Thursday, November 15, 2012

सौगत और मैं राजौरी यात्रा तृतीय भाग (यात्रा संस्मरण)


चिंगस 
जंगल बचे इंसानी लाशों की कीमत पर , ये भी विकास का एक पहलू था |रास्ता मन मोह लेने वाला था सम्पूर्ण शांति का एहसास आप कर सकते थे राजौरी से लगभग तीस किलोमीटर पहले एक चिंगस नाम की जगह ,चिंगस के बारे में बताने से पहले आपको बता दूँ राजौरी का यह इलाका उस रास्ते का हिस्सा है जिस रास्ते से मुग़ल शासक गर्मियों में कश्मीर घाटी जाते थे |मुगलों के द्वारा बनवाई गयी सरायों के अवशेष आज भी मिलते हैं मैंने भी ऐसी दो सरायें देखीं पर अब उन जगहों पर भारतीय सेना का कब्ज़ा है जहाँ किसी आम आदमी के लिए जाना उतना आसान नहीं है चूँकि सेना का मामला था इसलिए मैंने अपना कैमरा नहीं निकाला|थोड़ी दूर चलने पर चिंगस नाम की वो सराय आ गयी जिसे मुग़ल बादशाह अकबर ने बनवाया था.आज ये मुख्य सड़क से सटा एक वीरान इलाका है जहाँ मुग़ल बादशाह जहाँगीर के शरीर का कुछ हिस्सा दफ़न है|
चिंगस को फारसी भाषा में आंत कहते हैं किस्सा कुछ यूँ है कि मुग़ल बादशाह जहाँगीर अपनी बेगम नूरजहाँ के साथ अपने वार्षिक प्रवास के बाद कश्मीर से अपनी सल्तनत की ओर लौट रहे थे |
चिंगस :यहीं जहाँगीर की आंतें दफ़न हैं 
चिंगस सराय 
 चिंगस में उनकी तबियत खराब हुई और उनकी मौत हो गयी|उत्तराधिकार के संघर्ष को टालने के लिए नूरजहाँ इस बात का पता आगरा  पहुँचने से पहले सार्वजनिक नहीं करना चाहती थी|शरीर के वो हिस्से जो मौत के बाद सबसे जल्दी सड़ते हैं उन अंगों को इसी जगह काटकर निकल दिया गया और उनको यहीं दफना दिया गया जिसमें जहाँगीर की आंत भी शामिल थी|आंत और पेट के अंदरूनी हिस्से को निकाल कर उसके शरीर को सिल कर इस तरह रखा गया कि आगरा पहुँचने से पहले किसी को भी इस बात का आभास् नहीं हुआ कि जहाँगीर मर चुके हैं| इस तरह उसकी आँतों को जहाँ दफनाया गया वो चिंगस के नाम से प्रसिद्ध हो गया|यहाँ जहाँगीर की आँतों की कब्र आज भी सुरक्षित है लेकिन यहाँ एकदम सन्नाटा पसरा था लगता है यहाँ ज्यादा लोगों का आना जाना नहीं है हालांकि जम्मू कश्मीर पुरातत्व विभाग के लगे बोर्ड इस बात की गवाही दे रहे थे कि सरकार के लिए यह स्थल महत्वपूर्ण है|मैंने अपने कैमरे का यहाँ बखूबी इस्तेमाल किया|अब राजौरी करीब था हम भी थक चुके थे लखनऊ छोड़े हुए करीब चौबीस घंटे होने को आ रहे थे |शाम के पांच बजे हमने राजौरी में प्रवेश किया शांत कस्बाई रंगत वाला शहर जहाँ अभी विकास का कीड़ा नहीं लगा था और ना लोग प्रगति के पीछे पागल थे|जहाँ हमारे रुकने की व्यवस्था की गई थी वो एक सरकारी गेस्ट हाउस था पर उसके कमरे को देखकर लग रहा था जैसे कोई शानदार होटल हो खैर सुबह के बाद से हमारी सौगत से कोई बात नहीं हुई थी हमें ये बताया गया कि साहब बाहर हैं शाम को लौटेंगे|शाम हो चली थी हमने एक बार फिर गरम पानी से नहा कर थकान को कम करने की कोशिश की पर नहाने के बाद पता  पड़ा यहाँ ठंडक का मामला गंभीर था लखनऊ के मुकाबले |अँधेरा घिर आया था मैं समय काटने के लिए नीचे उतर कर गेस्ट हाउस के लॉन में चहलकदमी शुरू करने लग गया |राजौरी अंधरे में डूब रहा था पहाड़ों पर रौशनियाँ जगमगाने लगी थीं|अचानक एक शोर सा उठा साहब आ गए साहब आ गए मैंने गेट पर नजर डाली मुझसे दौ सौ मीटर की दूरी पर एक लाल बत्ती वाली  सफ़ेद इनोवा हमारी तरफ आ रही थी जिसके अंदर सौगत बैठे हुए थे गाड़ी कुछ पलों में मेरे सामने आकर रुकी वो पल मेरे जीवन के कुछ रोमांचक पलों में से एक बन गया सौगत के साथ बिताए गए वो सारे साल  फ्लैश बैक में मेरी आँखों के आगे घूम गए|
राजौरी की शाम 
पुरानी यादें :मैं और सौगत उपराष्ट्रपति के कार्यक्रम में हैलीपेड पर 
           मुझे याद आया 2002 में पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर में एक बार उप राष्ट्रपति स्व. भैरव सिंह शेखावत दीक्षांत समारोह में आये थे| हैलीपेड से विश्वविद्यालय तक के डेढ़ किलोमीटर के फासले में उनकी फ्लीट में सबसे अंत में एक गाड़ी चल रही थी जो उनकी अधिकारिक फ्लीट का हिस्सा नहीं थी और उस गाड़ी में दो मास्टर बैठे थे एक उस सारे घटनाक्रम का वीडियो बना रहा था दूसरा मीडिया कर्मियों को ब्रीफिंग के लिए आवशयक घटनाओं को कलमबद्ध कर रहा था मसलन किन लोगों ने पुष्पगुच्छ दिए कौन हैलीपेड पर आगवानी के लिए आया वो दो मास्टर मैं और सौगत थे उन फर्राटा भरती गाड़ियों का एक  हिस्सा बन कर इतनी खुशी हुई थी कि उस पूरे वाकये को बाकी के मास्टरों को नमक मिर्च लगा कर कई दिन तक सुनाया गया (हम दोनों मीडिया में अपने अपने क्षेत्रों में विशेज्ञता के कारण कुलपतियों के सीधे संपर्क में रहा करते थे जो और शिक्षकों के लिए ईर्ष्या का विषय रहा करता था कम से कम मुझे ऐसा लगता था ) क्योंकि इस मौके पर पूरे विश्वविद्यालय से मात्र दो ही लोग हैलीपेड पर जाने का सौभाग्य प्राप्त कर पाए थे| और आज सौगत खुद उस नायकत्व की स्थिति में था जहाँ एक पुलिस जिप्सी उसकी गाड़ी को सुरक्षा दे रही थी| वैसे भी राजौरी एक संवेदनशील जिला था इसलिए सुरक्षा हो सकता है आप लोगों को ये कोई बड़ी बात ना लगे पर मैं तो पलों में सदियाँ जी रहा था|मैंने उसको परिस्थितियों से लड़ते देखा था जूझते देखा था क्योंकि जब भी हम कोई काम प्लान करते थे उसमें कुछ ना कुछ गडबड जरुर आती थी पर काम हो जाता था| चलिए वापस लौटते हैं उस जगह जहाँ मैं सौगत से पांच साल बाद मिल रहा था |  मैं गाड़ी के पास पहुंचा उस समय मेरे स्थिति विचित्र थी जिसे शब्दों में वर्णन करना मुश्किल है मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैं उससे कैसे मिलूँगा मैं अपनों से हाथ नहीं मिलाता और सौगत भी बिलकुल  औपचारिक नहीं था हमने आज तक कभी हाथ नहीं मिलाया क्यूंकि जब दिल मिल गया फिर हाथ मिलाने की क्या जरुरत है |
सौगत 
          गले लगने का विकल्प जोखिम भरा लग रहा था वहां उसके बहुत मातहत थे वे पता नहीं इस मिलन को किस तरह से देखें मैं इन्हीं विचारों में झूल रहा था कि सौगत बाहर निकला दो चार लोगों को कुछ निर्देश देने के बाद सीधे मेरी तरफ मुखातिब और बे कहकर गले लगा लिया चल ऊपर चल यहाँ कहाँ घूम रहा है |मतलब हम लोगों के बीच कुछ भी नहीं बदला था वो दोस्त भी क्या जो तमीज से बात करे ,हा हा |
थोड़ी देर में हम कमरे में बैठे थे दस मिनट के बाद निर्णय लिया गया कि यहाँ नहीं मजा आ रहा है ,घर चला जाए चूँकि मैं अपने परिवार के साथ गया था इसलिए ये दो परिवारों का पुनर्मिलन हो रहा था|किस्से, बातें,कहानियां भूले बिसरे लोग उनसे जुडी यादें पर मैं ठण्ड से ठिठुर रहा था जबकि ये अक्टूबर की शुरुवात थी और कमरे में और  बाहर हर जगह हीटर की व्यवस्था थी|भाभी से सौगत का स्वेटर लेकर पहना तब जाकर चैन पड़ा जबकि पहले से मैंने एक ऊनी इनर पहन रखा था अगले चार दिन मैंने सौगत के उस स्वेटर का खूब शोषण किया| हम रात के बारह बजे वापस अपने सुइट पहुंचे (कमरा कहना उस जगह की बेइज्जती होगी)
जारी है .......................

1 comment:

डॉ. मनोज मिश्र said...

पढ़ रहा हूँ सर --बहुत ही रोचक संस्मरण और आनंददायक यात्रा वृत्तान्त ।

पसंद आया हो तो