Wednesday, January 17, 2024

गूगल खुद को बदल रहा है

 गूगल वेब पर अपने उपयोगकर्ताओं को कैसे ट्रैक करता है, इसमें कई बड़े बदलाव कर रहा है | इसी बदलाव की शुरुआत करने वाला है, गूगल ने एक सीमित परीक्षण शुरू किया है |जिसमें वह अपने क्रोम ब्राउज़र का उपयोग करने वाले एक प्रतिशत लोगों के लिए थर्ड पार्टी कुकीज़ को प्रतिबंधित करेगा, क्रोम बारुजर  दुनिया भर में सबसे ज्यादा लोकप्रिय ब्राउजर  है। इस वर्ष के अंत तक, गूगल का इरादा है कि वह सभी क्रोम उपयोगकर्ताओं के लिए थर्ड पार्टी कुकीज़ को समाप्त कर देगा |विश्व के 600 अरब डॉलर वार्षिक  ऑनलाइन विज्ञापन उद्योग के इतिहास में यह सबसे बड़े बदलावों में से एक होगा|नब्बे के दशक में कंप्यूटर इंटरनेट की दुनिया में एक छोटी सी पहल ने लोगों के वेबसाइट इस्तेमाल के अनुभव को उल्लेखनीय तरीके से बदल दिया और इसका श्रेय जाता है नेटवर्क इंजीनियर लू मोंटुल्ली को जिन्होंने  एच टी टी पी  कुकी का आविष्कार किया | इसी कुकी के द्वारा ही हमारा वेबसाइट अनुभव नियंत्रित्र होता है | कुकीज  को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है  जैसे अतिआवश्यक कुकीज , वर्किंग कुकीज , फर्स्ट पार्टी कुकीज, सेकंड पार्टी कुकीज़ तथा थर्ड पार्टी कुकीज़ आदि |

 वर्तमान समय मे गूगल द्वारा थर्ड पार्टी कूकीज का सपोर्ट बंद किया जा रहा जिससे ऑनलाईन विज्ञापन के  बाजार मे बड़ी हलचल मची हुई है | इस हलचल को समझने के लिये ये समझना होगा कि इन कुकीज कि उपयोगिता क्या है ? प्रमुखता कुकीज अनलाइन वेबसाईट पर हमारी गतिविधियां ट्रैक करती हैं और उन गतिविधियों  को कुकीज़ देने वाली वेबसाईट को अवगत कराती हैं |मान लीजिये  मुझे हिन्दी मे वेबसाईट देखनी है तो मैने भाषा हिन्दी चुनी तो ये गतिविधि वेबसाईट प्रदाता कंपनी को कुकीज़ के माध्यम से पता चल जाती है और अगली बार जब हम उस वेबसाईट पर आते हैं तो हमे भाषा का चुनाव नहीं करना पड़ता इससे हमारा अनुभव अच्छा रहता हैं क्योंकि कुकीज के माध्यम से अमुक वेबसाईट हमारी रुचियाँ जान जाती है |हमारे व्यवहार को समझते हुए |महत्वपूर्ण है कि ऑनलाईन विज्ञापन का बड़ा बाजार इसी बात पर टिका है कि उपभोक्ता क्या चाहता है और यहीं से उपभोक्ता का ब्राउजिंग  डाटा महत्वपूर्ण हो जाता है  |  

अब प्रश्न ये है कि फिर थर्ड पार्टी कूकीज बंद होने पर इतना हंगामा क्यूँ हो रहा तो उसका कारण ये हैं कि थर्ड पार्टी कूकीज प्रायः वेबसाईट सेवा प्रदाता के अनुबंध के कारण किसी अन्य सेवा प्रदाता के द्वारा  प्रदान की जाती है जो हमारे अनुभव से इतर ये रिकार्ड करती हैं कि हम वेबसाईट या ऑन लाइन क्या कर रहे हैं |अगर इसको ऐसे समझे कि हुमने गूगल पर जूते सर्च किये और उसके बाद हम जब किसी अन्यत्र वेबसाईट पर जाते हैं तो वहाँ हमे जूते के विज्ञापन दिखने लगते हैं जो कि थर्ड पार्टी कुकीज द्वारा दी गई सूचना के कारण  होता हैं |अब  लोग अपनी निजता   के प्रति बहुत जागरूक हुए हैं और इसी को ध्यान मे रखते हुए और उपभोक्ताओं कि मांग का सम्मान करते हुए गूगल के थर्ड पार्टी कुकीज का प्रयोग चरणबद्ध तरीके से बंद करना शुरू कर दिया है जिसका असर बहुत सारी कम्पनियों पर पड़ रहा है जो उपभोक्ता सूचना और विज्ञापन के क्षेत्र मे काम कर रही हैं | गूगल की इस नीति के कारण  उनका खर्च बढ़ने कि संभावना है|हालाँकि गूगल का यह प्रयास पहले केवल क्रोम उपयोगकर्ताओं के एक हिस्से  को प्रभावित करेंगे, लेकिन अंततः इसका नतीजा  यह हो सकता है कि अरबों इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को कम विज्ञापन दिखाई देंगे जो उनकी ऑनलाइन ब्राउज़िंग आदतों से काफी मेल खाते हैं। पिछले दशक के अंत में, मोज़िला के फ़ायरफ़ॉक्स और ऐप्पल के सफ़ारी ब्राउज़र ने लोगों की निजता और गोपनीयता चिंताओं के कारण कुकीज़ को ट्रैक करने पर सीमाएं लगानी शुरू कर दीं थी ।

 गूगल  ने 2020 में उन्हें क्रोम से हटाने की योजना बनाई, लेकिन विज्ञापन उद्योग और गोपनीयता के समर्थकों  की चिंताओं  को दूर करने के लिए इस प्रक्रिया में कई बार देरी हुई। और गेट एप की एक रिपोर्ट के अनुसार इकतालीस प्रतिशत  सेवा प्रदाताओं कि सबसे बड़ी चुनौती सही डेटा को ट्रैक करना होगा वहीं चौवालीस प्रतिशत  सेवा प्रदाताओं को लगता हैं कि  उन्हे अपने व्यसाययिक  लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये अपनी लागत को को पांच  प्रतिशत से पच्चीस प्रतिशत तक बढ़ाना पड़ सकता है | हालांकि उपभोक्ताओं  की निजता के लिये यह  कोई बहुत बड़ी राहत नहीं है क्योंकि अधिकतर सेवा प्रदाता अब एप का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं| जिससे उन्हे ज्यादा सटीक और ज्यादा  व्यक्तिगत सूचनाएं प्राप्त होंगी | दुनिया भर के देश गोपनीयता कानून अब कुकी प्रयोग और उस पर सहमति संबंधी प्रावधान जोड़ रहे हैं ताकि बिना सहमति के सूचनाएं साझा न हो और गोपनीयता बरकरार रहे | गूगल का ये प्रयास निजी सूचना आधारित व्ययसायों पर न केवल दूरगामी प्रभाव डालेगा बल्कि ऑनलाईन विज्ञापन के नये नए तरीकों को भी जन्म देगा |

अमर उजाला में 17/01/2024 को प्रकाशित 

Wednesday, January 10, 2024

सोशल मीडिया पर आते तो हैं,कुछ कहते नहीं

 साल 2010 में जो सोशल मीडिया आशाओं का अग्रदूत बन कर उभर रहा था वो साल 2020 तक आते –आते फेक न्यूज और लोगों की राजनीतिक विचारों को प्रभावित करने जैसे आरोपों का शिकार  हो चुका था | सोशल मीडिया की आंधी आये हुए महज दस साल में ही लोग अपनी राय पोस्ट करने में अब कम लोग ही सक्रिय हैं|पोस्ट करने से आशय टेक्स्ट इमेज फॉर्म में अपने आपको व्यक्त करने से है |सोशल  मीडिया पर रोज  बहुत सारे लोग लॉग इन करते हैं, पर  वास्तव में बहुत कम लोग ही पोस्ट कर रहे हैं।
हम  प्रतिदिन लगभग दो घंटे इंस्टाग्राम फेसबुक या ट्विटर  पर स्क्रॉल करते हुए समय बिताते हैं, लेकिन उनके मुख्य फ़ीड पर उनकी आखिरी पोस्ट एक साल पहले की थी। कभी कभी लोग सोशल मीडिया स्टोरीज जरुर शेयर करते हैं ,जो चौबीस  घंटों के बाद गायब हो जाती हैं। सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल ने लोगों को अब यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अब जीवन में और अधिक झगड़े जोड़ने की जरूरत नहीं है और लोगों को इस बात पर झगड़ने की ज़रूरत नहीं है कि मैंने किसे वोट दिया या मैं क्या सोचता हूँ।अब वह वह आमने-सामने और समूह चैट को प्राथमिकता देता है—जिसे अब  "निजी नेटवर्किंग" कहा जा रहा है। उपयोगकर्ताओं के सर्वेक्षण और डेटा-एनालिटिक्स फर्मों के शोध के अनुसार, अरबों लोग मासिक रूप से सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, लेकिन सोशल मीडिया उपयोगकर्ता कम पोस्ट कर रहे हैं और अधिक निष्क्रिय अनुभव का आनंद  ले रहे हैं।इसे दुसरे शब्दों में यूँ समझा जा सकता है कि ऐसा नहीं है लोगों का सोशल मीडिया से मोह  भंग हो रहा है वे अभी भी लोगों की सोशल मीडिया फीड देखने या राष्ट्रीय समय पास करना बन चुका शगल ,रील देखने में समय बिता रहे हैं पर वे अब अपनी राय रखने में उतने सक्रिय नहीं रहे हैं |डेटा-इंटेलिजेंस कंपनी मॉर्निंग कंसल्ट की अक्टूबर रिपोर्ट में,सोशल-मीडिया अकाउंट वाले 61 प्रतिशत अमेरिकी वयस्क उत्तरदाताओं ने कहा कि वे जो पोस्ट करते हैं उसके बारे में वे अधिक चयनात्मक हो गए हैं यनि अब लोग क्या पोस्ट करना है उसके बारे में सोचने लग गए है ।
भारत भी अपवाद नहीं है|भले ही अपने विशाल सोशल मीडिया यूजर बेस के कारण यहाँ ऐसा नहीं दिखता पर अब लोग सोशल मीडिया पर कम पोस्ट शेयर कर रहे हैं | इसके कई कारण हैं इस शोध के हिसाब से लोग ये मानने लगे हैं  कि वे जो सामग्री देखते हैं उसे नियंत्रित नहीं कर सकते। वेअपने जीवन को ऑनलाइन साझा करने को लेकर अधिक सुरक्षात्मक हो गए हैं और अब उन्हें अपनी निजता की भी चिंता होने लग गयी हैं ।सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स की बढ़ती संख्या के कारण लोगों का मजा किरकिरा भी हुआ है |सारे मेटा प्लेटफोर्म  (इन्स्टाग्राम और फेसबुक )में यह गुप्त प्रवृत्ति जिसमें टिकटोक और एक्स(ट्विटर ) इन सभी के व्यवसाय के लिए ख़तरा है। उपयोगकर्ताओं के ज्यादा से  ज्यादा शेयर करने के कारण वे दुनिया की सबसे शक्तिशाली कंपनियों और प्लेटफार्मों में से बन गए हैं।मजेदार तथ्य यह है कि इनमें से कोई भी कम्पनी  कोई उत्पाद नहीं बनाती है,फिर भी ये  नई कम्पनियां दुनिया की बड़ी और लाभकारी कम्पनियां बन गयीं है|
 सिर्फ यूजर जेनरेटेड कंटेंट जाहिर है लोगों की कहने की आदत के कारण|भारत अभी अमेरिका जैसी गंभीर स्थिति में नहीं है पर यह साफ़ तौर पर अब देखा जा सकता है कि लोग अपनी निजता और सब कुछ सोशल मीडिया पर डालने की मानसिकता से किनारा  कर रहे हैं |इसका एक बड़ा कारण सोशल मीडिया अकाउंट का उपयोग मार्केटिंग और ब्रांडिग के लिए किया जाना इसके अलावा मीडिया लिट्रेसी का प्रचार प्रसार भी है | वैसे  भी सोशल मीडिया पर आते ही उपभोक्ता डाटा में तब्दील हो जाता है| फिर उस डाटा ने और डाटा ने पैदा करना शुरू कर दिया |इस तरह देश में हर सेकेण्ड असंख्य मात्रा में डाटा जेनरेट हो रहा है पर उसका बड़ा फायदा इंटरनेट के व्यवसाय में लगी कम्पनियों को हो रहा है | यूजर जेनरेटेड कंटेंट से चलने वाली इन कम्पनियों की कमाई का बड़ा फायदा उपभोक्ताओं को नहीं होता |
आधिकारिक तौर पर सोशल मीडिया से भारत मे  कितने रोजगार पैदा हुए इसका विशेष उल्लेख नही मिलता क्योंकि ये सारी कम्पनियां इन से सम्बन्धित आंकड़े सार्वजनिक रूप से नहीं जारी करतीं । साथ ही प्रत्यक्ष रोजगार के काफी कम होने का संकेत इन कम्पनीज के एम्प्लाइज की कम संख्या से प्रमाणित होता  है । ऐसा भी नहीं कि ये सोशल मीडिया कंपनियां इस तथ्य से अनजान हैं |अब वे सोशल मीडिया के उपभोक्ताओं को ज्यादा पर्सनलाइज्ड अनुभव देने की ओर अग्रसर हैं |वे मैसेजिंग जैसे अधिक निजी उपयोगकर्ता अनुभवों में निवेश कर रहे हैं और बातचीत को अधिक सुरक्षित बना रहे हैं। जिसमें  लोगों को अधिक अंतरंग साथियों के लिए पोस्ट करने के लिए प्रोत्साहित करना भी शामिल है  - जैसा कि इंस्टाग्राम के हाल ही में जारी किये गए  क्लोज फ्रेंड्स फीचर के साथ हुआ है।इन सबके बावजूद सोशल मीडिया से लोगों की बढ़ती अरुचि किसी नए माध्यम के विकास का बहाना बनेगी या नए यूजर  की बढ़ती संख्या इस प्रक्रिया को चलायमान रखेगी यह देखना दिलचस्प होगा |

 नवभारत टाईम्स में 10/01/2024 को प्रकाशित लेख 

Tuesday, January 9, 2024

मनी और मोबाईल जिन्दगी नहीं


 पैसों का समाज से  गहरा रिश्ता रहा है. आज जिसके पास पैसा है वो और ज्यादा पाना चाहता है. जिसके पास नहीं है. वो भी पैसा पाना चाहता है.मतलब पैसा जिसके पास है दुनिया उसकी दास है . पैसे की माया अपरम्पार है.पैसा सर चढ़ कर बोलता है. ग्लोबलाईजेशन  के इस दौर में हर आदमी पैसा कमाने के किसी मौके को चूकना नहीं चाहता है .पैसा इंसान की एक जरूरत है लेकिन आज के इस दौर में ऐसा लगता है कि पैसा इंसान की एक मात्र जरुरत है.पैसे पाने की चाह में कहीं छूटती जा रही है रिश्तों की गरमी और अपनेपन का एहसास. सब कुछ मशीनी होता जा रहा है. कोई बीमार है देखने जाने की बजाय कुछ कम पैसे खर्च करके व्हाट्स एप  भेज दीजिये गेट वेल सून. काम हो गया. शुभकामना संदेश भेजना हो तो ई मेल कर दीजिये. और कुछ जयादा पैसे हों तो तरह तरह के ई-कार्ड तो मौजूद हैं. मतलब सारा खेल पैसे का ही है. सही ही कहा गया है सफलता अपनी कीमत मांगती है. अगर आगे बढ़ना है तो समय के साथ तो दौड़ना ही पढेगा नहीं तो हम पीछे छूट जायेंगे.तो परवाह किसे है रिश्तों की गर्मी और अपनेपन के एहसास की. 

अब किसे याद आती है गरमी की उन रातों की जब पूरा  घर छत पर सोता था. कूलर और एसी के बगैर भी वो रातें कितनी ठंडी होती थीं. या फिर जाडे की नर्म दोपहर में धूप सेंकते हुए सुख दुःख बांटना और वो नर्म धूप किसी हीटर के बगैर भी कितनी गरमी देती थी. वो छत पर बैठकर यूँ ही तारों को देखना .विकास तो खूब हुआ है. समय और स्थान की दूरियां घटी है. इन सब के बावजूद दिलों में दूरियां बढ़ी है. एक दूसरे पर अविश्वास बढ़ा है पैसा तो खूब है ,चैन नहीं है . होली या दीपावली की तैयारी महीनों पहले से होती थी. चिप्स या पापड़ बनाने का मामला हो या पटाखे की खरीददारी कोई बनावट नहीं थी लेकिन आज तो “पैसा फैंको तमाशा देखो” (फिल्म :दुश्मन ) सब कुछ रेडी मेड है. चिप्स पापड़ से लेकर चोकलेट में तब्दील होती हुई मिठाइयों तक , लेकिन रिश्ते न तो रेडी मेड होते हैं और न ही बाज़ार में मिलते हैं. रिश्ते तो बनते हैं प्यार की उर्जा ,त्याग समर्पण और अपनेपन के एहसास से. रिश्ते तो ही मकान को घर बनते हैं. 

आज मकान तो खूब बन रहे हैं लेकिन घर गायब होते जा रहे हैं. त्यौहार मनाने के लिए अब साल भर इंतज़ार करने की जरुरत नहीं जेब में पैसा हो तो हर दिन दसहरा है और रात दिवाली है. लेकिन मनी मस्ती और मोबाइल ही जिन्दगी नहीं है आज पैसा पॉवर का पर्यायवाची बन गया है . पैसे को जीवन का एक मात्र मिशन बनाना मनुष्य के मन की संवेदनाओं को मार सकता है .ये समय की मांग है या किसी भी कीमत पर सफल होने की चाह ? तो रिश्तों को कारपोरेट करण होने से बचाइए और चलिए आज यूँ करें की किसी पुराने रिश्ते को जिन्दा किया जाए किसी परिचित दोस्त या रिश्तेदार के घर बगैर किसी काम के चला जाए और देखा जाए कि बगैर पैसे के भी दुनिया में काफी जुटाया जा सकता है .

प्रभात खबर में 09/01/2024 को प्रकाशित 

Monday, January 1, 2024

वर्चुअल प्रारूप का बढ़ता दखल

 नए वर्ष के आगमन के साथ शुभकामनाओं के आदान में अब डिजीटल दुनिया की बड़ी भूमिका हो चली है |कागज के बने ग्रीटिंग कार्ड बीते वक्त की बात हो चली है |असल में हम एक डिजिटल दुनिया  में जी रहे हैं जहां हमारी वर्चुअल पहचान असली पहचान से ज्यादा महत्वपूर्ण है। जो हमारे जीवन को नियंत्रित करने लगा है। सिर्फ बाहरी ही नहीं, हमारा आंतरिक जीवन भी इसी से संचालित हो रहा है। हमारी सोच, हमारा मनोविज्ञान भी इसी के अनुरूप ढल गया है।इंटरनेट ने शुभकामनाओं के इस प्रचलन  को एक जन संपर्क प्रक्रिया में तब्दील कर दिया है जहाँ सब कुछ मशीनी है |इसका परिणाम  ‘डिजिटल इगो’ और ‘ई डाउट’ जैसी अवधारणाएं के रूप में हमारे सामने  हैं।कोरिया एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के सहायक प्रफेसर जैकब वैन कॉक्सविज ने अपनी किताब ‘डिजिटल इगो : वर्चुअल आइडेंटिटी के सामाजिक और कानूनी पहलू’ में इसको पारिभाषित करते हुए लिखा है कि वर्चुअल पहचान किसी इंसान की महज ऑनलाइन पहचान नहीं है, बल्कि यह एक नई तकनीकी और सामाजिक घटना है।हमारी दुनिया में डिजिटल इगो पनपता कैसे है? दरअसल लोगों की वर्चुअल स्पेस पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया के जरिए ही हम संबंधों को आंकने लगे हैं। जब हम किसी को या कोई हमें इस मंच पर नकारता है तो वहीं से इस डिजिटल इगो का जन्म होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल नेटवर्क पर अस्वीकृति आमने-सामने के टकराव से भी बदतर हो सकती है| क्योंकि लोग आमतौर पर ऑनलाइन होने की तुलना में आमने-सामने होने पर ज्यादा विनम्र होते हैं।हम कोई स्टेटस किसी सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर डालते हैं और देखते हैं कि अचानक उसमें कुछ ऐसे लोग स्टेटस के सही मंतव्य को समझे बगैर टिप्पणियां करने लगते हैं, जिनसे हमारी किसी तरह की कोई जान-पहचान नहीं होती।

 यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया होती है जिसमें इगो का एक महत्वपूर्ण स्थान होता है। यह स्थिति घातक भी हो सकती है।डिजिटल इगो को पहचान पाना आसान नहीं है। हम आसानी से नहीं समझ सकते कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर दिखने वाली अवहेलना क्या वास्तविक है, या इसके पीछे और कोई और वजह छिपी है? इसे हम यहां परत दर परत समझने की कोशिश करते हैं।मान लीजिए, मैंने अपने एक मित्र को फेसबुक पर मैसेज किया। मुझे दिख रहा है कि वो मैसेज देखा जा चुका है। लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं आ रहा है। तो मैं यह मान लेता हूं कि मेरा वह मित्र मुझे नजरंदाज कर रहा है। जबकि हकीकत में ऐसा नहीं भी हो सकता है। मुमकिन है कि उसके पास जवाब देने का वक्त न हो। या फिर उसका अकाउंट कोई और ऑपरेट कर रहा हो। बिना इन बिंदुओं पर विचार किए मेरा किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना अनुचित है।ऑनलाइन प्लैटफॉर्म पर हमारे चेहरे के भाव नहीं दिखते, आवाज का कोई लहजा नहीं होता। ऐसे में किसी किसी ई-मेल की गलत व्याख्या हो जाना स्वाभाविक है। इसलिए यहां किसी से भी जुड़ते समय शब्दों के चुनाव में और भाव-भंगिमाओं के संकेत देने में बहुत स्पष्ट रहना चाहिए। ई-डाउट की शुरुआत यहीं से होती है। यानी ऐसा शक जो हमारी वर्चुअल गतिविधियों से पैदा होता है और जिसका हमारे वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं होता। यही चीज हमें मशीन से अलग करती है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की तकनीक पूरी तरह से मशीन पर निर्भर है। एक बार जो कमांड दे दिया गया, उसी के अनुरूप हर स्थिति की व्याख्या की जाएगी। अब जब यह दुनिया इसी तकनीक पर चलने वाली है तो समय आ गया है कि हम मानव व्यवहार की हर स्थिति की पुनर्व्याख्या करें।

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस हमें मानव स्वभाव का और गहराई से अध्ययन करने के लिए प्रेरित करती है। हमारा इगो डिजिटल युग को पसंद करता है क्योंकि यह व्यक्तिवाद को बढ़ावा देता है, जिसमें शामिल है- ‘आई’, ‘मी’ और ‘माई’। सेलफोन का नाम क्या है- ‘आई-फोन’।यानी सामूहिकता की कहीं कोई जगह नहीं है। शायद इसीलिए लोग ज्यादा से ज्यादा लाइक्स, शेयर और दोस्त वर्चुअल दुनिया में पाना चाहते हैं। यह एक और संकट को जन्म दे रहा है जिससे लोग अपने वर्तमान का लुत्फ न उठाकर अपने अतीत और भविष्य के बीच झूलते रहते हैं। अपनी पसंदीदा धुन के साथ हम मानसिक रूप से अपनी वर्तमान स्थिति को छोड़ सकते हैं और अपने अस्तित्व को अलग डिजिटल वास्तविकता में परिवर्तित कर सकते हैं।वैसे भी इगो के लिए वर्तमान के कोई मायने नहीं होते। डिजिटल इगो से ग्रस्त मन अतीत के लिए तरसता है, क्योंकि यह आपको परिभाषित करता है। ऐसे ही इगो अपनी किसी आपूर्ति के लिए भविष्य की तलाश में रहता है। 


कुल मिलाकर हमारे डिजिटल उपकरण वर्तमान से बचने का बहाना देते हैं।फेसबुक जैसी तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स की सफलता के पीछे हमारे दिमाग की यही प्रवृत्ति जिम्मेदार है। जब हम कहीं घूमने जाते हैं तो प्राकृतिक दृश्यों की सुंदरता निहारने के बजाय तस्वीरें खींचने-खिंचाने में ज्यादा मशगूल हो जाते हैं और अपने वर्तमान को पीछे छोड़कर भविष्य में उस फोटो के ऊपर आने 
वाले कमेंट्स और लाइक्स के बारे में सोचने लग जाते हैं।डिजिटल इगो जब हमारे रोजमर्रा का हिस्सा हो जाएगा तब हम पूरी तरह वर्चुअल हो चुके होंगे। स्मार्टफोन कल्चर आने से आज परिवार में संवाद बहुत कम हो रहा है। तकनीकी विकास से हम पूरी दुनिया से तो जुड़े हैं लेकिन पड़ोस की खबर नहीं रख रहे। हमारा सामाजिक दायरा तेजी से सिमट रहा है और आपसी संबंध जिस तेजी से बन रहे हैं उसी तेजी से टूट भी रहे हैं। हमारी पूरी दुनिया वर्चुअल होती जा रही है। ऐसे में हमें मानव स्वभाव का पूरा अध्ययन करके डिजिटल इगो का निवारण करना पड़ेगा ताकि डिजिटल संचार के सर्वोपरि हो जाने पर हम संदेशों की गलत व्याख्या करने से बच सकें।

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 01/01/2023 को प्रकाशित 

Thursday, December 28, 2023

सर्वाधिक फीचर फोन यहीं बिकते हैं

भारत सचमुच विचित्रताओं का देश है। जहां पूरी दुनिया में स्मार्टफोन की मांग लगातार बढ़ रही है, वहीं भारत में फीचर फोन अब भी लोगों की पहली पसंद हैं। वह उन भारतीय ग्राहकों को लुभा रहे हैं , जो महंगे स्मार्टफोन नहीं खरीद सकते। सिंगापुर, ताईवान व ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने जहां 2-जी नेटवर्क को अलविदा कह दिया है, वहीं भारत में 2-जी नेटवर्क के सहारे साधारण फीचर फोन कम कीमत, ज्यादा बैटरी लाइफ, संगीत सुनने की सुविधा व बेसिक इंटरनेट सेवा के साथ भारत में लोगों को ऑनलाइन जोड़ रहा है।फीचर फोन से तात्पर्य उन मोबाइल फोन से है, जिनका प्रयोग वॉयस कॉलिंग और टेक्स्ट मैसेज के लिए किया जाता है। इसके अलावा इनमें बेसिक मल्टीमीडिया सुविधा होती है, जिससे ऑडियो-वीडियो सुविधाओं का आनंद उठाया जा सकता है।ये बहुत कम कीमत में उपलब्ध हैं। वहीं पर स्मार्टफोन इंटरनेट आधारित हैं,जो बात करने के अलावा इंटरनेट की दुनिया में एप सुविधाओं के साथ असीमित विकल्प देते हैं। ये फीचर फोन के मुकाबले महंगे होते हैं और इनकी परिचालन कीमत भी महंगी होती है। ये टच स्क्रीन सुविधा पर चलते हैं। 

वैसे भी, शहरों में देखा गया है कि आजकल लोग दो फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं- साधारण फीचर फोन बात करने के लिए और इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए स्मार्टफोन। आंकड़ों की रोशनी में यह तथ्य ज्यादा स्पष्ट तस्वीर पेश करता है। स्टेटिस्टा की एक रिपोर्ट के अनुसार 2023 में, भारत में फ़ीचर फ़ोन बाज़ार से उत्पन्न राजस्व आश्चर्यजनक रूप से 2.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर होगा। दुनिया भर के अन्य देशों की तुलना में, भारत 2023 में 2.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर के साथ इस बाजार में राजस्व सृजन के मामले में सबसे आगे है |2028 तक देखते हुए, फ़ीचर फ़ोन बाज़ार की मात्रा 37.6 मिलियन पीस यूनिट तक पहुंचने का अनुमान है।साइबरमीडिया रिसर्च (सीएमआर) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के फीचर फोन बाजार में 2023 की दूसरी तिमाही में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। कुल फीचर फोन बाजार शिपमेंट में 9% साल-दर-साल (YoY) वृद्धि दर्ज की गई।रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि 2जी फीचर फोन शिपमेंट की वृद्धि स्थिर रही, जबकि 4जी फीचर फोन शिपमेंट में तेज वृद्धि देखी गई। रिपोर्ट के अनुसार, 4जी फीचर फोन शिपमेंट में सालाना आधार पर 108% की महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की गई। एंड्रॉइड फोन की बढ़ती लोकप्रियता के बीच फीचर फोन की प्रासंगिकता के बने रहने  का बड़ा कारण भारतीय परिस्थितियों में इनका एक औसत भारतीय के लिए सस्ता होना, दूसरा बिजली की कम उपलब्धता और स्मार्टफोन की बैटरी का जल्दी से खर्च होना है, जिससे उनको बार-बार चार्ज करना पड़ता है। वहीं फीचर फोन की बैटरी एक बार चार्ज करने के बाद लंबे समय तक चलती है।फीचर फोन पुश बटन पर चलते हैं, जिसको चलाने के लिए किसी तरह की विशेषज्ञता की जरूरत नहीं होती है।
 यहां फोन का मतलब बातें करना और मैसेज भेजना भर है। अशिक्षा की वजह से इंटरनेट की बेसिक सुविधाओं का भी इस्तेमाल नहीं किया जाता। भारतीय परिस्थितयों में जहाँ फोन को सम्हालना भी एक बड़ा काम है |फीचर फोन चाहे गिर ही क्यों न जाए या फिर इसके पीछे का ढक्कन ही क्यों न खुल जाए, यह फोन बेहद ही टिकाऊ  होते हैं। एक बार फीचर फोन खरीदने के बाद कोई भी इसे 5 से 6 साल तक आसानी से चला सकते हैं।दूसरा बड़ा कारण फीचर फोन की मांग ग्रामीण इलाकों में ज्यादा है जहाँ मनोरंजन के साधन के रूप में सिर्फ इंटरनेट का इस्तेमाल अभी भी एक महंगा विकल्प है वहां पुराने जमाने के मोबाईल गेम्स को खेलना सीखना और सिखाना दोनों आसान हैं |
नोकिया  के स्नेक गेम तो कौन ही भूल सकता है। फीचर फोन्स में कई ऐसे गेम्स आते हैं जिनको  आज भी खेलना काफी मनोरंजक होता होता है। इसके अलावा बगैर इंटरनेट के भी ऍफ़ एम् सुनने का विकल्प उपलब्ध होना इसकी लोकप्रियता का लगातार बने रहने का एक बड़ा कारण है |भले ही दुनिया आजकल पोडकास्ट की दीवानी हो रही हो पर यह शहरी प्रवृत्ति है और भारत गाँवों में बसता है |जहाँ अभी भी मनोरंजन के लोगों की निर्भरता रेडियो पर ज्यादा है |फीचर फोन के हैक किये जाने का खतरा कम होता है |फीचर फोन किसी की निजता की रक्षा ज्यादा बेहतर ढंग से करते हैं |लेकिन तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि स्मार्टफोन लगातार बढ़त बनाये हुए हैं जैसे जैसे विकास का फल समावेशी रूप से भारत के हर हिस्से में पहुंचेगा वहां स्मार्टफोन भी पहुँच जायेंगे |लेकिन फिलहाल भारतीय स्थितयों में फीचर फोन अभी लम्बे समय तक प्रासंगिक बने रहने वाले हैं |
अमर उजाला में 28/12/2023 को प्रकाशित 


Thursday, November 30, 2023

 

आजकल महेंद्र सिंह धोनी एक विज्ञापन के अंत में बोलते है “मत बोल”.इंटरनेट के आगमन और सोशल  मीडिया के उदय ने जहाँ आम इंसान को अपनी बात रखने का मौक़ा दिया.वहीं बहुत सी चुनौतियां भी दी हैं.औपचारिक और अनौपचारिकता के बीच का भेद मिटा है .बात जब हम दोस्तों से करते हैं तो उसका लहजा अलग होता है पर वही बात जब हम सार्वजनिक मंच पर करते हैं तो उसको कहने का तरीका अलग.सोशल मीडिया पर सब ही दोस्त होते हुए भी दोस्त नहीं होते हैं. ये बात अभी हमें सीखनी है.नतीजा हर बात पर हर कोई अपनी राय दे रहा है चाहे उसकी जरुरत हो या न हो.यही से शुरू होता है ट्रोलिंग संस्कृति का निर्माण.

अभी अब्दुल रज्जाक की ऐश्वर्या राय पर  की गई टिप्पणी पर मुझे कुछ नही कहना है. पर जब इस तरह की बातें होती है तो हम भूल जाते है कि “बोली एक अमोल है जो कोई बोले जानु लिए तराजू तौल के तब मुख बाहर आन”. कबीर दास जी का यह दोहा कई सौ साल बीतने के  बाद भी प्रासंगिक बना हुआ है.

हम कितने भाग्यशाली  है कि हमें बोलने के लिए ‘जबान’ मिली और सुनने के लिए ‘कान’.मेरे शहर लखनऊ के एक मॉल में  रेस्टोरेंट है. जहां ज्यादातर वेटर मूक बधिर है.वे बड़े प्यार से आपको भोजन कराते हैं.अपनी इशारों की भाषा में वे सबके साथ सहज होते हैं.जब आप उनके बीच में होते है तब आपको समझ आता है कि हम कितने खुशनसीब है. कुछ भी कहने के लिए आपको सिर्फ जबान हिलानी है.आपको अपनी बात समझाने के लिए मेहनत नही करनी है.जरा सोचिये मूक बधिरों को अपनी बात कहने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है.यही बात उन्हें  जिम्मेदार बनाती है.वे शब्दों का महत्व जानते हैं. उनकी इशारों की भाषा में कुछ भी निजी नही होता है . सब कुछ सार्वजनिक और शायद इसीलिए वो हमसे ज्यादा जिम्मेदार होते है. हम कोई स्टेट्स किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डालते हैं और देखते हैं कि अचानक उसमें कुछ ऐसे लोग स्टेट्स के सही मंतव्य को समझे बगैर टिप्पणियाँ करने लगते हैं जिनसे हमारी किसी तरह की कोई जान पहचान नहीं होती .यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया होती है जिसमें ईगो का एक महत्वपूर्ण स्थान होता है  . हमारा ईगो, डिजिटल युग को पसंद क्यों करता है क्योंकि यह व्यक्तिवाद को बढ़ावा देता है जिसमें शामिल है ‘आई’’ ‘मी’ और “माई” “आई-फोन”. जिसमें सामूहिकता की कहीं कोई जगह नहीं है और शायद इसलिए लोगों ज्यादा से ज्यादा लाईक्स,शेयर और दोस्त वर्चुअल दुनिया में पाना चाहते हैं .

ये स्थिति घातक भी  हो सकती है. यह एक और संकट को जन्म दे रहा है जिससे लोग अपने वर्तमान का लुत्फ़ न उठाकर  अपने अतीत और भविष्य के बीच झूलते रहते हैं .अपनी  पसंदीदा धुन के साथ हम मानसिक रूप से अपने वर्तमान स्थिति को छोड़ सकते हैं और अपने अस्तित्व को अलग डिजिटल वास्तविकता में परिवर्तित कर सकते हैं.वैसे भी ईगो के लिए वर्तमान के कोई मायने नहीं होते हैं. ईगो मन अतीत के लिए तरसता है क्योंकि ये आपको परिभाषित करता है. ऐसे ही ईगो अपनी किसी आपूर्ति के लिए भविष्य की तलाश में रहता है. हमारे डिजिटल उपकरण वर्तमान से बचने का बहाना देते हैं और आक्रमकता को बढ़ावा देते हैं .फेसबुक,ट्विटर  जैसी तमाम सोशल नेटवर्किंग साईट्स की सफलता के पीछे हमारे दिमाग की यही प्रव्रत्ति जिम्मेदार है .लोग आमतौर पर ऑनलाइन होने की तुलना में आमने-सामने ज्यादा विनम्र होते हैं।चलते चलते बोलते वक्त जिम्मेदार बनिये वो चाहे वर्चुअल दुनिया हो या रीयल.

प्रभात खबर में 30/11/2023 को प्रकाशित 

Thursday, November 23, 2023

अंगदान में लिंगभेद का मामला

 दुनिया की बड़ी आबादी वाले देशों में से एक भारत में प्रतिवर्ष लगभग 3,00,000 लोग वक़्त पर अंग न मिल पाने के कारण अपनी जान गंवा देते हैं |औसतन  कम से कम 20 व्यक्तियों की रोज़ाना मौत अंगदान की कमी से हो जाती है |लेकिन उम्मीद की एक किरण देश की आधी आबादी से नजर आ रही है |2021 में एक्सपेरिमेंटल एंड क्लिनिकल ट्रांसप्लांटेशन जर्नल में प्रकाशित एक शोध पत्र  में जीवित अंग प्रत्यारोपण के मामले में देश में भारी लैंगिक असमानता पाई गई । आंकड़ों के अनुसार 2019 में अंग प्रत्यारोपण का विश्लेषण किया और पाया कि अस्सी प्रतिशत  जीवित अंग दाता महिलाएं हैं, मुख्य रूप से पत्नी या मां जबकि अस्सी प्रतिशत  प्राप्तकर्ता पुरुष हैं।देश में अंग प्राप्त करने वाली प्रत्येक महिला के मुकाबले चार पुरुषों का अंग प्रत्यारोपण हुआ है| 1995 से 2021 तक के आंकड़ों से पता चलता है कि 36,640 अंग प्रत्यारोपण किए गए, जिनमें से 29,000 से अधिक पुरुषों के लिए और 6,945 महिलाओं के लिए थे| अध्ययन में यह भी पाया गया कि अंग दान करने के लिए अधिकांश महिलाओं का प्राथमिक कारण उन पर परिवार में देखभाल करने वाला होने
और देने वाला होने का सामाजिक-आर्थिक दबाव है और चूंकि ज्यादातर मामलों में पुरुष कमाने वाले होते हैं, इसलिए वे किसी भी सर्जरी से गुजरने से झिझकते हैं| हालांकि अंगदान को लेकर लिंगभेद के दूसरे मोर्चे भी हैं| पुरुषों  के मुक़ाबले महिलायें  ज़्यादा अंगदान क्यों करती हैं, इसकी कई वजहें हो सकती हैं |माना जाता है कि महिलाएं, पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा सम्वेदनशील  होती हैं| उन्हें अपने रिश्तेदारों  से ज़्यादा हमदर्दी होती है|लेकिन इसका बड़ा कारण आर्थिक ही है और यह अंगदान महिलाओं द्वारा किये जाने इसकी बड़ी वजह आर्थिक बताई जाती है| घर में नियमित आमदनी का स्रोत  का उद्गम  पुरुषों से ही होता  है| बीमारी या ट्रांसप्लांट के दौरान, दान देने वाले को अक्सर महीने-दो महीने के लिए घर बैठना पड़ता है| इससे दोहरा आर्थिक नुक़सान होता है| इस परिस्थिति में  अक्सर महिलाओं को ये लगता है कि वे  अंग दान कर के घर को होने वाला आर्थिक नुक़सान को कम कर सकती हैं|

यदि महिलायें आर्थिक रूप से पुरुषों के बराबर होंगी तो यह आंकड़ा बराबरी का हो सकता है पर फिलहाल जीवन के हर क्षेत्र में महिलायें पितृसत्ता के दंश का शिकार होते हुए भी त्याग के ऐसे प्रतिमान गढ़ रही हैं जिसकी कहीं चर्चा नहीं हो रही है |महिलाओं का वित्तीय रूप से आत्म निर्भर न होने के कारण वे खुद भी कई समस्याओं का सामना कर रही होती है|जैसे प्राकृतिक आपदाओं के दौरान पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं को ज्यादा समस्याओं का सामना करना पड़ता  है। वर्ष  2007 में लंदन स्कूल ऑफ इक्नोमिक्स और एसेक्स विश्वविद्यालया के शोधकर्ताओं द्वारा किए १४१ देशों में किए गए गए एक अध्ययन के अनुसार वर्ष १९८१ से लेकर वर्ष २००२ तक हुई प्राकृतिक आपदाओं के दौरान मरने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या से काफी अधिक थी। साथ ही इस शोध में यह तथ्य भी सामने आया कि जैसे-जैसे प्राकृतिक आपदा की विभीषिका बढ़ती गयी वैसे-वैसे पुरुष और महिला मृत्यु-दर के बीच का फासला भी बढ़ता गया। अब इस पुरुषवादी समाज को भी सोचना होगा कि हम आर्थिक रूप से उन्हें स्वावलंबी बनाने में न केवल  मदद करें बल्कि उन्हें  इस बात का एहसास भी कराएं कि समाज की गाड़ी को चलाने के लिए जितनी जरुरत पुरुषों की है उतनी ही महिलाओं की भी |

दैनिक जागरण में 23/11/2023 को प्रकाशित 

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