Friday, June 1, 2012

दिल पे लगेगी तो बात बनेगी

अच्छा कल नो टोबेको डे था हर साल हम इसे मनाते है आप सोच रहे होंगे इससे क्या फायदा टोबेको खाने वाले और स्मोकिंग करने वालों की संख्या तो कम नहीं हुई लेकिन  सोकर उठने के लिए कुछ लोग अलार्म लगते हैं कुछ को जगाना पड़ता है और कुछ अपने आप उठ जाते हैं,पर किसी सोसायटी में अगर लोगों को बार बार जगाना पड़े तो समझ लीजिए कि मामला गडबड है.सत्यमेव जयते ऐसे ही सोते हुए लोगों को जगाने की कोशिस है.सीरिअल के बहाने ही सही देश की एक बड़ी समस्या कन्या भूर्ण हत्या को चर्चा में ला दिया मकसद इतना है कि बात दिल पे लगेगी तो बात बनेगी पर जहां हर प्रोब्लम  से निबटने का एक ही  तरीका हो कि  दिल पे मत ले यार वहां  दिल है कि मानता नहीं क्या किया जाए मामला तो दिल का ही है जो धडकता है भावनाओं में बहता है पर दिल तो आखिर दिल ही है ना और जब मामला दिल का हो तो फैसले दिमाग से ही  लेना चाहिए फिर क्या बस मेरी कलम चल  पडी  क्योंकि मेरा दिल चाहता है कि दुनिया के सबसे बडी युवाओं की आबादी वाले देश में सब नहीं चलता.किसी समाज की सोच एक दिन में न तो बनती है और ना ही बिगड़ती पर बढ़ती  लैंगिक असमानता से ये साफ़ पता चलता है कि हमारे दिमाग में क्या चल रहा है. वैसे बहुत सी बातें हमें स्कूल कोलेज नहीं सिखाते फिर भी हम सीख जाते हैं जैसे गाली देना,गालियाँ वो भी जेंडर स्पेस्फिक,जेंडर सेंट्रिक  तेरी माँ का साकीनाका हमारा परिवेश हमें बहुत कुछ सिखा देता है.डूड टेंसन लेने का नहीं देने का बात को थोडा आसान करता हूँ.अच्छा एक कल्पना कीजिये महिलाओं के बगैर ये दुनिया ओह  मिस्टेक इतना आगे नहीं सोचते है अपने आस पास का एक्साप्म्ल लेते हैं वो कोलेज की कैंटीन हमारा ऑफिस कैसा दिखेगा?ना रंग होंगे ना भाव.इस मेल डोमीनेंट समाज में आजकल हर चीज सिखाई जा रही है पर क्या कोई हमें ये बताता है कि हमें महिलाओं से किस तरह का व्यवहार करना चाहिए.लड़कियों को देखकर सीटी बजा देना या छेड़ना बताता है कि मानसिक तौर पर हम अपोजिट  सेक्स को कितनी इज्जत दे रहे हैं और ऐसे लोग जब पेरेंट्स बनते हैं तो वो लड़कियां नहीं चाहते फिर वही होता है जो हम सब जानते पहले से थे पर दर्द को आवाज़ सत्यमेव जयते ने दी यानि कन्या भूर्ण हत्या और इसका पढ़े लिखे होने  से कोई सीधा सम्बन्ध भी  नहीं है रिसर्च बताती है कि ऐसी हत्याओं में पढ़े लिखे और संपन्न लोग ज्यादा शामिल हैं.मामला सेंटी होने का है लेकिन  अगर आप सिर्फ सेंटी  हो रहे हैं तो अच्छी बात नहीं है.वक्त कुछ करने का है बात सायकी बदलने की है और ये काम यांगिस्तानियों को ही  करना होगा क्योंकि कल आपका है और एक बेहतर कल के लिए आज से ही शुरुआत हो जानी चाहिए पर ध्यान ये भी रहे कि ये महज  फेसबुक पर कमेन्ट लाईक करने जैसी औपचारिकता बन कर ना रह जाए.ये बात हमारे ज़हन में रहे कि प्रोब्लम कितनी सीरियस है.अगर हमारे घर या आस पास ऐसी कोई घटना होती है तो उसका पुरजोर विरोध कीजिये उसके लिए भी ज्यादा परेशान ना होइए अगर आपको लगता है आपकी बात नहीं सुनी जा रही है तो फेसबुक ट्विटर है ना डाल दीजिए पूरी घटना फिर देखिये क्या होता है .जो बीत गयी वो बात गयी दौर बदल रहा  है अब जिम्मेदारी यांगिस्तानियों की है कल के पेरेंट्स यही है जिनके ऊपर समाज की जिम्मेदारी है और इन्हें जगाने के लिए किसी को नहीं आना पड़ेगा ये जगे भी हैं और जागरूक भी और अगर बात इनके दिल पर लग रही है तो समझ लीजिए बात बननी भी शुरू हो गयी आपको क्या लगता है .
आई नेक्स्ट में 01/06/12 को प्रकाशित 

3 comments:

mukulkamedia said...

good article sir

archana chaturvedi said...

सर जी दिल पे लगी हैं तभी तो बात बनी हैं अब वो बात अलग हैं की जिन्होंने अपने घड़ी में सेल ही नहीं लगाये तो उनका अलार्म कहा बजेगा कहने का मतलब उन तबको से हैं जहा टी वी ही नहीं हैं या उनकी पहुच नहीं हैं उनको कोंन जगायेगा ?
" वो बीज जो गंदगियो में पनप रहा हैं खाद पानी के बिना , अगर आगे जा के वो खजूर भी बन गया तो हमारे देश में क्या फर्क पड़ने वाला है " क्योकि हमारे पास तथ्य हैं , आकडे हैं , सबूत हैं और बात हैं पर वो बात अभी तक हमने दिल पे नहीं ली हैं जिस दिन भी हम यांगिस्तानियो ने बात दिल पे ले ली उस दिन से अलार्म लगाने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी । ऐसा मेरा मानना हैं ।

Bhawna Tewari said...

दिल पे लग गयी सर....उम्मीद है बात भी बनेगी

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