Thursday, September 21, 2023

भारत में बढ़ता डेटिंग एप का चलन

 

जीवन साथी  के चुनाव  और दोस्ती  जैसी भावनात्मक   और  निहायत व्यक्तिगत  जरूरतों   के लिए  दुनिया भर  के डेटिंग एप  निर्माताओं  की निगाह  में भारत सबसे  पसंदीदा जगह बन कर उभर  रहा है | उदारीकरण के पश्चात बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और रोजगार की संभावनाएं  बड़े शहरों ज्यादा बढीं ,जड़ों और रिश्तों से कटे ऐसे युवा  भावनात्मक  सम्बल पाने के लिए और ऐसे रिश्ते बनाने में जिसे वो शादी के अंजाम तक पहुंचा सकें  डेटिंग एप का सहारा ले रहे हैं | विवाह तय करने जैसी सामाजिक प्रक्रिया पहले परिवार और यहां तक कि खानदान के बड़े बुजुर्गों, मित्रों, रिश्तेदारों वगैरह को शामिल करते हुए आगे बढ़ती थी, अब उसमें भी ‘ई’ लग गया है। 

मैट्रीमोनी वेबसाइट से शुरू हुआ ये सिलसिला अब डेटिंग एप्प्स तक पहुँच गया है । आम तौर पर इंटरनेट की सहायता से किसी सम्बन्ध  को बनाना एक विशुद्ध शहरी घटना माना जाता था और छोटे शहरों को इस प्रवृत्ति से दूर माना जाता था |इस सांस्कृतिक अवरोध के बावजूद डेटिंग का व्यवसाय भारत में तेजी से पैर पसार रहा है |इंटरनेट साईट स्टेटीस्टा के अनुसार इस समय देश में 38 मिलीयन लोग डेटिंग एप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और रेवेन्यु के हिसाब से यह संख्या विश्व में चीन और अमेरिका के बाद तीसरे नम्बर की सबसे बड़ी संख्या है |ओनलाईन प्यार भारत में एक नयी परिघटना है साल 2013 से शादी कराने वाली वेबसाईटस सुर्ख़ियों में आना शुरू हुईं पर डेटिंग एप का ट्रेंड साल 2014 में टिंडर के आने के बाद शुरू हुआ और तबसे वैश्विक रूप से लोकप्रिय डेटिंग एपबम्ब्ल , हप्प्न , और हिन्ज देश में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुके हैं |जब से होमोसेक्सुअल्टी भारत में अपराध न रही “एलजीबीटीक्यू” समुदाय के लिए ग्रिंडर जैसे एप भी भारत आये पर बड़ी कम्पनियों में शामिल टिंडर और बम्ब्ल भी समान लिंगी साथियों के चुनाव की सुविधा भी देते हैं | देश की संस्कृतिक विविधता के हिसाब से सभी प्रचलित डेटिंग एप्स अंग्रेजी भाषा को ही प्रमुखता देते हैं , टिंडर ने हिन्दी भाषा में भी अपनी सेवा देनी शुरू कर दी है पर अभी भी अंग्रेज़ी का बोलबाला है जबकि देश की मात्र बारह प्रतिशत जनसंख्या ही अंग्रजी बोलती है |

जानकार मानते हैं कि भारत में भाषा की समस्या अब उतनी गंभीर डेटिंग एप के मामले में उतनी गंभीर नहीं क्योंकि लोग मोटे तौर पर यह जानते हैं कि एप चलता कैसे है जब संदेशों के आदान प्रदान की बात आती है तो लोग हिन्दी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को रोमन में लिख लेते हैं |इन एप्स ने अपने भारतीय संस्करणों में भारतीयता को भी अपनाया है | सम्बन्ध बनाने में शादी की ही प्रधानता रही है और इसीलिये भारत में शादियाँ कराने वाली वेबसाईट्स तेजी से उभरी |देश की सबसे बड़ी शादी कराने वाली वेबसाईट मेट्रेमोनी डॉट कॉम के देश में पांच मिलीयन सक्रीय उपभोक्ता हैं | डेटिंग पूरी तरह से पश्चिमी अवधारणा है और जब ये विदेशी वेबसाईट्स भारत आयीं तो इन्हें दिक्कतों का सामना करना पडा इस स्थिति का मुकाबला करने में इन्होने अपनी रणनीति बदली जिसमें डेटिंग के सहारे ऐसे गंभीर सम्बन्ध विकसित करने पर जोर दिया गया जो शादी तक पहुंचें मतलब ऐसे एप्स अपनी एप्रोच में न तो डेटिंग जैसे कैजुवल रहें और न ही शादी कराने वाली वेबसाईट्स जैसे कठोर |सांस्कृतिक जतिलाताओं के कारण देश में डेटिंग एप्स को ज्यादा मान्यता नहीं दी जाती है पर जब छोटे शहरों में पले बढ़े लोग अपने शहरों  से बाहर निकले तो ये एप उनकी पसंद में शामिल हो गए पर वे अपने शहरों में इनका इस्तेमाल ज्यादा नहीं करते रहे हैं |विडम्बना यह हुई कि जब देश में लॉक डाउन लगा तो ये अलग –अलग जगहों पर बिखरे हुए लोग अपने घर लौट आये |

डेटिंग एप ट्रूली मैडली जो साल 2014 में बना उसके रेवन्यू में साल 2020 में दस गुना बढ़ोत्तरी उन शहरों से हुई जो देश के मेट्रोपोलिटन शहर नहीं थे और उसके कुल रेवन्यू में साल 2019 के मुकाबले चार गुना बढ़ोत्तरी हुई |सामाजिक रूप से देखें, तो जहां पहले शादी के केंद्र में लड़का और लड़की का परिवार रहा करता था, अब वह धुरी खिसककर लड़के व लड़की की इच्छा पर केंद्रित होती दिखती है। वर या वधू तलाशने का काम अब मैट्रीमोनिअल साइट व ऑनलाइन डेटिंग साइट कर रही हैं और वह भी बगैर किसी बिचौलिये के। वैसे यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इससे पारदर्शिता आई है। कुछ और तथ्यों पर गौर किया जाना भी जरूरी है। इन एप्स  से बने रिश्तों  में धोखाधड़ी के कई मामले भी सामने आए हैं। दी गई जानकारी कितनी सही है, इसे जांचने का कोई तरीका ये एप्स उपलब्ध नहीं कराते। उनकी जिम्मेदारी लड़का-लड़की को मिलाने तक सीमित रहती है। हालांकि, झूठ बोलकर शादी कर लेने में नया कुछ नहीं, पर इंटरनेट एप्स से बने रिश्तों  के पीछे कोई सामजिक दबाव नहीं काम करता और गड़बड़ी की स्थिति में आप किसी मध्यस्थ को दोष देने की स्थिति में भी नहीं होते। और न कोई ऐसा होता है, जो बिगड़ी बात को पटरी पर लाने में मदद करे।

प्रभात खबर में 21/09/2023 को प्रकाशित 

 

Wednesday, September 13, 2023

सिर चढ़कर बोल रहा है शोर्ट वीडियो का जादू

 इंटरनेट के आने से पहले की दुनिया में बदलाव की गति धीमी थी |नया देर से पुराना होता था पर अब यह प्रक्रिया इतनी तेज है कि नया  द्रुत गति से पुराना हो रहा है|सोशल मीडिया के आने के बाद लोगों ने अपनी बात कहने के लिए  ब्लॉग पोस्ट और तस्वीरों को जरिया  बनाया फिर वीडियो और आडियो कंटेंट की धूम मची पर तस्वीरें या फोटोग्राफ मांग में लगातार बने रहे |बात चाहे अपना जन्मदिन मनाते जोड़े की हो या दुनिया घूमती एक युवा लड़की की हर जगह तस्वीरें प्रमुखता से अपनी भूमिका निभा रही थी|ये तस्वीरों का ही कमाल  था|जिसने  मोबाइल से अपनी खुद की तस्वीरें लेने की कला “सेल्फी” को विकसित किया  और देखते -देखते सारी दुनिया में छा गयी|लेकिन  इंटरनेट पर रील्स की बढ़ती लोकप्रियता ने इन तस्वीरों   की लोकप्रियता को खत्म  तो नहीं पर कम जरुर कर दिया है|रील्स जैसा ही एक और प्रारूप इंटरनेट पर सुर्खियाँ बटोर रहा है |वह है "व्लॉगिंग"|ये  दो अलग-अलग डिजिटल मीडिया प्रारूप हैं जिनका उपयोग वीडियो सामग्री बनाने और साझा करने के लिए किया जाता है।जिनके कारण तस्वीरों की लोकप्रियता में कमी आ रही है| व्लॉगिंग का मतलब होता है कि व्यक्तिगत अनुभवों, ज्ञान, कला, साहित्य, यात्राओं आदि को वीडियो के माध्यम से साझा करना।इनकी अवधि रील के मुकाबले ज्यादा होती है | रील्स एक प्रकार की वीडियो सामग्री है जो आमतौर पर एम् एक्स शोर्ट विडियो, मौज ,जोश ,चिंगारी,मित्रों इन्स्टाग्राम,यूट्यूब और फेसबुक  जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर बनाई जाती है।हालाँकि  यह विभिन्न  विषयों पर छोटे-छोटे वीडियो होते हैं जिन्हें संगीत, डायलॉग्स, आदि के साथ तस्वीरों और क्लिप्स के साथ मिलाकर बनाया जाता है। रील में गति होती है जबकि तस्वीरों में अगर गति लानी भी  है तो रील्स का ही सहारा लेना पड़ेगा |सोशल इनसाइडर  के अनुसार रील्स इंस्टाग्राम पर किसी भी अन्य सामग्री प्रकार से दोगुनी पहुंच उत्पन्न करते हैं।रील्स की औसत पहुंच दर 30.81 प्रतिशत  है, जबकि कैरोसल  (ऐसी पोस्ट जिसमें एक से अधिक फ़ोटो या वीडियो हों , जिन्हें उपयोगकर्ता फ़ोन ऐप के माध्यम से पोस्ट पर स्वाइप करके देख सकते हैं। ) और फोटो  पोस्ट की औसत पहुंच दर क्रमशः 14.45 प्रतिशत  और 13.14प्रतिशत  है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 2022 और 2023 के बीच कैरोसल पोस्ट  की पहुंच दर में महत्वपूर्ण  गिरावट आई है।

स्टैटिस्टा की एक रिपोर्ट के अनुसार, इन्स्टाग्राम  रील्स की पहुंच दर उन खातों के लिए कहीं अधिक है। जो कम फ़ॉलोअर्स रखते हैं, 500 फ़ॉलोअर तक के खातों की औसत पहुँच दर 892 प्रतिशत  होती है। हालांकि यह उन खातों की पहुँच दर से कई गुना जयादा  है जिनके पास ज्यादा  फ़ॉलोअर्स होते हैं,  पर बड़े खातों वालों के इन्स्टाग्राम  रील्स की पहुँच में  भी काफी महत्वपूर्ण वृद्धि देखी जा रही  है।

ये आंकड़े सुझाव देते हैं कि भारत में  फोटो ग्राफ    की तुलना में रील्स एक अधिक प्रभावी तरीका है जिससे भारत में जनसंचार करने, लोकप्रियता प्राप्त करने और जनों को परिवर्तित करने का सही तरीका है। डिमांड्सएज वेबसाईट के अनुसार 230.25 मिलियन इंस्टाग्राम उपयोगकर्ताओं के साथ, भारत इंस्टाग्राम रील्स का सबसे बड़ा बाजार है, दूसरे नम्बर पर  अमेरिका (159.75 मिलियन) और तीसरे स्थान पट ब्राजील  (119.45 मिलियन) है।

रील्स के लोकप्रिय होने के कुछ कारण हैं. पहला, वे स्थिर तस्वीरों की तुलना में अधिक आकर्षक हैं| रील्स कहानियां बता सकती हैं, गति दिखा सकती हैं, और संगीत और ध्वनि प्रभाव जोड़ सकती हैं, जो उन्हें दृश्य रूप से अधिक आकर्षक और देखने में दिलचस्प बना सकती हैं| दूसरा, रील्स बनाने के लिए पहले से कहीं अधिक आसान हैं| स्मार्टफोन और वीडियो संपादन ऐप्स के आगमन के साथ, कोई भी कुछ ही टैप के साथ एक रील बना सकता है. तीसरा, रील्स एक व्यापक दर्शकों तक पहुंचने का एक शानदार तरीका है. उन्हें इंस्टाग्राम यु ट्यूब शॉर्ट्स  जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर साझा किया जा सकता है, जिनके अरबों उपयोगकर्ता हैं|फिर भी स्थिर चित्रों का महत्त्व खत्म नहीं हुआ है |वे यादें कैद करने का एक अधिक स्थायी और कालातीत तरीका है| उन्हें घरों और व्यवसायों में मुद्रित और प्रदर्शित किया जा सकता है, जिन्हें कई  वर्षों तक संजोया जा सकता है| स्थिर तस्वीरें दूसरों से व्यक्तिगत तौर पर जुड़ने से  एक अधिक अंतरंग तरीका भी हैं| जिनका उपयोग व्यक्तिगत कहानियां बताने और निजी क्षणों को साझा करने के लिए किया जा सकता है| उनका उपयोग विशेष अवसरों, यात्रा और रोजमर्रा की जिंदगी का दस्तावेजीकरण करने के लिए होता है|रील्स छोटे   मनोरंजक वीडियो साझा करने का एक शानदार तरीका है. जिनका उपयोग  अक्सर हास्य, रचनात्मकता और व्यक्तित्व को प्रदर्शित करने के लिए होता है| इसलिए, जबकि रील्स लोकप्रिय हो रहे हैं, यह संभावना नहीं है कि वे पूरी तरह से स्थिर तस्वीरों को समाप्त कर देंगे | दोनों प्रारूपों की अपने ताकत और कमजोरियां हैं, और वे आने वाले वर्षों में सह-अस्तित्व के साथ कितनी देर तक रह पायेंगे इसका फैसला होने में अभी वक्त है |

 नवभारत टाईम्स में 13/09/2023 को प्रकाशित 



साइबर अपराधियों का नया हथियार

 

जवान फिल्म के एक द्रश्य में एक शहर का ट्रैफिक बस एक क्लिक से बाधित कर दिया जाता है और लोगों की गाड़ियाँ आपस में लड़ जाती है|यह द्रश्य एक फ़िल्मी कल्पना नहीं बल्कि एक वास्तविकता है कि किसी भी कंप्यूटर नेटवर्क को कभी भी भेदा जा सकता है |लेकिन इसके लिए हमें प्रोफेशनल की जरुरत पड़ती |ए आई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के आने से प्रोफेशनल हैकर और शौकिया  हैकर के बीच का दायरा काफी सिमटा है और इंटरनेट का कोई भी दायरा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की पहुँच से अब दूर नहीं रहा है |इन्हीं में से ताजा मामला फिशिंग ई मेल्स से जुड़ा है|फ़िशिंग एक प्रकार का कम्प्यूटरीकृत हमला है जिसका उपयोग अक्सर उपयोगकर्ता का डेटा चुराने के लिए किया जाता है| जिसमें लॉगिन क्रेडेंशियल और क्रेडिट कार्ड नंबर शामिल हैं। यह तब होता है| जब एक साइबर अपराधी या हैकर, एक विश्वसनीय संस्था का रूप धारण किये हुए लिंक को  किसी व्यक्ति के  ईमेल, व्हाट्स एप संदेश  या टेक्स्ट संदेश को  खोलने के लिए उकसाता  है।जैसे ही वह व्यक्ति ऐसा करता है उसकी गोपनीय जानकारियां या धन उस साइबर अपराधी या हैकर तक पहुँच जाता है | अमेरिका स्थित ईमेल सिक्योरिटी  कंपनी अब्नॉर्मल सिक्यूरिटी ने कहा कि उन्होंने अपने ग्राहकों के ई मेल में जनरेटिव एआई प्लेटफ़ॉर्मों से निर्मित  फिशिंग ईमेल देखे हैं। ये मेसेज  बहुत कुशलता  से बनाए गए हैं और एकदम असली  लगते हैं , जिससे उन्हें पहली नजर में पता लगाना कठिन होता है |कोई जब ऐसे ई मेल देखता है तो उसे कहीं से भी ऐसा नहीं लगता है कि यह एक फिशिंग हमला हो सकता है |

वर्षों से, फिशिंग ईमेल्स की पहचान के लिए लोगों को चेताया जाता रहा है कि सबसे पहले  इ मेल की भाषा देखें|अक्सर ये तरीका काम भी करता था |कॉर्पोरेट प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने कर्मचारियों को चेतावनी भी दी जाती  है कि वे फिशिंग ई मेल्स की पहचान के लिए वर्तनी की गलतियों, गलत  व्याकरण और अन्य त्रुटियों की खोज करने के लिए सतर्क रहें, जो ऐसे  लोगों के लिए सामान्य होती हैं जिनकी  अंग्रेजी संचार की पहली भाषा नहीं है या वे लोग कम पढ़े लिखे होते हैं ।लेकिन अब जनरेटिव एआई टूल्स, जिसमें ओपनएआई  का लोकप्रिय  चैटजीपीटी भी शामिल है, ऐसे ई मेल में  वर्तनी की गलतियों और अन्य त्रुटियों  को पलक झपकते ही  ठीक कर सकते हैं। इससे शौकिया हैकर्स के हाथों में भी, एआई अब एक प्रभावी खतरा बन गया है क्योंकि अब ऐसे फिशिंग ई मेल्स जनरेटिव एआई टूल्स की मदद से  निहायत ही व्यक्तिगत ई मेल बनाये जा सकते हैं |
सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल और अपनी निजता की परवाह न करने के कारण लोग अपनी बहुत सी जानकारियाँ इंटरनेट पर साझा करते रहते हैं |ऐसे में जिन लोगों को फिशिंग मेल्स किया जा रहा है| जनरेटिव एआई टूल्स  की मदद से उनके सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटा का विश्लेषण करते हुए कुछ ही सेकंड में निहायत  व्यक्तिगत ईमेल बनाया जा सकता है |
यह  एक बड़े खतरे की आहट है |आपको अचानक एक ऐसा ई मेल दिखेगा जो आपकी पत्नी  या किसी करीबी दोस्त  से आ रहा है। उसके लिखने की शैली बात चीत के मुद्दे सब असली जैसे लगेंगे पर वे असली होंगे नहीं |वे ये जानते हैं कि आपका सबसे अच्छा दोस्त कौन है, और वो आपको कैसे मेल लिखता है | ऐसा इसलिए हो रहा है कि बड़े भाषा मॉडल्स जैसे कि चैटजीपीटी और गूगल का बार्ड, मानवों की तरह भाषा को समझते नहीं हैं, लेकिन वे वाक्य संरचना, साहित्यिक शैली और स्लैंग कैसे काम करते हैं, इसका विश्लेषण कर सकते हैं|अपनी इसी विश्लेषण क्षमता के आधार पर वे कभी-कभी तो  अद्वितीय सटीकता के साथ कोई दोस्त या पति अपने मेल में क्या  लिखेगा या लिख सकता है का पूर्वानुमान लगा सकते हैं |
बड़े भाषा मॉडल (LLMs) प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण कंप्यूटर प्रोग्राम होते हैं जो कृत्रिम न्यूरल नेटवर्क का उपयोग करके ए आई द्वारा निर्मित टेक्स्ट  बनाने में  सहायक होते हैं।ये टेक्स्ट अक्सर   सोशल मीडिया, समाचार साइटों, इंटरनेट फोरम्स और अन्य स्रोतों से एकत्रित किया जा  सकते हैं फिर इस टेक्स्ट सामाग्री को हैकर्स अपने हिसाब से अनुकूलित कर सकते हैं | जिसमें लेखन शैली की नक़ल भी शामिल है |अगर यही काम बगैर ए आई जेनरेटेड भाषा मोडलों के बगैर किया जाए तो इसमें महीनों लग सकते है जो काम अब सेकेंडों में हो सकता है |
चैटजीपीटी  और बार्ड में फिशिंग ईमेल जैसी  सामाग्री  निर्मित करने के इनबिल्ट सुरक्षा उपाय  है। लेकिन कई ओपन-सोर्स LLMs में कोई सुरक्षा उपाय नहीं हैं, और हैकर्स डार्कनेट फोरम्स पर इच्छुक खरीदारों को मैलवेयर लिखने के लिए मॉडल लाइसेंस कर रहे हैं।
एआई को विश्वसनीय डीपफेक (जिसमें वीडियो और आवाज की नक़ल शामिल है) तैयार करने के लिए प्रयोग किया भी जा रहा है जो फेक न्यूज को फैलाने में एक बड़ा कारक है।लेकिन  ईमेल, आवाज और वीडियो को शामिल करने वाले ऐसे हाइब्रिड हमले अब एक करीबी  वास्तविकता है। इसमें सबसे बड़ा खतरा है साइबर सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा का क्योंकि ए आई ऐसे हाइब्रिड हमलों को और  ज्यादा मारक बना सकता है ऐसी भी संभावना है कि हम आज जहाँ तक सोच भी नहीं सके हैं वो ऐसे  हमलों के बारे सोच सकता है |
शतरंज जैसे खेलों में एआई ने पहले ही सिद्ध कर दिया है कि वे इंसानों को परास्त कर सकते हैं| इसी तर्ज पर देश में ऐसे साइबर हमले किये जा सकते हैं जिनका सामना करने के लिए हमारी सरकार या तंत्र तैयार ही न हो |हमें एक ऐसे रक्षात्मक एआई सिस्टम की आवश्यकता है  जिससे एआई-जनित साइबर हमलों का सामना किया जा सके।
अमर  उजाला में 13/09/2023 को प्रकाशित 

Sunday, September 10, 2023

लखनऊ, तुझसे ही सीखा है मैंने जीने का अंदाज


 लक्ष्मण ने बसाया था नवाबों ने संवारा 

 लखनऊ फ़िदा है तुझ पर ये नन्हा   सा  दिल हमारा |

गोमती के किनारे बसती है एक राहगुज़र,

 इन्ही राहों से निकलें हैं  हमारे सपने करते हैं सफ़र  ।

तुझे सोचने पर धडकता है मेरा दिल 

तहजीब और तमीज के इस शहर को भूलना बड़ा  मुश्किल |

ये मनाता है कभी ईद तो कभी दीवाली 

ये शहर नहीं होता कभी उम्मीद से खाली |

चिकनकारी की कढाई  और दशहरी की बातें, 

ये है लखनऊ की निशानियाँ  और उनकी रवायतें ।

इसके  सीने पर गुजरते हुए  तांगों की आवाज़,

 वो भीगती हुई मिट्टी की खुशबू और खुशी का आगाज़ |

ये शहर है लखनऊ, जिसकी दास्ताँ हैं अनमोल,

यहाँ की गलियों में छुपे  है अदबी  शायरी के बोल  

क़ैफियत से भरी हर जगह और  जिन्दादिली का राज  , 

लखनऊ, तुझसे ही सीखा है मैंने जीने का अंदाज ||


लखनऊ पर एक कविता 

Friday, August 18, 2023

पाइरेसी के विरूद्ध पहल

 

फिल्म 'गदर 2' ऑनलाइन लीक हो गई है |फिल्म का एचडी प्रिंट टोरेंट साइट्स पर रिलीज कर दिया गया है| यह फिल्म तमिल रोकर्स , टेलीग्राम  , फिल्मज़िला  और मूवीरुल्ज  जैसी पाइरेसी वेबसाइट्स पर डाल दी गई है|सारी दुनिया में पाइरेसी एक बड़ी समस्या है और इंटरनेट ने इस समस्या को और भी जटिल बना दिया है| सोफ्टवेयर पाइरेसी से शुरू हुआ यह सफर फिल्म, संगीत धारावाहिकों तक पहुँच गया है |मोटे तौर पर पाइरेसी से तात्पर्य किसी भी सोफ्टवेयर ,संगीत,चित्र और फिल्म  आदि के पुनरुत्पाद से है| जिमसें मौलिक रूप से इनको बनाने वाले को कोई आर्थिक लाभ नहीं होता और पाइरेसी से पैदा हुई आय इस गैर कानूनी काम में शामिल लोगों में बंट जाती है |इंटरनेट से पहले यह काम ज्यादा श्रम साध्य था और इसकी गति धीमी थी, पर इंटरनेट ने उपरोक्त के वितरण में बहुत तेजी ला दी है| जिससे मुनाफा बढ़ा है |भारत जैसे देश में जहाँ इंटरनेट बहुत तेजी से फ़ैल रहा है| ऑनलाईन पाइरेसी का कारोबार भी अपना रूप बदल रहा है |पहले इंटरनेट स्पीड कम होने की वजह से ज्यादातर पाइरेसी टोरेंट से होती थी पर अब भारत समेत सारी दुनिया में पाइरेसी का चरित्र बदल रहा है क्योंकि अब हाई स्पीड इंटरनेट स्मार्टफोन के जरिये हर हाथ में पहुँच रहा है, तो लोग पाइरेटेड कंटेंट को सेव करने की बजाय सीधे इंटरनेट स्ट्रीमिंग सुविधा से देख रहे हैं |ऑनलाइन पाइरेसी में मूलतः दो चीजें शामिल हैं पहला सॉफ्टवेयर दूसरा ऑडियो -वीडियो कंटेंट जिनमें फ़िल्में ,गीत संगीत शामिल हैं |सॉफ्टवेयर की लोगों को रोज –रोज जरुरत होती नहीं वैसे भी मोटे तौर पर काम के कंप्यूटर सोफ्टवेयर आज ऑनलाईन मुफ्त में उपलब्ध हैं या फिर काफी सस्ते हैं पर आज की भागती दौडती जिन्दगी में जब सारा मनोरंजन फोन की स्क्रीन में सिमट आया है और इन कामों के लिए कुछ वेबसाईट वो सारे कंटेंट उपभोक्ताओं को मुफ्त में उपलब्ध कराती हैं और अपनी वेबसाईट पर आने वाले ट्रैफिक से विज्ञापनों से कमाई करती हैं पर जो कंटेंट वे उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही होती हैं वे उनके बनाये कंटेंट नहीं होते हैं और उस कंटेंट से वेबसाईट जो लाभ कमा रही होती हैं उसका हिस्सा भी मूल कंटेंट निर्माताओं तक नहीं जाता है |ऑडियो –वीडियो कंटेंट को मुफ्त में पाने के लिए लाईव स्ट्रीमिंग का सहारा लिया जा रहा है क्योंकि इंटरनेट की गति बढ़ी है और उपभोक्ता को बार –बार कंटेंट बफर नहीं करना पड़ता यानि अभी सेव करो और बाद में देखो वाला वक्त जा रहा है |यू ट्यूब जैसी वीडियो वेबसाईट जो कॉपी राईट जैसे मुद्दों के प्रति जरुरत से ज्यादा संवेदनशील है| पाइरेटेड वीडियो को तुरंत अपनी साईट से हटा देती है पर इंटरनेट के इस विशाल समुद्र में ऐसी लाखों वेबसाईट हैं जो पाइरेटेड आडियो वीडियो कंटेंट उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही हैं |

मनोरंजन उद्योग में ऑनलाइन चोरी पर नज़र रखने वाली मुसो, साईट के अनुसार पाइरेसी के लिए जिस तकनीक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है उसमें स्ट्रीमिंग पहले नम्बर पर है |मुसो कॉपीराइट उल्लंघनों पर आंकडा  एकत्र करती  है |इंटरनेट पर ऐसी कई साईट्स  हैं, जहां से पाइरेटेड कंटेंट  मिल जाती हैं. जेलर और पठान जैसी फ़िल्में भी लीक हुईं . दक्षिण में  में तमिल रॉकर्स जैसी पाइरेसी साइट्स ने तो कोहराम  मचा रखा है. इन्हें जैसे ही ब्लोक  किया जाता है, ये यूआरएल बदलकर फिर से काम  करने लगती हैं. पाइरेसी फिल्म इंडस्ट्री की एक बड़ी समस्या है. पाइरेसी के कारण  फिल्म इंडस्ट्री को 20 हज़ार करोड़ का नुकसान हो रहा है. वैश्विक सलाहकार फर्म अंकुरा की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में टोरेंट साइटों के माध्यम से 7 बिलियन से अधिक विज़िट के साथ कंटेंट पायरेसी वेबसाइटों पर जाने के मामले में  भारत तीसरे स्थान पर है। भारत से आगे अमेरिका और रूस जैसे देश हैं |स्पाइडर-मैन: नो वे होम 2022 में भारत में सबसे अधिक पायरेटेड फिल्म थी, जबकि गेम ऑफ थ्रोन्स सबसे अधिक पायरेटेड श्रृंखला थी। केजीएफ: चैप्टर 2 और आरआरआर सबसे अधिक पायरेटेड भारतीय फिल्में थीं। संगीत, फिल्मों, सॉफ्टवेयर और किताबों की पाइरेसी में व्हाट्स एप और टेलीग्राम जैसे मेसेजिंग एप नें स्थिति को और गंभीर बना दिया है | जो टॉरेंट साइट्स या एग्रीगेटर ऐप्स के बारे में जानकारी प्रसारित करते हैं जहाँ पाइरेटेड सामाग्री उपलब्ध हैं |

रिपोर्ट के अनुसार पायरेसी वेबसाइटों पर आने वाले कुल ट्रैफ़िक में टीवी सामग्री का हिस्सा 46.6 प्रतिशत था, इसके बाद प्रकाशन सामग्री (किताबें) का योगदान 27.80 प्रतिशत  रहा । फिल्म पाइरेसी 12.40 प्रतिशत  तक पहुंच गई है, इसके बाद संगीत और सॉफ्टवेयर का स्थान आता है, जो क्रमशः 7 प्रतिशत  और 6.20 प्रतिशत है।भारत में वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पायरेसी के कारण कुल राजस्व का 25-30 प्रतिशत हिस्सा गँवा रहे हैं|सरकार ने इसके लिए सिनेमैटोग्राफ संशोधन बिल 2023 में कुछ नए प्रावधान जोड़े हैं| इस विधेयक का उद्देश्य ‘पायरेसी’ की समस्या पर व्यापक रूप से अंकुश लगाना है, इस बिल के तहत फिल्म की पाइरेसी करने वालों को तीन महीने से लेकर तीन साल की जेल हो सकती है. साथ ही फिल्म  की निर्माण लागत  का पांच  प्रतिशत जुर्माना भी भरना होगा. फिल्म को गैरकानूनी तरीके से दिखाना या फिर इसकी गैर कानूनी रिकॉर्डिंग भी अपराध की श्रेणी में आएगी. निजी इस्तेमाल, करेंट अफेयर्स, रिपोर्टिंग और फिल्म क्रिटिसिज्म के लिए कॉपीराइट कंटेंट इस्तेमाल किया जा सकेगा. सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 में अंतिम महत्वपूर्ण संशोधन वर्ष 1984 में किया गया था। भले ही नई प्रौद्योगिकी प्लेटफार्मों पर पाइरेसी  व्यापक हो गई है, कई कानून आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं हैं। कॉपीराइट अधिनियम, 1957 जैसे मौजूदा कानूनों  में कई समस्याएं  हैं और वे पर्याप्त कठोर नहीं हैं, जिससे अपराधियों को दण्डित करना मुश्किल  हो जाता है। राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) नीति 2016 सहित नए कानूनों का पालन  और साइबर डिजिटल अपराध इकाइयों की स्थापना अभी भी प्रारंभिक चरण में है। पर्याप्त कानूनों के अभाव में, अदालतें पाइरेसी के मामले में कुछ ख़ास नहीं कर पाती हैं तकनीक के तौर पर इंटरनेट की जटिलता को देखते हुए ये सिनेमैटोग्राफ संशोधन बिल 2023 पाइरेसी की समस्या को कितना कम कर पायेगा इसका फैसला अभी होना है |

अमर उजाला में 18/08/2023 को प्रकाशित 

 

Wednesday, August 9, 2023

विज्ञापन कर रहे सोशल इन्फ़्ल्युएन्सर


 बात ज्यादा पुरानी नहीं है .आज से पांच साल पहले किसी ने नहीं सोचा था कि एक ऐसा वक्त भी आएगा जब आप कुछ न करते हुए भी बहुत कुछ करेंगे और पैसे भी कमाएंगे .बात चाहे यात्राओं की हो या खान –पान की या फिर फैशन की देश विदेश की बड़ी कम्पनिया ऐसे लोगों को जो इंटरनेट पर ज्यादा फोलोवर रखते हैं अपने प्रोडक्ट के विज्ञापन के लिए पैसे दे रही हैं और उनके खर्चे भी उठा रही हैं . सोशल मीडिया प्लेटफोर्म नित नए रूप बदल रहे हैं उसमें नए –नए फीचर्स जोड़े जा रहे हैं .इस सारी कवायद का मतलब ऑडिएंस को ज्यादा से ज्यादा वक्त तक अपने प्लेटफोर्म से जोड़े रखना .इसका बड़ा कारण इंटरनेट द्वारा पैदा हो रही आय भी है .

मूल्यांकन सलाहकार फर्म (Valuation Advisory firm  Kroll) क्रोल  की एक नवीन रिपोर्ट के अनुसार एक साल में भारतीय ब्रांड्स ने अपनी इन्फ़्लुएन्सर मार्केटिंग पर खर्च दोगुना कर दिया .पिछले एक साल में एक तिहाई भारतीय ब्रांड्स ने सोशल मीडिया इन्फ़्लुएन्सेर्स पर अपना खर्च दो गुना कर दिया है . भारत में सोशल मीडिया की कंटेंट क्रियेटर इंडस्ट्री पच्चीस प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ रही है.आज भारत में लगभग 80 मिलियन कॉन्टेंट क्रिएटर हैं, जिनमें वीडियो स्ट्रीमर्स,   इन्फ़्लुएन्सेर्स    और ब्लॉगर्स शामिल हैं। डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी आई क्यूब्स वायर के  एक शोध से पता चलता है कि लगभग 35 प्रतिशत  ग्राहकों के खरीदारी निर्णय सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर पोस्ट, रील्स और वीडियो देखकर लिए जा रहे हैं . affable.ai नामक एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता-संचालित इंफ्लुएंसर मार्केटिंग प्लेटफोर्म के आंकड़ों के अनुसार नैनो- इंफ्लुएंसर, जिनके पास 10,000 से कम फॉलोअर हैं, ने 2022 में इंस्टाग्राम पर सबसे अधिक इंगेजमेंट अर्जित की है .जबकि माइक्रो इंफ्लुएंसर जिनके दस हजार से पचास हजार के बीच फॉलोअर ने इन्स्टाग्राम और यू ट्यूब पर ज्यादा दर्शक मिले पर उनकी इंगेजमेंट दर कम थी .

 देश  में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, व्यक्ति और ब्रांड प्रमोशन का बड़ा औजार  बनकर सामने आया है .  सोशल मीडिया विज्ञापन का एक अपरंपरागत माध्यम  है . जो बाकी सारे मीडिया (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और समानांतर मीडिया) से अलग है .यह एक वर्चुअल वर्ल्ड बनाता है जिसे उपयोग करने वाला व्यक्ति सोशल मीडिया के किसी प्लेटफॉर्म (फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम) आदि का इंटरनेट के माध्यम से  उपयोग कर किसी भी नेट कनेक्टेड व्यक्ति तक पहुंच बना सकता है .

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर वह आम व्यक्ति होता है जिसकी विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर काफी सारे फोलोवर होते हैं और वह अपनी इस लोकप्रियता का इस्तेमाल  विभिन्न तरह के उत्पाद बेचने में करता है . इसमें रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट दूसरे विज्ञापन  माध्यमों के मुक़ाबले अधिक है. सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर जहाँ विज्ञापनों की दुनिया में एक नया आयाम गढ़ रहा है वहीं विज्ञापनों की दुनिया में सेलिब्रेटी स्टेट्स को खत्म भी कर रहा है .जहाँ हमारे आपके बीच के लोग ही स्टार बन रहे है .

भारत में चूँकि अभी इंटरनेट बाजार में पर्याप्त संभावनाएं हैं इसलिए अभी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर का यह दौर चलेगा पर कुछ चिंताएं भी है भारत के इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग उद्योग को विनियमन की आवश्यकता है ताकि तथ्यों के गलत प्रस्तुतीकरण  से बचा जा सके। जनवरी में, भारत के उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने घोषणा की कि ऐसे में ये गाइडलाइंस ग्राहक हितों की रक्षा के लिए जरूरी हैं. सोशल मीडिया पर ऐड्स करने वाले सेलेब्रिटीज़ भी इसके दायरे में होंगे. किसी भी भ्रामक विज्ञापन व  इन्हें नहीं मानने पर इंफ्लूएंसर्स को 10 लाख तक का जुर्माना देना होगा. लगातार अवमानना पर 50 लाख तक जुर्माना देना होगा. साथ ही एंडोर्स करने वाले को 2 से 6 महीने तक किसी भी एंडोर्समेंट करने  से रोका जा सकता है. उस प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करने की कार्रवाई भी सम्भव है.

प्रभात खबर में 09/08/2023 को प्रकाशित 

 


Friday, August 4, 2023

एआइ से सभी तक पहुंच संभव

 आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) लगभग हर क्षेत्र में क्रांति ला रहा है और हेल्थकेयर डिजिटलाइजेशन कोई अपवाद नहीं है। स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में एआई एक व्यापक शब्द है |जो जटिल चिकित्सा डेटा का विश्लेषण, समझने और प्रस्तुत करने के लिए मानव अनुभूति की नकल करने के लिए मशीन लर्निंग एल्गोरिदम के उपयोग का इस्तेमाल  करता है।देश में अस्पताल और स्वास्थ्य सेवा संस्थाएं भी बदल रही है जिसको गति कोरोना काल में और तेजी मिली  | अब ई कन्सलटेशन (आभासी परामर्श ) वास्तविकता है  जो ऑडियो और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग टूल के माध्यम से किया जा रहा है सरकार की टेलीमेडिसिन प्रेक्टीस गाईड लाईन्स  देश के सुदूर इलाकों में चिकित्सकों को इंटरनेट के माध्यम से अपनी सेवाएँ देने को विधिक स्वरुप प्रदान करती है |चिकित्सा का यह तरीका न केवल संकट के इस समय बल्कि भविष्य में भी लोगों को फायदा पहुंचाएगा |  डॉक्टर तथा मरीज इन-पर्सन विजिट के बजाय वस्तुतः डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ सकेंगे |जिससे अस्पतालों  में अनावश्यक भीड़ को कम किया जा सकेगा और गंभीर रोगों के इलाज के लिए रोगी अस्पताल पहुंचेंगे | गूगल के हेल्थ प्रोग्राम से जुड़े वैज्ञानिकों की एक टीम ने आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस यानि AI को लेकर एक कमाल किया है। इस टीम ने AI प्रोग्राम के एक अंतर्गत एक ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया है, जो मशीन लर्निंग की मदद से किसी भी इंसान के शरीर में मौजूद बीमारियों का पता लगाएगा। यही नहीं इन छिपी हुई बातों को पता लगाने के लिए किसी भारी भरकम टेस्ट या डायग्नोस्टिक मशीन की जरूरत नहीं होगी और न ही इसके लिए ब्लड सैंपल लेना पड़ेगा। जनाब इसके लिए गूगल का खास सॉफ्टवेयर स्मार्टफोन या दूसरी कैमरा डिवाइस के द्वारा लोगों की आंखें स्कैन करेगा। इसके बाद रेटीना स्कैन के डेटा को प्रोसेस करके गूगल का सॉफ्टवेयर उस व्यक्ति की उम्र, ब्लड प्रेशर के अलावा यह भी बता देगा कि वो स्मोकिंग करता है या नहीं।

 इन सब बातों को चेक करके गूगल का प्रोग्राम बता देगा कि उस व्यक्ति को दिल की बीमारी या हार्ट अटैक का कितना खतरा है और कितने सालों बाद उसे ऐसी कोई बीमारी हो सकती है। डाटा एनालिसिस से डॉक्टर बेहतर फ़ैसले भी ले सकेंगे| धीरे-धीरे एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआई की ज़रूरत नहीं रहेगी. गलत निदान स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में एक बड़ा मुद्दा है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार , अमेरिका में हर साल लगभग 12 मिलियन लोगों का गलत निदान किया जाता है, और उनमें से 44प्रतिशत कैंसर रोगी होते हैं। एआई डायग्नोस्टिक सटीकता और दक्षता में सुधार करके इस मुद्दे को दूर करने में मदद कर रहा है।भारत में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है |छोटे शहरों और कस्बों में जगह जगह निजी डायग्नोस्टिक सेंटर और हॉस्पिटल की भरमार है पर उनके द्वारा देखे जा रहे मरीजों द्वारा पैदा किया जा रहा आंकडा शोध के काम में नहीं आ पा रहा है और न ही इन सेंटरों पर किया जा रहा इलाज कितना सटीक है |इसके आंकलन की कोई केंद्रीयकृत व्यवस्था है | स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग बढ़ने के अनुपात में  चिकित्सकों की आपूर्ति सीमित रहती है|ऐसे में  रोगी की लगातार देखभाल को बनाए रखना कठिन हो जाता है।चिकित्सा क्षेत्र में ज्यादा जोर रोग ठीक करने में है न कि ऐसी परिस्थिती का निर्माण हो जिसमें रोग हों ही न | 

एआई के साथ सक्षम कंप्यूटर विजन जैसे डिजिटल चिकित्सा समाधान, चिकित्सा इमेजिंग का सटीक विश्लेषण प्रदान करते हैं, जिसमें रोगी की रिपोर्ट, सीटी स्कैन, एमआरआई रिपोर्ट, एक्स-रे, मैमोग्राम आदि शामिल हैं, जो मानव आंखों को दिखाई नहीं देने वाले डेटा को निकालने में सक्षम  हैं।अधिकांश चिकित्सा डेटा का विश्लेषण करने में एआई रेडियोलॉजिस्ट की तुलना में तेज़ और सटीक हो सकता है, यह अभी भी रेडियोलॉजिस्ट को पूरी तरह से बदलने के लिए पर्याप्त परिपक्व नहीं है। इसलिए, मेसचुटेस इंस्टिट्यट ऑफ़ टेक्नोलॉजी  ने हाइब्रिड दृष्टिकोण के आधार पर एक मशीन लर्निंग सिस्टम बनाया है जो मेडिकल रिपोर्ट का विश्लेषण करके विभिन्न प्रकार के कैंसर का निदान कर सकता है या कार्य को विशेषज्ञ रेडियोलॉजिस्ट को संदर्भित कर सकता है।

एआई के माध्यम से रोगी के साथ संचार को स्वचालित करने से अपॉइंटमेंट प्रबंधन, रिमाइंडर, भुगतान संबंधी समस्याएं जैसे थकाऊ कार्य समाप्त हो सकते हैं। इन कार्यों से बचाए गए समय को रोगियों की देखभाल में लगाया जा सकता है, जो स्वास्थ्य पेशेवरों का मुख्य उद्देश्य है।एआई डेटा का त्वरित विश्लेषण भी कर सकता है, रिपोर्ट प्राप्त कर सकता है और रोगियों को संबंधित डॉक्टरों के पास भेज सकता है। एआई सर्जरी को सुरक्षित और स्मार्ट बना रहा है। रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी सर्जनों को जटिल सर्जिकल प्रक्रियाओं में उच्च परिशुद्धता, सुरक्षा, लचीलापन और नियंत्रण प्राप्त करने में सक्षम बनाती है।यह रिमोट सर्जरी को भी सक्षम बनाता है, जिसे दुनिया में कहीं से भी उन क्षेत्रों में किया जा सकता है जहां सर्जन उपलब्ध नहीं हैं। यह वैश्विक महामारी के दौरान भी लागू होता है जब सामाजिक दूरी आवश्यक है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल द्वारा प्रकाशित शोध ने पारंपरिक और रोबोट-समर्थित प्रोस्टेट कैंसर सर्जरी के बीच अंतर की तुलना की। अध्ययन में पाया गया कि रोबोट-सहायता प्राप्त रोगियों में प्रक्रिया के बाद अस्पताल में कम समय तक रहना पड़ा और उन्हें सर्जरी के बाद दर्द भी कम हुआ |भारत इंटरनेट के प्रयोगकर्ताओं के हिसाब से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है | आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल और इंटरनेट की पहुंच स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है |  

भारत जैसे गरीब देशों में मेडिकल सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने में आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस अहम टूल साबित हो सकता है | आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस को सभी जगहों तक पहुंचाने के लिए हेल्थ रिकॉर्ड को डिजिटाइज करना पहला अहम कदम है |  वर्तमान स्थिति,सरकार का संरक्षण और विभिन्न स्टार्टअप्स की शुरुआत   भारत को आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस को अपनाने के लिए आवश्यक गति  प्रदान कर सकता है। देश में आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि लोग स्वास्थ्य सेवाओं में तकनीक का इस्तेमाल कितनी जल्दी अपने व्यवहार में ले आयेंगे और क्या तकनीक उन्हें वो भरोसा दे सकती है जितना की इंसान |

 दैनिक जागरण  के राष्ट्रीय संस्करण  में 04/08/2023 को प्रकाशित 

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