Friday, June 23, 2023

बातचीत का सिकुड़ता दायरा

 


आज के दौर में विचारों के संप्रेषण का सबसे स्वतंत्र और द्रुतगामी माध्यम है इंटरनेट पर जैसे जैसे इसका इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है मानव संचार में शामिल मानवीयता की जगह  तकनीक लेती जा रही है जहाँ मानव चेहरा गायब है . यह समस्याओं को सुलझाने की बजाय बिगाड़ रही है |तथ्य यह भी है कि इस प्रक्रिया में एक ओर जहाँ हमें तकनीक से जोड़ने वाली और इंटरनेट पर कुछ न कुछ लिखने या पोस्ट करने वाली सभी प्रमुख सोशल नेटवर्किंग साईट्स हो या हमारे जीवन को आसान बनाने वाली ऑन लाइन कम्पनिया जिनमें अर्बन कम्पनी से लेकर उबर जैसी टैक्सी आधारित सेवाएँ देने वाली कम्पनी शामिल हैं |

हम अधिकांश के बारे  में न तो ज्यादा कुछ जानते हैं और न ही हम तकनीक के सहारे मौखिक रूप से हम अपनी समस्या ,पीड़ा ,खुशी अपनी आवाज में भावों के साथ इन्हें प्रेषित कर सकते हैं | जो भी कहना है आप लिख कर कहिये और उसके बाद अगर उन कम्पनियों को लगेगा तो वो अपनी सुविधा के हिसाब से आप से बात कर सकती हैं | हमारी  लगभग हर जानकारी, हम क्या पसंद करते हैं? क्या नापसंद करते हैं? क्या ख़रीदते हैं?कहाँ घूमने जाते हैं? घर की , दोस्तों की तस्वीरें , विडियो सब फेसबुक और ट्विटर जैसी साईट्स  के पास है। एक संस्थागत तंत्र के रूप में सिवाय हेल्प,सपोर्ट  और रिपोर्ट अ पोस्ट  / पेज  / अकाउंट के अतिरिक्त इनका कोई सम्पर्क नहीं । 

वो चाहे आधुनिक युग का सबसे बड़ा सामाजिक नेटवर्क हो या अन्य ओनलाईन कम्पनियां यह सब कितना असामाजिक और  अमानवीय है |ये बात हमें डराती नहीं ये बात हमारी नींद भी नहीं उड़ाती। किसी शहर या राज्य में हम  डीएम, एसपी को जानते हैं या वहाँ तक पहुँच सकते हैं, बैंक में मैनेजर को , किसी कम्पनी में उसके सुपरवाइज़र को , स्कूल में प्रिन्सिपल को वैसे क्या फेसबुक या उबर में हम किसी तक पहुँच के या फोन द्वारा अपनी बात पहुंचा सकते हैं ? उसको फ़ोन या ईमेल कर सकते हैं? नहीं आपको कोई शिकायत करनी हो , कोई जानकारी लेनी हो तो सिवाय कुछ प्री डिसायडेड एक तरफ़ा हेल्प  /कोंटेक्ट तंत्र के अलावा कुछ भी नहीं। कोई चेहरा नहीं जो सामने आकर आपकी शिकायत सुने , आपको तसल्ली दे।लिख कर बात कह पाने की एक अपनी सीमा है और उसकी अपनी चुनौतियाँ  है | इस कारण  से जो समस्या एक मिनट की बात से सुलझ सकती थी उसी समस्या के समाधान में घण्टों लगते हैं और इसके बाद भी कोई जरुरी नहीं है की समस्या सुलझे | अक्सर देखा गया है कि  ऐसे में झुंझलाया हुआ उपभोक्ता उन मुद्दों को ले कर सोशल मीडिया पर चला जाता है और छोटी सी बात का बतंगड़ बन जाता है |इसका मतलब लिखित सम्वाद की प्रक्रिया समस्या को और ज्यादा दुरूह बना रही है |इंटरनेट की तकनीक लोगों की समस्या समाधान के व्यवसाय को तेजी से बदल रही है |एड्रायेट मार्केट रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक़  साल 2017 में भारत में कॉल सेण्टर का बाजार  28.19 बिलियन डॉलर था और इसके 2025 तक 54.25 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाने की संभावना थी | परन्तु मार्किट लीडर्स के सेवा प्रदान करने के तरीके में बदलाव आने से इस रुझान में भी बदलाव आने की सम्भावना तेजी से बढ़ रही है | 

एक समय में रुझान ऐसे थे कि  कैसे ग्राहक सेवा में वेटिंग टाइम को कम से कम किया जाए परन्तु धीरे धीरे इसमें बदलाव की शुरुआत हुई और कॉल सेंटर की बजाय लोगों से अपनी समस्याएं लिख कर देने को प्रेरित किया जाने लगा  और यहाँ से मौखिक संचार की बजाय आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की सहायता से लिखित संचार की ओर कम्पनियों का झुकाव बढ़ा | सेवा प्रदाता खास कर प्रमुख टेलीकॉम कंपनी ने कॉल सेण्टर में बात करने के पैसे चार्ज करने शुरू कर दिये और इसी चलन में आगे चल कर वर्तमान में बड़ी कंपनीओं ने इस मद में खर्च में कटौती करने की शुरवात कॉल सेण्टर एग्जीक्यूटिव की संख्या घटाने से शुरू कर दी है | भारत में भारत में कॉल सेण्टर की प्रति घंटा दर छ डॉलर से दस डॉलर के बीच है  जबकि विदेशों में यही  दर बीस डॉलर से तीस डॉलर प्रति घंटा है | ऐसे में लागत कम करने का आसान तरीका ये है कि लोगों की कॉल सेण्टर पर निर्भरता कम की जाए  |

 इसके लिये कई प्रकार के अच्छे और बुरे हथकंडे अपनाये जाते हैं जैसे की की कस्टमर की ज़्यदातर समस्याओं का समाधान FAQ के माध्यम से करना या आई वी आर एस  के विकल्प की तरफ प्रेषित करना | एक तरीका इस प्रकार का  भी होता है की कॉल सेण्टर के लिंक तक पहुँचने को इतना जटिल बना देना की कस्टमर उस तक पहुँच ही न पाए |  इंटरनेट पर ऐसे बहुत से शोध उपलब्ध है जिसमे कॉल सेण्टर एग्जीक्यूटिव के तनाव और उसके कारण और परिणामो का अध्धयन किया गया है पर बहुत खोजने पर भी ऐसे शोध ज्यादा नहीं मिलते जो यह बताते हो कि  समस्या को गलत तरीके से हैंडल करने पर लोगों  के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है और उसके क्या परिणाम होते हैं | ऑनलाईन कम्पनियों के अपने तर्क है कि उपभोक्ता ऐसी समस्याओं के लिए फोन करते हाँ जिनका निदान आसानी से वेबसाईट के हेल्प पेज पर मिल सकता है |उसके अतिरिक्त भद्दी और अश्लील काल्स अनावश्यक दबाव बढाते हैं जिससे इस व्यवसाय में लगे लोगों की गुणवत्ता प्रभावित होती है और जेनुइन लोग परेशान होते हैं | ऐसे समय में जब लोगों के पास लोगों से बात करने के अवसर सिमटते जा रहे हैं ऐसे में बात करके समस्या का समाधान निकालने के तरीके पर इन ऑनलाईन कम्पनियों   को विशेष ध्यान देना  चाहिए क्यूंकि कहते है न बात करने से ही बात बनती है | 

प्रभात खबर में 23/06/2023 को प्रकाशित 

Friday, May 19, 2023

संभावित चुनौतियों का समाधान

 

आज हर उद्योग  किसी न किसी रूप में सूचना प्रौद्योगिकी की सहायता से चल रहा है  वो चाहे निर्माण,परिचालन ,भर्ती हो या लेखा सभी  कम्प्युटरीकृत होते जा रहे हैं  और उपभोक्ता भी पहले के मुकाबले आज निर्णय और खरीदने की प्रक्रिया में ज्यादा से ज्यादा तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है |इसी का चरम रूप अब हमारे सामने आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस”, रोबोटिक्स के रूप में सामने आ रहा है |चैट जी पी टी आने से पहले ये माना जा रहा था कि आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस का सामान्य इंसान के लिए प्रयोग अभी दूर की कौड़ी है पर पिछले ६ महीनों में करोडो लोग आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस पर आधारित चैट जी पी टी से जुड़े और निरंतर जुड़ते जा रहे हैं |उससे सूचना प्रौधिगिकी से रोजगारों पर पड़ने वाले असर की चर्चा शुरू हो गयी हैं |आप इसे यूँ समझ सकते हैं रेलवे आरक्षण में कम्प्यूट्रीकृत व्यवस्था से पहले आरक्षित टिकट बुक करने के लिए एक बुकिंग क्लर्क हुआ करता था |जो आरक्षित टिकट जारी करता था लेकिन अब बुकिंग कलर्क की कोई जरुरत ही नहीं अब ये सारा काम मोबाईल एप और वेबसाईट से होता है | जो बुकिंग क्लर्क का पद था वो अब लुप्त हो चुका है |इसलिए अब रेलवे इनकी नियुक्ति नहीं करता है |

आज से तीस साल पहले घटी यह प्रक्रिया इंसान और तकनीक के सहजीवन का उदाहरण बनी पर अब तो हर रोजगार में सिर्फ तकनीक का ही राज है | आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस इस गति को कई सौ गुना तेज कर रहा है |जाहिर है इसका असर नौकरियों पर पड़ने वाला है। इसे लेकर एक ताजा रिपोर्ट सामने आई है। वर्ल्ड इकोनमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट  फ्यूचर आफ जाब्स में भविष्‍य को लेकर कई  नई संभावना जाहिर की गई है। इसके अनुसार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ), मशीन लर्निंग और डाटा सेगमेंट के चलते अगले पांच सालों में देश में 22 प्रतिशत नौकरियों का स्वरूप बदल जाएगा।   वैश्विक स्तर पर नौकरियों में 23 प्रतिशत बदलाव होने का अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान 6.9 करोड़ नए रोजगार सृजित होंगे जबकि 8.3 करोड़ रोजगारों के खत्म होने की उम्मीद है। इस तरह अगले पांच सालों में दुनिया में एक चौथाई नौकरियां घट सकती हैं। इस दौरान नौकरियों में बढ़ोतरी की दर 10.2 प्रतिशत और गिरावट की दर 12.3 प्रतिशत रह सकती है। 803 कंपनियों के बीच कराए गए सर्वे के माध्यम से इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है। जिन कंपनियों को सर्वे में शामिल किया गया है, उनमें 1.13 करोड़ लोग काम करते हैं और ये कंपनियां 27 सेक्टरों का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये कंपनियां 45 देशों का प्रतिनिधित्व करती हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वो तकनीक है जहां आप कंप्यूटर को इंसान की तरह काम करना सिखाते हैं| जैसे एपल का सिरी, गूगल असिस्टेंट या फिर एमेजन एलेक्सा. यहां आप कंप्यूटर को डाइरेक्ट करते हैं और वो आपके हिसाब से काम करता है| अपने सरलतम रूप में, एआई को इस तरह से समझा जा सकता है कि उन चीजों को करने के लिए कंप्यूटर का उपयोग किया जाता  है जिनके लिए मानव बुद्धि की आवश्यकता होती है।

ए आई  बाजार पर कब्जा करने के लिए इन दिनों माइक्रोसॉफ्ट के “चैटजीपीटी” और गूगल के “बार्ड” के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा इसका एक उदाहरण है | इसे इस तरह समझा जा सकता है एक बैंक में एक आर्टिफिशल इंटेलिजेंस सिस्टम लगाया गया है जो लोगों के द्वारा भेजे गए ईमेल संदेशों को अपने आप जवाब दे देता  है। इससे, जो लोग ई मेल का का जवाब देने  के लिए रखे  गए थे, वे अधिकांशतः अनुपयोगी हो जायेंगे या उन्हें अपने अंदर कोई नयी स्किल सीखनी होगी जिससे वे बैंक के लिए उपयोगी बने रहें |अब चुनौती यह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वजह से जिनके रोजगार जायेंगे |उनका क्या होगा ?इस बहस के बीच औद्योगिक क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का  जमकर स्वागत किया जा रहा है इसके पीछे तर्क  यह  है कि इससे उत्पादन में बढ़ोतरी होगी, लागत में कमी आएगी। चिकित्सकीय-जीवन रक्षक मामलों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से गलती शून्य हो जाने के कारण ज्यादा जीवन बचाए जाने की उम्मीद की जा रही  है।लेकिन यह सब इतनी आसानी से नहीं होने जा रहा है |इंटरनेट के  प्रयोगकर्ताओ के मामले में दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश के सामने कई चुनौतियां है |जैसे  कि देश की शिक्षा व्यवस्था अभी इस तकनीक के साथ कदमताल करने के लिए बिलकुल तैयार नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में तकनीकी तौर पर दक्ष युवा तैयार करने के लिए देश  को अपनी शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

 पाठ्यक्रम के साथ-साथ शिक्षकों में भी बड़े बदलाव की आवश्यकता महसूस की जा रही है। अकादमिक जगत के विशेषज्ञ मानते  है कि इसके बिना भारत एक बार फिर कंप्यूटर क्रांति की तरह पिछड़ जाएगा और उसे पश्चिमी देशों से आयातित तकनीक पर ही निर्भर रहने के लिए मजबूर हो जाना पड़ेगा।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारी सोचने से ज्यादा तेज गति से बढ़ रहा है। लेकिन अभी के स्तर पर यह कहना बहुत मुश्किल है कि इसके लंबी अवधि में क्या परिणाम होंगे और बाजार और नौकरियों पर इसका क्या असर पड़ेगा।लेकिन इतना तय है कि आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का हर औद्योगिक सेक्टर में तेजी से उपयोग बढ़ने वाला है। यदि युवाओं को भविष्य की नौकरियों के लिए तैयार होना है, तो उन्हें इस तकनीक की बारीकियों से अवगत कराया जाना चाहिए।सरकार द्वारा लाई जा रही नई शिक्षा नीति में नई तकनीक को अपनाने को लेकर बड़े बदलाव किए जा रहे हैं जिसका असर आने वाले समय में दिखाई पड़ेगा।  लेकिन  यदि हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को नए जमाने की चुनौतियों के अनुरूप तैयार करना हो, तो उनके इन प्रश्नों का नए संदर्भों के साथ उत्तर खोजा जाना बहुत  जरूरी है।

दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में 19/05/2023 को प्रकाशित 

Thursday, May 4, 2023

पॉडकास्ट की बढ़ती लोकप्रियता

 

इंटरनेट पर हमेशा वीडियो और चित्रों का राज रहा है |दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले जहाँ ध्वनिया यानि पॉडकास्ट तेजी से लोकप्रिय हो रहा था |भारत में वीडियो के प्रति दीवानगी बरकरार रही| कोरोना महामारी और वर्क फ्रॉम होम जैसी न्यू नार्मल चीजों ने  काफी कुछ बदला है ,और इसी दौर में लोगों की इंटरनेट पर पसंद वीडियो के साथ साथ ध्वनियों ने भी जगह बनाई और पॉडकास्ट की लोकप्रियता में बढ़ोत्तरी होनी शुरू हुई | भारत के विविधता वाले बाजार में पॉडकास्ट एक शहरी प्रवृत्ति बन कर रह गया था और इसके बाजार में जितनी तेजी से वृद्धि होनी चाहिए उसका बड़ा कारण इन आडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफोर्म में इंटरैक्टिवटी का ख़ासा अभाव था |

इंटरनेट की तेज दुनिया में अब कोई इन्तजार नहीं करना चाहता और इसीलिये पॉडकास्ट को वो लोकप्रियता नहीं मिल रही थी जितनी सोशल मीडिया साईट्स को मिली |जबकि ध्वनियों का मामला इंटरनेट के एक आम उपभोक्ता के लिए वीडियो के मुकाबले ज्यादा सरल है और इसमें डाटा भी कम खर्च होता है | भारत जैसे देशों में, जहां इंटरनेट की स्पीड काफी कम होती है, वीडियो के मुकाबले पॉडकास्टिंग ज्यादा कामयाब हो सकती है। भारतजैसे भाषाई विविधता वाले देश में जहाँ निरक्षरता अभी भी मौजूद है | पॉडकास्ट लोगों तक उनकी ही भाषा में संचार करने का एक सस्ता और आसान विकल्प हो सकता है |प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की मन की बात कार्यक्रम का पॉडकास्ट काफी लोकप्रिय है | पॉडकास्ट की सबसे बड़ी खूबी है इसकी ग्लोबल रीच यानि अगर आप कुछ ऐसा सुना रहे हैं जो लोग सुनने चाहते हैं तो किसी चैनल के लोकप्रिय होते देर नहीं लगेगी | भारत हमेशा श्रोत परम्परा वाला देश रहा है जहाँ हमारे सामाजिक जीवन में कहानियां बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है   कोरोना महामारी से उपजी पीड़ा और चिंताओं ने लोगों को कहानियाँ कहने और सुनने दोनों के लिए प्रेरित किया |उधर लोग सोशल मीडिया पर लोग अपनी राय व्यक्त करने के लिए लिखने में अपना समय नष्ट नहीं करना चाहते है तो इसका विकल्प ध्वनियाँ ही ही हो सकती हैं |

फेसबुक (लाईव ऑडियो रूम )और ट्विटर (स्पेक्स) आवाज की दुनिया में पहले ही कदम रख चुके हैं | इसी कड़ी में 2021  मई  में देश में लॉन्च होते ही  क्लबहाउस लोगों की चर्चा का केंद्र बन गया |क्लब हाउस  ध्वनि  आधारित एक सोशल नेटवर्किंग साइट है| जो लोगों को ‘किसी भी चीज’ और ‘हर चीज के बारे में’ बात करने की सुविधा  देता है। लांच होने के बाद ही ये तेजी से लोकप्रिय हो रहा है|आधिकारिक तौर पर भारत में इसके कितने उपभोक्ता है इसका आंकड़ा जारी नहीं किया गया है |इसकी लोकप्रियता से उत्साहित होकर आडियो स्ट्रीमिंग में उपभोक्ताओं की पहले ही पसंद बन चुकी कम्पनी स्पोटीफाई ने क्लब हाउस को टक्कर देने के लिए इसी माह आवाज पर आधारित एक सोशल नेटवर्किंग एप ग्रीन रूम लांच कर दिया है माना जा रहा है कि लाईव आडियो मार्केट में एक कदम आगे निकले हुए ग्रीन रूम कलाकारों पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करेगा और इसके लिए कम्पनी जल्दी ही एक क्रियेटर फंड बनाने जा रही है जिससे ऑडियो  क्रियेटर को यू ट्यूब की तर्ज पर अपने लोकप्रिय काम के पैसे भी मिलेंगे |इंटरनेट पर हुई वीडियो क्रांति के अनुभव बताते हैं कि वीडियो कंटेंट में बहुत अश्लीलता, फूहड़ मजाक और फेक न्यूज की बाढ़ भी आ गयी है |चूँकि इंटरनेट पर किसी तरह का कोइ सेंसर नहीं है ऐसे में बच्चों को अवांछित ऑडियो  कंटेंट से कैसे बचाया जाएगा |उपभोक्ताओं द्वारा बोले गए शब्द कंटेंट का क्या होगा उसकी निजता की रक्षा कैसे की जायेगी | इसके अलावा, नफरत फैलाने वाले भाषण जैसे दुरुपयोग की निगरानी के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल की कमी के कारण इस तरह के एप कैसे अपने उपभोक्ताओं को इंटरनेट पर ध्वनि की दुनिया में  सुरक्षित अनुभव दे पायेंगे इसका फैसला अभी होना है |

प्रभात खबर में 04/05/2023 को प्रकाशित 

Monday, April 17, 2023

सोशल मीडिया कंटेंट इंडस्ट्री से बढेगा रोजगार

 

बात ज्यादा पुरानी नहीं है |आज से पांच साल पहले किसी ने नहीं सोचा था कि एक ऐसा वक्त भी आएगा जब आप कुछ न करते हुए भी बहुत कुछ करेंगे और पैसे भी कमाएंगे |बात चाहे यात्राओं की हो या खान –पान की या फिर फैशन की देश विदेश की बड़ी कम्पनिया ऐसे लोगों को जो इंटरनेट पर ज्यादा फोलोवर रखते हैं अपने प्रोडक्ट के विज्ञापन के लिए पैसे दे रही हैं और उनके खर्चे भी उठा रही हैं | इंटरनेट की दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण बात है इसकी गतिशीलता नया बहुत जल्दी पुराना हो जाता है और नई संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं |सोशल मीडिया प्लेटफोर्म नित नए रूप बदल रहे हैं उसमें नए –नए फीचर्स जोड़े जा रहे हैं |इस सारी कवायद का मतलब ऑडिएंस को ज्यादा से ज्यादा वक्त तक अपने प्लेटफोर्म से जोड़े रखना |इसका बड़ा कारण इंटरनेट द्वारा पैदा हो रही आय भी है |अब सोशल मीडिया इतना तेज़ और जन-सामान्य का संचार माध्यम बन गया कि इसने हर उस व्यक्ति को जिसके पास स्मार्ट फोन है और सोशल मीडिया पर उसकी एक बड़ी फैन फोलोविंग  वह एक चलता फिरता मीडिया हाउस बन गया  है | अब वह वक्त जा चुका है जब सेलेब्रेटी स्टेट्स माने के लिए किसी को सालों इन्तजार करना पड़ता था |सोशल मीडिया रातों रात लोगों को सेलिब्रटी बना दे रहा है जिसमें बड़ी भूमिका ,फेसबुक ,इन्स्टाग्राम और यू ट्यूब जैसी साईट्स निभा रही हैं |

मूल्यांकन सलाहकार फर्म (Valuation Advisory firm  Kroll) क्रोल  की एक नवीन रिपोर्ट के अनुसार एक साल में भारतीय ब्रांड्स ने अपनी इन्फ़्लुएन्सर मार्केटिंग पर खर्च दोगुना कर दिया |पिछले एक साल में एक तिहाई भारतीय ब्रांड्स ने सोशल मीडिया इन्फ़्लुएन्सेर्स पर अपना खर्च दो गुना कर दिया है | कोरोना महामारी ने बड़ी मात्रा में डिजिटलीकरण को प्रेरित किया , भारत में सोशल मीडिया की कंटेंट क्रियेटर इंडस्ट्री पच्चीस प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ रही है और जिसके साल 2025 में 290|3 मिलीयन डालर हो जाने की उम्मीद है |  सोशल मीडिया इन्फ़्लुएन्सेर्स   अब ब्रांड को एक बड़े दर्शक वर्ग पर कम खर्च में पहुंचने का एक सुलभ तरीका बन रहा है आज भारत में लगभग 80 मिलियन कॉन्टेंट क्रिएटर हैं, जिनमें वीडियो स्ट्रीमर्स,   इन्फ़्लुएन्सेर्स    और ब्लॉगर्स शामिल हैं। डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी आई क्यूब्स वायर के  एक शोध से पता चलता है कि लगभग 35 प्रतिशत  ग्राहकों के खरीदारी निर्णय सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर पोस्ट, रील्स और वीडियो देखकर लिए जा रहे हैं | affable|ai नामक एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता-संचालित इंफ्लुएंसर मार्केटिंग प्लेटफोर्म के आंकड़ों के अनुसार नैनो- इंफ्लुएंसर, जिनके पास 10,000 से कम फॉलोअर हैं, ने 2022 में इंस्टाग्राम पर सबसे अधिक इंगेजमेंट अर्जित की है |जबकि माइक्रो इंफ्लुएंसर जिनके दस हजार से पचास हजार के बीच फॉलोअर ने इन्स्टाग्राम और यू ट्यूब पर ज्यादा दर्शक मिले पर उनकी इंगेजमेंट दर कम थी |

सोशल मीडिया यूजर्स अपनी बड़ी फैन फोलोइंग का फ़ायदा “सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर”  के तौर पर उठा रहें और यह एक विज्ञापन के नए माध्यम के रूप में तेजी से उभर रहा है| सोशल मीडिया अब आम इंटरनेट यूजर्स को सितारा बना रहा है |

 देश  में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, व्यक्ति और ब्रांड प्रमोशन का बड़ा औजार  बनकर सामने आया है |  सोशल मीडिया विज्ञापन का एक अपरंपरागत माध्यम  है | जो बाकी सारे मीडिया (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और समानांतर मीडिया) से अलग है |यह एक वर्चुअल वर्ल्ड बनाता है जिसे उपयोग करने वाला व्यक्ति सोशल मीडिया के किसी प्लेटफॉर्म (फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम) आदि का इंटरनेट के माध्यम से  उपयोग कर किसी भी नेट कनेक्टेड व्यक्ति तक पहुंच बना सकता है |

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर वह आम व्यक्ति होता है जिसकी विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर काफी सारे फोलोवर होते हैं और वह अपनी इस लोकप्रियता का इस्तेमाल  विभिन्न तरह के उत्पाद बेचने में करता है | इसमें रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट दूसरे विज्ञापन  माध्यमों के मुक़ाबले अधिक है| देश के लाखों युवा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को एक करियर के अच्छे विकल्प के रूप में देख रहे हैं | सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर जहाँ विज्ञापनों की दुनिया में एक नया आयाम गढ़ रहा है वहीं विज्ञापनों की दुनिया में सेलिब्रेटी स्टेट्स को खत्म भी कर रहा है |जहाँ हमारे आपके बीच के लोग ही स्टार बन रहे है |

भारत में चूँकि अभी इंटरनेट बाजार में पर्याप्त संभावनाएं हैं इसलिए अभी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर का यह दौर चलेगा पर कुछ चिंताएं भी है भारत के इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग उद्योग को विनियमन की आवश्यकता है ताकि तथ्यों के गलत प्रस्तुतीकरण  से बचा जा सके। जनवरी में, भारत के उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने घोषणा की कि ऐसे में ये गाइडलाइंस ग्राहक हितों की रक्षा के लिए जरूरी हैं| सोशल मीडिया पर ऐड्स करने वाले सेलेब्रिटीज़ भी इसके दायरे में होंगे| किसी भी भ्रामक विज्ञापन व  इन्हें नहीं मानने पर इंफ्लूएंसर्स को 10 लाख तक का जुर्माना देना होगा| लगातार अवमानना पर 50 लाख तक जुर्माना देना होगा| साथ ही एंडोर्स करने वाले को 2 से 6 महीने तक किसी भी एंडोर्समेंट करने  से रोका जा सकता है| उस प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करने की कार्रवाई भी सम्भव है|

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को आत्म-नियंत्रित करने की आवश्यकता है जिससे वे  नीति निर्माण में भाग ले सकें ताकि इस उद्योग पर सकारात्मक प्रभाव हो| परम्परागत विज्ञापनों में शामिल खिलाड़ियों और सिने कलाकारों के प्रति लोगों का मोह एकदम से कम तो नहीं हुआ है पर इसकी शुरुआत जरुर हो गयी है |इन दोनों की लड़ाई में कौन जीतेगा इसका फैसला वक्त को करना है|

नवभारत टाईम्स मे 17/04/2023 को प्रकाशित 

Thursday, April 13, 2023

सोशल मीडिया रील्स का बोलबाला


 सोशल  मीडिया साईट्स ने हमारे हमारे जीवन को एक इवेंट में तब्दील करके एक आम इंसान को सेलीब्रेटी होने का एहसास करवाया |जहाँ उसे अपने दैनिक जीवन में होने वाले घटनाक्रम को लोगों के साथ साझा करके अपने ख़ास होने का एहसास हुआ|जहाँ जन्मदिन से लेकर शादी तक सब कुछ भव्य तरीके से साझा किया जा रहा था ,लेकिन फिर भी कुछ कमी थी |हम सेलीब्रेटी जैसा महसूस तो कर रहे थे पर हम सेलेब्रेटी थे नहीं |इस कमी को पूरा किया रील ने. शार्ट वीडियो एप्स की जिस कहानी की शुरुआत टिक टोक से शुरू हुई थी जून 2020 में उसके बैन होने के बाद एक लंबा रास्ता तय कर चुकी है |एम् एक्स शोर्ट विडियो, मौज ,जोश ,चिंगारी,मित्रों जैसे एप भी इस दुनिया में तहलका मचाये हुए हैं | युवाओं और किशोरों में शोर्ट वीडियो बनाने की सुविधा देने वाली वेबसाईट एप्स की  बढ़ती लोकप्रियता का बड़ा कारण बढ़ती फेक न्यूज की आमद और चारित्रिक हनन की कोशिशों के बीच लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग साईट्स ट्विटर और फेसबुक पर एक सामान्य उपभोक्ता का अनुभव अब उतना सुहाना नहीं रहा| जितना आज से कुछ साल पहले रहा करता था |ऐसे में वो उपभोक्ता जो समाचार और राजनीति से इतर कारणों से सोशल मीडिया पर थे एक विकल्प की तलाश में थे जिसकी भरपाई  रील्स   ने बखूबी कर दी |आज हर कोई रील बना रहा है |स्कूल जाते बच्चों से लेकर बड़े फिल्म स्टार्स तक | दुनिया के दूसरे सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते इंटरनेट यूजरबेस को होस्ट करने वाले देश में  जहाँ हर कोई कैमरे के सामने सेलेब्रेटी बनना चाहता है, जहाँ फ़िल्में उनके संवाद और गाने  हमारे जीवन में इस हद तक घुसे हुए हैं कि कि उसके बगैर जीवन की कल्पना करना मुश्किल  है, वहां रील्स की सफलता आश्चर्यजनक नहीं है |

2016 में रिलायंस जिओ के लांच के बाद सस्ते डाटा के युद्ध ने इसको भारत में पाँव पसारने का बेहतरीन मौका  दिया | कोई भी जिसके पास एक स्मार्ट फोन इंटरनेट कनेक्शन के साथ है अपना नाचता गाता वीडियो अपनी भाषा में  बना सकता  है|जिसमें तस्वीरें शब्द और सुंदर वीडियो इफेक्ट भी आसानी से पिरोये जा सकते हैं|रेड्शीर कंसल्टिंग फर्म की रिपोर्ट एंटरटेनमेंट एंड एडवरटाइजिंग राइडिंग द डिजीटल वेव के अनुसार वीडियो के ये लघु संस्करण फेसबुक और गूगल के बाद दूसरा सबसे बड़ा सेगमेंट है जहाँ लोग सबसे ज्यादा समय बिता रहे हैं |शोर्ट वीडियो बनाने की सुविधा देने वाली वेबसाईट एप्स के यूजर्स की संख्या साल 2025 तक 650 मिलीयन हो जायेगी |इसी रिपोर्ट के अनुसार शार्ट वीडियो एप्स आने वाले वक्त में ओ टी टी वीडियो कंटेंट को भी पछाड़ देगा |

डिजीटल विज्ञापनों की दुनिया में वीडियो के ये लघु संस्करण तेजी से अपनी जगह  बना रहे  हैं |साल 2019  से 2022 के बीच यह सेगमेंट 44  प्रतिशत की रफ़्तार  से बढ़ा |इसका कारण टियर टू शहरों में इंटरनेट का फैलाव है जिसने एक नयी मार्केट पैदा की है जहाँ ब्रांड उपभोक्ता तक सीधे पहुँच बना रहे हैं |लेकिन कुछ सवाल ऐसे भी हैं जिनके जवाब अभी खोजे जाने हैं उसमें पहला मुद्दा निजता का है |टियर टू शहरों  से आने वाले रील वीडियो ज्यादातर लोगों के निजी परिवेश को ही  दिखा रहे हैं |वो कहाँ रहते हैं क्या करते हैं उनके परिवार के सदस्य कौन -कौन हैं |काफी कुछ इनमें दिख जा रहा है |दूसरा मुद्दा है अश्लीलता का अपने रील्स प्लेटफोर्म को लोकप्रिय बनाने के लिए लोग सॉफ्ट पोर्न और अश्लील चुटकुलों का सहारा ले रहे हैं |दूसरों के कंटेट को एडिट कर के अपना बना लेने की कोशिश यहाँ भी खूब  हो रही है |

अपनी रील में इंटरनेट पर पहले से मौजूद किसी मजाकिया क्लिप का इस्तेमाल करना नैतिकता द्रष्टि से उचित नहीं माना जा सकता है |कोई व्यक्ति रोड क्रास करते वक्त मेन होल में गिर जाता है और उसका फन्नी  वीडियो  किसी शार्ट वीडियो एप की मदद से इंटरनेट पर वायरल हो जाता है और फिर अनंतकाल तक के लिए सुरक्षित भी हो जाता है |क्या वह वीडियो उस व्यक्ति से अनुमति लेकर किसी एप पर डाला गया |जिसको देख कर हम कहकहे लगा रहे हैं |इंटरनेट के फैलाव ने बहुत सी निहायत निजी चीजों को सार्वजनिक कर दिया है|ये सामाजिक द्रष्टि से निजी चीजें जब हमारे चारों ओर बिखरी हों तो हम उन असामान्य परिस्थिति में घटी घटनाओं को भी सार्वजनिक जीवन का हिस्सा मान लेते हैं जिससे एक पर पीड़क समाज का जन्म होता है और शायद यही कारण है कि अब कोई दुर्घटना होने पर लोग मदद करने की बजाय वीडियो बनाने में लग जाते है कि न जाने उस वीडियो का कौन सा हिस्सा क्लिप बन कर हमारे आस -पास घूमने लगे | अंत में सबसे बड़ा मुद्दा रील देखने में समय की बरबादी का है जिसमें दर्शक कोल्हू के बैल की तरह चलता तो बहुत है पर पहुंचता कहीं नहीं है |इंटरनेट की दुनिया में बिखरी हुई रील्स में फूहड़ चुटकुले ,दूसरों को तंग करने वाले मजाक का ज्यादा बोल बाला है |आने वाले वक्त में जैसे जैसे इन रील्स के दर्शक समझदार होते जायेंगे इन पर आने वाला कंटेंट भी बेहतर होगा |ऐसी उम्मीद की जा सकती है |

 प्रभात खबर में 13/04/2023 को प्रकाशित 

तकनीकी मदद से पनपते भावनात्मक सम्बन्ध

 

मानव सभ्यता के ज्ञात इतिहास में किसी और चीज ने नहीं बदला है ,यह बदलाव बहु आयामी है बोल चाल  के तौर तरीके से  शुरू हुआ यह सिलसिला  खरीददारी  ,भाषा  साहित्य  और  हमारी अन्य प्रचलित मान्यताएं और परम्पराएँ  सब  अपना रास्ता बदल रहे हैं। यह बदलाव इतना  तेज है कि इसकी नब्ज को पकड़  पाना समाज शास्त्रियों  के लिए भी आसान नहीं है  और  आज इस तेजी  के मूल में “एप” ( मोबाईल एप्लीकेशन ) जैसी यांत्रिक  चीज  जिसके माध्यम से मोबाईल  फोन में  आपको किसी वेबसाईट को खोलने की जरुरत नहीं पड़ती |आने वाली पीढियां  इस  समाज को एक “एप” समाज के रूप में याद  करेंगी जब  लोक और लोकाचार  को सबसे  ज्यादा  “एप” प्रभावित कर रहा  था |हम हर चीज के लिए बस एक अदद “एप” की तलाश  करते हैं |जीवन की जरुरी आवश्यकताओं के लिए  यह  “एप” तो ठीक  था  पर  जीवन साथी  के चुनाव  और दोस्ती  जैसी भावनात्मक   और  निहायत व्यक्तिगत  जरूरतों   के लिए  दुनिया भर  के डेटिंग एप  निर्माताओं  की निगाह  में भारत सबसे  पसंदीदा जगह बन कर उभर  रहा है | 

उदारीकरण के पश्चात बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और रोजगार की संभावनाएं  बड़े शहरों ज्यादा बढीं ,जड़ों और रिश्तों से कटे ऐसे युवा  भावनात्मक  सम्बल पाने के लिए और ऐसे रिश्ते बनाने में जिसे वो शादी के अंजाम तक पहुंचा सकें  डेटिंग एप का सहारा ले रहे हैं |स्टेइस्टा सर्वे कंपनी के अनुसार इंटरनेट पर जितने लोग एक्टिव हैं, उनमें से तीन प्रतिशत फिलहाल ऑनलाइन डेटिंग ऐप्स या साइट का इस्तेमाल कर रहे हैं. 2025 तक इसकी संख्या बढ़कर 4.3 प्रतिशत हो जाएगी. वर्तमान में भारत में ऑनलाइन डेटिंग सेगमेंट में 53.6 करोड़ डॉलर का कारोबार हो रहा है. यह कारोबार 17. 61 प्रतिशत की सालाना दर से बढ़ रहा है. इन आंकड़ों से भारत में डेटिंग ऐप्स के भविष्य का अंदाजा लगाया जा सकता है. लेकिन इस तस्वीर का एक और भी पहलू है |


इन डेटिंग एप से बनने वाले सम्बन्धों की कोई सामाजिक स्वीकृति नहीं रहती | डेटिंग एप से पहले सम्बन्ध साथ पढ़ाई लिखाई करने ,मोहल्ले या फिर साथ कम करते वक्त  की परिधि में बनते थे जिसमें काफी कुछ समानता हुआ करती थी |भले ही ये सम्बन्ध निजता के दायरे में आते थे पर आस -पास के लोगों को इनके बारे में एक अंदाज़ा हुआ करता था |यह अंदाजा बात बिगड़ने की सूरत में एक ढाल का काम किया करता था | श्रद्धा हत्याकांड अपने आप में एक बानगी है कि इंटरनेट की दुनिया में लगातार विचरने वाली युवा पीढी कितनी अकेली होती जा रही है |चैटिंग एप के स्क्रीन शॉट वायरल हो जाने की संभवनाओं के चलते लोग इस पर अनौपचारिक और अन्तरंग चर्चा करने से बचते हैं |मिल जुल के समस्याओं को समझाने का वक्त किसी के पास नहीं है | क्या डेटिंग ऐप्स पर मिले लोगों को एक-दूसरे के बारे में ज्यादातर जानकारी नहीं होती है?

सिर्फ नाम पता और तस्वीर देखकर मुलाक़ात तय कर ली जाती हैं और फिट उन मुलाकातों में जो कुछ दिख रहा है वो कितना असली है |इसकी गारंटी कोई भी नहीं ले सकता क्योंकि डेटिंग एप्स पर आने वाले  लोगों का कोई वेरिफिकेशन नहीं होता है और इसी बिंदु से असली समस्या शुरू होती है |नेटफ्लिक्स पर “द टिंडर स्विंडलर” वृत्तचित्र एक ऐसी ही सच्ची घटना का प्रस्तुतीकरण है जिसमें एक व्यक्ति अपने इन्स्टाग्राम अकाउंट के जरिये महिलाओं को ठगता है |चूँकि डेटिंग या रिश्ते जैसी चीजें वैसी भी बहुत निजी तरह का मामला होता है फिर उसमें असफलता जैसी चीजें लोग अपने अभिन्न मित्रों से बताने में संकोच करते हैं |सोशल मीडिया और डेटिंग एप जैसा प्लेटफोर्म पर अपनी पीड़ा रखना या मदद मांगना तो दूर की बात है |ऐसे में कोई भी व्यक्ति जो रिश्तों में ईमानदार नहीं है उसका मायाजाल चलता रहता है और उसकी वास्तविकता कभी सबके सामने नहीं आ पाती |

ट्रूली मैडली, वू ,टिनडर,आई क्रश फ्लश और एश्ले मेडिसन ,बम्बल जैसे डेटिंग एप भारत में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं जिसमें एश्ले मेडिसन जैसे एप किसी भी तरह की मान्यताओं को नहीं मानते हैं आप विवाहित हों या अविवाहित अगर आप ऑनलाईन किसी तरह की सम्बन्ध की तलाश में हैं तो ये एप आपको भुगतान लेकर सम्बन्ध बनाने के लिए प्रेरित करता है |

हालंकि डेटिंग एप का यह कल्चर अभी मेट्रो और बड़े शहरों  तक सीमित है पर जिस तरह से भारत में स्मार्ट फोन का विस्तार हो रहा है और इंटरनेट हर जगह पहुँच रहा है इनके छोटे शहरों में पहुँचते देर नहीं लगेगी |पर यह डेटिंग संस्कृति भारत में अपने तरह की  कुछ समस्याएं भी लाई है जिसमें सेक्स्युल कल्चर को बढ़ावा देना भी शामिल है |वैश्विक सॉफ्टवेयर एंटी वायरस  कंपनी नॉर्टन बाई सिमेंटेक के अनुसार ऑनलाइन डेटिंग सर्विस एप साइबर अपराधियों का मनपसंद प्लेटफार्म बन चुका है। भारत के लगभग 38 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने कहा कि वह ऑनलाइन डेटिंग एप्स का प्रयोग करते हैं। ऐसे व्यक्ति  जो मोबाइल में डेटिंग एप रखते है, उनमें से करीब 64 प्रतिशत  महिलाओं और 57 प्रतिशत  पुरुषों ने सुरक्षा संबंधी परेशानियों का सामना किया है। आपको कोई फॉलो कर रहा है, आप की पहचान चोरी होने के डर, के साथ-साथ उत्पीड़ित और कैटफिशिंग के शिकार होने का खतरा बरकरार रहता है।

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 13/04/2023 को प्रकाशित 

 

Wednesday, March 29, 2023

नई तकनीक के दौर में भ्रामक खबरों के खतरे


 पिछले साल के अंतिम महीनों में चैट जी पी टी के आने के बाद आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस बहुत चर्चा में है | कुछ साल पहले, पत्रकारिता में आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस के आगमन  ने  पत्रकारिता उद्योग में काफी उम्मीदें बढ़ाई थी कि इससे  समाचारों का वितरण  एक नयी पीढी में पहुंचेगा और पत्रकारिता जगत में  क्रांतिकारी उलटफेर होगा। उम्मीद तो यह भी जताई जा रही थी कि आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस से फेक न्यूज  और मिस इन्फोर्मेशन  के प्रसार को रोकने का एक प्रभावी तरीका भी मिल जाएगा पर व्यवहार में इसके उलट ही हो रहा है | एक तरफ प्रौद्योगिकी ने आर्थिक और सामाजिक विकास किया है तो दूसरी फेक न्यज  में काफी  वृद्धि हुई है| लोकतांत्रिक राजनीति के लिए अड़चन  पैदा करने में और चारित्रिक हत्या करने में  इंटरनेट एक शक्तिशाली औजार के रूप में उभरा है|अपने सरलतम रूप में, एआई को इस तरह से समझा जा सकता है कि उन चीजों को करने के लिए कंप्यूटर का उपयोग किया जाता  है जिनके लिए मानव बुद्धि की आवश्यकता होती है।ए आई  बाजार पर कब्जा करने के लिए इन दिनों माइक्रोसॉफ्ट के “चैटजीपीटी” और गूगल के “बार्ड” के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा इसका एक उदाहरण है |

फेक न्यूज की समस्या को डीप फेक ने और ज्यादा गंभीर बना दिया है |असल में डीप फेक में आर्टिफिसियल इंटेलीजेंस एवं आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के जरिए किसी वीडियो क्लिप  या फोटो पर किसी और व्यक्ति का चेहरा लगाने का चलन तेजी से बढ़ा है| इसके जरिए कृत्रिम तरीके से ऐसे क्लिप या फोटो विकसित कर लिए जा रहे हैं जो देखने में बिल्कुल वास्तविक लगते हैं|‘डीपफेक' एक बिल्कुल अलग  तरह  की समस्या  है इसमें वीडियो सही होता है पर तकनीक से चेहरे, वातावरण या असली औडियो बदल दिया जाता है और देखने वाले को इसका बिलकुल पता नहीं लगता कि वह डीप फेक वीडियो देख रहा है |एक बार ऐसे वीडियो जब किसी सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर आ जाते हैं तो उनकी प्रसार गति बहुत तेज हो जाती है|इंटरनेट पर ऐसे करोडो डीप फेक वीडियो मौजूद हैं| देश में जहाँ डिजीटल साक्षरता बहुत कम है वहां डीप फेक वीडियो समस्या को गंभीर करते है |हालाँकि  ऐसे वीडियो को पकड़ना आसान भी हो सकता है क्योंकि ऐसे वीडियो इंटरनेट पर मौजूद असली वीडियो से ही बनाये जा सकते हैं पर इस काम को करने के लिए जिस धैर्य की जरुरत होती है| वह भारतीयों के पास वहाट्स एप मेसेज को फॉरवर्ड करने में नहीं दिखती |ऐसे में जब फेक न्यूज वीडियो के रूप में मिलेगी तो लोग उसे तुरंत आगे बढ़ने में नहीं हिचकते |

लेकिन ए आई  मॉडल की अगली पीढ़ी, जिसे जनरेटिव ए आई  कहा जाता है |समस्या को एक अगले स्तर पर ले जाती है | Dall-e, ChatGPT, मेटा का मेक-ए-वीडियो जैसी साईट्स से आप ऐसी फोटो, वीडियो बनवा सकते हैं| जो पूरी तरह काल्पनिक है जैसे पिछले दिनों वायरल हुई तस्वीर जिसमें बराक ओबामा और एंजेला मार्केल की समुद्र के किनारे छुट्टिया बिताते हुए दिख रहे है असल में ए आई द्वारा निर्मित की गयी हैं|इन साईट्स को  वीडियो या फोटो को रूपांतरित करने के लिए किसी अन्य  स्रोत की आवश्यकता नहीं होती है। इसके बजाय, वे संकेतों के आधार पर एक छवि, पाठ या वीडियो उत्पन्न कर सकते हैं। ये अभी भी विकास के प्रारंभिक चरण में हैं, लेकिन इससे भविष्य में नुकसान की बड़ी सम्भावना दिखती है , क्योंकि हमारे पास साक्ष्य के रूप में उपयोग करने के लिए कोई मूल सामग्री नहीं होगी ही नहीं|

ट्विटर और फेसबुक सहित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पिछले दिनों साझा किए गए दो सिंथेटिक वीडियो  और एक हिंदी अखबार की रिपोर्ट का डिजिटल रूप से बदला हुआ स्क्रीनशॉट, वीडियो बनाने में एआई टूल्स के खतरनाक परिणामों को उजागर करता है|

ए सी नेल्सन की हालिया इंडिया इंटरनेट रिपोर्ट 2023' शीर्षक वाली रिपोर्ट के आंकड़े चौंकाते हैं ग्रामीण भारत में 425 मिलियन से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता थे, जो शहरी भारत की तुलना में चौआलीस प्रतिशत  अधिक था, जिसमें 295 मिलियन लोग नियमित रूप से इंटरनेट का उपयोग करते थे। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि लगभग आधा ग्रामीण भारत इंटरनेट तीस प्रतिशत  की मजबूत वृद्धि के साथ, इंटरनेट पर है और जिसके  भविष्य में और बढ़ने की सम्भावना है|

 सामान्यतः: सोशल मीडिया एक तरह के ईको चैंबर का निर्माण करते हैं जिनमें एक जैसी रुचियों और प्रव्रत्तियों वाले लोग आपस में जुड़ते हैं |ऐसे में डीप फेक वीडियो के प्रसार को रोकने के लिए बुनियादी शिक्षा में मीडिया साक्षरता और आलोचनात्मक सोच पाठ्यक्रम को शामिल करने की आवश्यकता है ताकि जागरूकता को बढ़ावा दिया जा सके| जिससे  लोगों को फेक न्यूज  से बचाने में मदद करने के लिए एक सक्रिय दृष्टिकोण का निर्माण किया जा सके। डीपफेक और फेक न्यूज  से सतर्क रहने के लिए हमें आज और आने वाले कल के जटिल डिजिटल परिदृश्य वाले भविष्य  के लिए, सभी उम्र के लोगों को तैयार करने में पूरे भारत में एक बहु-आयामी, क्रॉस-सेक्टर दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

 अमर उजाला में 29/03/2023  को प्रकाशित  

पसंद आया हो तो