहीं, बल्कि भौतिक रूप से जिंदगी को जीना और महसूस करना होता था । तब हम बड़े गर्व से कहते थे—"डाक टिकट इकट्ठा करना।"
सच तो यह है कि इंटरनेट ने सिर्फ सूचनाओं का आदान-प्रदान आसान नहीं किया, बल्कि हमारे जीवन के उन तमाम खूबसूरत और रचनात्मक शौकों को भी चुपचाप लील लिया, जो कभी हमारी शख्सियत का अहम हिस्सा हुआ करते थे ।
सोशल मीडिया के इस शोर-शराबे वाले युग से पहले, हम देश और दुनिया को इंटरनेट या गूगल से नहीं, बल्कि डाक टिकटों और पुराने सिक्कों के झरोखे से देखा करते थे । उन अभावों के दिनों में भी जेनरल पोस्ट ऑफिस (GPO) के चक्कर इस उम्मीद में लगा लेते थे कि देखें आज कौन सा नया डाक टिकट आया है । जेबें खाली होती थीं, इसलिए खिड़की से टिकट खरीद तो नहीं पाते थे, लेकिन दोस्तों की दरियादिली और चिट्ठियों से उतरे टिकट ही हमारे संग्रह की जागीर बनते थे । लिफाफे से भाप देकर टिकट उतारना किसी वैज्ञानिक प्रयोग जैसा रोमांचक था । आज कूरियर और ईमेल के इनबॉक्स ने टिकट संग्रह के उस पूरे रोमांच को ही दफ़न कर दिया है ।हम उन दिनों बहुत सी चीजें बस यूं ही किया करते थे वो यूज एण्ड थ्रो का जमाना नहीं था |हमारी पीढ़ी के लोग सब सहेज लेना चाहते थे चाहे वो शौक हो या यादें वो भी बगैर किसी कारण से |अब देखिए न इंटरनेट और स्पॉटिफ़ाई (Spotify) ने संगीत को हमारे अँगूठों पर ला दिया है, लेकिन इसने ऑडियो कैसेट इकट्ठा करने और सहेजने के उस दीवाने शौक को मार डाला। अपनी पसंदीदा फिमों के गानों की खुद 'मिक्सिंग' करवाकर कैसेट तैयार करवाना और जब रील फंस जाए तो पेंसिल डालकर उसे धीरे-धीरे री-वाइंड करना—यह केवल एक शौक नहीं, संगीत से रिश्ता जोड़ने का हमारा तरीका था। इसी तरह शनिवार की शाम वीसीआर किराये पर लाना और पड़ोसियों को इकट्ठा करके फिल्म देखना एक त्योहार जैसा शौक था, जिसे आज ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के 'अकेलेपन' ने पूरी तरह खत्म कर दिया है।
चिट्ठियाँ लिखने और मीलों दूर बैठे किसी अनजान 'पेन-फ्रेंड' (पत्र-मित्र) से दोस्ती निभाने का शौक हमारी पीढ़ी की सबसे खूबसूरत याद है । हम पंद्रह-पंद्रह दिन एक अंतर्देशीय पत्र या पोस्टकार्ड के आने का इंतजार करते थे । उस इंतज़ार में एक रूहानी सुकून था। आज वॉट्सऐप के इंस्टेंट 'ब्लू टिक' ने संदेशों की गति तो बढ़ा दी, लेकिन शब्दों के भीतर की उस गर्माहट और हाथ की लिखावट के अहसास को सुखा दिया ।
इसी तरह, मशहूर हस्तियों, शिक्षकों या दोस्तों से उनकी ऑटोग्राफ बुक में कुछ पंक्तियाँ लिखवाना और उनके हस्ताक्षर सहेजना एक लोकप्रिय शौक था। आज उसकी जगह 'सेल्फी' के ठंडे और बेजान पिक्सल्स ने ले ली है।
नब्बे के दशक तक, गर्मियों की दोपहर में किराये की दुकान से दो रुपये में 'राज कॉमिक्स', 'डायमंड कॉमिक्स' या 'चाचा चौधरी' लाकर छुपकर पढ़ना हर बच्चे का सबसे बड़ा शौक हुआ करता था । उन पन्नों की महक और तस्वीरों की रंगीन दुनिया हमें कल्पनाओं के असीमित ब्रह्मांड में ले जाती थी। आज वह कॉमिक्स कल्चर, किताबों की छोटी दुकानें और पुस्तकालयों का ठहराव 'पीडीएफ संस्कृति', रील्स और किंडल स्क्रीन के सामने पूरी तरह दम तोड़ चुका है ।
आज की पीढ़ी अपनी हॉबी की भी १५ सेकंड की रील बना देती है । वहाँ शौक को जीने का संतोष नहीं, बल्कि दूसरों को दिखाने और 'लाइक्स' बटोरने का एक अदृश्य सामाजिक दबाव है । सोचता हूँ, अगर हमारे ज़माने में सोशल मीडिया या इंटरनेट होता, तो क्या हम इन शौकों को इतनी शिद्दत से जी पाते? शायद नहीं। हमारे समय के शौक हमें 'सब्र', 'तटस्थता' और 'एकाग्रता' सिखाते थे।
खैर, जो बीत जाता है वो बीत ही जाता है; वक्त के पहिये को पीछे नहीं घुमाया जा सकता । डिजिटल क्रांति ने हमें आधुनिक और चौबीसों घंटे 'कनेक्टेड' तो बना दिया, लेकिन बदले में हमसे हमारी रचनात्मकता और हमारे वो मासूम शौक छीन लिए जो हमें एक संवेदनशील इंसान बनाते थे । अलमारी में बंद वह पुरानी स्टैम्प बुक और धूल खाती डायरियाँ आज केवल कागज़ के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि इंटरनेट के मायाजाल में फँसने से पहले के उस बेहद खूबसूरत, धीमे और ठहर कर जीने वाले दौर का जीवंत दस्तावेज़ हैं ।
प्रभात खबर में 15/07/2026  को प्रकाशित 

No comments:

पसंद आया हो तो