Thursday, November 15, 2012

सौगत और मैं राजौरी यात्रा द्वितीय भाग(यात्रा संस्मरण)

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मंसूरी की वो शाम 

हम देर रात तक मंसूरी के सड़कों पर घूमें और देश के भावी प्रशासनिक अधिकारीयों के मन टटोले और जून के महीने में सर्दी से ठिठुरे क्योंकि रजाई एक ही थी ऐसा ही सौगत बिस्वास फिर मैं अपनी जिंदगी में रम गया बीच में एक बार छोटी सी मुलाक़ात हुई थी दिल्ली में जब मैं इटली जा रहा था सौभाग्य से सौगत उस वक्त दिल्ली में था उसके बाद से गोमती में बहुत सा पानी बह गया उसकी पोस्टिंग बदलती रहीं और हम कभी कभार फोन पर बात कर लिया करते थे एक बार यूँ ही सौगत ने एक प्रस्ताव रखा था कि चल हम लोग स्लीपर में भारत भ्रमण पर निकलते हैं बगैर किसी प्लानिंग के ये उसकी पोस्टिंग के शुरुवाती दिन थे उसके बाद वो भी व्यस्त होता गया और मैं बगैर किसी व्यस्तता के व्यस्त इंडिया टुडे ने जब मेरे ऊपर एक स्टोरी के लिए किसी एक ऐसे शख्स का नाम माँगा तो मुझे सिर्फ उसका नाम सूझा धर्म संबंधी मेरे विचारों में सबसे बड़ा परिवर्तन उसके पिता जी की किताबों को पढकर आया जिन्होंने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया शायद पहली बार मैंने किसी समस्या को मानवीय नजरिये से देखा ना हिंदू ना मुसलमान सिर्फ इंसान, तो बस ऐसे ही एक ही दिन मैंने फैसला किया मुझे सौगत से मिलने जाना है ना कोई काम था ना घूमने की इच्छा बस आमने सामने बैठकर गप्प लड़ाने का मन.राजौरी के लिए ट्रेन जम्मू तक ही जाती है वहां से लगभग 165 किमी दूर सडक से ही पहुंचा जा सकता है हालंकि राजौरी में एअरपोर्ट है पर वहां से से नियमित उड़ान का कोई सिलिसला नहीं है वो एअरपोर्ट ज्यादातर भारतीय सेना या मंत्रियों के हेलीकॉप्टर के काम ही आता है |
आतंकवाद के दिनों में राजौरी भी उन जिलों में से एक था जो आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित थे |अब समस्या ट्रेन के टिकट की थी मैंने दो दिन के टिकट बुक किये पर जाने के दिन आते आते मुझे लगा कि वो कन्फर्म नहीं हो पायेंगे आख़िरकार फिर उसी चीज का इस्तेमाल करना पड़ा जिसके बिना हिन्दुस्तान में कोई काम संभव नहीं होता यानि जुगाड एक ट्रैवल एजेंट से बात हुई तत्काल में उसने टिकट दिलवा दिया और हम चल पड़े सौगत से मिलने पांच साल बाद हम एक दूसरे को साक्षात देखने वाले थे |मैंने सौगत को फोन करके बता दिया कि मैं आ रहा हूँ उसने बगैर किसी उत्साह के स्वागत किया हालंकि ये उसका स्वभाव है जो मैं अच्छे तरीके से जानता हूँ फिर भी दिल में एक चोर था पहले हम साथ काम करते थे हमारे सुख दुःख साझे थे पर अब वो राजौरी का जिलाधिकारी था और मैं एक मास्टर,पता नहीं कैसे मिलेगा समय दे भी पायेगा या नहीं एक जिलाधिकारी और एक मास्टर की जुगलबंदी अब जमेगी भी या नहीं संशय तो था ही फिर मेरे पास और कोई प्रयोजन भी नहीं था कि हम तो फलां काम से जा रहे हैं मिल लिया तो ठीक है नहीं तो अपना काम करेंगे और घर लौट जायेंगे हमें तो ये भी पता नहीं था कि राजौरी जगह कैसी है बस ख़बरों में ही सुना था शायद इसीलिये मैं ज्यादा उनी कपडे नहीं ले जा रहा था सोचा जम्मू जैसा ही होगा जब जम्मू में ज्यादा ठण्ड नहीं पड़ती तो राजौरी भी ऐसा ही होगा पर हुआ इसका उल्टा राजौरी में अच्छी ठण्ड थी |मैं एक बार अगर राजौरी के भूगोल के बारे में गूगल ही कर लेता तो कुछ समस्या से बच सकता था पर हम तो निकल पड़े बस सौगत से मिलना है|ट्रेन समय से निकल पडी पन्द्रह घंटे के सफर के बाद हम जम्मू पहुँच जाने वाले थे सुबह हमारे पहुँचने से पहले सौगत का फोन आ गया था  कि आपको लेने के लिए लोग वहां हैं आप निश्चिन्त रहें जैसे ही ट्रेन रुकी दो लोग सीधे हमारे पास आये और हमारा सामान सम्हाल लिया जीवन में पहली बार खास होने का एहसास हुआ हम सीधे वी वी आई पी पार्किंग में पहुंचे जहाँ एक शानदार गाड़ी हमारे लिए आरक्षित थी और हम चल पड़े अभी हमें लंबा रास्ता तय करना | सुरक्षाधिकारी परवेज और ड्राईवर रशीद अगले चार दिन तक हमारे साथ साये की तरह रहने वाले थे हमें इसका कोई अंदाज़ा नहीं था दिन के दो बज तक हम  अखनूर पार कर चुके थे और उसके बाद राजौरी जिला शुरू हुआ सुंदरबनी के पी डबल्यू डी गेस्ट हाउस में दोपहर के भोजन की व्यवस्था थी खूबसूरत कमरा था जहाँ मैंने स्नान किया और भोजन पर टूट पड़े पता नहीं सौगत को मेरे मांसाहारी भोजन के लगाव की बात याद थी या ये सिर्फ एक संयोग था कि अगले चार दिन मुझे सिर्फ मांसाहारी भोजन परोसा गया जिसकी शुरुवात सुंदरबनी से हो रही थी चिकन चावल और नरम नरम रोटी फिर एक गरम चाय |हम तरोताजा  होकर फिर निकल पड़े अब रास्ता में सन्नाटा बढ़ रहा था जंगल घने हो रहे थे और एक पहाड़ी नदी लगातार हमारे साथ चल रही थी जिसका कोई नाम मुझे परवेज और रशीद बता नहीं पाए वो बोले ये जिस जगह से गुजरती है|
परवेज और रशीद 
 उस जगह का नाम नदी को दे दिया जाता है मैं जंगल और हरियाली में खो गया हम जगह जगह गाड़ी रोक कर फोटोग्राफी भी कर ले रहे थे पर मैंने अपने जीवन में इतनी शुद्ध और अच्छी हवा कहीं नहीं महसूस की थी मैं खूब लंबी लंबी साँसे ले रहा था |हम नौशेरा से गुजर रहे थे आर्मी के ट्रकों का आना जाना लगा था उसके बाद तीथवाल पड़ा 1947-48 मे यहाँ पाकिस्तानी कबाइलों ने यहाँ घुसपैठ कर ली थी मैंने इतिहास में पढ़ा था और आज देख रहा था इतिहास को जीना अच्छा लग रहा था |
 परवेज कहीं से पुलिस वाले नहीं लग रहे थे मैंने कहा भी कि यू पी में ऐसे पुलिस वाले क्यूँ नहीं हैं तो वो मुस्कुरा दिए पुलिस में होने की उन्होंने बड़ी कीमत चुकाई है जिसका पता मुझे बाद में पता चला उनके सगे छोटे भाई को आतंकवादियों ने मार दिया था |रास्ता लंबा था तो मैंने मिलिटेंसी के दौर की बात शुरू कर दी उस दर्द को शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है और जब जब मैंने जिस किसी से आतंकवाद के उस दौर की बात की तो लगा जैसे वे तटस्थ हो चुके हैं इतना कुछ झेलने के बाद  सुख दुख राग द्वेष सबसे बस ये जवाब हर बार मिला हम तो दोनों तरफ से मारे जा रहे थे मिलीटेंट को खाना ना दो तो वो मार देते थे और दे दो तो आर्मी |
राजौरी के रास्ते में 
 बातों बातों में आतंकवाद का  एक सकारात्मक पहलू एक चायवाले ने बताया कि हमारे जंगल अंधाधुंध काटने से बच गए नहीं तो इतनी हरियाली ना दिखती मेरे कैसे पूछने पर बड़ा मजेदार उत्तर मिला होता यूँ था कि पाकिस्तान से आये आतंकवादी जंगलों में पनाह लेतेथे दिन में अगर कोई लकड़ी काटने वाला जंगल में जाता तो उसे मार पीटकर जंगल से भगा देते थे जिससे सेना या पुलिस को उनकी छुपने की जगह का पता नहीं चलता था |इस तरह उन लोगों ने इतना दहशत का माहौल बना दिया कि लोग जंगलों में जाते ही नहीं थे जिससे अवैध कटाई पर पूरी तरह रोक लग गयी|

5 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत रोचक सर और आपनें जो लिखा है -----
"मैंने सौगत को फोन करके बता दिया कि मैं आ रहा हूँ उसने बगैर किसी उत्साह के स्वागत किया हालंकि ये उसका स्वभाव है जो मैं अच्छे तरीके से जानता हूँ फिर भी दिल में एक चोर था पहले हम साथ काम करते थे हमारे सुख दुःख साझे थे पर अब वो राजौरी का जिलाधिकारी था और मैं एक मास्टर,पता नहीं कैसे मिलेगा समय दे भी पायेगा या नहीं एक जिलाधिकारी और एक मास्टर की जुगलबंदी अब जमेगी भी या नहीं संशय तो था ही फिर मेरे पास और कोई प्रयोजन भी नहीं था कि हम तो फलां काम से जा रहे हैं मिल लिया तो ठीक है नहीं तो अपना काम करेंगे और घर लौट जायेंगेकाम करेंगे और घर लौट जायेंगे""
-------ऐसा नहीं है सर जी, सौगत सर के साथ मुझे भी कुछ समय रहने को मिला है वे यारों के यार है एक विराट व्यक्तित्व और विशाल ह्रदय वाले व्यक्ति ऐसे मित्र है वे ,आपको सदा गर्व होना चाहिए .

shambhu nath said...

जब किसी दोस्त की प्रशंसा सुनो तो सीना गर्व से फूल जाता है...

Anonymous said...

जब किसी दोस्त की प्रशंसा की जाए, तो सीना गर्व से फूल जाता है...

Ankur Sharma said...

Sir sachha dost ya sachhi dosti yahi h na ki jb hm apne kisi ese dost se milne Jaye chahe jitni b dur ho wo but us k piche koi wjah na ho.

Suraj Verma said...

अब समस्या ट्रेन के टिकट की थी मैंने दो दिन के टिकट बुक किये पर जाने के दिन आते आते मुझे लगा कि वो कन्फर्म नहीं हो पायेंगे आख़िरकार फिर उसी चीज का इस्तेमाल करना पड़ा जिसके बिना हिन्दुस्तान में कोई काम संभव नहीं होता यानि जुगाड ! Ye lines bhut mast hai sir ..... दूसरा भाग बहुत ही अच्छा है सर । काफी कुछ राजौरी जिला के बारे में जानने को मिला इस भाग में !

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