Tuesday, March 28, 2023

डिजिटल ईगो को पहचाने

 

इस भौतिक समाज में बहुत सी ऐसी मनोवैज्ञानिक अवधारणायें हैं जो कल तक इस वर्च्युल दुनिया का हिस्सा नहीं थी पर सोशल मीडिया साईट्स के बढ़ते इस्तेमाल और तकनीकी डेवेलपमेंट  ने इन सीमाओं को धीरे –धीरे समाप्त करना शुरू किया और संचार के साथ –साथ भावों को भी व्यक्त करने के तरीके उपलब्ध कराये. पहले  हम सोशल मीडिया में अपने गुस्से का इजहार करना चाहें तो हमें इसे लिख कर बताना पड़ता था पर इमोजी के आने से यह आसान हो गया पर ऐसे बहुत से भाव अभी भी छूटे हैं .जिनको व्यक्त करने या महसूस कराने के लिए पर्याप्त संकेतों का अभाव है. ईगो का मसला उसमें से एक है .आज हम एक डिजिटल युग में जी रहे हैं जहां हमारी एक वर्चुअल पहचान है.  इसका इस्तेमाल करने वाले सिटीजन ,नेटिजन में तब्दील हो गए . ये पहचान अस्थाई है और जैसे ही हम अपना उपकरण फोन या लैपटॉप बंद  करते हैं, हमारी ये पहचान खत्म  नहीं होती बल्कि उसका अस्तित्व बना रहता है .इसलिए आज  लोग अपनी सोशल पहचान के लिए ज्यादा सतर्क रहते हैं .‘डिजिटल ईगो’ इसी आम धारणा को खारिज करता है यानि कंप्यूटर बंद करने के बाद भी हमारी वर्च्युल पहचान अपना काम करती रहती है .

हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ओर बढ़ रहे हैं जहां गैर-मानवीय वर्चुअल आइडेंटिटी की संभावनाएं बढ़ती हुई नजर आ रही हैं. इसमें मीडिया आउटलेट्स,विज्ञापन प्रंबंधक तथा सामान्य कंप्यूटर उपयोगकर्ता अहम भूमिका निभा रहे हैं.

हमारी दुनिया में डिजिटल ईगो पनपता कैसे है? लोगों की वर्चुअल स्पेस पर निर्भरता बढ़ती जा रही है. सोशल मीडिया के हम आदी होते जा रहे हैं. ऐसे में जब हम किसी को या कोई हमें इस मंच पर नकारता है, वहीं से इस डिजिटल ईगो का जन्म होता है.विशेषज्ञों का मानना  है कि सोशल नेटवर्क पर अस्वीकृति आमने-सामने के टकराव से भी बदतर हो सकती है क्योंकि लोग आमतौर पर ऑनलाइन होने की तुलना में आमने-सामने ज्यादा विनम्र होते हैं।हम कोई स्टेट्स किसी सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर डालते हैं और देखते हैं कि अचानक उसमें कुछ ऐसे लोग स्टेट्स के सही मंतव्य को समझे बगैर टिप्पणियाँ करने लगते हैं जिनसे हमारी किसी तरह की कोई जान पहचान नहीं होती .यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया होती है जिसमें ईगो का एक महत्वपूर्ण स्थान होता है  .ये स्थिति घातक भी  हो सकती है. डिजिटल ईगो को पहचान पाना आसान नहीं है. हम ये आसानी से नहीं समझ सकते कि इंटरनेट व सोशल मीडिया पर अवहेलना क्या वास्तविक है या इसके पीछे और कोई और वजह छिपी है.

परत दर परत इसको समझने की कोशिश करते हैं. मान लीजिए मैंने अपने एक मित्र को फेसबुक पर मैसेज किया. मुझे ये दिख रहा है कि वो मैसेज देखा जा चुका है. लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं आ रहा है. तो मैं ये मान लेता हूं कि मेरे वह  मित्र मुझे नजरंदाज़ कर रहा है.जबकि वास्तविकता में ऐसा न हो सकता है कि उसके पास जवाब देने का वक्त न हो. या फिर उसका अकाउंट कोई और ऑपरेट कर रहा हो. बिना इन बिंदुओं पर विचार किए मेरा किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना अनुचित है।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर हमारे चेहरे के भाव नहीं दिखते, कोई आवाज का लहजा नहीं होता. ऐसे में किसी भी ई-मेल की गलत व्याख्या करना आसान हो जाता है. इसलिए यहां किसी से भी जुड़ते समय शब्दों के चुनावों में और भाव-भंगिमाओं के संकेत देने में बहुत स्पष्ट रहना चाहिए .यहीं से ई डाउट की शुरुआत होती है ऐसा शक जो हमारी  वर्च्युल गतिविधियों से पैदा होता है जिनका हमारे वास्तविक जीवन से कोई लेना देना नहीं होता है .

यही चीज हमें मशीन से अलग करती है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तकनीक पूरी तरह से मशीन पर निर्भर है. एक बार जो कमांड दे दिया गया उसी के अनुरूप हर स्थिति की व्याख्या की जाएगी. अब जब ये दुनिया इसी तकनीक पर चलने वाली है तो समय आ गया है कि हम मानव व्यवहार की हर स्थिति की पुनर्व्याख्या करें. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमें मानव स्वभाव पर और गहराई से अध्ययन करने को प्रेरित करता है.

हमारा ईगो डिजिटल युग को पसंद क्यों करता है क्योंकि यह व्यक्तिवाद को बढ़ावा देता है जिसमें शामिल है ‘आई’’ ‘मी’ और “माई” “आई-फोन” जिसमें सामूहिकता की कहीं कोई जगह नहीं है और शायद इसीलिये लोगों ज्यादा से ज्यादा लाईक्स,शेयर और दोस्त वर्च्युल दुनिया में पाना चाहते हैं .यह एक और संकट को जन्म दे रहा है जिससे लोग अपने वर्तमान का लुत्फ़ न उठाकर  अपने अतीत और भविष्य के बीच झूलते रहते हैं . अपनी  पसंदीदा धुन के साथ हम मानसिक रूप से अपने वर्तमान स्थिति को छोड़ सकते हैं और अपने अस्तित्व को अलग डिजिटल वास्तविकता में परिवर्तित कर सकते हैं. हमारे डिजिटल उपकरण वर्तमान से बचने का बहाना देते हैं.फेसबुक जैसी तमाम सोशल नेटवर्किंग साईट्स की सफलता के पीछे हमारे दिमाग की यही प्रव्रत्ति जिम्मेदार है .जब हम कहीं घूमने जाते हैं तो प्राकृतिक द्रश्यों की सुन्दरता निहारने की बजाय हम तस्वीरें खिंचाने में ज्यादा मशगूल हो जाते हैं और अपने वर्तमान को पीछे छोड़कर भविष्य में उस फोटो के ऊपर आने वाले कमेन्ट लाईक्स के बारे में सोचने लग जाते हैं .  स्मार्टफोन कल्चर आने से आज परिवार में संवाद बहुत कम हो रहा है. तकनीकी  विकास से हम पूरी दुनिया से तो जुड़े हैं लेकिन पड़ोस की खबर नहीं रख रहे हैं.

 प्रभात खबर में 28/03/2023 को प्रकाशित 

Tuesday, March 21, 2023

फर्जी कंटेंट पर पूर्ण अंकुश

 

इंटरनेट ने जहां एक ओर हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वहीं इसके माध्यम से फर्जी समाचारों का भी विस्तार हो रहा है, जिसे नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती बन गई है |बीते दिनों तमिलनाडु में बिहार के कुछ मजदूरों की पिटाई से संबंधित एक फर्जी समाचार को प्रसारित किए जाने का आरोप बिहार के एक यूट्यूबर पर आरोप लगाया गया है। वस्तुत: एक फर्जी बताए जा रहे वीडियो से तमिलनाडु और बिहार सरकार के संबंध बिगड़ने के करीब आ गए थे,|लिहाजा एक संबंधित यूट्यूबर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इस घटना के बाद एक बार फिर इंटरनेट पर फेक न्यूज को रोकने के बारे में सख्त कानून की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। यह कैसी विडंबना है कि तकनीक ने एक तरफ हमारे जीवन को आसान बनाया है, तो वहीं दूसरी तरफ कई स्तरों पर अराजकता भी पैदा कर दी है। आज सूचनाओं के संजाल में यह तय करना मुश्किल है कि क्या सही है क्या गलत। इससे हमारे समाज के सामने एक नई चुनौती पैदा हो गई है। गलत सूचनाओं को पहचानना और उनसे निपटना आज के दौर के लिए एक बड़ा सबक है।

फेक न्यूज के चक्र को समझने के लिए मिसइनफार्मेशन और डिसइनफार्मेशन में अंतर समझना जरूरी है। मिसइनफार्मेशन का मतलब ऐसी सूचनाओं से है जो असत्य हैं, पर जो इसे फैला रहा है वह यह मानता है कि यह सूचना सही है। वहीं डिसइनफार्मेशन का मतलब ऐसी सूचना से है जो असत्य है और इसे फैलाने वाला भी यह जानता है कि अमुक सूचना गलत है, फिर भी वह फैला रहा है। हमारा देश डिसइनफार्मेशन और मिसइनफार्मेशन के बीच फंसा हुआ है।इंटरनेट का बढ़ता महत्व : नोकिया की वार्षिक मोबाइल ब्राड्बैंड इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में एक भारतीय औसत रूप से 19.5 जीबी डाटा प्रति माह उपयोग कर रहा है। रिपोर्ट बताती है कि यह भारत में डाटा उपयोग 2022 में 13.6 प्रतिशत बढ़ा है। आंकड़े अपनी कहानी स्वयं कह रहे हैं कि आज एक औसत भारतीय के रोजमर्रा के जीवन के लिए इंटरनेट कितना महत्वपूर्ण है। इंटरनेट उपभोक्ताओं में इतनी वृद्धि का होना इस ओर स्पष्ट इशारा करती है कि इंटरनेट के अनेक उपभोक्ता सूचनाओं के लिए इंटरनेट मीडिया, वाट्सएप और यूट्यूब जैसी साइट्स पर भी निर्भर हैं। अभी तक 'फेक न्यूज' के प्रसार के लिए वाट्सएप और फेसबुक ट्विटर जैसी साइट्स ही घेरे में रही थी, पर अब यूट्यूब पर भी भारत में फेक न्यूज के प्रसार का एक बड़ा माध्यम बन रहा है। आंकड़ों के अनुसार समूचे विश्व में यूट्यूब के सबसे ज्यादा उपयोगकर्ता भारत में हैं जिसकी संख्या 46.7 करोड़ है। 

इसके बाद अमेरिका का नंबर आता है जहां लगभग 24 करोड़ लोग यूट्यूब का उपयोग करते हैं।वीडियो की पुख्ता जांच : अनुभव बताता है कि यूट्यूब पर लगभग 90 प्रतिशत वीडियो सही होते हैं, परंतु उन्हें गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता है। किसी भी वीडियो की जांच करने के लिए उसे ध्यान से बार-बार देखा जाना चाहिए। यह काम क्रोम ब्राउजर में 'इनविड एक्सटेंशन' जोड़ कर किया जा सकता है। इनविड जहां किसी भी वीडियो को फ्रेम दर फ्रेम देखने में मदद करता है, वहीं इसमें वीडियो के किसी भी दृश्य को मैग्निफाई (बड़ा) करके भी देखा जा सकता है। यह वीडियो को देखने के बजाय उसे पढ़ने में मदद करता है। मतलब किसी भी वीडियो को पढ़ने के लिए किन चीजों की तलाश करनी चाहिए, ताकि उसके सही होने की पुष्टि की जा सके। जैसे वीडियो में पोस्टर-बैनर, गाड़ियों की नंबर प्लेट और फोन नंबर की तलाश की जानी चाहिए, ताकि गूगल द्वारा उन्हें खोज कर उनके क्षेत्र की पहचान की जा सके। कोई लैंडमार्क खोजने का प्रयास करना चाहिए ताकि उसके स्थान के बारे में अधिक से अधिक सटीक जानकारी मिल सके। वीडियो में दिख रहे लोग कैसे कपड़े पहने हुए हैं, वे किस भाषा या बोली में बात कर रहे हैं, उसे देखा जाना चाहिए। इंटरनेट पर ऐसे कई साफ्टवेयर उपलब्ध हैं जो वीडियो और फोटो की सत्यता पता लगाने में मदद कर सकते हैं।एमनेस्टी इंटरनेशनल ने वीडियो में छेड़छाड़ और उसका अपलोड इतिहास पता करने के लिए यूट्यूब के साथ मिलकर 'यूट्यूब डाटा व्यूअर सर्विस' का आरंभ किया है। वैसे हमारे देश में फेक न्यूज को रोकने के लिए अलग से कोई कानून नहीं है, परंतु नफरत से भरा कंटेंट बनाने वालों और इसे साझा करने वाले लोगों को भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की प्रासंगिक धाराओं के तहत सजा दी जा सकती है। वैसे इंटरनेट की विशालता के कारण ऐसे लोगों की पुख्ता पहचान करना काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। बीते कुछ वर्षों में ‘फेक न्यूज’ फैलाने वाले कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है और कई इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म ने भी अपनी नीति में कुछ परिवर्तन किया है, किंतु इसके बावजूद एक सार्वभौमिक नीति अथवा नियम के अभाव के कारण ‘फेक न्यूज’ की समस्या से अब तक पूर्णतः निपटा नहीं जा सका है।

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 21/03/2023  को प्रकाशित 

Wednesday, January 18, 2023

महकता -महकाता जाड़ा

 


जाड़ों का मौसम मुझे हमेशा पसंद  रहा है उसके पीछे मेरे पास ज्यादा कारण नहीं वैसे आप चाहे तो कई कारण बता सकते हैं जैसे इस मौसम में काम करने की क्षमता बढ़ जाती है ,साग सब्जियों की ज्यादा वैरायटी उपलब्ध होती है  आप इसे यूँ समझे जितने मुंह उतनी बातें पर मेरे पास ठण्ड को पसंद करने का एक अनोखा कारण है. मुझे अपने बचपन से ही फूलों पत्तियों पर गिरी ओस बहुत अच्छी लगती है और इस द्रश्य को देखने और महसूस करने का सबसे अच्छा मौसम है जाड़ा बचपन में जब हम जाड़े की शामों में  सैर पर निकलते थे तो चारों ओर फूल ही फूल दिखते  थे .  

प्रकृति के इस अनोखे रूप को महसूस करने हिंदी फिल्म के गीतकारों ने अपने अपने तरीके से महसूस किया है. अब जब बात फूलों की छिड़ ही गयी है तो कुछ याद आया. अगर  नहीं याद आया तो सुनिए ये गाना “फिर छिड़ी रात, बात फूलों की,रात है या बारात फूलों की” (बाजार )| फूल न होते, तो दुनिया इतनी रंगीन नहीं होती.जितने कोमल फूल होते हैं उतनी ही कोमल होती हैं हमारी भावनाएं. देखिये एक भाई अपनी बहन के लिए क्या गा रहा है “फूलों का तारों का सबका कहना है एक हजारों में मेरी बहना है” (हरे राम हरे कृष्णा) .जरा सोचिए फूलों से हमारा कितना गहरा रिश्ता है इंसान के पैदा होने से लेकर उसके मरने तक हर खुशी हर गम में फूल हमारा साथ देते हैं. फूलों की बात हो  तो गुलाब का जिक्र होना लाजिमी है . उसे फूलों का राजा यूँ ही तो नहीं कहा जाता और गानों में सबसे ज्यादा इसी फूल का जिक्र हुआ है. प्यार की कोमल भावनाओं को व्यक्त करता हुआ  कुछ ऐसी कहानी बयान कर रहा है ये गाना  “फूल गुलाब का लाखों हजारों में एक चेहरा जनाब का” (बीवी हो तो ऐसी ).

बचपन की शरारतों के बाद जब हम जवान होते हैं तो हमारे जेहन में कुछ सपने होते हैं कुछ उम्मीदें होती हैं. इन्ही सपनों में एक सपना अपने घर का भी होता और घर जब फूलों के शहर में हो तो क्या कहना “देखो मैंने देखा है एक सपना फूलों के शहर में है घर अपना” (लव स्टोरी) पर अगर आपको सपने में फूल ही फूल दिखें तो ऐसे ख्वाब को क्या कहेंगे चलिए मैं आपको गाना ही बता देता हूँ “देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए दूर तक निगाह में गुल खिले हुए” (सिलसिला ) पर फूल सिर्फ कोमल ही नहीं होता अगर आपकी इस कोमलता का सम्मान नहीं करेंगे तो ये अंगारा भी बन सकता है “फूल कभी जब बन जाए अंगारा” (फूल बने अंगारे ).

 जिंदगी में हर चीज़ की अपनी अहमियत होती है और ये बात रिश्तों पर भी लागू होती है फूल को बढ़ने के लिए खाद पानी की जरुरत होती है. रिश्तों को संबंधों की गर्मी और अपनेपन के एहसास की तो जाड़ों  के इस मौसम मे गर्मी का एहसास करने के लिए गर्म कपडे पहनने के अलावा  कुछ फूलों के पेड़ लगाइए, नए रिश्ते बनाइये. पुराने रिश्तों पर जम गयी गर्द को झाडिये क्योंकि रिश्ते भी फूलों की तरह नाजुक होते हैं .आइये महसूस करते हैं अपने आसपास बिखरी हुई फूलों की खुशबू रिश्तों में बसी अपने पन  की महक और जाड़े के मौसम में इठलाते फूलों की सरगोशियाँ हमारी राह तक रही हैं .जाड़े का स्वागत अगर महकते हुए और महकाते हुए किया जाए तो इससे अच्छा भला और क्या हो सकता है .

प्रभात खबर में 18/01/2023 को प्रकाशित 

Tuesday, December 13, 2022

इंटरनेट की खतरनाक लत

 एक लड़की थी दीवानी सी जहाँ जाती खुशियाँ बिखेरती नाम था परी दिन भर पढ़ाई करती चिल करती और जरुरत के वक्त इंटरनेट खोलती फिर एक दिन उसे जी नहीं उसे प्यार बिलकुल भी  नहीं हुआ बल्कि उसके एक करीबी दोस्त ने एक नेट इनेबल्ड एंड्रायड फोन भेंट किया फिर क्या उसकी कल्पनाओं को पंख लग गए नए नए एप्स डाउनलोड करना अपने दोस्तों से खूब चैट करना वीडियो शेयर करना शुरू कर दिया जो इंटरनेट उसकी तरक्की के रास्ते खोल रहा था वो उसके जी का जंजाल बन गया एक दोस्त से बात करो तो दूसरा नाराज चैट पर दिन भर ऑन दिखने से उसके दोस्तों में गलतफहमियां पनपने लग गयीं कि वो दिन भर किसी से चैट करती है फिर क्या उसका आधा दिन उन गल्फह्मियों को दूर करने में और आधा दिन उन  दोस्तों से चैट करने में बीत जाता जो उसके चैट न कर पाने से दुखी थे .

उसे पता ही नहीं पड़ा कि कैसे उसका ये शौक कब लत बन गया.हर दो मिनट में अपना मोबाईल चेक करती कि कहीं कोई मेसेज तो नहीं आया नतीजा उसके करीबी दोस्त उससे दूर हो गए वो बस जितने एप्स हो सकते हैं उन्हें अपने मोबाईल में भर लेना चाहती थी जिससे वो सबसे जुडी रहे  नतीजा एक पढ़ने लिखने वाली लड़की जो अपनी छोटी सी दुनिया में अपने चुनिन्दा दोस्तों के साथ खुश रहा करती थी इंटरनेट के एडिक्शन से कई तरह के दबाव से टूट कर रूखे स्वभाव की हो गयी बात बात में नाराज होने लगी पढ़ना लिखना छूट गया वो कई तरह की मनोवैज्ञानिक समस्याओं की शिकार रहने लग गयी. रात में अजीब अजीब सपने देखती नींद आँखों से दूर हो गयी जिससे दिन में भी वो उनींदी सी रहती .उसके कई  करीबी दोस्त उससे दूर हो गए.ये महज कहानी नहीं बल्कि आज के यूथ के लाईफ की कडुवी रीयल्टी है.नेट के एडिक्शन के चक्कर में रीयल वर्ल्ड से नाता तोड़कर वर्चुअल वर्ल्ड में जीने वाले आज परी जैसे  लोग हमारे आस पास न जाने कितने मिल जायेंगे.टेक्नोलॉजी वक्त की जरुरत है पर इस जरुरत को हमें अपनी नीड के हिसाब से देखना होगा.हर उम्र और वक्त के हिसाब से टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.पढ़ने लिखने की उम्र में हर वक्त ऐसा कोई संदेसा हर वक्त नहीं आएगा जिसको अगर आप मिस कर गए तो आसमान फट पड़ेगा.फोन पर इंटरनेट के आ जाने से समस्या ज्यादा गंभीर हो गयी है आप लोगों से कनेक्टेड रहें पर हर इंटरनेट के इस्तेमाल में एक डिसीप्लीन रहना बहुत जरूरी है नहीं तो ये शौक कब आपको धीरे धीरे खत्म करने लग जाएगा पता भी नहीं पड़ेगा इसलिए अपने काम के हिसाब से नेट के इस्तेमाल का वक्त तय कीजिये दोस्तों के साथ फन करने का एक निश्चित समय रखिये उसके बाद यदि कोई मेसेज आता है जिसमे हेलो,नमस्ते, क्या हो रहा है जैसे शब्द हों तो  इस बात की परवाह किये बगैर कि सामने वाला क्या सोचेगा जवाब मत दीजिए.आप एक बार इसको अपनी आदत बनायेंगे तो धीरे धीरे ऐसे लोग जो दिन भर ऐसे लोगों की तलाश में रहते हैं जो उनके खालीवाक्त के साथी बनें आपको संदेसा भेजना कम कर देंगे. बीच बीच में अपने मोबाईल को ऑफ करना सीखिए अपनी सोशल नेटवर्किंग साईट्स को आराम दीजिए जरूरी नहीं कि रोज कुछ न कुछ अपडेट करें थोडा वक्त अपने लिए निकालिए और देखिये दुनिया कितनी खूबसूरत है आपके कितने ऐसे दोस्त हैं जो आपके वर्चयुल साथ के लिए नहीं बल्कि रीयल साथ के लिए तरसते हैं कुछ एस्माय्ली भेज देने से भावनाओं का इजहार नहीं हो जाता इसके लिए किसी रिश्ते को जीना पड़ता है.टेक्नोलोजी को अपने ऊपर हावी मत होने दीजिए अपनी जरुरत और तकनीक में संतुलन बनाइये तभी आप जिंदगी का सच्चा लुत्फ़ उठा पायेंगे.मैं तो आज अपना स्मार्ट  फोन ऑफ कर अपनी दोस्त से मिलने जा रहा हूँ जो नेट के एडिक्शन से उबरने की कोशिश कर रही है .आप क्या करेंगे जरुर बताइयेगा|

प्रभात खबर में 13/12/2022 को प्रकाशित 

Tuesday, December 6, 2022

समाज को कहाँ ले जायेगी सोशल मीडिया रील्स

सोशल  मीडिया साईट्स ने हमारे हमारे जीवन को एक इवेंट में तब्दील करके एक आम इंसान को सेलीब्रेटी होने का एहसास करवाया |जहाँ उसे अपने दैनिक जीवन में होने वाले घटनाक्रम को लोगों के साथ साझा करके अपने ख़ास होने का एहसास हुआ|जहाँ जन्मदिन से लेकर शादी तक सब कुछ भव्य तरीके से साझा किया जा रहा था ,लेकिन फिर भी कुछ कमी थी |हम सेलीब्रेटी जैसा महसूस तो कर रहे थे पर हम सेलेब्रेटी थे नहीं |इस कमी को पूरा किया रील ने जिसकी शुरुआत टिक टाक से हुई पर उसके बैन होने  के बाद उसकी जगह इन्स्टा ग्राम रील ,यू ट्यूब शॉर्ट्स और फेसबुक रील जैसे कई एप्स  ने ले ली| शार्ट वीडियो एप्स की जिस कहानी की शुरुआत टिक टोक से शुरू हुई थी जून 2020 में उसके बैन होने के बाद एक लंबा रास्ता तय कर चुकी है |एम् एक्स शोर्ट विडियो, मौज ,जोश ,चिंगारी,मित्रों जैसे एप भी इस दुनिया में तहलका मचाये हुए हैं | युवाओं और किशोरों में शोर्ट वीडियो बनाने की सुविधा देने वाली वेबसाईट एप्स की  बढ़ती लोकप्रियता का बड़ा कारण बढ़ती फेक न्यूज की आमद और चारित्रिक हनन की कोशिशों के बीच लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग साईट्स ट्विटर और फेसबुक पर उपभोक्ताओं का अनुभव अब उतना सुहाना नहीं रहा| जितना आज से कुछ साल पहले रहा करता था |ऐसे में वो उपभोक्ता जो समाचार और राजनीति से इतर कारणों से सोशल मीडिया पर थे एक विकल्प की तलाश में थे जिसकी भरपाई  रील्स   ने बखूबी कर दी |आज हर कोई रील बना रहा है |स्कूल जाते बच्चों से लेकर बड़े फिल्म स्टार्स तक |अब अपनी कहानी खुद सुनाने का दौर है |

 दुनिया के दूसरे सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते इंटरनेट यूजरबेस को होस्ट करने वाले देश में  जहाँ हर कोई कैमरे के सामने सेलेब्रेटी बनना चाहता है, जहाँ फ़िल्में उनके सम्वाद और गाने  हमारे जीवन में इस हद तक घुसे हुए हैं कि कि उसके बगैर जीवन की कल्पना करना मुश्किल  है, वहां रील्स की सफलता आश्चर्यजनक नहीं है |

2016 में रिलायंस जिओ के लांच के बाद सस्ते डाटा के युद्ध ने इसको भारत में पाँव पसारने का बेहतरीन मौका  दिया | कोई भी जिसके पास एक स्मार्ट फोन इंटरनेट कनेक्शन के साथ है अपना नाचता गाता वीडियो अपनी भाषा में  बना सकता  है|जिसमें तस्वीरें शब्द और सुंदर वीडियो इफेक्ट भी आसानी से पिरोये जा सकते हैं|

रेड्शीर कंसल्टिंग फर्म की रिपोर्ट एंटरटेनमेंट एंड एडवरटाइजिंग राइडिंग द डिजीटल वेव के अनुसार वीडियो के ये लघु संस्करण फेसबुक और गूगल के बाद दूसरा सबसे बड़ा सेगमेंट है जहाँ लोग सबसे ज्यादा समय बिता रहे हैं |

शोर्ट वीडियो बनाने की सुविधा देने वाली वेबसाईट एप्स के यूजर्स की संख्या साल 2025 तक 650 मिलीयन हो जायेगी |इसी रिपोर्ट के अनुसार शार्ट वीडियो एप्स आने वाले वक्त में ओ टी टी वीडियो कंटेंट को भी पछाड़ देगा |

डिजीटल विज्ञापनों की दुनिया में वीडियो के ये लघु संस्करण तेजी से अपने एजगाह बना आरहे हैं |साल 2019  से 2022 के बीच यह सेगमेंट 44  प्रतिशत की रफ़्तार  से बढ़ा |इसका कारण टियर टू शहरों में इंटरनेट का फैलाव है जिसने एक नयी मार्केट पैदा की है जहाँ ब्रांड उपभोक्ता तक सीधे पहुँच बना रहे हैं |हालाँकि मुद्रीकरण के लिहाज से भारत अभी बहुत शैशवावस्था में है लेकिन माना जा रहा  है कि डिजीटल विज्ञापन राजस्व का यह ढांचा आने वाले वर्षों में बहुत तेजी से बदलेगा |ब्रांड और एन्फ्लयून्सेर्स रील के माध्यम से अपने उत्पाद  को लोकप्रिय बना रहे हैं|जाहिर सी बात है इन रील्स को बनाने में किसी बड़े प्रोडक्सन हाउस की मदद नहीं ली जा रही है |इसका बड़ा कारण रील बनाने के प्लेटफोर्म का आसान इंटरफेस होना|जिसके लिए किसी को तकनीक के महारथ होने की जरुँरत नहीं है |

लेकिन कुछ सवाल ऐसे भी हैं जिनके जवाब अभी खोजे जाने हैं उसमें पहला मुद्दा निजता का है |टियर टू शहरों  से आने वाले रील वीडियो ज्यादातर लोगों के निजी परिवेश को ही  दिखा रहे हैं |वो कहाँ रहते हैं क्या करते हैं उनके परिवार के सदस्य कौन -कौन हैं |काफी कुछ इनमें दिख जा रहा है |दूसरा मुद्दा है अश्लीलता का अपने रील्स प्लेटफोर्म को लोकप्रिय बनाने के लिए लोग सॉफ्ट पोर्न और अश्लील चुटकुलों का सहारा ले रहे हैं |दूसरों के कंटेट को एडिट कर के अपना बना लेने की कोशिश यहाँ भी खूब  हो रही है |

अपनी रील में इंटरनेट पर पहले से मौजूद किसी मजाकिया क्लिप का इस्तेमाल करना नैतिकता द्रष्टि से उचित नहीं माना जा सकता है |कोई व्यक्ति रोड क्रोस करते वक्त मेन होल में गिर जाता है और उसका फन्नी  वीडियो  किसी शार्ट वीडियो एप की मदद से इंटरनेट पर वायरल हो जाता है और फिर अनंतकाल तक के लिए सुरक्षित भी हो जाता है |क्या वह वीडियो उस व्यक्ति से अनुमति लेकर किसी एप पर डाला गया |जिसको देख कर हम कहकहे लगा रहे हैं |इंटरनेट के फैलाव ने बहुत सी निहायत निजी चीजों को सार्वजनिक कर दिया है|ये सामाजिक द्रष्टि से निजी चीजें जब हमारे चारों ओर बिखरी हों तो हम उन असामान्य परिस्थिति में घटी घटनाओं को भी सार्वजनिक जीवन का हिस्सा मान लेते हैं जिससे एक परपीड़क समाज का जन्म होता है और शायद यही कारण है कि अब कोई दुर्घटना होने पर लोग मदद करने की बजाय वीडियो बनाने में लग जाते है कि न जाने उस वीडियो का कौन सा हिस्सा क्लिप बन कर हमारे आस -पास घूमने लगे | अंत में सबसे बड़ा मुद्दा रील देखने में समय की बरबादी का है जिसमें दर्शक कोल्हू के बैल की तरह चलता तो बहुत है पर पहुंचता कहीं नहीं है |इंटरनेट की दुनिया में बिखरी हुई रील्स में फूहड़ चुटकुले ,दूसरों को तंग करने वाले मजाक का ज्यादा बोलबाला है |आने वाले वक्त में जैसे जैसे इन रील्स के दर्शक समझदार होते जायेंगे इन पर आने वाला कंटेंट भी बेहतर होगा |ऐसी उम्मीद की जा सकती है |

नवभारत टाईम्स में 06/12/2022 को प्रकाशित 

Saturday, November 26, 2022

तकनीक है असली खलनायक


 

श्रद्धा हत्याकांड यूँ तो महिलाओं के प्रति होने वाले वीभत्स अपराधों में से एक माना जाएगा |इसकी समाज शास्त्रीय विवेचना में हम इस हत्याकांड में तकनीक के हस्तक्षेप को नजरंदाज नहीं कर सकते | मानव सभ्यता के ज्ञात इतिहास में किसी और चीज ने नहीं बदला है ,यह बदलाव बहु आयामी है बोल चाल  के तौर तरीके से  शुरू हुआ यह सिलसिला  खरीददारी  ,भाषा  साहित्य  और  हमारी अन्य प्रचलित मान्यताएं और परम्पराएँ  सब  अपना रास्ता बदल रहे हैं। यह बदलाव इतना  तेज है कि इसकी नब्ज को पकड़  पाना समाज शास्त्रियों  के लिए भी आसान नहीं है  और  आज इस तेजी  के मूल में “एप” ( मोबाईल एप्लीकेशन ) जैसी यांत्रिक  चीज  जिसके माध्यम से मोबाईल  फोन में  आपको किसी वेबसाईट को खोलने की जरुरत नहीं पड़ती |आने वाली पीढियां  इस  समाज को एक “एप” समाज के रूप में याद  करेंगी जब  लोक और लोकाचार  को सबसे  ज्यादा  “एप” प्रभावित कर रहा  था |

हम हर चीज के लिए बस एक अदद “एप” की तलाश  करते हैं |जीवन की जरुरी आवश्यकताओं के लिए  यह  “एप” तो ठीक  था  पर  जीवन साथी  के चुनाव  और दोस्ती  जैसी भावनात्मक   और  निहायत व्यक्तिगत  जरूरतों   के लिए  दुनिया भर  के डेटिंग एप  निर्माताओं  की निगाह  में भारत सबसे  पसंदीदा जगह बन कर उभर  रहा है | उदारीकरण के पश्चात बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और रोजगार की संभावनाएं  बड़े शहरों ज्यादा बढीं ,जड़ों और रिश्तों से कटे ऐसे युवा  भावनात्मक  सम्बल पाने के लिए और ऐसे रिश्ते बनाने में जिसे वो शादी के अंजाम तक पहुंचा सकें  डेटिंग एप का सहारा ले रहे हैं |स्टेइस्टा सर्वे कंपनी के अनुसार इंटरनेट पर जितने लोग एक्टिव हैं, उनमें से तीन प्रतिशत फिलहाल ऑनलाइन डेटिंग ऐप्स या साइट का इस्तेमाल कर रहे हैं. 2025 तक इसकी संख्या बढ़कर 4.3 प्रतिशत हो जाएगी. वर्तमान में भारत में ऑनलाइन डेटिंग सेगमेंट में 53.6 करोड़ डॉलर का कारोबार हो रहा है. यह कारोबार 17. 61 प्रतिशत की सालाना दर से बढ़ रहा है. इन आंकड़ों से भारत में डेटिंग ऐप्स के भविष्य का अंदाजा लगाया जा सकता है. लेकिन इस तस्वीर का एक और भी पहलू है |


इन डेटिंग एप से बनने वाले सम्बन्धों की कोई सामाजिक स्वीकृति नहीं रहती | डेटिंग एप से पहले सम्बन्ध साथ पढ़ाई लिखाई करने ,मोहल्ले या फिर साथ कम करते वक्त  की परिधि में बनते थे जिसमें काफी कुछ समानता हुआ करती थी |भले ही ये सम्बन्ध निजता के दायरे में आते थे पर आस -पास के लोगों को इनके बारे में एक अंदाज़ा हुआ करता था |यह अंदाजा बात बिगड़ने की सूरत में एक ढाल का काम किया करता था | श्रद्धा हत्याकांड अपने आप में एक बानगी है कि इंटरनेट की दुनिया में लगातार विचरने वाली युवा पीढी कितनी अकेली होती जा रही है |चैटिंग एप के स्क्रीन शॉट वायरल हो जाने की संभवनाओं के चलते लोग इस पर अनौपचारिक और अन्तरंग चर्चा करने से बचते हैं |मिल जुल के समस्याओं को समझाने का वक्त किसी के पास नहीं है | क्या डेटिंग ऐप्स पर मिले लोगों को एक-दूसरे के बारे में ज्यादातर जानकारी नहीं होती है?

सिर्फ नाम पता और तस्वीर देखकर मुलाक़ात तय कर ली जाती हैं और फिट उन मुलाकातों में जो कुछ दिख रहा है वो कितना असली है |इसकी गारंटी कोई भी नहीं ले सकता क्योंकि डेटिंग एप्स पर आने वाले  लोगों का कोई वेरिफिकेशन नहीं होता है और इसी बिंदु से असली समस्या शुरू होती है |नेटफ्लिक्स पर “द टिंडर स्विंडलर” वृत्तचित्र एक ऐसी ही सच्ची घटना का प्रस्तुतीकरण है जिसमें एक व्यक्ति अपने इन्स्टाग्राम अकाउंट के जरिये महिलाओं को ठगता है |चूँकि डेटिंग या रिश्ते जैसी चीजें वैसी भी बहुत निजी तरह का मामला होता है फिर उसमें असफलता जैसी चीजें लोग अपने अभिन्न मित्रों से बताने में संकोच करते हैं |सोशल मीडिया और डेटिंग एप जैसा प्लेटफोर्म पर अपनी पीड़ा रखना या मदद मांगना तो दूर की बात है |ऐसे में कोई भी व्यक्ति जो रिश्तों में ईमानदार नहीं है उसका मायाजाल चलता रहता है और उसकी वास्तविकता कभी सबके सामने नहीं आ पाती |

ट्रूली मैडली, वू ,टिनडर,आई क्रश फ्लश और एश्ले मेडिसन ,बम्बल जैसे डेटिंग एप भारत में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं जिसमें एश्ले मेडिसन जैसे एप किसी भी तरह की मान्यताओं को नहीं मानते हैं आप विवाहित हों या अविवाहित अगर आप ऑनलाईन किसी तरह की सम्बन्ध की तलाश में हैं तो ये एप आपको भुगतान लेकर सम्बन्ध बनाने के लिए प्रेरित करता है |

हालंकि डेटिंग एप का यह कल्चर अभी मेट्रो और बड़े शहरों  तक सीमित है पर जिस तरह से भारत में स्मार्ट फोन का विस्तार हो रहा है और इंटरनेट हर जगह पहुँच रहा है इनके छोटे शहरों में पहुँचते देर नहीं लगेगी |पर यह डेटिंग संस्कृति भारत में अपने तरह की  कुछ समस्याएं भी लाई है जिसमें सेक्स्युल कल्चर को बढ़ावा देना भी शामिल है |वैश्विक सॉफ्टवेयर एंटी वायरस  कंपनी नॉर्टन बाई सिमेंटेक के अनुसार ऑनलाइन डेटिंग सर्विस एप साइबर अपराधियों का मनपसंद प्लेटफार्म बन चुका है। भारत के लगभग 38 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने कहा कि वह ऑनलाइन डेटिंग एप्स का प्रयोग करते हैं। ऐसे व्यक्ति  जो मोबाइल में डेटिंग एप रखते है, उनमें से करीब 64 प्रतिशत  महिलाओं और 57 प्रतिशत  पुरुषों ने सुरक्षा संबंधी परेशानियों का सामना किया है। आपको कोई फॉलो कर रहा है, आप की पहचान चोरी होने के डर, के साथ-साथ उत्पीड़ित और कैटफिशिंग के शिकार होने का खतरा बरकरार रहता है।

राष्ट्रीय सहारा हस्तक्षेप में 26/11/2022 को प्रकाशित 

Tuesday, November 22, 2022

आंकड़ों की सुरक्षा का सवाल

 


इन्फोमोनिक्स की दुनिया  आंकड़ों से ही जुड़ी है |डाटा आज की सबसे बड़ी पूंजी है यह डाटा का ही कमाल  है कि गूगल और फेसबुक जैसी अपेक्षाकृत नई कम्पनियां दुनिया की बड़ी और लाभकारी कम्पनियां बन गयीं है|डाटा ही वह इंधन है जो अनगिनत कम्पनियों को चलाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं |वह चाहे तमाम तरह के एप्स हो या विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साईट्स सभी उपभोक्ताओं  के लिए मुफ्त हैं |असल मे जो चीज हमें मुफ्त दिखाई दे रही है |वह सुविधा हमें हमारे संवेदनशील निजी डाटा के बदले मिल रही है |इनमे से अधिकतर कम्पनियां उपभोक्ताओं द्वारा उपलब्ध कराए  गए आंकड़ों को सम्हाल पाने में असफल रहती हैं| जिसका परिणाम लागातार आंकड़ों की चोरी और उनके  दुरूपयोग के मामले सामने आते रहते हैं |साल 2020 में फेसबुक ने लगभग  छियासी बिलियन डॉलर और गूगल ने एक सौ इक्यासी  बिलियन डॉलर विज्ञापन से कमाए | सारी दुनिया में आज खोज का पर्याय बन चुकी कम्पनी का नाम है गूगल | गूगल इंटरनेट का प्रवेश द्वार है और खोज-विज्ञापन के बाजार में यह विशालकाय है।गूगल लगातार हमारे जीवन में घुसपैठ बढाता रहा सर्च इंजन से शुरू हुआ सफर ई मेल फोटो वीडियो और न जाने कितनी सेवाओं को जोड़कर हमारे जीवन को आसान करता रहा | लेकिन गूगल और उस जैसी टेक कम्पनियों का एक और चेहरा है जो अपने मुनाफे को बढाने के लिए लगातार अपने उपभोक्ताओं की निजी जानकारियों का अनाधिकृत इस्तेमाल करता है |ताजा मामला अमेरिका का है जहाँ  अमेरिका के 40 राज्यों ने गूगल  पर  बड़ी कार्यवाही  करते हुए भारी भरकम जुर्माना लगाने का फैसला  किया है| मिशिगन के अटॉर्नी जनरल डाना नेसेल के ऑफिस ने इस मामले पर जानकारी देते हुए बताया कि चालीस  राज्यों ने गूगल पर यह कार्रवाई लोकेशन ट्रैकिंग केस में की है| कंपनी पर यह आरोप लगा था कि वह लोकेशन ट्रैकिंग प्रैक्टिस के जरिए ग्राहकों को गुमराह कर रही थी और  कंपनी ने उपयोगकर्ताओं के स्थानों को ट्रैक करना तब भी जारी रखा, जब उन्होंने  लोकेशन ट्रेकिंग  सुविधा को बंद करने का ऑप्शन चुना था | 

जांच में पाया गया कि Google ने कम से कम 2014 से उपभोक्ताओं को उनके स्थान ट्रैकिंग प्रथाओं के बारे में गुमराह करके राज्य उपभोक्ता संरक्षण कानूनों का उल्लंघन किया था| गूगल की कमाई का ज्यादातर हिस्सा लोगों की व्यक्तिगत जानकारियों  के जरिए ही आता है| लोग अपने जरुरत की चीजों को  अपने ब्राउजर में खोजते हैं चूँकि मोबाईल एक व्यक्तिगत माध्यम है तो लोग जहाँ भी जाते हैं मोबाईल उनके साथ रहता है और वे किन ऐप्स का इस्तेमाल करते हैं |यह सभी जानकारी गूगल के पास रहती है| ऐसे में इन डेटा के जरिए लोगों को उनकी पसंद का कंटेंट और ऐप्स उन्हें अपने स्क्रीन पर दिखने लगते हैं| इस मामले पर अमेरिका के चालीस  राज्यों ने गूगल के साथ समझौते के तहत अब गूगल को राज्यों को कुल 32 अरब रुपये यानी करीब 400 मिलियन डॉलर का भुगतान करने का फैसला किया है| ध्यान देने वाली बात ये है कि यह अब तक का सबसे बड़ा प्राइवेसी समझौता है|

वही भारत जो कि दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इंटरनेट यूजर देश है वहां डेटा और डेटा प्राइवेसी को लेकर अभी भी कोई जागरूकता नहीं दिखती है|निजी जानकारियों को सुरक्षित रखने और इसके  गलत इस्तेमाल को रोकने  के लिए सरकार ने 11 दिसंबर 2019 को लोकसभा में पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल पेश किया था इस पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने अपनी रिपोर्ट सदन के समक्ष नवम्बर 2021 में रख दी है जिस पर आगे चर्चा होनी है |  उम्मीद की जा रही है कि इस बजट सत्र के बाद डिजीटल डाटा सुरक्षा बिल कानून का रूप ले लेगा |जिस तरह इंटरनेट की इस दुनिया में आंकड़े महत्वपूर्ण हो चले हैं इस बिल के कानून बनने में अभी वक्त है |देश में जिस तेजी से इंटरनेट का विस्तार हुआ उस तेजी से हम अपने निजी आंकडे (फोन ई मेल आदि) के प्रति जागरूक नहीं हुए हैं परिणाम तरह तरह के एप मोबाईल में भरे हुए जिनको इंस्टाल करते वक्त कोई यह नहीं ध्यान देता कि एप को इंस्टाल करते वक्त किन –किन चीजों को एक्सेस देने की जरुरत है |यदि किसी उपभोक्ता ने मौसम का हाल जानने के लिए कोई एप डाउनलोड किया और एप ने उसके फोन में उपलब्ध सारे कॉन्टेक्ट तक पहुँचने की अनुमति माँगी तो ज्यादातर लोग बगैर यह सोचे की मौसम का हाल बताने वाला एप कांटेक्ट की जानकारी क्यों मांग रहा है उसकी अनुमति दे देंगे |अब उस एप के निर्मताओं के पास किसी के मोबाईल में जितने कोंटेक्ट उन तक पहुँचने की सुविधा मिल जायेगी|यानि एप डाउनलोड करते ही उपभोक्ता आंकड़ों में तब्दील हुआ फिर उस डाटा ने और डाटा ने पैदा करना शुरू कर दिया |इस तरह देश में हर सेकेण्ड असंख्य मात्रा में डाटा जेनरेट हो रहा है पर उसका बड़ा फायदा इंटरनेट के व्यवसाय में लगी कम्पनियों को हो रहा है |ऐसे में लोगों की डेटा प्राइवेंसी पर बहुत बड़ा सवाल उठता है| 

दैनिक जागरण में 21/11/2022 को प्रकाशित 

 

पसंद आया हो तो