Saturday, January 9, 2010

सवाल

 


तुम्हारे लिए काफी पीना महज एक क्रिया है

पर मेरे लिए ये विशेषण

जब तुमने बनाई हो

खैर तुम नहीं समझोगी

तुम्हारे लिए सब काम हैं जीवन के

जैसे मैं एक काम हूँ

 दोस्त जैसा कुछ

या फिर काफी सारी अच्छी होती हैं ?

क्योंकि क्रिया, क्रिया होती

जिसमें कारण नहीं ढूंढा जाता

मेरी जिन्दगी के व्याकरण में

वर्तनी की बहुत गलतियाँ है

तो बचा क्या

क्योंकि सारे सवालों का जवाब  

तुम्हारे पास : क्या ....

मैं क्यों हूँ

तुम्हारे जीवन में

 जब सब कॉफ़ी एक जैसी होती है

फिर क्यों रुक जाती हैं कभी -कभी

तुम्हारी उँगलियाँ

मोबाईल से स्क्रोल करते हुए

उस कॉफ़ी को बनाने लिए

एक बात बताओगी

क्या ढूंढती रहती हैं तुम्हारी उँगलियाँ ?

उस मोबाईल में

जहाँ मैं भी झांकना चाहता हूँ

क्योंकि तुम्हारे दिल में

झाँकने के सारे  दरवाजे बंद हैं   

चलो कुछ और बाते करते हैं

जिसमें न कॉफ़ी हो न तुम्हारी बातें

कुछ ज्ञान की

कुछ विज्ञान की

क्योंकि

तुम्हारे लिए काफी पीना महज एक क्रिया है

पर मेरे लिए ये विशेषण

जब तुमने बनाई हो


Saturday, December 12, 2009

आ रहा हूँ मैं

प्रिय पाठकों आप जल्दी ही मेरी अमेरिका यात्रा के संस्मरण से रूबरू होंगे इंतज़ार कीजिये

Saturday, November 21, 2009

Travelling an experience


पिछले दिनों एक वेबसाइट के एक लेख पर नज़र पडी .लेख की शुरुवात कुछ इस तरह थी कि पिछले साल बुकर पुरूस्कार की दौड़ में दो भारतीय अरविन्द अडिग और अमिताव घोष शामिल थे , जिनमें मैदान अरविन्द अडिग के हाथ रहा लेकिन २००८ के लिए साहित्य का सबसे बड़ा पुरूस्कार यानि नोबेल पुरूस्कार फ़्रांसीसी लेखक जॉन मेरी गुस्ताव लाक्लेज़ियो की झोली में गया है.
लाक्लेज़ियो ट्रैवेल लेखक हैं .लेख आगे चलकर दूसरी दिशा में मुड़ जाता है लेकिन मेरा मन मुड़ गया दूसरी ओर मेरे जेहन में अपने बचपन में सुनी गयी वो सारी कहानिया घूमने लगी जो मैंने रजाई में अपने पिताजी के आगोश में दुबक कर या कभी कभी अलाव के गिर्द बैठकर सूनी थी. कभी सिंदबाद दा सेलर, तो कभी गुलिवर तरिवाल्स का कोई घटनाकर्म कभी हातिमताई कुछ न समझ आये तो ऐसे राजकुमार की कहानी जो रानी की तलाश में जंगल जंगल घूम रहा है .
सर्दियां शुरू हो गयीं हर मौसम से सबकी कुछ न कुछ यादें जुडी होती है ऐसा ही कुछ मेरे साथ है सर्दियां मुझे मेरे बचपन की याद बड़ी शिद्दत से कराती हैं आप भी सोच रहे होंगे कि मै आप लोगों पर इतना इमोशनल अत्याचार क्यों कर रहा हूँ मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है मै तो सिर्फ इतना याद दिलाना चाहता हूँ कि जिस टोपिक पर मै आज बात कर रहा हूँ वो हमारी जिन्दगी का कितना अहम् हिस्सा है जिसकी शुरुवात हमारे बचपने से हो जाती है मै बात कर रहा हूँ यात्रा की , सफ़र की, याद कीजिये भले ही बचपने की ज्यादातर कहानियां सफ़र से जुडी हुई रहती थीं आज के बच्चे कहानी सुनने की बजाय कार्टून देख कर सोते हों पर ज्यादातर कार्टून उन्हें यात्रा पर ले जाते हैं यात्राओं के बारे में सोचते हुए राहुल संस्क्रतायानन याद न आयें ऐसा हो सकता है क्या ? ट्रावोल्ग पढ़ते वक्त हमेशा ऐसा लगता है था कि घुमक्कड़ी के बाद इतना शानदार कैसे लिख लेते हैं लोग .लेकिन अब समझ में आने लगा है कि जब हम यातारों को जीना शुरू कर देते हैं तो यात्रा वृतांत अपने आप जी उठते हैं कहते है किसी पल को जीभर कर जी लेने के बाद ही डूब कर लिखा जा सकता है मैंने भी आज सफ़र को जीने की कोशिश की .
यात्राएँ हमारे चिंतन को विस्तार देती हैं आप ने वो गाना जरूर सुना होगा " जिन्दगी एक सफर है सुहाना यहाँ कल क्या हो किसने जाना" यूँ तो देखा जाए तो जिन्दगी का सफ़र है तो सुहाना लेकिन इसके साथ जुडी हुई है अन्सर्तेंतिटी और ऐसा ही होता है जब हम किसी सफ़र पर निकलते हैं ट्रेन कब लेट हो जाए बस कब ख़राब हो जाए वगैरह वगैरह मुश्किलें तों हैं पर क्या मुश्किलों की वजह से हम सफ़र पर निकलना छोड़ देते हैं भाई काम तो करना ही पड़ेगा न सर्दियों में कोहरा कितना भी पड़े डेली पैसेंजर तो वही ट्रेन पकड़ते हैं जिससे वो साल भर जाते हैं कभी छोटी छोटी बातें जिन्दगी का कितना बड़ा सबक दे जाती हैं और हमें पता ही नहीं पड़ता है हर सफ़र हमें नया अनुभव देता है जिस तरह हमारे जीवन का कोई दिन एक जैसा नहीं होता वैसे ही दुनिया का कोई इंसान ये दावा नहीं कर सकता कि उसका रोज का सफ़र एक जैसा होता है कुछ चेहरे जाने पहचाने हो सकते हैं लेकिन सारे नहीं, जिन्दगी भी ऐसी ही है .अब देखिये न सर्दी तो सबको लगती है मेरे पिताजी कहा करते हैं बेटा सर्दी बिस्तर पर ही लगती है बाहर निकलो काम पर चलो सर्दी गायब हो जायेगी मंजिल तभी तक दूर लगती है जब तक हम सफ़र की शुरुवात नहीं करते लेकिन एक बार चल पड़े और चलते रहे तो मंजिल जरूर मिलेगी . अब सफ़र पर निकले हैं तो किसी न किसी साथी की जरुरत पड़ेगी जरुरी नहीं आप साथी के साथ ही सफ़र करें साथी सफ़र में भी बन जाते हैं लेकिन साथी के सेलेक्टिओं मे सावधान रहें गलत साथी आपके सफ़र को पेनफुल बना सकते हैं और वैसा ही जिन्दगी का सफ़र में गलत कोम्पैनिओन आपके लिए प्रॉब्लम ला सकते हैं .आप ध्यान दे रहें न कहते हैं जो सफ़र प्यार से कट जाए वो प्यारा है सफ़र नहीं तो मुश्किलों के बोझ का मारा है सफ़र वाकई सफ़र तो वाकई वही जो हँसते मुस्कराते कटे और तभी सफ़र का मज़ा भी है मेरा तो जिन्दगी का सफ़र जारी है जिन्दगी के इस मोड़ पर आप सबसे मुलाकात अच्छी लगी क्या आप भी जिन्दगी के इस सफ़र में मेरे साथी बनेंगे और आगे से जब भी किसी सफ़र पर निकालिएगा तो ये मत भूलियेगा कि ये जिन्दगी का सफ़र है और हर सफ़र की शुरुवात अकेले ही होती है लेकिन अंत अकेले नहीं होता साथ में कारवां होता है अपनों का अपने अपनों का यात्राएँ चाहे जीवन की हों या किसी दूर देश की या फिर घर से दफ्तर के बीच की ही क्यों न हो .ऐसी ही यात्राओं से कोई लाक्लेज़ियो नोबेल पुरूस्कार ले जाते हैं ओर कोई अपनी मंजिल पर पहुंचकर मुस्कुरा उठता है .सबकी यात्राओं का अपना अलग अलग सुख है .फिलहाल यह लेख लिहने की अपनी यह यात्रा में यहीं ख़तम करता हूँ ओर निकलता हूँ अपनी दूसरी यात्राएँ की ओर
२१ नवम्बर को आई नेक्स्ट में प्रकाशित

Friday, October 23, 2009

लेट'स विश अ लॉट


कभी कभी कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं कि हमारे दिमाग में अब तक फीड हुई परिभाषाएं एकदम नए रूप में सामने आ खडी होती हैं .अक्सर अपने बच्चे से मैं उसकी चॉकलेट की जिद या किसी और चीज़ के लिए जिद करते समय  उसे यही समझाता हूँ कि लालच बुरी बात है .एक  चॉकलेट  ही मिलेगी ज्यादा नहीं . मेरा बेटा शायद मेरे कहे को ज्यादा बड़े अर्थों में गुण रहा था .एक दिन उसने कहा पापा ,आप मुझसे ये क्यों कहते हैं कि लालच बुरी बात है .मुझे ज्यादा नंबर लाने का लालच है , तो क्या यह बुरा है ? मुझे स्पोर्ट्स में ट्राफी जीतने का लालच है, तो क्या यह गलत है ? मुझे लालच है कि मैं आपके साथ ज्यादा वक्त बिताऊं क्या यह गलत है ? बेटा अपनी बात कह चुका था और मैं उलझन में पड़ गया था .अब कहानी में यही थोडा सा ट्विस्ट है हमें बचपन से बताया जाता है कि लालच करना बुरी बात है जितनी चादर है उतना ही पैर पसारना चाहिए ये कहावतें आपने भी सुनी होगीं लेकिन जब हम हैं नए तो अंदाज़ क्यों हो पुराना तो आइये इस लालच के फलसफे को समझने की कोशिश की जाए.
बात थोड़ी पुरानी है एक जंगल में एक आदमी रहता था न पास में कपडा न ही रहने को मकान लेकिन उसके पास एक दिमाग था जो सोचता था समझता था उसने सोचा क्यों न उसके पास रहने को एक ऐसी जगह हो जहाँ उसे बारिश में भीगना न पड़े ठण्ड में ठिठुरना न पड़े और गर्मी भी कम लगे अब आप सोच रहे होंगे कि ये बात उसके दिमाग में आयी कहाँ से अब जंगल में रह रहा था तो जरुर उसने पक्षियों के घोंसले को देखा होगा खैर यहीं से मानव सभ्यता  का इतिहास बदल जाता है. इंसान ने अपने लिए पहले घर बनाया और फिर अपनी जरुरत के हिसाब से चीज़ों का आविष्कार होता गया .बैलगाडी से शुरू हुआ सफ़र हवाई जहाज़ तक पहुँच गया . कबूतर से चिठियों को पहुंचाने की शुरुवात हुई और आज ई मेल का जमाना है .बगल की बंटी की दुकान आज शॉपिंग मॉल्स  में तब्दील हो गयी ,घर के धोबी की जगह कब वाशिंग मशीन आ गयी हमें पता ही नहीं चला .लेकिन इन सब परिवर्तन में एक बात कॉमन है वो है लालच , लालच जीवन को बेहतर बनाने का, लालच जिन्दगी को खूबसूरत बनाने का ,लालच खुशियाँ मनाने का ,लालच आने वाले कल को बेहतर बनाने का. आप भी सोच रहे होंगे कि ये कौन सी उल्टी गंगा बहाई जा रही है लालच अच्छा भी होता है. लालच अगर अच्छा न होता तो हम ज्यादा का इरादा कैसे कर पाते, कैसे और ज्यादा विश करते . जब इरादा है और विश भी तो आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है . सचमुच आज सारी प्रोग्रेस सारी ग्रोथ लालच यानि और ज्यादा पाने की तम्मना से जुडी है थोडा और विश करो का फंडा ही तो हमें आगे ले जता है.लालच अगर अच्छा न होता तो हम ज्यादा का इरादा कैसे कर पाते कैसे और ज्यादा विश करते .अब तो मुझे लगने लगा है कि सारी दुनिया की तरक्की विज्ञानं के नए आविष्कार सब लालच का ही नतीजा हैं. सैचुरेशन पॉइंट से उठाकर आगे ले जाने का काम करता है हमारा लालच . एजुकेशन पीरीयड हो या जॉब टाइम हमारा लालच ही हमें आगे ले जाने को प्रेरित करता है .
अब जबकि लालच के इस पक्ष से सामना हुआ है तो मेरे मन में भी न जाने कैसे कैसे लालच पनपने लगे हैं .लालच इस दुनिया को हिंसा से मुक्त करने का शांति की बात को किताबों और भाषणों से निकाल कर सारी दुनिया में गूंजा देने का .आम आदमी को खास आदमी बना देने का लालच .एजूकेशन , हेल्थ रोजगार जैसी बेसिक चीज़ों को हर किसी के लिए उपलब्ध कराने का लालच वह भी बिना किसी ज्यादा मशक्कत के , करप्शन से मुक्ति का लालच .
अरे अरे मेरे लालच की लिस्ट तो बढ़ती ही जा रही है .यहीं रोकता हूँ इस लिस्ट को .लेकिन इतना जरूर है कि अब मैं अपने बेटे से यह नहीं कहूँगा कि लालच मत करो.बेटा खूब लालच करो और हर लालच के लिए जिद करो .उसे पूरा करो .बस यह लालच आशावादी सोच के साथ हो. तो अब आपका क्या ख्याल है लालच के बारे में .
आई नेक्स्ट में २३ अक्टूबर को प्रकशित

Monday, September 7, 2009

धुन जो साथ चले



कहते है, कभी कभी कोई गीत, सुबह सुबह आप सुन ले तो वो गीत आपके जहन पर पूरा दिन रहता है। हम  सारा दिन वो गीत, गाते गुनगुनाते रहते है। लेकिन उन गीतों का क्या,जिनके बोलों का कोई सीधा अर्थ नहीं निकलता फिर भी वो हमारी जबान पर चढ़ जाते हैं अगर ऐसा नहीं है तो गीतों से होने वाले संचार का कोई मतलब नहीं रहेगा आज गीतों की कहानी में थोडा ट्विस्ट है. वाकई ये गानों की दुनिया एकदम निराली है क्या आपने कभी सुना है कि किसी शब्द का कोई अर्थ न हो फिर भी गानों में उनका इस्तेमाल होता है चकरा गए न. मै कोई पहेली नहीं बुझा रहा हूँ आपने कई ऐसे गाने सुने होंगे जिनके कुछ बोलों का कोई मतलब नहीं होता है लेकिन गानों के लिये बोल जरुरी होते हैं किशोर कुमार की आवाज़ में ये गाना याद करिए “ईना मीना डीका ,डाई डम नीका” किसी शब्द का मतलब समझ में आया ?फिर भी ऐसे गाने जब भी बजते हैं हमारे कदम थिरकने लगते हैं. अब इस तरह के गानों से कम से कम ये तो सबक मिलता है कि इस जिन्दगी में कोई चीज़ बेकार नहीं बस इस्तेमाल करने का तरीका आना चाहिए वैसे भी क्रियेटिविटी का पहला रूल है हर विचार अच्छा होता है और ये हमारे गीतकारों की क्रियेटिविटी ही है कि वो गानों के साथ लगातार प्रयोग करते आये हैं.कभी धुन को शब्दों में ढाल देते हैं और कभी ऐसे शब्दों को गीत में डाल देते हैं कि हम गुनगुना उठते हैं अई ईया सुकू सुकू (फिल्म:जंगली ) ताजातरीन फिल्म कमीने का “ढेन टणेन” धुन को शब्द बनाने का बेहतरीन प्रयास है फ़िल्मी गानों के ग्लोबल होने का कारण शायद गीतकारों की प्रयोगधर्मिता ही है.” इस तरह के गानों के शब्दों का अर्थ भले ही न हो लेकिन ये सन्देश देने में तो सफल रहते ही हैं डांस की मस्ती को "रम्भा हो हो हो"(अरमान ) जैसे गीतों से बेहतर नहीं समझा जा सकता है .राम लखन फिल्म का गाना नायक की अलमस्ती को कुछ ऐसे ही शब्दों में बयां कर रहा है "रम प् पम प् पम ए जी ओ जी करता हूँ जो मैं वो तुम भी करो जी” असल में इस तरह के शब्दों का काम गानों की बोली में भावना को डालना होता है हम हवा को देख नहीं सकते सिर्फ महसूस कर सकते हैं .गीतकार जब भावनाओं को नए तरीके से महसूस कराना चाहता है तो वह इस तरह के शब्दों का सहारा लेता है लेकिन यह काम बगैर संगीतकार के सहयोग  के नहीं हो सकता है .जिन्दगी में भी अगर मेहनत सही दिशा में की जाए तभी सफल होती है और हर काम खुद नहीं करने की कोशिश करनी चाहिए.. अगर आप मेरी बात समझ रहे हैं तो सुनिए ये गाना "डम डम डिगा डिगा मौसम भीगा भीगा".जिन्दगी में कितना कुछ है जो हम महसूस कर सकते हैं लेकिन एक्सप्रेस नहीं कर सकते और इन फीलिंग्स को एक्सप्रेस करने के लिए जब इन अजाब गज़ब से शब्दों का सहारा लेकर कोई गीत रच दिया जाता है तो ये अर्थहीन शब्द भी मीनिंगफुल हो जाते हैं . छई छपा छई छपाक के छई पानीयों पर छींटे उडाती हुई लडकी (हु तु तु) पानी के साथ खेल का इससे सुन्दर बयान क्या हो सकता है .गानों में इस तरह के प्रयोग की शुरुवात जंगली फिल्म से हुई .आप भी अभी तक याहू को नहीं भूले होंगे और ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है .जिन्दगी भी तो कभी एक सी नहीं रहती ,गाने भी हमारी जिन्दगी के साथ बदलते रहे .आज की इस लगातार सिकुड़ती दुनिया में जहाँ एस ऍम एस भाषा के नए व्याकरण को बना रहा है .ऐसे में अगर गाने शब्दों की पारंपरिक दुनिया से निकल कर भावनाओं की दुनिया में पहुँच रहे हैं तो क्यों न गानों की इस बदलती दुनिया का जश्न मनाया जाए क्योंकि ये अजाब गज़ब गाने अब हमारी जिन्दगी का हिस्सा हैं.
आई नेक्स्ट में ७ सितम्बर २००९ को प्रकाशित

Monday, August 17, 2009

नो कन्फयूजन ओनली फ्यूजन



मै एक विज्ञापन  देख रहा था जिसमे घर में काम करने वाली एक महिला अंग्रेजी राइम गा रही और उसे देख कर उसका मालिक आश्चर्य चकित रह जाता है वाकई अंग्रेजी ग्लोबल तो थी ही अब लोकल भी होती जाती रही है शायद आपको समझ नहीं आया अंग्रेजी को अपनी भाषा के साथ जोड़ दीजिये और फिर देखिये लोकल होने का मज़ा हिंगलिश ऐसी ही तो बनी है अंग्रेजी और हिंदी का मिक्सचर ,आज का यांगिस्तानी हिंगलिश प्रेमी है अब यह अच्छा है या बुरा इसका फैसला भाषाकारों पर छोड़ दिया जाए . आप भी सोच रहे होंगे हमेशा गानों की बात करने वाला शख्स आज क्या मुश्किल बात कर रहा है . मै बिलकुल सिंपल बात करूँगा गानों की और फिल्मों की ये तो सिर्फ बैक ग्राउंड तैयार कर रहा था यानि आज बात होगी ऐसे हिंदी गानों की जो अंग्रेजी शब्दवाली रखते हैं.वैसे तो किसी हिंदी फिल्म में पहली बार अंग्रेजी गाना जूली फिल्म मै आया "माय हार्ट इस बीटिंग "लेकिन उसके बहुत पहले १९४७ में शेहनाई फिल्म में इस तरह के प्रयोग की शुरुवात हो चुकी थी जिसका गाना था "आना मेरी जान सन्डे के सन्डे " नमक हलाल फिल्म मे अमिताभ बचचन द्वारा बोली गयी अंग्रेजी को लोग आज भी याद करते हैं इसी कड़ी में "अमर अकबर एंथोनी " फिल्म का गाना माय नेम इस एंथोनी गोंसाल्विस आज भी लोगों को थिरकने पर मजबूर कर देता है. हिंदी फिल्मों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग सत्तर के दशक बाद बढा तब अंग्रेजी भाषा के एक दो शब्द ही प्रयोग  किये जाते लेकिन आज पूरे पूरे वाक्य यूज  किये जा रहे हैं .आई लव यू से शुरू हुआ  यह प्रयोग आज "मूव योउर बॉडी टूनाइट" (जॉनी  गद्दार ) तक पहुँच गया है. हिंदी और अंग्रेजी का ये फ्यूसन सिर्फ गानों तक सीमित नहीं है हिंदी फिल्में अगर आज ग्लोबल हो रही है तो इनके पीछे कहीं न कहीं भाषा का ये फ्यूसन जिम्मेदार  है. ये सिर्फ किस्मत कनेक्शन नहीं है हिंदी गाने इसीलिए खास रहे हैं क्योंकि वे अपने वक्त की भाषा को रिप्रेजेंट  करते हैं. आज हम डेली लाइफ मैं अंग्रेजी का यूज  ज्यादा कर रहे हैं उसका रिफ्लेक्शन  गानों मे भी दिख रहा है. यह भी सच है कि हिंदी के प्रति कोई प्रेम नहीं होने के बावजूद गीत-संगीत के कारण अनेक गैर हिंदी लोगों ने हिंदी सीखी है, तो फिर हम हिंदी भाषी क्यों इस ग्लोबल भाषा को सीखने में पीछे रहें .गानों का ये फ्यूसन नए अवसर लेकर आया है जिन्हें हिंदी आती है वे अंग्रेजी सीखें और जिन्हें अंग्रेजी आती है वे हिंदी सीखें . जरा 'टशन' का वो गाना याद कीजिए, 'वेरी हैप्पी इन माई हार्ट, दिल चांस मारे रे' 'तुम्हरे दिल के थिएटर मा दिल दीवाना बुकिंग एडवांस मांगे रे' तो आपके सामने सारी तस्वीर साफ हो जाएगी. 'आजकल गाने बोलचाल की भाषा में लिखे जाते हैं.अब देखिये न जिस डिस्को की शुरुवात बप्पी दा ने की थी "आई ऍम अ डिस्को डांसर " (डिस्को डांसर ) से की थी वो दौर अब और आगे बढ़ निकला है "इट्स टाइम टू डिस्को " (कल हो न हो ) अब अगर आज का यांगिस्तानी भाषा के इस फ्यूसन का लुत्फ उठा रहा है तो हम यही पूछेंगे न "व्हेयर इस दा पार्टी टू नाईट" (कभी अलविदा न कहना )पर इसका मतलब ये बिलकुल मत निकालिएगा दोस्तों की मैं हिंदी के खिलाफ हूँ किसी भी भाषा का विकास किसी दूसरी भाषा की कीमत पर नहीं होना चाहिए ऐसे में अगर दो भाषाएँ करीब आ रही हैं तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. भाषा एक बहती नदी है इसे बाँधा नहीं जा सकता और भाषा का विकास ऐसे ही होता आया है. सोचिये न हम कितने शब्द ऐसे बोलते हैं जो मूल रूप से हिंदी के नहीं हैं पर अब वो ऐसे अपना लिए गए हैं कि लगता है की वे हिंदी के ही शब्द हैं और यही तो हिंदी का कमाल है हिंदी को आगे बढ़ाने में जितना काम फिल्मों और गानों ने किया है उतना और कोई नहीं कर सकता तो फिर क्यों न हिंदी की सफलता का जश्न मनाया जाए . फिल्मों के सहारे ही सही हिंदी ग्लोबल तो हो रही है. "इट्स राकिंग" (क्या लव स्टोरी है )और फिर हमें ये भी तो नहीं भूलना चाहिए "ईस्ट और वेस्ट इंडिया इस दा बेस्ट" (जुड़वां)
आई नेक्स्ट में १७ अगस्त को प्रकाशित

Wednesday, July 1, 2009

कुछ कहती है ये बूंदें


बारिश शुरू होते ही जो पहली चीज हमारे जेहन में आती है वो लहलहाते हरे भरे खेत ,पानी से भरे तालाब कहीं न कहीं हमारे मन के अन्दर बैठा बच्चा मचल पड़ता है उस गाँव  में जाने को जिसे हम सिर्फ फिल्मों में देखते हैं कंक्रीट  के जंगल में जहाँ वाटर क्रायसिस  अपने चरम पर है , हम अपनी जिन्दगी में इतने उलझ चुके हैं कि  अगल बगल क्या हो रहा है कौन रहता है . शोले फिल्म के संवाद की तरह हमें कुछ नहीं पता ,कुछ भी नहीं पता. गाँव  हम शहर में पले बढे लोगों के लिए अब सिर्फ बचपन की यादों में बचा है. जब गर्मियां की छुट्टियाँ शुरू होते ही दादी बाबा या नाना नानी के यहाँ जाने की तैयारियां शुरू हो जातीथीं.देखा न आपका भी दिल मचल पड़ा गाँव  जाने के लिए गाँव और शहर के इस अंतर को मुन्नवर राणा साहब की ये पंक्तियाँ बखूबी बयां करती हैं
               “तुम्हारे शहर में सब मय्यत को भी कन्धा नहीं देते
                 हमारे गावं में छप्पर भी सब मिलकर उठाते हैं”
अब किया क्या जाये ख़तम होते गाँव और बढ़ते शहरों को देखकर परेशान होया जाये और विकास के पहिये को रोक दिया जाए या  गाँव और शहर के बीच बढ़ते अंतर को पाटा जाए .पर ये होगा कैसे . आजकल ग्लोबल विलेज की बात होती है न की ग्लोबल सिटी या या ग्लोबल टाऊन मशहूर संचार साइंटिस्ट मार्शल मक्लुहान का मानना था कि एक दिन दुनिया संचार के मामले में एक  गाँव  जितनी छोटी हो जायेगी और ऐसा हो भी रहा है इसीलिए  गाँव  में पता खोजना उतना मुश्किल नहीं होता क्योंकि वहां सभी एक दूसरे से परिचित होते हैं.तो इन बरसते बादलों के बीच मेरे मन में कुछ विचार बरस पड़े अगर हम कुछ ऐसा कर पाते कि शहरों में भी  गाँव की खासियतें ले आ पाते तो आम के आम गुठलियों के भी दाम वाली बात हो जाती इसके लिए हमें कुछ खास नहीं करना है बस हमें अपने नज़रिए को थोडा सा बदलना पड़ेगा ज्यादा नहीं अपने आस पास नज़र डालिए हमें पता ही नहीं रहता कि हमारे फ्लैट के बगल में कौन रहता है किसी के पर्सनल  स्पेस में घुसपैठ किये बगैर हम अपने अडोस पड़ोस के बारे में जानकारी रख सकते हैं ज्यादातर आतंकवादी हमले हमारी इस लापरवाही से होते हैं कि हमें पता ही नहीं होता कि हमारे आस पास क्या हो रहा है .हम लोगों के सुख दुःख में शामिल होंगे तो कभी अपने आपको अकेला नहीं पायेंगे भूल गए क्या बहुत साल पहले अरस्तु कह कर गए हैं कि इंसान एक सामजिक प्राणी है .  गावं  इसीलिए अच्छे हैं क्योंकि वो ज्यादातर नेचर पर डिपेंडेंट   हैं पर शहर में हम कुछ ऐसा नहीं कर पाए जब लाइट चली जाती है और ए सी काम करना बंद कर देता है तब हमें हवा की कमी का एहसास होता है अगर ए सी को जरूरत के वक्त ही चलाये जाए तो बिजली भी बचेगी और हम नेचर से भी जुड़े रहेंगे .पेड़ लगाने के लिए जमीन की जरूरत होती है और जमीन ऐसी नहीं है कोई बात नहीं २-४ गमले तो लगाये जा सकते हैं. बारिश का पानी यूँ ही नालियों में बह जाता है और जमीन का वाटर लेवल लो होता जा रहा है अब अगर आपको घर के बाथरूम में ट्यूब वेल के पानी का मज़ा लेना है तो पानी तो बचाना ही पड़ेगा जरा सोचिये अगर हमें शहर में ही  गावं  का मज़ा मिलने लग जाए तो शहर और  गावं  का अंतर मिट जाएगा और विकास का फल सभी को मिलेगा तो सोच क्या रह रहे हैं आइये शहरों और गांवों के बीच इस दूरी को खत्म किया जाए और ग्लोबल विलेज को रियल सेंस में ग्लोबल कर दिया जाए .
आई नेक्स्ट में १ जुलाई को प्रकाशित


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