Sunday, September 26, 2010

इंडिया टुडे का नवीनतम अंक अक्टूबर २०१०


आप सभी का शुक्रिया एवं आभार
उम्मीद है भविष्य में सहयोग का सिलसिला जारी रहेगा .
http://indiatoday.intoday.in/site/Story/113858/Cover%20Story/mukul-srivastava-the-newsmaker.html

Friday, September 24, 2010

खेल खेल में



खेल हमेशा किसी न किसी वजह से चर्चा में रहते हैं वो चाहे कामन वेल्थ गेम्स हों या क्रिकेट वैसे जिंदगी भी तो एक खेल ही है न कभी आप बहुत मेहनत करते हैं पर फिर भी सफलता नहीं मिलती लेकिन जैसे जिंदगी चलती रहती है वैसे जिंदगी का खेल भी , जिंदगी में अगर खेल महतवपूर्ण हैं तो हमारी फ़िल्में भी इनसे कहाँ अछूती हैं बहुत सी फिल्मों की कहानी खेलों के इर्द गिर्द ही घूमती है फैमली ड्रामा के बाद खेल ही एक ऐसा विषय है जिसमें बॉलीवुड ने अपनी प्रयोगधर्मिता को दिखाया है .१९७७ में बनी  शतरंज के खिलाड़ी हालाँकि प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित थी पर शतरंज के बहाने इस फिल्म ने भारत में अंग्रेजों के आने का समय  और नवाबों के रवैये का अच्छा चित्रण किया था , १९८४ में बनी हिप्प हिप्प हुर्रे ने पहली बार फ़ुटबाल के खेल को बड़े परदे पर उतारा .हार और जीत तो हर खेल के साथ जुडी रहती है पर हार के डर से खेल नहीं छोड़ा जाता है इम्पोर्टेंट है खेल को खेलना अगर ये फिलोस्फी हम अपनी लाइफ में उतार लें तो जिंदगी का खेल टेंशन फ्री हो जाएगा .अस्सी के दशक में खेलों पर आधारित अन्य फिल्मों में बोक्सर(१९८४),आल राउंडर(१९८४),कभी अजनबी थे (१९८५)और मालामाल (१९८८)प्रमुख थी .जिसमें बोक्सर को छोडकर सभी की विषय वस्तु क्रिकेट ही थी आपको याद दिलाता चलूँ यही वह दौर था जब भारत ने १९८३ का क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता था और धीरे धीरे क्रिकेट का जादू लोगों के सर चढ़कर बोलने लगा था .असल में खेलों की दुनिया कभी हार न मानने की ह्यूमन  इंस्टिंक्ट को रीप्रेसेंट करती है और यहीं खेल हमारी जिंदगी से जुड जाते हैं .नब्बे का दशक खेलों के लिहाज़ से ज्यादा बेहतरीन नहीं माना जा सकता सिर्फ दो फ़िल्में ऐसी थी जिनका कथानक खेलों से प्रेरित था अव्वल नंबर (१९९२) क्रिकेट , और जो जीता वही वही सिकंदर (१९९२) सायक्लिंग रेस पर आधारित थी .फिर आया २००० का दशक दुनिया और खेल में बहुत कुछ बदल चुका था खेल रात में फ्लड लाईट में खेले जाने लग गए खेलों को इन्तेरेस्तिंग बनाने के लिए उनके नियम में बदलाव हुआ और यही वक्त था जब हमारी जिंदगी के नियमों को  मोबाईल और मल्टीप्लेक्स बदल रहे थे बदलाव के इस दौर में  फिल्मों को भी बदलना था हमजोली फिल्म के जीतेन्द्र और लीना चंदावर्कर   के बेडमिंटन मैच के बाद से अब तक काफी कुछ बदल चुका था .इस दशक में क्रिकेट को ध्यान में रखकर एक के बाद एक फ़िल्में आयें , जिनमे सबसे पहले लगान(२००३) का जिक्र करना जरूरी है ये वो पहली फिल्म थी जिसने पारम्परिक  भारतीय सिनेमा की ताकत का एहसास दुनिया को कराया .लगान के अलावा स्टम्प्ड (२००३),इकबाल (२००५) हैटट्रिक (२००७) से सलाम इंडिया (२००७), दिल बोले हडिप्पा (२००७ ) ऐसी और फ़िल्में थी.
 क्रिकेट पर ज्यादा फ़िल्में बनने का कारण लोगों में इस खेल के प्रति जुनून की हद तक लगाव है ऐसे में चक दे इंडिया एक नया नजरिया ले कर आयी सिनेमा के रूपहले परदे पर जिसका विषय एकदम नया और अनोखा था महिला होकी फिल्म ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किया और लोगों में होकी के प्रति एक नया जोश भरा .ऐसा नहीं है कि फ़िल्में पोपुलर स्पोर्ट्स को ध्यान में रखकरबनाई जाती हैं तीन पत्ती :ताश , तारा रम  पम :रेसिंग , स्ट्राइकर: कैरम  और लाहौर :किक बॉक्सिंग पर आधारित फिल्में  है, जो डायवर्सिटी खेलों  में है वो हमारी फिल्मों में भी दिखती  है पर जैसे खेल को खेल भावना से खेला जाता है उसी तरह से जिंदगी के खेल को भी खेलिए आज अगर आप हारें तो कल जीत भी सकते हैं और अगर आज जीते हैं तो कल हार भी सकते हैं तो क्या कहते हैं इन फिल्मों के खेल के बारे में आप  बताएगा जरुर

  आई नेक्स्ट २४ सितम्बर २०१० 

Sunday, August 22, 2010

मीडिया की दुनिया के गरीब नत्था :हिन्दुस्तान सम्पादकीय (२२/०८/१० )

हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म पीपली लाइव ने धूम मचा रखी है. दर्शकों और आलोचकों का इस फिल्म को समान प्यार मिला है. फिल्म के मूल में भारतीय इलेक्ट्रोनिक मीडिया का फटीचरपन दिखाया गया है. वैसे तो फिल्म में मीडिया के अलावा भी समाज के अन्य पहलुवों  को छुआ गया है. पर पूरा फोकस इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर ही है. फिल्म में आपको इलेक्ट्रोनिक मीडिया के हर रूप के दर्शन हो जायेंगे.हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता के भेद और मीडिया नौटंकी आदि  पर पूरी फिल्म में एक ख़ास बात है फिल्म में एक स्ट्रिंगर राकेश की मौत. राकेश जो कि  एक संवेदनशील पत्रकार था. किसी बड़े मीडिया चैनल में नौकरी पाना उसका सपना था. जिसके बलबूते चैनल के संपादकों ने पूरी खबर में लम्पटई मचाई. सब कुछ ख़तम होने के बाद कोई भी राकेश को याद नहीं रखता और वह नेपथ्य में ही गुम हो जाता है . राकेश सबसे पहले नत्था की आत्महत्या की खबर अपने एक छोटे से अखबार में छापता है जिसको आधार बनाकर एक अंगरेजी समाचार चेनल स्टोरी करता है और फिर सारी दुनिया की मीडिया का जमावड़ा लग जाता है ये स्ट्रिंगर मीडिया की दुनिया के नत्था है ये मीडिया की दुनिया की वो गरीब जनता है जिस से मीडिया का जलाल कायम है किसी  भी समाचार को ब्रेक करने का काम इन्हीं मुफ्फसिल पत्रकारों द्वारा किया जाता है ये ऐसी नींव की ईंट होते हैं जिनकी और किसी का ध्यान नहीं जाता देखने वाला तो बस कंगूरा देखता है आमतौर पर स्ट्रिंगर को ऐसा व्यक्ति माना जाता है जो श्रमजीवी  पत्रकार न होकर आस पास की खबरों की सूचना सम्बंधित समाचारपत्र या चैनल को देता है. बाकि समय वह अपना काम करता है पर समाज के हित से जुडी बड़ी ख़बरें सामने लाने में स्ट्रिंगर की बड़ी भूमिका रही है. मुफ्फसिल पत्रकारों में वो लोग होते हैं जो या तो छोटे समाचार पत्रों में काम करते हैं या भाड़े पर समाचार चैनलों को समाचार कहानी उपलब्ध कराते हैं वो चाहे भूख से होने वाली मौतें हों या किसानों की आत्महत्या की खबर , हर खबर की सबसे पहले खबर इन्हीं को होती है .महानगरों में काम करने वाले पत्रकारों के सामने इनका कोई औचित्य नहीं होता क्योंकि अक्सर इनकी खबरे जमीन से जुडी हुई होती हैं जिन पर पर्याप्त शोध और मेहनत की जरुरत होती है आजकल प्रचलित मुहावरा प्रोफाइल के हिसाब से इनकी खबरें लो प्रोफाइल वाली होती हैं प्रख्यात पत्रकार श्री पी साईनाथ सवालिया लहजे में कहते  ‘पिछले 15 वर्षों में उच्‍च मध्‍यम वर्ग के उपभोग की सभी वस्‍तुएं सस्‍ती हुई हैं। आप एयर टिकटकंप्‍यूटर वगैरह खरीद सकते हैं। ये सब हमें उपलब्‍ध हैं लेकिन इसी दौरान गेंहूंबिजलीपानी आदि गरीबों के लिए 300-500 फीसदी महंगा हो गया है। आखिर ये बातें मीडिया में क्‍यों नहीं आती हैं। भारत शहरों में नहीं गावों में बसता है पर इन गावों को मीडिया ने स्ट्रिंगरों के भरोसे छोड़ दिया गया है देश का सारा प्रबुद्ध मीडिया महानगरों में बसता है कहने का मतलब है कि मीडिया ऐसी बहुत जगहों पर नहीं पहुँच  पा रहा हैजहां पर बहुत सारी रोचक चीजें हो रही हैं।
 यही वजह की कंटेंट के स्तर पर इलेक्ट्रोनिक मीडिया अक्सर वैचारिक शून्यता का शिकार दिखता है और तब शुरू होता नाग नागिन और भूत प्रेतों का खेल ऐसी कहानियों के लिए किसी वैचारिक तैयारी और शोध की जरुरत नहीं पड़ती और न ही स्ट्रिंगर को अलग से कोई निर्देश देने की आवश्यकता टी आर पी की तलाश में गन्दा है पर धंदा की आड़ में ऐसी हरकतों को जायज़ ठहराने की कोशिश की जाती है .भारत में सन २००० का साल इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लिए क्रांति का साल था २४ घंटे वाले समाचार चैनल पूरे देश की नब्ज समझने का दावा करने वाले चैनल पर पर उस अनुपात में योग्य पत्रकारों की नियुक्ति न तो की ही गयी और ना ही बाज़ार का अर्थशास्त्र इसकी इजाजत देता है चैनल के पत्रकारों को सेलेब्रिटी स्टेट्स मिलने लग गया ऐसे में बड़े पैमाने पर लोग इस ग्लैमर जॉब (पढ़ें टी वी पत्रकार ) की तरफ आकर्षित हुए  और यहीं से स्ट्रिंगर कथा का आरम्भ हुआ वे इस धंदे का हिस्सा हैं भी और नहीं भी इसी गफलत में अक्सर वे शोषण का शिकार होते हैं चूँकि चैनल की तरफ से उनके प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था होती नहीं योग्यता के रूप में एक कैमरा होना पर्याप्त है लेकिन चैनल के लिए सालो काम करने के बाद भी चैनल के लिए अनाम रहते है.इन्हे हर बार अपनी पहचान बतानी पड़ती है ।  ब्रेकिंग की मारा मारी में जो सबसे पहले अपने चैनल को दृश्य भेज देता है उसी की जय जय कार होती है पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सूखा या बाढ़  जैसी प्राकर्तिक आपदा हो या कोई अपराध इनकी खबर सबसे पहले देने वाले स्ट्रिंगर ही होते हैं ये चैनल की रक्त शिराओं जैसे होते हैं यूँ तो पत्रकारों के लिए सरकार ने अनेक योजनाएं बनाई हैं जिसे उन्हें सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलता है पर स्ट्रिंगर उस दायरे में नहीं आते इनको होने वाला भुगतान समय  पर नहीं होता है ऐसे में अक्सर इन पर भष्टाचार में लिप्त होने का आरोप भी लगाया जाता है हर चैनल की यह अघोषित नीति होती है कि स्ट्रिंगर को किसी जगह जड़ न ज़माने दो और अगर जड़ जमा रहा है तो उसका ट्रांसफर ऐसी जगह कर दो कि वो खुद ही अपना इस्तीफ़ा दे दे भारत के सारे प्रादेशिक चैनल इन्हीं स्ट्रिंगर के बूते नंबर वन बने रहने की जंग में लगे हैं इनका हाल भारत के उन किसानों जैसा है जो हमारे लिए अन्न और सब्जियां उगाते हैं लेकिन उनसे बने पकवान खुद नहीं खा पाते हैं .इलेक्ट्रोनिक मीडिया का मूलभूत सिद्धांत है कैमरा उठाने से पहले कागज पर अच्छी तैयारी करें और समाचारों में शोध पर पर्याप्त ध्यान दें लेकिन यहाँ इसका उल्टा होता है पहले विजुअल ले लो स्टोरी का पेग नॉएडा में निर्धारित होगा ऐसे में स्ट्रिंगर को जो कुछ समझ में आएगा कर के भेज देगा आखिर कैमरा और खबर दोनों उसीको करना है इसलिए खबरें अब गैदर नहीं बल्कि कलेक्ट की जाती हैं  .पीपल लाइव के बहाने ही सही कम से कम स्ट्रिंगरों की समस्या पर बहस तो शुरू हुई इनकी हालत बेहतर करने के लिए अब वक्त आ  चुका है कि स्ट्रिंगरों के पर्याप्त प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए ,करने के लिए उनके मेहनताने का समय  पर भुगतान किया जाए .  उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए समय समय पर इनके लिए ओरिएंटेसन कोर्स चलाये जाएँ  इसकी पहल न्यूस ब्रोडकास्टर एसोसीयेसन को करनी होगी अगर ऐसा न हुआ तो ये जगहंसाई का खेल चलता रहेगा राकेश मरते रहेंगे और समाचारों के नाम झाड फूंक भूत प्रेत और चीखना चिल्लाना चलता रहेगा

Wednesday, August 11, 2010

आइये सपनों को बेदखल करें

आराम भला किसे नहीं पसंद होता और जब भी आराम की बात होती है सोना या नींद सबसे ऊपर होती है. खैर, आप अभी-अभी सारी रात आराम करने के बाद, सोकर उठे हैं और मैं फिर से नींद की बात कर रहा हूं. अरे अरे, नाराज मत होइये क्योंकि यह बात जरूरी है. अभी एक नेशनल मैगजीन द्वारा कराये गए सर्वेक्षण में पता चला है कि लगभग 94 प्रतिशत भारतीय नींद संबंधी किसी न किसी समस्या से पीड़ित हैं. कभी-कभी सोचता हूं कि कैसे हमारी जिंदगी से जुड़े सर्वे फटाफट आ जाते हैं. जैसे इधर मेरी नींद हराम हुई उधर सर्वे हाजिर. ऐसा सबके साथ होता है ना? वैसे अगर नींद न आ रही हो तो पहला समाधान यही दिया जाता है की दिमाग शांत करके कोई अच्छा सा गाना सुन लीजिए नींद आ जायेगी. अगर गाना नींद से ही संबंधित हो तो क्या कहने. ये नुस्खा जांचा, परखा और आजमाया हुआ है. जरा अपने बचपन को याद कीजिये, जब मां हमें सुलाने के लिए लोरी गाया करती थीं और हम मीठी नींद सो जाया करते थे. अच्छी नींद और गानों का पुराना संबंध रहा है. ऐसे में सोते वक्त ये गाना कैसा रहेगा कोई गाता, मैं सो जाता-(फिल्म-आलाप). हमारे मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध नींद से होता है. अगर आप बहुत प्रसन्न हैं, तो चैन की नींद आयेगी, नहीं तो आपकी रातों की नींद उड़ जायेगी. अब प्रसन्न होने की शर्त तो बहुत बड़ी है भई. जब ऑफिस से लेकर घर तक काम के दबाव हों, जब सरकारें अपनी मनमर्जी कर रही हों, हमारी मर्जी से चुने जाने के बावजूद. जब महंगाई रात-दिन हमारा मजाक उड़ा रही हो, जब करप्शन मुंह फाड़े हमें निगलने को तैयार बैठा हो. जब पूरा शहर विकास के नाम पर खुदा पड़ा हो तो हम प्रसन्न कैसे हो सकते हैं. खैर, मैं कुछ ज्यादा ही भावुक हो गया. नींद पर लौटता हूं. नींद आना और नींद का उड़ जाना सामान्य स्थितियों में हमारे डेली रूटीन पर डिपेंड करता है. अब अगर आप इस गाने की फिलॉसफी पर भरोसा करेंगे कि बम्बई से आया मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम करो रात को खाओ-पियो, दिन को आराम करो तो निश्चित ही नींद उड़ जायेगी और आप अनिद्रा रोग के शिकार हो जायेंगे. किसी काम में मन नहीं लगेगा और दिन भर आप उनींदे से रहेंगे. एक्सप‌र्ट्स कहते हैं कि अगर अच्छी नींद लेनी है तो दिन में खूब काम कीजिये और रात को आराम कीजिये नहीं तो आप सारी रात चांद को देखते हुए बिता देंगे. नींद और ख्वाब एक दूजे के लिए ही बने हैं पर ख्वाबों में जागते रहना, बेख्वाब सोने से अच्छा है. यूं ख्वाबों का बड़ा गहरा रोमैन्टिसिज़्म है, लेकिन असलियत ये है कि जब नींद गहरी हो और सपनों-वपनों की इसमें कोई गुंजाइश तक न हो तो सबसे अच्छा है. क्योंकि अगर नींद में लगातार सपने आ रहे हैं तो अच्छी बात नहीं है. ज्यादा सपने देखने का मतलब नींद की सेहत ठीक नहीं है. क्यों आजकल नींद कम ख्वाब ज्यादा हैं (फिल्म-वो लम्हे). हमारी सुबह सुहानी हो इसके लिए जरूरी है हम रात में अच्छी नींद लें. मीठी प्यारी नींद जो हमें हल्का महसूस कराये. सुबह आंख खुलते ही यह गाना अगर हमारे कानों में पड़े तो दिन की शुरुआत इससे बेहतर भला और क्या हो सकती है. निंदिया से जागी बहार ऐसा मौसम देखा पहली बार(हीरो). लेकिन नींद के कई दुश्मन हैं स्ट्रेस, टेंशन. ये सब तब होता है जब हम अपनी प्रजेंट सिचुएशन से सैटिस्फाइड नहीं हो पाते या कोई काम हमारे मन का नहीं होता. इसी वजह से जिंदगी में परेशानी होती है और नींद उड़ जाती है. शरीर में हेल्थ रिलेटेड कई समस्याएं पैदा हो जाती हैं. यानी हम जागते हुए भी सोये-सोये से रहते हैं और जब सोते हैं तो भी जगा-जगा सा महसूस करते हैं. वैसे डॉक्टर्स बताते हैं कि अच्छी नींद के लिये जरूरी है कि रात का खाना थोड़ा जल्दी खा लिया जाए. रात को नहाकर सोने से भी नींद अच्छी आ सकती है. हां, सोने से पहले टीवी देखना या कम्प्यूटर पर काम करने से बचें. सोते वक्त कुछ पढ़ने की आदत भी भली है. लेकिन अगर इन सब उपायों के बाद भी नींद उड़ी ही रहे तो डॉक्टर के पास ही जाना पड़ेगा. सबसे अच्छा तो यही होगा कि हमें डॉक्टर की जरूरत ही न पड़े. इधर हम बिस्तर की ओर बढ़ें और उधर नींद हमारी तरफ. खुद को एक मीठी सी नींद के हवाले करने से सुखद कुछ नहीं हो सकता. है ना? तो आइये अगले सर्वे की रिपोर्ट बदलने की तैयारी करें.
आई नेक्स्ट ११ अगस्त 

Friday, July 16, 2010

ख़ुशी हो या गम याद आये तुम............


 मैं कभी कभी ही खुश होता हूँ और जब खुश होता हूँ तो गाने सुनता हूँ  और जब दुखी होता हूँ तो भी गाने सुनता हूँ आप भी सोच रहे होंगे की ये क्या गड़बड़झाला है मित्रों जिन्दगी में कोई भी प्रोब्लम हो म्युसिक एक ऐसी मेडिसिन है जो सारे स्ट्रेस और टेंशन को भगाने के लिए काफी है पर कभी कभी ऐसा होता है जब सिचुएसन पर हमारा जोर नहीं रहता और कुछ भी अच्छा नहीं होता तब एक और बस एक ही चीज़ याद आती है भगवान् गोड, अल्लाह आप कुछ भी नाम लें मतलब एक है एक सुपर नेचुरल पवार जो हमारा आखिरी सहारा है मै तो फ़िल्मी आदमी हूँ तो फिल्म के डाँयलाग की भाषा में इसे दवा की नहीं दुआ की जरुरत है दुआ मतलब उपरवाला अब सोचिये अगर म्युसिक और गोड को जोड़ दिया जाए तो एक ऐसी मेडिसिन तैयार होगी जिसका कोई मुकाबला नहीं होगा बात सीधी से है पर है थोड़ी टेढ़ी कहते हैं संगीत कि कोई भाषा नहीं होती और आप उसे किसी  भाषा में बाँध भी नहीं सकते अब आप "वाका वाका" को ही ले लीजिये इस शब्द का मतलब भले ही हम न समझें पर गुनगुना तो सारी दुनिया ही रही है  पर जब आप बहुत परेशान और निराश हों तब एक ही गाना याद आता है मुझे जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा है यारों मैं नहीं कहता किताबों में लिखा है यारों (लावारिस ) ,निराशा भी अक्सर एक मोटिवेटर का काम करती है जब उसे ऊपर वाले यानि गोड, भगवान् या अल्लाह का सहारा मिल जाता है तो बात ये है कि हमारे फ़िल्मी गाने भी एक बड़ा जरिया हैं.                  भगवान् से हमारा सम्बन्ध स्थापित करने का आप न या माने पर ये सच है, जैसे धर्म भले ही अलग अलग हों सबका सन्देश एक ही है प्यार , मानवता , भाईचारा वैसे ही हमरे फ़िल्में गाने किसी एक मज़हब या धर्म की बात नहीं करते नहीं भरोसा हो रहा हो तो बानगी देख लीजिये "अल्लाह तेरो नाम इश्वर तेरो नाम "(हमदोनों ),जयरघुनन्दनजयसियाराम(घराना),वो मसीहा आया है (क्रोधी ) या फिर एक ओंकार सतनाम (रंग दे बसन्ती ). गाने की नज़र से देखें तो ये सिर्फ गाने हैं ख़ास बात ये है कि ये भारत के हर रिलिजन  की बात कर रहे हैं  कोई छोटा है  कोई बड़ा   थोडा और आगे बढ़ें तो ये गाने उसी फ़िल्मी गाने को आगे बढ़ाते हैं तू हिन्दू बनेगा  मुसलमान बनेगाइंसान की औलाद है इंसान बनेगा .वैसे एक बात और बताते चलूँ सूफी संगीत का जन्म ही संगीत और उस रूहानी ताकत के मिलन से हुआ जिसे हम भगवान कहते हैं और जब आप इसको सुनते हैं लगता है ऊपर वाला हमारे सामने है अगर भरोसा  हो रहा तो  ये गाना सुनियेगा अल्लाह के बन्दे हंस दे जो हो कल फिर आएगा  हिंदी फिल्म उद्योग केसंगीतकार अपने गीतों में सूफी संगीत की मधुरता बुन रहे हैं। अल्लाह के बंदेपिया हाजी अलीख्वाजा मेरे ख्वाजाअर्जियां.. जैसे सूफी संगीत में पगे गीतों की सूची बहुत लंबी है.तोजीवन की इन राहों पर अगर आप चलते चलते थक जाएँ तो थोडा रुक कर अगर इन गानों का साथी बन जाया जाए तो मंजिल कुछ करीब दिखने लगेगी और सफ़र की थकनकम होगी लेकिन एक बात मत भूलियेगा जब भी पर्थारना कीजिये पुरे विश्वास  से कीजिये  तो प्यार बाँटते चलिए और निराशाओं को  अपने ऊपर हावी  मत होने दीजिये .कलतो बिलकुल आएगा आशाओं  का उम्मीदों का इसलिए अगर आज थोड़ी मुश्किल है थोडा धीरज रख लीजिये क्योंकि कोई है जो आपके साथ है आप उसे किसी भी नाम से बुलासकते हैं.
आई नेक्स्ट १६ जुलाई    

Sunday, July 11, 2010

लखनऊ विश्वविद्यालय

लखनऊ विश्वविद्यालय के चाहने वालों के लिए करीब ५ साल पुरानी फिल्म है लेकिन बदलाव की शुरुवात हो चुकी थी जरा देखें और अपनी राय बताएं .


Thursday, June 3, 2010

ह्यूमन राइटस पर है बॉलीवुड की नज़र


हिंदी फिल्मों ने हमें सिर्फ इन्टरटेन ही नहीं किया है आम आदमी की ज़िन्दगी से जुड़े मुद्दों को भी फिल्मों में खूब दिखाया है . ह्यूमन राइटस भी इन इस्सुएस में से एक है .सोसाएटी में चेंज तभी आ सकता है .जब हम सब अपने राइटस के बारे में जानते हों .फिल्मों के जरिये कोई भी बात बहुत जल्दी और दूर तक पहुंचाई जा सकती है .यही वज़ह है कि फिल्मों में गानों में यह विषय काफी दिखा तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है इंसान बनेगा ये कोई साहित्यिक पंक्ति नहीं बल्कि एक हिंदी फिल्म का गाना है एक और बानगी देखिये हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेगे एक खेत नहीं एक बाग़ नहीं हम सारी दुनिया मांगेगे , इंसान का इंसान से हो भाईचारा यही पैगाम हमारा , "ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ". ऐसे एक नहीं सैकडों उदाहरन मिल जायेंगे जिससे पता चलता है कि हमारा फिल्म मीडिया जागरूक और सज़ग है वैसे ह्युमन राईट्स का युनिवर्सल दिक्लारेसन (Universal declaration ) बहुत बाद में आया लेकिन हमारी फिल्मों में मानवाधिकार से जुड़े कथानक हमेशा से प्रभावी भूमिका निभाते रहे .१९३२ में बनी चंडीदास और अछूत कन्या में छुवाछूत जैसे विषय को कहानी का मुख्य आधार बनाया गया. १९३६ में जे बी एच वाडिया द्वारा हिन्दू मुस्लिम एकता पर सबसे पहली फिल्म जय भारत का निर्माण किया गया १९३७ में प्रभात कंपनी ने दुनिया न माने फिल्म बनाई जिसका विषय बेमेल विवाह था .१९३८ में वी शांताराम ने पड़ोसी बनाई जो सांप्रदायिक सदभाव जैसे संवेदनशील विषय पर बनी थी .आज़ादी के बाद फिल्मों में प्रयोग तो हुए लेकिन इनकी संख्या कम ही रही इसके लिए फिल्मकारों की सोच से ज्यादा बाज़ार का अर्थशास्त्र और और दर्शकों की मानसिकता भी कम जिम्मेदार नहीं थी .मानवाधिकारों को फिल्म का विषय बनाने में बिमल रॉय का प्रगतिशील नजरिया पचास के दशक को ख़ास बनाता है जिनमे दो बीघा जमीन , नौकर , सुजाता , परख और बिराज बहू जैसी फ़िल्में शामिल हैं .मदर इंडिया , दो आँखें बारह हाथ और गरम कोट जैसी फ़िल्में आज भी हमारे फिल्मकारों को प्रेरणा देती हैं सस्ती तकनीक , इन्टरनेट और शिक्षा का फैलाव इन सब ने मिलकर नब्बे के दशक में एक ऐसा कोकटेल तैयार किये जिससे फ़िल्में थोड़ी और ज्यादा वास्तविकता के करीब आयीं मल्टी प्लेक्स कल्चर के बढ़ने से निर्माता रिस्क ज्यादा ले सकते हैं जिससे ज्यादा एक्स्परीमेंटल फ़िल्में बन रही हैं सस्ती तकनीक , इन्टरनेट और शिक्षा का फैलाव इन सब ने मिलकर नब्बे के दशक में एक ऐसा कोकटेल तैयार किये जिससे फ़िल्में थोड़ी और ज्यादा वास्तविकता के करीब आयीं मल्टी प्लेक्स कल्चर के बढ़ने से निर्माता रिस्क ज्यादा ले सकते हैं जिससे ज्यादा एक्स्परीमेंटल फ़िल्में बन रही हैं कोमर्शियल सिनेमा की अफरा तफरी के बीच आज भी सोशल इस्सुअस पर बेस फ़िल्में भी खूब बन रही हैं .नए डायरेक्टरस भी इन पर विश्वास कर रहे हैं ह्यूमन राइटस जैसे विषयों को फिल्मों के जरिये लोगों तक पहुँचाना ह्यूमन राइटस के प्रति लोगों को अवेर करना और अम्वेदंशीलता को बढ़ाना भी है .

आई नेक्स्ट में ३ जून को प्रकाशित

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