Wednesday, November 22, 2023

एक खतरनाक चुनौती है 'डीप फेक '

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में  'डीप फेक' बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटलीजेंस (AI) के दुरुपयोग को चिह्नित किया और कहा कि मीडिया को इस संकट के बारे में लोगों को शिक्षित करना चाहिए। प्रधानमंत्री सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके वायरल वीडियो के बारे में चर्चा कर रहे थे , जिनमें वो गाना गाते और गरबा खेलते हुए दिखाई दे रहे हैं।असल में उस वीडियो में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नहीं थे |यह आर्टिफिशियल इंटलीजेंस (AI) द्वारा निर्मित एक डीप फेक था |फोटो और वीडियो से छेड़ छाड़ कर बने डीप फेक साल 2016 से ही चलन में हैं लेकिन तब इनका ज्यादातर इस्तेमाल मजाक में होता था |लेकिन अब लिप सिंक कर  डीपफेक बनने लगे हैं |पांच साल पहले ऐसा करने के लिए बहुत से सारे इंटरनेट डाटा की जरुरत पड़ती थी लेकिन अब एक से दो मिनट में कोई भी 'डीप फेक' बना सकता है |जिसके लिए किसी ख़ास तकनीकी कौशल की जरुरत भी नहीं है |लेन्सा ए आई, 'डीप फेक वेब ,रिफेस ,माई हेरिटेज और डीप फेस लैब जैसी सैकड़ो वेबसाईट और एप हैं जहाँ कोई भी किसी का 'डीप फेक' बना सकता है |ऐसे में वो लोग ज्यादा खतरे में हैं जिनकी तस्वीरें और वीडियो इंटरनेट पर बहुतायत में उपलब्ध हैं |

यह भी कैसी विडंबना है कि तकनीक ने एक तरफ हमारे जीवन को काफी आसान बनाया है, दूसरी तरफ कई स्तरों पर अराजकता भी पैदा कर दी है। आज सूचनाओं के संजाल में यह तय करना मुश्किल है कि क्या सही है क्या गलत। इससे हमारे समाज के सामने एक नई चुनौती पैदा हो गई है। गलत सूचनाओं को पहचानना और उनसे निपटना आज के दौर के लिए एक बड़ा सबक है। फेक न्यूज आज के समय का सच है। फेक न्यूज ज्यादातर भ्रमित करने वाली सूचनाएं होती हैं। अक्सर झूठे संदर्भ या गलत संबंधों को आधार बनाकर ऐसी सूचनाएं फैलाई जाती हैं। कुछ साल पहले, पत्रकारिता में आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस के आगमन  ने  पत्रकारिता उद्योग में काफी उम्मीदें बढ़ाई थी कि इससे  समाचारों का वितरण  एक नयी पीढी में पहुंचेगा और पत्रकारिता जगत में  क्रांतिकारी उलटफेर होगा। उम्मीद तो यह भी जताई जा रही थी कि आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस से फेक न्यूज  और मिस इन्फोर्मेशन  के प्रसार को रोकने का एक प्रभावी तरीका भी मिल जाएगा पर व्यवहार में इसके उलट ही हो रहा है | एक तरफ प्रौद्योगिकी ने आर्थिक और सामाजिक विकास किया है तो दूसरी फेक न्यज  में काफी  वृद्धि हुई है| लोकतांत्रिक राजनीति के लिए अड़चन  पैदा करने में और चारित्रिक हत्या करने में  इंटरनेट एक शक्तिशाली औजार के रूप में उभरा है|अपने सरलतम रूप में, एआई को इस तरह से समझा जा सकता है कि उन चीजों को करने के लिए कंप्यूटर का उपयोग किया जाता  है जिनके लिए मानव बुद्धि की आवश्यकता होती है।

फेक न्यूज की समस्या को डीप फेक ने और ज्यादा गंभीर बना दिया है |असल में डीप फेक में आर्टिफिसियल इंटेलीजेंस एवं आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के जरिए किसी वीडियो क्लिप  या फोटो पर किसी और व्यक्ति का चेहरा लगाने का चलन तेजी से बढ़ा है| इसके जरिए कृत्रिम तरीके से ऐसे क्लिप या फोटो विकसित कर लिए जा रहे हैं जो देखने में बिल्कुल वास्तविक लगते हैं|‘डीपफेक' एक बिल्कुल अलग  तरह  की समस्या  है इसमें वीडियो सही होता है पर तकनीक से चेहरे, वातावरण या असली औडियो बदल दिया जाता है और देखने वाले को इसका बिलकुल पता नहीं लगता कि वह डीप फेक वीडियो देख रहा है |एक बार ऐसे वीडियो जब किसी सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर आ जाते हैं तो उनकी प्रसार गति बहुत तेज हो जाती है| देश में जहाँ डिजीटल साक्षरता बहुत कम है वहां डीप फेक वीडियो समस्या को गंभीर करते है |हालाँकि  ऐसे वीडियो को पकड़ना आसान भी हो सकता है क्योंकि ऐसे वीडियो इंटरनेट पर मौजूद असली वीडियो से ही बनाये जा सकते हैं पर इस काम को करने के लिए जिस धैर्य की जरुरत होती है| वह भारतीयों के पास वहाट्स एप मेसेज को फॉरवर्ड करने में नहीं दिखती |ऐसे में जब फेक न्यूज वीडियो के रूप में मिलेगी तो लोग उसे तुरंत आगे बढ़ने में नहीं हिचकते |

डीपफ़ेक बेहद पेचीदा तकनीक है. इसके लिए मशीन लर्निंग यानी कंप्यूटर में दक्षता होनी चाहिए|डीपफे़क कंटेंट दो एल्गोरिदम का उपयोग करके बनाई जाती है, जो एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करती है|एक को डिकोडर कहते हैं तो दूसरे को एनकोडर|इसमें फेक डिजिटल कंटेंट बनाता है और डिकोडर से यह पता लगाने के लिए कहता है कि कंटेंट रियल है या नकली|हर बार डिकोडर कंटेंट को रियल या फे़क के रूप में सही ढंग से पहचानता है, फिर वह उस जानकारी को एनकोडर को भेज देता है ताकि अगले डीपफे़क में गलतियां सुधार करके उसे और बेहतर किया जा सके|दोनों प्रक्रियाओं को मिलाकर जेनरेटिव एडवर्सरियल नेटवर्क बनाते हैं जिसे जीएएन कहा जाता है|

एक बार ऐसे वीडियो जब किसी सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर आ जाते हैं तो उनकी प्रसार गति बहुत तेज हो जाती है|इंटरनेट पर ऐसे करोडो डीप फेक वीडियो मौजूद हैं| इस तकनीक की शुरुआत अश्लील कंटेंट बनाने से हुई| पोर्नोग्राफी में इस तकनीक का काफी इस्तेमाल होता है. अभिनेता  और अभिनेत्री  का चेहरा बदल के अश्लील कंटेंट पोर्न साइट्स पर पोस्ट किया जाता है |

डीपट्रेस की रिपोर्ट के अनुसार,2019 में ऑनलाइन पाए गए डीपफेक वीडियो में छियानबे प्रतिशत अश्लील कंटेंट था|इसके अलावा इस तकनीक का इस्तेमाल मनोरंजन के लिए भी किया जाता है. इन डीपफे़क वीडियो का मकसद देखनेवालों को ये यकीन दिलाना होता है जो हुआ ही नहीं है | डीपफे़क कंटेंट की पहचान करने के लिए कुछ ख़ास चीज़ो पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी है|उनमें सबसे पहले आती है चेहरे की स्थिति | अक्सर डीपफे़क तकनीक चेहरे और आँख की स्थिति  में मात खा जाता है| इसमें पलकों का झपकना भी शामिल है|

ऐसे में डीप फेक वीडियो के प्रसार को रोकने के लिए बुनियादी शिक्षा में मीडिया साक्षरता और आलोचनात्मक सोच को पाठ्यक्रम में  शामिल करने की आवश्यकता है ताकि जागरूकता को बढ़ावा दिया जा सके| जिससे  लोगों को फेक न्यूज  से बचाने में मदद करने के लिए एक सक्रिय दृष्टिकोण का निर्माण किया जा सके। डीपफेक और फेक न्यूज  से सतर्क रहने के लिए हमें आज और आने वाले कल के जटिल डिजिटल परिदृश्य वाले भविष्य  के लिए, सभी उम्र के लोगों को तैयार करने में पूरे भारत में एक बहु-आयामी, क्रॉस-सेक्टर दृष्टिकोण की आवश्यकता है।जिसमें एक अहम् मुद्दा अपनी निजता को बचाए रखने का भी है |'डीप फेक' का शिकार कोई भी कभी भी हो सकता है |अगर हम इस नजरिये से सोचेंगे तो 'डीप फेक' की समस्या से लड़ने में ज्यादा आसानी होगी |

 प्रभात खबर में 22/11/2023 को प्रकाशित 


Friday, November 17, 2023

डीप फेक वीडियो आसान नहीं पहचान कर पाना

डिजिटल माध्यम पर दिखने वाली हर चीज सच नहीं होती, इसे डीप फेक वीडियो के बहुप्रसारित होने से भी समझा जा सकता है। हाल में एक अभिनेत्री की ऐसी वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित होने के बाद से इस बारे में चिंता बढ़ी है |हाल ही में अभिनेत्री रश्मिका मंदाना का एक डीप फेक वीडियो इंटरनेट मीडिया पर बहुप्रसारित हुआ है। इसने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि सूचनाओं के संजाल में यह तय करना बहुत मुश्किल है कि क्या सही है और क्या गलत। इससे हमारे समाज के सामने एक नई चुनौती पैदा हो गई है। वस्तुत: डिजिटल माध्यमों से हम तक पहुंचने वाली गलत सूचनाओं को पहचानना और उनसे निपटना आज के दौर के लिए एक बड़ा सबक है। फेक न्यूज आज के समय का सच है। फेक न्यूज ज्यादातर भ्रमित करने वाली सूचनाएं होती हैं। अक्सर झूठे संदर्भ या गलत संबंधों को आधार बनाकर ऐसी सूचनाएं फैलाई जाती हैं। लेकिन डीप फेक वीडियो समस्या को और गंभीर बनाते हैं। जैसे अभिनेत्री रश्मिका मंदाना के डीप फेक में हुआ, जिसमें शरीर किसी और का दिख रहा है, परंतु चेहरा रश्मिका का लगा हुआ था। इंटरनेट मीडिया पर तो लोग पहली बार में इस वीडियो की असलियत को पहचान ही नहीं पाए। एक झलक में देखने पर चेहरे के हाव भाव एकदम असली लग रहे थे। कई बार देखने पर ही यह समझा जा सकता है कि यह वीडियो फेक है। लिहाजा इस तरह के फर्जी वीडियो पर पूर्ण नियंत्रण के उपाय के बारे में विचार करना होगा।

वैसे केंद्र सरकार ने ऐसे डीप फेक वीडियो पर सख्त नाराजगी जाहिर की है। केंद्र सरकार ने एक्स, इंस्टाग्राम और फेसबुक समेत सभी इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्मों से आइटी नियमों के तहत शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर छेड़छाड़ की गई तस्वीरों को हटाने के लिए कहा है। यह सही है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आगमन ने पत्रकारिता जगत में काफी उम्मीद बढ़ाई थी कि इससे समाचारों का वितरण एक नई पीढ़ी तक पहुंचेगा और पत्रकारिता जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन संभव हो सकता है। उम्मीद तो यह भी जताई जा रही थी कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से फेक न्यूज और मिस इन्फोर्मेशन के प्रसार को रोकने का एक प्रभावी तरीका भी मिल जाएगा, परंतु व्यवहार में इसके उलट ही हो रहा है। एक तरफ प्रौद्योगिकी ने आर्थिक और सामाजिक विकास किया है तो दूसरी फेक न्यूज में काफी वृद्धि हुई है। 

शक्तिशाली औजार के रूप में उभरा इंटरनेट : लोकतांत्रिक राजनीति के लिए अड़चन पैदा करने में और चारित्रिक हत्या करने में इंटरनेट एक शक्तिशाली औजार के रूप में उभरा है। फेक न्यूज की समस्या को डीप फेक ने और ज्यादा गंभीर बना दिया है। असल में डीप फेक में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के जरिये किसी वीडियो क्लिप या फोटो पर किसी और व्यक्ति का चेहरा लगाने का चलन तेजी से बढ़ा है। इसके माध्यम से कृत्रिम तरीके से ऐसे क्लिप या फोटो विकसित कर लिए जा रहे हैं जो देखने में बिल्कुल वास्तविक लगते हैं। 'डीप फेक' एक बिल्कुल अलग तरह की समस्या है। इसमें वीडियो सही होता है, पर तकनीक से चेहरे, वातावरण या असली आडियो को बदल दिया जाता है और देखने वाले को इसका बिलकुल पता नहीं लगता कि वह डीप फेक वीडियो देख रहा है। एक बार ऐसे वीडियो जब किसी इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर आ जाते हैं तो उनकी प्रसार की गति बहुत तेज हो जाती है। 

इंटरनेट पर ऐसे करोडों डीप फेक वीडियो मौजूद हैं। देश में डिजिटल साक्षरता बहुत कम है, लिहाजा डीप फेक वीडियो समस्या को गंभीर करते हैं। इससे बचाव के लिए केंद्र सरकार ने आइटी नियमों के उपबंध और इंटरनेट मीडिया कंपनियों के दायित्वों का हवाला देते हुए इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म को एक एडवाइजरी जारी की है। इस  एडवाइजरी के अनुसार, इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म को उस सामग्री को हटाने या निष्क्रिय करने के लिए सभी उपाय करने चाहिए, जो फेक हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि इंटरनेट मीडिया मध्यस्थों को नियमों और विनियमों, गोपनीयता नीति या उपयोगकर्ता समझौते को सुनिश्चित करने सहित उचित नियमों का पालन करना चाहिए और उपयोगकर्ताओं को किसी अन्य व्यक्ति का प्रतिरूपण करने वाली किसी भी सामग्री को पोस्ट नहीं करने के लिए सूचित करना चाहिए। 

डीप फेक, गलत सूचना का नवीनतम और उससे भी अधिक खतरनाक स्वरूप है। लिहाजा इंटरनेट मीडिया को इससे निपटने की जरूरत है। आइटी एक्ट 2000 के वर्ग 66 ई के तहत बिना अनुमति किसी की फोटो और वीडियो बनाने पर तीन साल की सजा और दो लाख रुपये जुर्माना का प्रविधान है। इस नियम के तहत गोपनीयता के उल्लंघन के दोषी पाए जाने पर कार्रवाई का नियम है। इसमें किसी की व्यक्तिगत फोटो बिना अनुमति कैप्चर करने और उसे शेयर करने के आरोप के तहत कार्रवाई हो सकती है। आइटी एक्ट सेक्शन 67 के तहत साफ्टवेयर या किसी अन्य इलेक्ट्रानिक तरीके से किसी की अश्लील फोटो बनाने और उसे शेयर करने पर तीन साल जेल और पांच लाख रुपये जुर्माना लगाया जा सकता है। ऐसा बार-बार करने पर अपराधी को पांच साल की जेल और दस लाख रुपये का जुर्माना देना पड़ सकता है। डीपफेक के मामले में आइपीसी की धारा 66सी, 66ई और 67 के तहत कार्रवाई की जा सकती है। इसमें आइपीसी की धारा 153ए और 295ए के तहत मुकदमा दर्ज करके कार्रवाई की जा सकती है।

दैनिक जागरण में 17/11/2023 को प्रकाशित 

Friday, November 10, 2023

चरित्र हनन की तकनीक

 पुष्पा’ जैसी सफल  फ़िल्म से प्रसिद्द हुई  अभिनेत्री  रश्मिका मंदाना की चर्चा फिलहाल उनकी एक्टिंग को न लेकर बल्कि एक वायरल वीडियो को लेकर हो रही है. डीपफ़ेक वीडियो के जरिए तैयार किये गए इस वीडियो में नज़र आ रही एक महिला को रश्मिका मंदाना की तरह दिखाने की कोशिश की गई| अमिताभ बच्चन ने इस वीडियो का सन्दर्भ  देते हुए एक्स पर लिखा  कि इस मामले में क़ानूनी कार्रवाई होनी चाहिए|, केंद्रीय (राज्य प्रभार) मंत्री कौशल विकास और उद्यमशीलता मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय राजीव चंद्रशेखर ने कहा है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि मिस इंफॉर्मेशन, उनके प्लेटफॉर्म पर शेयर ना की जाए|कुछ साल पहले, पत्रकारिता में आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस के आगमन  ने  पत्रकारिता उद्योग में काफी उम्मीदें बढ़ाई थी कि इससे  समाचारों का वितरण  एक नयी पीढी में पहुंचेगा और पत्रकारिता जगत में  क्रांतिकारी उलटफेर होगा। उम्मीद तो यह भी जताई जा रही थी कि आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस से फेक न्यूज  और मिस इन्फोर्मेशन  के प्रसार को रोकने का एक प्रभावी तरीका भी मिल जाएगा पर व्यवहार में इसके उलट ही हो रहा है | एक तरफ प्रौद्योगिकी ने आर्थिक और सामाजिक विकास किया है तो दूसरी फेक न्यज  में काफी  वृद्धि हुई है| लोकतांत्रिक राजनीति के लिए अड़चन  पैदा करने में और चारित्रिक हत्या करने में  इंटरनेट एक शक्तिशाली औजार के रूप में उभरा है|

असल में डीप फेक में आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस एवं आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के जरिए किसी वीडियो क्लिप  या फोटो पर किसी और व्यक्ति का चेहरा लगाने का चलन तेजी से बढ़ा है| इसके जरिए कृत्रिम तरीके से ऐसे क्लिप या फोटो विकसित कर लिए जा रहे हैं जो देखने में बिल्कुल वास्तविक लगते हैं|‘डीपफेक' एक बिल्कुल अलग  तरह  की समस्या  है इसमें वीडियो सही होता है पर तकनीक से चेहरे, वातावरण या असली औडियो बदल दिया जाता है और देखने वाले को इसका बिलकुल पता नहीं लगता कि वह डीप फेक वीडियो देख रहा है | डीपफ़ेक बेहद पेचीदा तकनीक है. इसके लिए मशीन लर्निंग यानी कंप्यूटर में दक्षता होनी चाहिए|डीपफे़क कंटेंट दो एल्गोरिदम का उपयोग करके बनाई जाती है, जो एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करती है|एक को डिकोडर कहते हैं तो दूसरे को एनकोडर|इसमें फेक डिजिटल कंटेंट बनाता है और डिकोडर से यह पता लगाने के लिए कहता है कि कंटेंट रियल है या नकली|हर बार डिकोडर कंटेंट को रियल या फे़क के रूप में सही ढंग से पहचानता है, फिर वह उस जानकारी को एनकोडर को भेज देता है ताकि अगले डीपफे़क में गलतियां सुधार करके उसे और बेहतर किया जा सके|दोनों प्रक्रियाओं को मिलाकर जेनरेटिव एडवर्सरियल नेटवर्क बनाते हैं जिसे जीएएन कहा जाता है|

एक बार ऐसे वीडियो जब किसी सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर आ जाते हैं तो उनकी प्रसार गति बहुत तेज हो जाती है|इंटरनेट पर ऐसे करोडो डीप फेक वीडियो मौजूद हैं| इस तकनीक की शुरुआत अश्लील कंटेंट बनाने से हुई| पोर्नोग्राफी में इस तकनीक का काफी इस्तेमाल होता है. अभिनेता  और अभिनेत्री  का चेहरा बदल के अश्लील कंटेंट पोर्न साइट्स पर पोस्ट किया जाता है |

डीपट्रेस की रिपोर्ट के अनुसार,2019 में ऑनलाइन पाए गए डीपफेक वीडियो में छियानबे प्रतिशत अश्लील कंटेंट था|इसके अलावा इस तकनीक का इस्तेमाल मनोरंजन के लिए भी किया जाता है. इन डीपफे़क वीडियो का मकसद देखनेवालों को ये यकीन दिलाना होता है जो हुआ ही नहीं है | डीपफे़क कंटेंट की पहचान करने के लिए कुछ ख़ास चीज़ो पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी है|उनमें सबसे पहले आती है चेहरे की स्थिति | अक्सर डीपफे़क तकनीक चेहरे और आँख की स्थिति  में मात खा जाता है| इसमें पलकों का झपकना भी शामिल है|

 देश में जहाँ डिजीटल साक्षरता बहुत कम है वहां डीप फेक वीडियो समस्या को गंभीर करते है |हालाँकि  ऐसे वीडियो को पकड़ना आसान भी हो सकता है क्योंकि ऐसे वीडियो इंटरनेट पर मौजूद असली वीडियो से ही बनाये जा सकते हैं पर इस काम को करने के लिए जिस धैर्य की जरुरत होती है| वह भारतीयों के पास वहाट्स एप मेसेज को फॉरवर्ड करने में नहीं दिखती |ऐसे में जब फेक न्यूज वीडियो के रूप में मिलेगी तो लोग उसे तुरंत आगे बढ़ने में नहीं हिचकते | ए सी नेल्सन की हालिया इंडिया इंटरनेट रिपोर्ट 2023' शीर्षक वाली रिपोर्ट के आंकड़े चौंकाते हैं ग्रामीण भारत में 425 मिलियन से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता थे, जो शहरी भारत की तुलना में चौआलीस प्रतिशत  अधिक था, जिसमें 295 मिलियन लोग नियमित रूप से इंटरनेट का उपयोग करते थे। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि लगभग आधा ग्रामीण भारत इंटरनेट तीस प्रतिशत  की मजबूत वृद्धि के साथ, इंटरनेट पर है और जिसके  भविष्य में और बढ़ने की सम्भावना है| सामान्यतः: सोशल मीडिया एक तरह के ईको चैंबर का निर्माण करते हैं जिनमें एक जैसी रुचियों और प्रव्रत्तियों वाले लोग आपस में जुड़ते हैं |ऐसे में डीप फेक वीडियो के प्रसार को रोकने के लिए बुनियादी शिक्षा में मीडिया साक्षरता और आलोचनात्मक सोच पाठ्यक्रम को शामिल करने की आवश्यकता है ताकि जागरूकता को बढ़ावा दिया जा सके| जिससे  लोगों को फेक न्यूज  से बचाने में मदद करने के लिए एक सक्रिय दृष्टिकोण का निर्माण किया जा सके। डीपफेक और फेक न्यूज  से सतर्क रहने के लिए हमें आज और आने वाले कल के जटिल डिजिटल परिदृश्य वाले भविष्य  के लिए, सभी उम्र के लोगों को तैयार करने में पूरे भारत में एक बहु-आयामी, क्रॉस-सेक्टर दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

 अमर उजाला में 10/11/2023 को प्रकाशित 

Friday, October 20, 2023

फेक वीडियो की बढ़ती चुनौती

 यह भी कैसी विडंबना है कि तकनीक ने एक तरफ हमारे जीवन को काफी आसान बनाया है, दूसरी तरफ कई स्तरों पर अराजकता भी पैदा कर दी है। आज सूचनाओं के संजाल में यह तय करना मुश्किल है कि क्या सही है क्या गलत। इससे हमारे समाज के सामने एक नई चुनौती पैदा हो गई है। गलत सूचनाओं को पहचानना और उनसे निपटना आज के दौर के लिए एक बड़ा सबक है। फेक न्यूज आज के समय का सच है। फेक न्यूज ज्यादातर भ्रमित करने वाली सूचनाएं होती हैं। अक्सर झूठे संदर्भ या गलत संबंधों को आधार बनाकर ऐसी सूचनाएं फैलाई जाती हैं। हाल ही में मुम्बई उच्च न्यायालय की गोवा पीठ के न्यायाधीश महेश सोनक ने अपने एक व्याख्यान में  कहा कि सोशल मीडिया या मास मीडिया जनसंहार का हथियार बन गया है और उनसे निपटने के लिए अब तक कोई समन्वित कोशिश नहीं की गई है।अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा  ‘‘हम ऐसे युग में रहते हैं, जहां हम कंप्यूटर और स्मार्टफोन जैसी सोचने वाली मशीनों को पसंद करते हैं और उनका महिमामंडन करते हैं। लेकिन हम उन व्यक्तियों पर बेहद संदेह करते हैं या उनसे सावधान भी रहते हैं, जो सोचने की कोशिश करते हैं।कुछ दशक पहले, दुनिया जनसंहार के हथियारों के खिलाफ लड़ रही थी। आज, सोशल मीडिया या मास मीडिया बड़े पैमाने पर ध्यान भटकाने वाले हथियार बन गए हैं और फिर भी उनसे निपटने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए हैं।समाचार न पढ़ने या न देखने से, ऐसा लगा कि मुझे कई मुद्दों के बारे में जानकारी नहीं है। लेकिन मुझे लगता है कि यह गलत जानकारी होने से बेहतर है।

कुछ साल पहले, पत्रकारिता में आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस के आगमन  ने  पत्रकारिता उद्योग में काफी उम्मीदें बढ़ाई थी कि इससे  समाचारों का वितरण  एक नयी पीढी में पहुंचेगा और पत्रकारिता जगत में  क्रांतिकारी उलटफेर होगा। उम्मीद तो यह भी जताई जा रही थी कि आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस से फेक न्यूज  और मिस इन्फोर्मेशन  के प्रसार को रोकने का एक प्रभावी तरीका भी मिल जाएगा पर व्यवहार में इसके उलट ही हो रहा है | एक तरफ प्रौद्योगिकी ने आर्थिक और सामाजिक विकास किया है तो दूसरी फेक न्यज  में काफी  वृद्धि हुई है| लोकतांत्रिक राजनीति के लिए अड़चन  पैदा करने में और चारित्रिक हत्या करने में  इंटरनेट एक शक्तिशाली औजार के रूप में उभरा है|अपने सरलतम रूप में, एआई को इस तरह से समझा जा सकता है कि उन चीजों को करने के लिए कंप्यूटर का उपयोग किया जाता  है जिनके लिए मानव बुद्धि की आवश्यकता होती है।ए आई  बाजार पर कब्जा करने के लिए इन दिनों माइक्रोसॉफ्ट के “चैटजीपीटी” और गूगल के “बार्ड” के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा इसका एक उदाहरण है |

फेक न्यूज की समस्या को डीप फेक ने और ज्यादा गंभीर बना दिया है |असल में डीप फेक में आर्टिफिसियल इंटेलीजेंस एवं आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के जरिए किसी वीडियो क्लिप  या फोटो पर किसी और व्यक्ति का चेहरा लगाने का चलन तेजी से बढ़ा है| इसके जरिए कृत्रिम तरीके से ऐसे क्लिप या फोटो विकसित कर लिए जा रहे हैं जो देखने में बिल्कुल वास्तविक लगते हैं|‘डीपफेक' एक बिल्कुल अलग  तरह  की समस्या  है इसमें वीडियो सही होता है पर तकनीक से चेहरे, वातावरण या असली औडियो बदल दिया जाता है और देखने वाले को इसका बिलकुल पता नहीं लगता कि वह डीप फेक वीडियो देख रहा है |एक बार ऐसे वीडियो जब किसी सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर आ जाते हैं तो उनकी प्रसार गति बहुत तेज हो जाती है|इंटरनेट पर ऐसे करोडो डीप फेक वीडियो मौजूद हैं| देश में जहाँ डिजीटल साक्षरता बहुत कम है वहां डीप फेक वीडियो समस्या को गंभीर करते है |हालाँकि  ऐसे वीडियो को पकड़ना आसान भी हो सकता है क्योंकि ऐसे वीडियो इंटरनेट पर मौजूद असली वीडियो से ही बनाये जा सकते हैं पर इस काम को करने के लिए जिस धैर्य की जरुरत होती है| वह भारतीयों के पास वहाट्स एप मेसेज को फॉरवर्ड करने में नहीं दिखती |ऐसे में जब फेक न्यूज वीडियो के रूप में मिलेगी तो लोग उसे तुरंत आगे बढ़ने में नहीं हिचकते | ए सी नेल्सन की हालिया इंडिया इंटरनेट रिपोर्ट 2023' शीर्षक वाली रिपोर्ट के आंकड़े चौंकाते हैं ग्रामीण भारत में 425 मिलियन से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता थे, जो शहरी भारत की तुलना में चौआलीस प्रतिशत  अधिक था, जिसमें 295 मिलियन लोग नियमित रूप से इंटरनेट का उपयोग करते थे। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि लगभग आधा ग्रामीण भारत इंटरनेट तीस प्रतिशत  की मजबूत वृद्धि के साथ, इंटरनेट पर है और जिसके  भविष्य में और बढ़ने की सम्भावना है| सामान्यतः: सोशल मीडिया एक तरह के ईको चैंबर का निर्माण करते हैं जिनमें एक जैसी रुचियों और प्रव्रत्तियों वाले लोग आपस में जुड़ते हैं |ऐसे में डीप फेक वीडियो के प्रसार को रोकने के लिए बुनियादी शिक्षा में मीडिया साक्षरता और आलोचनात्मक सोच पाठ्यक्रम को शामिल करने की आवश्यकता है ताकि जागरूकता को बढ़ावा दिया जा सके| जिससे  लोगों को फेक न्यूज  से बचाने में मदद करने के लिए एक सक्रिय दृष्टिकोण का निर्माण किया जा सके। डीपफेक और फेक न्यूज  से सतर्क रहने के लिए हमें आज और आने वाले कल के जटिल डिजिटल परिदृश्य वाले भविष्य  के लिए, सभी उम्र के लोगों को तैयार करने में पूरे भारत में एक बहु-आयामी, क्रॉस-सेक्टर दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

 दैनिक जागरण में 20/10/2023 को प्रकाशित 

Tuesday, October 17, 2023

पर्यावरण की समस्या बने सबकी समस्या

 

आधुनिक विकास की अवधारणा के साथ ही कूड़े की समस्या मानव सभ्यता के साथ आयी .जब तक यह प्रव्रत्ति प्रकृति सापेक्ष थी परेशानी की कोई बात नहीं रही पर इंसान जैसे जैसे प्रकृति को चुनौती देता गया कूड़ा प्रबंधन एक गंभीर समस्या में तब्दील होता गया क्योंकि मानव ऐसा कूड़ा छोड़ रहा था जो प्राकृतिक तरीके से समाप्त  नहीं होता या जिसके क्षय में पर्याप्त समय लगता है और उसी बीच कई गुना और कूड़ा इकट्ठा हो जाता है जो इस प्रक्रिया को और लम्बा कर देता है जिससे कई तरह के प्रदुषण का जन्म होता है और साफ़ –सफाई की समस्या उत्पन्न होती है .देश की हवा लगातार रोगी होती जा रही है .पेट्रोल डीजल और अन्य कार्बन जनित उत्पाद जिसमें कोयला भी शामिल है .तीसरी दुनिया के देश जिसमें भारत भी शामिल है प्रदूषण के मोर्चे पर दोहरी लड़ाई लड़ रहे हैं .

 पेट्रोल डीजल और कोयला ऊर्जा के मुख्य  श्रोत हैं अगर देश के विकास को गति देनी है तो आधारभूत अवस्थापना में निवेश करना ही पड़ेगा और इसमें बड़े पैमाने पर निर्माण भी शामिल है निर्माण के लिए ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए पेट्रोल डीजल और कोयला  आसान विकल्प  पड़ता है दूसरी और निर्माण कार्य के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटान और पक्के निर्माण भी किये जाते हैं जिससे पेट्रोल डीजल और कोयला  के जलने से निकला धुंआ  वातावरण को प्रदूषित करता है . 

ऊर्जा के अन्य गैर परम्परा गत विकल्पों में सौर उर्जा और परमाणु ऊर्जा महंगी है और इनके इस्तेमाल में भारत  काफी पीछे है .पर्यावरण की समस्या देश में भ्रष्टाचार की तरह हो गयी है जानते सभी है पर कोई ठोस कदम न उठाये जाने से सब इसे अपनी नियति मान चुके है .हर साल स्मोग़ की समस्या से दिल्ली और उसके आस –पास इलाके जूझते  हैं. टाटा सेंटर फॉर डेवलपमेंट के सहयोग से क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब शिकागो की रिपोर्ट का अनुमान है कि वर्ष 2100 तक, जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में हर साल लगभग पंद्रह लाख से  अधिक लोग मर सकते हैं . इसका असर सबसे अधिक छह राज्य में होगा .

 इस रिपोर्ट के अनुसार,  उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश ,और महाराष्ट्र देश में जलवायु परिवर्तन से होने वाली कुल मौतों का 64 प्रतिशत से ज्यादा का योगदान देंगे  . पर्यावरण एक चक्रीय व्यवस्था है। अगर इसमें कोई कड़ी टूटती है, तो पूरा चक्र प्रभावित होता है। पर विकास और प्रगति के फेर में हमने इस चक्र की कई कड़ियों से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया है। पूंजीवाद के इस युग में कोई चीज मुफ्त में नहीं मिलती, इस सामान्य ज्ञान को हम प्रकृति के साथ जोड़कर न देख सके, जिसका नतीजा धरती पर अत्यधिक बोझ के रूप में सामने है. 

दुर्भाग्य से भारत में विकास की जो अवधारणा लोगों के मन में है उसमें प्रकृति कहीं भी नहीं है,हालाँकि हमारी विकास की अवधारणा  पश्चिम की विकास सम्बन्धी अवधारणा की ही नकल है पर स्वच्छ पर्यावरण के प्रति जो उनकी जागरूकता है उसका अंश मात्र भी हमारी विकास के प्रति जो दीवानगी है उसमें नहीं दिखती है  .

एक हीट-वेव या प्रदूषण की समस्या को केवल एक आपदा या सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि होना यह चाहिए कि इसे समाज के अलग-अलग  क्षेत्रों  जैसे श्रम, पेयजल, कृषि और बिजली के विभागों के लिए भी  चिंता का विषय होना चाहिए . 

 प्रभात खबर में 17/10/2023 को प्रकाशित 


डेटिंग से शादी तक

 इंटरनेट ने लोक व लोकाचार के तरीकों को काफी हद तक बदल दिया है। बहुत-सी परंपराएं और बहत सारे रिवाज अब अपना रास्ता बदल रहे हैं। यह प्रक्रिया इतनी तेज है कि नया बहुत जल्दी पुराना हो जा रहा है। जीवन साथी  के चुनाव  और दोस्ती  जैसी भावनात्मक   और  निहायत व्यक्तिगत  जरूरतों   के लिए  दुनिया भर  के डेटिंग एप  निर्माताओं  की निगाह  में भारत सबसे  पसंदीदा जगह बन कर उभर  रहा है | उदारीकरण के पश्चात बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और रोजगार की संभावनाएं  बड़े शहरों ज्यादा बढीं ,जड़ों और रिश्तों से कटे ऐसे युवा  भावनात्मक  सम्बल पाने के लिए और ऐसे रिश्ते बनाने में जिसे वो शादी के अंजाम तक पहुंचा सकें  डेटिंग एप का सहारा ले रहे हैं |विवाह तय करने जैसी सामाजिक प्रक्रिया पहले परिवार और यहां तक कि खानदान के बड़े बुजुर्गों, मित्रों, रिश्तेदारों वगैरह को शामिल करते हुए आगे बढ़ती थी, अब उसमें भी ‘ई’ लग गया है। 

मैट्रीमोनी वेबसाइट से शुरू हुआ ये सिलसिला अब डेटिंग एप्प्स तक पहुँच गया है । आम तौर पर इंटरनेट की सहायता से किसी सम्बन्ध  को बनाना एक विशुद्ध शहरी घटना माना जाता था और छोटे शहरों को इस प्रवृत्ति से दूर माना जाता था |इस सांस्कृतिक अवरोध के बावजूद डेटिंग का व्यवसाय भारत में तेजी से पैर पसार रहा है |इंटरनेट साईट स्टेटीस्टा के अनुसार इस समय देश में 38 मिलीयन लोग डेटिंग एप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और रेवेन्यु के हिसाब से यह संख्या विश्व में चीन और अमेरिका के बाद तीसरे नम्बर की सबसे बड़ी संख्या है |ऑनलाइन  प्यार भारत में एक नयी परिघटना है|साल 2013 से शादी कराने वाली वेबसाईटस सुर्ख़ियों में आना शुरू हुईं पर डेटिंग एप का ट्रेंड साल 2014 में टिंडर के आने के बाद शुरू हुआ और तबसे वैश्विक रूप से लोकप्रिय डेटिंग एप बम्ब्ल , हिन्ज देश में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुके हैं |जब से होमोसेक्सुअल्टी भारत में अपराध न रही “एलजीबीटीक्यू” समुदाय के लिए ग्रिंडर जैसे एप भी भारत आये पर बड़ी कम्पनियों में शामिल टिंडर और बम्ब्ल भी समान लिंगी साथियों के चुनाव की सुविधा भी देते हैं | देश की सांस्कृतिक विविधता के हिसाब से सभी प्रचलित डेटिंग एप्स अंग्रेजी भाषा को ही प्रमुखता देते हैं , टिंडर ने हिन्दी भाषा में भी अपनी सेवा देनी शुरू कर दी है पर अभी भी अंग्रेज़ी का बोलबाला है जबकि देश की मात्र बारह प्रतिशत जनसंख्या ही अंग्रजी बोलती है |

भारत में भाषा की समस्या डेटिंग एप के मामले में उतनी गंभीर नहीं क्योंकि लोग मोटे तौर पर यह जानते हैं कि एप चलता कैसे है जब संदेशों के आदान प्रदान की बात आती है तो लोग हिन्दी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को रोमन में लिख लेते हैं |इन एप्स ने अपने भारतीय संस्करणों में भारतीयता को भी अपनाया है | सम्बन्ध बनाने में शादी की ही प्रधानता रही है और इसीलिये भारत में शादियाँ कराने वाली वेबसाईट्स तेजी से उभरी |देश की सबसे बड़ी शादी कराने वाली वेबसाईट मेट्रेमोनी डॉट कॉम के देश में पांच मिलीयन सक्रीय उपभोक्ता हैं | डेटिंग पूरी तरह से पश्चिमी अवधारणा है और जब ये विदेशी वेबसाईट्स भारत आयीं तो इन्हें दिक्कतों का सामना करना पडा| इस स्थिति का मुकाबला करने में इन्होने अपनी रणनीति बदली| जिसमें डेटिंग के सहारे ऐसे गंभीर सम्बन्ध विकसित करने पर जोर दिया गया| जो शादी तक पहुंचें मतलब ऐसे एप्स अपनी एप्रोच में न तो डेटिंग जैसे कैजुवल रहें और न ही शादी कराने वाली वेबसाईट्स जैसे कठोर |सांस्कृतिक जटिलताओं के कारण देश में डेटिंग एप्स को ज्यादा मान्यता नहीं दी जाती है पर जब छोटे शहरों में पले बढ़े लोग अपने शहरों  से बाहर निकले तो ये एप उनकी पसंद में शामिल हो गए पर वे अपने शहरों में इनका इस्तेमाल ज्यादा नहीं करते रहे हैं |विडम्बना यह हुई कि जब देश में लॉक डाउन लगा तो ये अलग –अलग जगहों पर बिखरे हुए लोग अपने घर लौट आये |

डेटिंग एप ट्रूली मैडली की शुरुआत भारत में साल 2014 में हुई|  उसके रेवन्यू में साल 2020 में दस गुना बढ़ोत्तरी उन शहरों से हुई जो देश के मेट्रोपोलिटन शहर नहीं थे और उसके कुल रेवन्यू में साल 2019 के मुकाबले चार गुना बढ़ोत्तरी हुई |सामाजिक रूप से देखें, तो जहां पहले शादी के केंद्र में लड़का और लड़की का परिवार रहा करता था, अब वह धुरी खिसककर लड़के व लड़की की इच्छा पर केंद्रित होती दिखती है। वर या वधू तलाशने का काम अब मैट्रीमोनिअल साइट व ऑनलाइन डेटिंग साइट कर रही हैं और वह भी बगैर किसी बिचौलिये के। वैसे यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इससे पारदर्शिता आई है। कुछ और तथ्यों पर गौर किया जाना भी जरूरी है। इन एप्स  से बने रिश्तों  में धोखाधड़ी के कई मामले भी सामने आए हैं। दी गई जानकारी कितनी सही है, इसे जांचने का कोई तरीका ये एप्स उपलब्ध नहीं कराते। उनकी जिम्मेदारी लड़का-लड़की को मिलाने तक सीमित रहती है। हालांकि, झूठ बोलकर शादी कर लेने में नया कुछ नहीं, पर इंटरनेट एप्स से बने रिश्तों  के पीछे कोई सामजिक दबाव नहीं काम करता और गड़बड़ी की स्थिति में आप किसी मध्यस्थ को दोष देने की स्थिति में भी नहीं होते, और न कोई ऐसा होता है, जो बिगड़ी बात को पटरी पर लाने में मदद करे।

 अमर उजाला में 17/10/2023 को प्रकाशित 

Monday, September 25, 2023

नाबालिगों के लिए इंटरनेट मीडिया पर सीमित पाबंदी

कर्नाटक हाई कोर्ट ने 19 सितंबर को अपनी एक टिप्पणी में कहा अगर नौजवानों और विशेषकर स्कूल के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का प्रतिबंध लगा दिया जाए तो ये देश के लिए अच्छा होगा. इसके साथ ही कोर्ट ने सुझाव देते हुए ये भी कहा कि जिस उम्र में उन्हें वोट करने का अधिकार मिलता है तभी उन्हें सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने का मौका दिया जाना चाहिए. ये उम्र 21 या 18 हो सकती है| जस्टिस जी. नरेंद्र और जस्टिस विजयकुमार ए. पाटिल की खंडपीठ एक्स कॉर्प (पूर्व में ट्विटर) की अपील की सुनवाई कर रही थी. इसी दौरान ये टिप्पणी की गई. खंडपीड ने कहा, “स्कूल जाने वाले बच्चे सोशल मीडिया के आदी हो चुके हैं और ये देश के लिए अच्छा रहेगा कि उन पर पाबंदी लगाई जाए |लम्बे समय तक  स्क्रीन का मतलब घरों में सिर्फ टीवी ही  होता था पर आज उस स्क्रीन के साथ एक और स्क्रीन हमारी जिन्दगी का महत्वपूर्ण  हिस्सा बन गयी है वो है हमारे स्मार्ट फोन की स्क्रीन जहाँ मनोरंजन से लेकर समाचारों तक सब कुछ मौजूद है |

यह मोबाईल स्क्रीन अभिभावकों के लिए एक अंतहीन गुस्से का कारण बन रही है| एक तरफ बच्चे मोबाईल चाहते हैं दूसरी तरफ अभिभावक भले ही मोबाईल के लती बन चुके हैं और यह जानते हुए भी कि मोबाईल इंटरनेट में बहुत सी अच्छी चीजें बच्चों के लिए हैं, वे उन्हें देना भी चाहते हैं और नहीं भी ,यह सब मिलकर भारतीय घरों में  मानसिक द्वन्द का एक ऐसा वातावरण रच रहे हैं जिससे हर परिवार पीड़ित  है | हालांकि माध्यमों के चुनाव को लेकर भारतीय घरों में यह द्वन्द नया नहीं है पहले रेडियो सुनने फिर टीवी जब घर –घर पहुंचा तो ऐसा ही कुछ टेलीविजन के साथ हुआ कि टेलीविजन बच्चों को बिगाड़ देगा उन्हें ज्यादा टीवी नहीं देखना चाहिए ऐसी बहसें हर घर की कहानी हुआ करती थी पर मोबाईल स्क्रीन  की कहानी इन सब माध्यमों से अलग है |यह एक बहुत शक्तिशाली माध्यम है जिसके साथ फोन और कैमरा लगा हुआ है जो हमारी जेब में आ जाता है या यूँ कहें यह हमें व्यस्त रहने के लिए उकसाता है और फिर हमारे व्याकुलता के स्तर को बढ़ाता है और अंत में हमें अपना लती (व्यसनी )बना देता है |

बच्चों के मामले में यह स्थिति और गंभीर होती है क्योंकि मोबाईल एक माध्यम के रूप में  ज्यादा व्यक्तिगत और मांग पर उपलब्ध कंटेंट प्रदान करता है जो अंतर वैयक्तिक सम्बन्धों की गतिशीलता  को प्रभावित करता है अतः इससे दूर हो पाना किसी के लिए भी मुश्किल होता है | विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, जहां एक साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल फोन और लैपटॉप जैसे किसी भी उपकरण के संपर्क में नहीं रखा जाना चाहिए, वहीं एक से पांच साल तक के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम एक दिन में एक घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, 6-14 साल के लिए, अधिकतम स्क्रीन समय प्रति दिन छह घंटे होना चाहिए, लेकिन केवल तभी जब बच्चे ने ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त की हो। अन्यथा, यह समय सीमा दो घंटे होनी चाहिए|एपलफोन  , माता-पिता को परिपक्व सामग्री तक पहुंच को प्रतिबंधित करने के लिए 'वयस्क वेबसाइटों को सीमित करें' विकल्प का चयन करने की भी अनुमति देता है। ये सीमाएं, जो गूगल के एंड्रॉइड ऑपरेटिंग सिस्टम का उपयोग करने वाले फोन पर भी मौजूद हैं, माता-पिता द्वारा एक पिन सेट करने पर निर्भर करती हैं जिसे केवल वे ही जानते हैं। कोलोरेडो विश्वविद्यालय,अमेरिका  के एक शोध में यह निष्कर्ष निकला है कि दुनिया के नब्बे प्रतिशत बच्चे (पांच साल से सत्रह साल की उम्र वाले )मोबाईल स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं जिससे वे देर से सो रहे हैं और  उनकी नींद की गुणवत्ता  प्रभावित हो रही है नतीजा बच्चों की नींद और  एकाग्रता में कमी के रूप में सामने आता है|मोबाईल स्क्रीन से निकलने वाले  प्रकाश की  तरंग दैर्ध्य और गुणवत्ता,शरीर की आन्तरिक घड़ी और नींद लेने की प्रक्रिया पर असर डालती है जो शरीर के मेलाटोनिन हार्मोन को कम करता है यह हार्मोन ही हमारे शरीर को बताता है कि यह नींद लेने का समय है।स्क्रीन पहले की तुलना में लगातार छोटे होते जा रहे हैं इसलिए उनका इस्तेमाल व्यक्तिगत स्तर पर होता जा रहा है इसलिए बच्चों के लिए उनका इस्तेमाल ज्यादा आसान है जिस वक्त उन्हें सोना चाहिए वे मोबाईल पर वीडियो देख रहे होते हैं |

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बचपन और किशोरवस्था में अच्छी नींद का आना मोटापे के खतरे को कम करता है और बच्चों के संज्ञानात्मक व्यवहार को बेहतर करता है | इंटरनेट पर वीडियो देखे जाने की सुविधा का आगमन और अमेजन प्राईम वीडियो, नेट फ्लिक्स और यूट्यूब  जैसे वीडियो आधारित इंटरनेट चैनलों के आ जाने से स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय वीडियो कार्यक्रमों के लिए हमारी दिनचर्या का मोहताज नहीं रहा ,जब जिसको जैसे मौका मिले वो अपने मनपसन्द कार्यकर्मों का लुत्फ़ उठा सकता है,यह सुविधा अपने साथ कुछ समस्याएं भी ला रही है और इसका सबसे ज्यादा शिकार बच्चे हो रहे हैं जो देर रात तक अपने मनपसन्द कार्यक्रम मोबाईल पर देख रहे हैं | यह अलग बात है कि हम मोबाईल स्क्रीन के मोह में ऐसे बंधे हैं कि इस बात पर गौर ही नहीं कर पा रहे हैं कि हमारे बच्चे भी मोबाईल स्क्रीन के चंगुल में फंसते  जा रहे हैं| जो कि उनके स्वास्थ्य के लिए बिलकुल अच्छा नहीं है |भारत में इस माध्यम के इस्तेमाल का बहुत ज्यादा पुराना इतिहास नहीं है |एक ही वक्त में माता –पिता और बच्चे साथ -साथ इसके प्रयोग से परिचित हो रहे हैं |

इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ रहा है और उसमें बच्चे भी शामिल हैं |मोबाईल स्क्रीन अब हमारे जीवन की सच्चाई है तो इससे काटकर हम अपने बच्चों को बड़ा नहीं कर पायेंगे तो इसके संतुलित इस्तेमाल का तरीका उन्हें सीखाया जाए उनकी दिनचर्या में शारीरिक गतिविधियों के खेल से लेकर पढने के अभ्यास तक का उचित सम्मिश्रण होना चाहिए |अब वक्त आ चुका है जब हमें तकनीक और उस पर उपलब्ध कंटेंट को अलग –अलग देखना सीखना होगा क्योंकि तकनीक कोई गलत या खराब नहीं होती उसके इस्तेमाल का तरीका सही या खराब होता है |जाहिर है जब माता –पिता का अपने बच्चों के साथ विश्वास का सम्बन्ध कायम  नहीं होगा तब तक वे  अपने बच्चों को मोबाईल के इस्तेमाल का सही तरीका नहीं सिखा पायेंगे|इस दिशा में इंटरनेट प्रदान करने वाली कम्पनियों को भी पहल करनी चाहिए जैसे कि सोते वक्त वाई-फाई राउटर अपने आप बंद हो जाए या उनमें चिल्ड्रेन मोड का एक विकल्प दिया जाए | इस तरह की व्यवस्था हो कि बच्चों द्वारा ज्यादा इस्तेमाल किये जा रहे एप रात में  न चले जैसे छोटे कदम बच्चों के मोबाईल इंटरनेट को व्यवस्थित कर सकते हैं |  

दैनिक जागरण में 25/09/2023 को प्रकाशित 

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