Friday, September 12, 2014

कामकाजी महिलाओं की सेहत का सवाल

विकास जब अपने संक्रमण काल में होता तब सामजिक समस्याएं ज्यादा गंभीर होती हैं,कुछ ऐसी परिस्थितियों से भारतीय समाज भी गुजर रहा है |आंकड़े बताते हैं कि समाज के हर क्षेत्र में महिलाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं|उच्च शिक्षा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी रोजगार के अवसरों को बढ़ा रहे हैं|महिलायें कार्यक्षेत्र में पुरुषों के वर्चस्व को तेजी से तोड़ रही हैं|आमतौर पर ऐसी तस्वीर किसी भी समाज के लिए आदर्श मानी जायेगी जहाँ स्त्रियाँ तरक्की कर रही हों पर भारतीय परिस्थितयों में ये स्थिति महिलाओं के लिए स्वास्थ्य संबंधी कई परेशानी पैदा कर रही है|वैश्वीकरण की बयार,शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता ने पूरे देश को प्रभावित किया है|धीरे धीरे ही सही अब इस धारणा को बल मिल रहा है कि कामकाजी महिला घर और भविष्य के लिए बेहतर होगी पर हमारा पितृ सत्तामक सामजिक ढांचा उन्हें घर परिवार के साथ साथ  रोजगार सम्हालने की भी अपेक्षा करता है जिसका नतीजा महिलाओं में बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं  के रूप में सामने आ रहा है|स्वास्थ्य संगठन मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर लिमिटेड द्वारा देश के चार महानगरों दिल्लीकोलकाताबंगलुरु  और मुंबई में रहने वाली महिलाओं के बीच किये गए  इस सर्वेक्षण से पता चलता है कि युवा महिलाओं में डायबिटीज और थायरॉयड जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं| जिसकी  वजह से महिलाओं को थकानकमजोरीमांसपेशियों में खिंचाव और मासिक चक्र में गड़बड़ी जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा  है|रिपोर्ट के अनुसार,चालीस  से साठ साल के बीच की की उम्र वाली महिलाओं में इन दोनों बीमारियों के होने की आशंका बढ़ी है| महतवपूर्ण तथ्य यह भी है कि अब कम उम्र की महिलाएं भी इन बीमारियों की चपेट में आ रही हैंअर्थव्यवस्था में तेजी आने से रोजगार के अवसर बढे जिसके कारण गाँवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा जिसका नतीजा बढ़ते एकल परिवारों के रूप में हमारे सामने आ रहा है|सामजिक रूप से बढ़ते एकल परिवार कोई समस्या की बात नहीं हैं पर संयुक्त परिवारों की तुलना में एकल परिवार में कामकाजी महिलाओं पर काम का बोझ ज्यादा बढ़ा है जिससे महिलाओं को अपने कार्यक्षेत्र और घर दोनों को सम्हालने के लिए पुरुषों से ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है जिससे तनाव बढ़ता है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होती जिससे अन्य बीमरियों के होने की आशंका बढ़ जाती है|अब वो दौर बीत चुका है जब ये माना जाता था कि महिलायें सिर्फ घर का कामकाज देखेंगी अब महिलायें पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर जीवन की हर चुनौतियों का सामना कर रही हैं,उनके काम का दायरा बढ़ा है पर परिवार से जो समर्थन उन्हें मिलना चाहिए,वह नहीं मिल रहा है| जबकि पुरुषों का कार्यक्षेत्र सिर्फ बाहरी कामकाज तक सीमित है|भारत के सम्बन्ध में यह समस्या इसलिए महत्वपूर्ण है जहाँ अभी तक महिलायें घर की चाहरदीवारी में कैद रही हैं पर अब उनको स्व्वीकार्यता  तो मिल रही है पर स्थिति बहुत अच्छी नहीं है|
अभी भी पुरुषों की सहभागिता  घर के रोज के सामान्य कामों में न के बराबर है| विश्व आर्थिक मंच की एक रिपोर्ट के अनुसार लैंगिक समानता सूचकांक में भारत का 135 देशों में  113 वाँ स्थान है| वर्ल्ड इकॉनॉमिक फ़ोरम का सूचकांक दुनिया के देशों की उस क्षमता का आंकलन करता है जिससे यह पता चलता है कि किसी देश ने  पुरुषों और महिलाओं को बराबर संसाधन और अवसर देने के लिए कितना प्रयास किया|ऑर्गनाइज़ेशन फोर इकॉनॉमिक कोऑपरेशन ऐंड डेवलेपमेंट’ (आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन) द्वारा 2011 में किए एक सर्वे में छब्बीस सदस्य देशों और भारतचीन और दक्षिण अफ्रीका जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के अध्ययन से यह पता चलता है कि भारत ,तुर्की और मैक्सिको की महिलाएं पुरुषों के मुकाबले पांच घंटे ज्यादा अवैतनिक श्रम  करती हैं|भारत में अवैतनिक श्रम कार्य के संदर्भ में बड़े  तौर पर लिंग विभेद हैजहां पुरुष प्रत्येक दिन घरेलू कार्यों के लिए एक घंटे से भी कम समय देते हैं| रिपोर्ट के अनुसार  भारतीय पुरुष टेलीविज़न देखनेआराम करनेखानेऔर सोने में ज्यादा  वक्त बिताते हैं| मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर रिपोर्ट के अनुसार नौकरी और घर दोनों सम्हालने वाली अधिकतर महिलायें डायबिटीज और थायरॉयड के अलावा मानसिक अवसादकमर दर्दमोटापे और दिल की बीमारियों से पीड़ित हैं|अधिकतर भारतीय घरों में ये उम्मीद की जाती है कि कामकाजी महिलायें,अपने काम से लौटकर घर के सामान्य काम भी निपटाएं|ऐसे में महिलाओं के ऊपर काम का दोहरा दबाव पड़ता है जबकि पुरुष घर आकर काम की थकान मिटाते हैं वहीं महिलायें फिर काम में लग जाती हैं बस फर्क इतना होता है कि बाहर के काम का आर्थिक भुगतान होता है जबकि घर के काम काज को परम्पराओं ,मर्यादाओं के तहत उसके जीवन का अंग मान लिया जाता है|उल्लेखनीय है कि इस समस्या के और भी कुछ अल्पज्ञात पहलू हैं| घर परिवार मर्यादा नैतिकता और संस्कार की दुहाई के नाम पर महिलाओं को अक्सर घरेलू श्रम के ऐसे चक्र में फंसा दिया जाता है कि वे अपने अस्तित्व से ही कट जाती हैं|
बड़े शहरों में जागरूक माता पिता अपनी लड़कियों की पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं ऐसे में वो लड़कियां शादी से पहले ही कामकाजी हो जाती हैं और घर के दायित्वों में सक्रीय रूप से योगदान नहीं देती पर शादी के बाद स्थिति एकदम से बदल जाती हैं|यहीं पुरुष अगर घर के सामान्य कामों को छोड़कर अपनी पढ़ाई या करियर पर ध्यान दें तो यह आदर्श स्थिति मानी जायेगी क्यूंकि समाज उनसे यही आशा करता है पर महिलाओं के मामले में समाज की सोच दूसरी है ऐसे में भी अगर कोई लडकी पढ़ लिख कर कुछ बन जाती है तो भी उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह घर के कामों में ध्यान देगी और तब समस्याएं शुरू होती हैं|समाज का ढांचा तो बदल रहा है पर मानसिकता नहीं और यही समस्या की जड़ है|मानसिकता में बदलाव समाज के ढांचे में बदलाव की अपेक्षा काफी  धीमा होता है|इसकी कीमत कामकाजी महिलाओं को चुकानी पड़ रही है|कामकाजी महिलाओं को स्वीकार किया जा रहा है पर शर्तों के साथ |इन खतरनाक बीमरियों पर अंकुश लगाने के लिए यह जरुरी है कि परिवार अपनी मानसिकता में बदलाव लायें और पुरुष घर के काम काज को लैंगिक नजरिये से देखना बंद करें|छोटे बच्चे जब घर के सामान्य कामकाज को अपने पिताओं को करते देखेंगे तो उनके अन्दर काम काज के प्रति लैंगिक विभेद नहीं पैदा होगा ऐसे में जरुरी है छोटे बच्चों का समाजीकरण घरेलू काम में लैंगिक बंटवारे के हिसाब से न हो यानि खाना माता जी ही पकायेंगी और पिता जी ही सब्जी लायेंगे| यदि  ऐसा होगा तो आज के बच्चे कल के  एक बेहतर नागरिक नागरिक अभिभावक बनेगे|बीमारियों का इलाज तो दवाओं से हो सकता है पर स्वस्थ मानसिकता का निर्माण जागरूकता और सकारात्मक सोच से ही होगा
राष्ट्रीय सहारा में 12/09/14 को प्रकाशित 

13 comments:

deeps media said...

kya likha h sir aapne..grt sir..
par sir dekhye is samaj ki soch kab badle..

kashika mehrotra said...

Society toh badal rahi hai par aaj bhi logo ki soch nahi badal rahi hai mahilaon ke prati... har field me mahilayen aadmiyon se age hai par tab bhi society ki najar me vo sabse piche hi khadi milti hai... jab tak ye soch nahi badlegi tab tak kuch nahi badal sakta...

Sonali Kanojia said...

In developing India we observe, 'women r independent but men r still dependent on women'.... V shud change our mindset and try to balance our activities as a family so dat women alone cannot handle the pressure of extra work and responsibilities....

avinash vimal said...

lok kalyankari rajya ki sthapna ke kiye manav ko apni soch ko achi soch ke roop me badalna hoga. achi soch hi ek achhe samaj ka nirman karti hai...

akash yadav said...

though RIGHT TO EQUALITY is ar fundamental right bt stil a long way to go to put it in practice ....

aditi verma said...

Yes sir but iss k mntlty badalne me kafi vaqt lgega qk yaha k log chahte h k ldki ghar bhi smbhale aur job k jimmdari b pura kare bina kisi shart or shiqwa shiqayat ke.aditiverma

Anonymous said...

Like you said, Sir, in our society women who work are expected to look after the household as well. I think husbands should share the weight of the household chores along with their wives.

Deepshikha Seymour

beauty said...

yes sir... ek taraf jaha india developement ke stage pe hai wahi logo ki soch towards women abhi bhi pichhe hai... they have a lot of expectation from women in india... but why?? sare kaam women hi kyu kare?? iska answer kewal hm logo ki soch ko badal ke de skte hai.. so we have to change our thinking...
Anjali singh mjmc 1st sem

soumya singh said...

'save girl child' so popular tag line of our country ...but what about those girls and women who are alive but still struggling for there rights.at least there should be equal right regarding health ...
SOUMYA SINGH MJMC 1 SEM

pawan singh said...

jab is disa me hamare desh ke andar kanoon bana ki hamare desh ki ladkiyo ki shadi kam age me karna kanoon apradh hai ...tabhi se hamare desh ke bachhiyo ke mata pita me ladkiyo k prati ek achhi soch aayi aur bachhiyo k sicha k disa me dhyan dene ka kam kiya. SIR yah avasyak tha...

Ashutosh Jaiswal said...

Society mei soch thodi badli hai logo ne mahilaon ko purusho ki tarah kaam karne ki sweekriti toh di hai lekin unhe saath mei kai bandishon ka paalan karna padta hai jaise samay par ghar aana aur fir ghar ke kaam karna ityadi.,, lekin purusho ko poorn swatantrta prapt hai apne decision-making ke liye aise samaj ka balance bigad raha hai aur iska bhaar striyon ko zyada uthana pad raha hai.
Ashutosh Jaiswal
MJMC 1st semester

kusum shastri said...

We live in 21st century but we all very much aware of typical Indian mentality that working ladies have to take care of their families & professional life if she's not capable to handle then she will have to leave her job not family responsibility. Its very pathetic.
Kusum
MJMC 1st sem.

Rachna Rishi said...

The blog has rightly pointed out that society is now increasingly coming to terms with working women. Even though it is no longer a taboo for women to be working but there is no concern for any health issues that are part and parcel of a hectic life. There is no support system for women neither from home or from workplace and the situation needs to change in order to create a healthy society.

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