Thursday, November 15, 2012

सौगत और मैं राजौरी यात्रा चतुर्थ भाग(यात्रा संस्मरण)

डी के जी की झोपडियां 

पच्चीस अक्टूबर को हम राजौरी को एक्सप्लोर करने निकल पड़े पहला पड़ाव था राजौरी से तीस किलोमीटर दूर बाबा गुलाम शाह की दरगाह इन्हीं संत के नाम पर अभी राजौरी में एक विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी है |अब असली जम्मू कश्मीर देखने की बारी थी पहाड़ों के चक्कर लगते हुए हम कई गाँवों से गुजर रहे थे कई जगह सेब बिकते देखे सोचा खरीदा जाए भाव सुनकर खुशी का परवार ना रहा बीस रुपये किलो ,सीढीदार खेत मक्के की कटाई हो चुकी थी उनको सूखने के लिए खेतों में ही ढेर बना कर छोड़ दिया गया है मक्का और दूध बहुतायत में उपलव्ध है भूमिहीन किसानों की संख्या नगण्य है |मजदूर बहुत महेंगे है |मनरेगा का असर और काम दोनों दिख रहा था पहाड़ों से निकालने वाले चश्मे आस पास के दृश्यों  की सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे|चश्मे प्राकृतिक पानी के ऐसे स्रोत हैं जो पहाड़ों से निकलते हैं | पानी को बर्बादी से बचाने  के लिए जगह जगह नालियां बना दी गयीं जिससे लोग पानी का इस्तेमाल पीने और  खेतों के लिए करते हैं |परवेज बता रहे थे कि कैसे आतंकवाद के दिनों में इन रास्तों में शाम तो क्या दिन में भी लोग नहीं गुजरते थे रास्ते के कई हिस्से एनकाउंटर की खौफनाक कहानियों  के गवाह रह चुके थे पर अब सब शान्ति है खुदा करे ये शांति बनी रहे|दो घंटे के सफर के बाद हम दरगाह पहुँच चुके थे|
कितनी खूबसूरत तस्वीर है ये  कश्मीर है 
ऊँचाई पर बनी दरगाह लगभग २५० साल पुरानी है जहाँ चौबीस घंटे लंगर चलता है जिसमें चावल दाल और मक्के की रोटी प्रसाद में मिलती है हमने पहले दरगाह में सजदा किया और चादर चढ़ाई सबकुछ व्यवस्थित और शांत दरगाह का प्रबंधन सरकार द्वारा स्थापित ट्रस्ट करता है जो भी चढावा आता है उसकी बाकायदा नाम पते के साथ रसीद दी जाती है एक खास बात ये थी कि इस दरगाह पर सभी मजहब के लोग आते हैं जिनकी मन्नत पूरी हो जाती हैं उनमें कुछ मुर्गे और पशु भी चढाते हैं पर उन पशुओं का वध दरगाह परिसर में नहीं किया जाता है उन्हें जरूरतमंदों को दे दिया जाता है|दरगाह के लंगर में सिर्फ शाकाहारी भोजन ही मिलता है यहीं नमकीन कश्मीरी चाय भी पीने को मिली |दरगाह पर भीड़ तो थी पर वो परेशांन करने वाले नहीं थी|
दरगाह में दो घंटे बिताने के बाद हम चल पड़े पर्यटक स्थल डी के जी देखने इसका फुलफॉर्म भूल रहा हूँ पर दरगाह से एक घंटे की यात्रा के बाद हम यहाँ पहुंचे क्या नज़ारे थे इस जगह पर हमारे सिवा कोई नहीं था सिर्फ बर्फ से ढंके पहाड जो पाक अधिकृत कश्मीर में थे ठंडी हवा हालाँकि धूप तेज थी पर ठण्ड थी एक पहाड़ी पर कुछ लकड़ी की झोपडियां बनाई गयी हैं जिनको गरम रखने के लिए सोलर एनर्जी का इस्तेमाल किया जाता है जिससे पर्यावरण को नुक्सान ना पहुंचे इसी पहाड़ी के समीप एक व्यू पॉइंट बनाया गया है जहाँ से पूरे राजौरी का नजारा लिया जा सकता है|हमारे पीछे पूँछ शहर दिख रहा था और उसके पार पाक अधिकृत कश्मीर सब कुछ एक था पर बीच में नियंत्रण रेखा भारत और पाकिस्तान को अलग अलग कर रही थी|
दूर दिखता पुंछ शहर बीच में बहती चिनाव नदी 
कश्मीरी  बंजारों का कैम्प 
दिन के भोजन की व्यवस्था यहीं की गयी थी|भुना चिकन खाने के बाद एक लड्डू जैसा मांस का व्यंजन परोसा गया जो भेंड के मांस  से बना था जिसे रिस्ता कहते हैं खाने में बहुत स्वादिष्ट था |चूँकि मैं बहुत कम खा पाता हूँ मैं एक से ज्यादा नहीं खा पाया |मुझे बताया गया कि यह कश्मीरी दस्तरख्वान का हिस्सा है जिमें भेंड के मांस को लकड़ी के बर्तन में गुंथा जाता है फिर दही के साथ पकाया जाता है|आतंकवाद प्रभावित इलाका होने के कारण पर्यटक यहाँ नहीं आते पर अब शांति हो जाने के बाद राजौरी में बहुत सारी ऐसी जगहें जो एकदम अनछुई हैं| ऐसे में मेरे जैसे इंसान के लिए जो भीड़ भाड़ कम पसंद करता है उसके लिए ऐसी जगहें जन्नत से कम नहीं हैं|खाना खा कर हम वहीं घूमें फोटोग्राफी की शांति इतनी की हम अपनी साँसों की आवाज़ को सुन सकते थे|शाम हो रही थी अब लौटने का वक्त रास्ते में दिखते चीड के पेड़ों पर जब सूर्य की किरणें पड़ती तो वो हरे पेड भी सुनहली आभा देते और बगल में बहने वाले पानी के चश्मे चांदी जैसे चमकते बहुत सी किताबों में इस तरह के द्रश्यों के बारे में पढ़ा था पर अपनी आँखों से प्रकृति के सोना चांदी को पहली बार देखा रहा था|लौटते वक्त परवेज ने बताया कि इन गावों में रहने वाले काफी लोग मध्यपूर्व के देशों में बेहतर जीवन की तलाश में चले गए हैं उनके भेजे हुए पैसों से गाँव के घरों में छत टिन की बनने लग गयी है मिट्टी या सीमेंट की छत बर्फबारी में घर की रक्षा नहीं कर पाती और ये टिन की छतों वाले घर सूर्य की किरणों से ऐसे चमक रहे थे जैसे पहाड पर अनगिनत शीशे रख दिए गए हों|
एक फोटो मेरी भी 
जगह जगह श्रीनगर से लौटते बंजारों के भेड़ बकरियों का झुण्ड हमारा रास्ता रोक रहा था जो सर्दियों में राजौरी जैसी जगहों पर लौट आते हैं और गर्मियों में फिर श्रीनगर का रुख कर देते हैं|धन के नाम पर इनके पास भेंड,बकरियां और घोड़े ही होते हैं जिनसे इनका जीवन चलता है ये सारा साल पैदल ही घूमते हैं|वापस लौटते समय मैं साथ बहती नदी में जाने से अपने आपको रोक नहीं पाया कुछ बंजारों का कैम्प लगा था और वे शाम के भोजन की व्यवस्था में लगे थे|पुरुष सुस्ता रहे थे महिलाएं चूल्हों पर रोटियां सेंक रही थी मैंने नदी में हाथ डाला बर्फ से भी ठंडा पानी था जो पहाड़ों पर जमी बर्फ के पिघलने से आ रहा था ये पानी गर्मियों में भी इतना ही ठंडा रहता है ऐसा मुझे बताया गया|सबको आगे भेजकर मैं आस पास के लोगों से बात करने लगा|पास ही एक दूकान थी जहाँ का दुकानदार आतंकवाद से प्रभावित रह चुका था|मेरे हाथ में कैमरा देखकर उसने बहुत खुलकर मुझसे बात नहीं की पर उसने बताया कि वो एस पी ओ (जम्मू कश्मीर सरकार का एक आतंकवाद विरोधी कार्यक्रम जिसमे सरकार लोगों को शस्त्र और मासिक तनख्वाह देती है )रह चुका था पर सरकार पैसे समय पर नहीं देती थी और जो पैसे मिलते वो भी बहुत कम थे इसलिए उसने किराने की दूकान खोल ली|हाँ एक बात जो मुझे अच्छी लगी वो नए  डी सी (जम्मू कश्मीर में डी एम् को डी सी कहते हैं )के जनता दरबार से खुश था वो रेड डालते हैं और तुरंत कार्यवाही करते हैं |उसे बिलकुल नहीं पता था कि मैं डी सी का दोस्त हूँ |शाम हो चुकी थी और हम वापस राजौरी में थे सौगत ने मुझे अपने ऑफिस बुला लिया जो उसके बंगले के ठीक सामने है वहां लोगों का जमावड़ा था वो काम भी कर रहा था और मुझसे बात भी करता जा रहा है |धीरे धीरे लोगों का जमावड़ा खत्म हुआ लेकिन उसको कुछ फाइलें अभी और भी निपटानी थी मैंने कहा आप काम करते चलें मैं इसी का आनंद उठा रहा हूँ |आखिरकार हमने घर का रुख किया जहाँ ठण्ड और हीटर के बीच दो परिवार जमा हुए और गप्पें मारने का एक और दौर शुरू हुआ|खाने में प्रसिद्ध ट्राउट मछली और चिकन था|ट्राउट का नाम डिस्कवरी पर खूब सुना था पर खाने का सौभाग्य पहली बार मिल रहा था|इधर उधर की बातें करते रात के ग्यारह बज गए और राजौरी में मेरा एक दिन और खतम हुआ |
जारी है .......................

3 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत ही रोचक और नवीनता लिए है यह वृत्तान्त,आगे का इंतज़ार है.....

डॉ. पंकज सिंह said...

मुकुल भाई क्या कहूँ.लग रहा है भांग सा नशा हो गया है. आखें भर आई हैं. क्या दिन थे, क्या सच्ची और बेशर्म मोहब्बत का एहसास था. इस संस्मरण के बहाने आपने यादों के खजाने पर से कुछ धुल के परत हटा दिए. मैं भी उन लम्हों को अपनी ज़िन्दगी की कमाई मानता हूँ.आपकी लेखनी के तो हम पहले भी कायल थे , अब मुरीद हुए जा रहे हैं. इस संस्मरण में ब्रिजेश का ज़िक्र चाय में एक मुठी नमक जैसी है.अच्छा है. कहीं कहीं तो आपकी ऑब्जरवेशन किसी इतिहासकार तो कहीं एक जिज्ञासु बच्चे वाली है. मुबारक हो! और लिखें ......

Suraj Verma said...

बहुत ही रोचक है यह लेख , मैं कभी जम्मू कश्मीर नहीं गया लेकिन अब जाने का मन करता है । मुझे बहुत पसंद आया यह भाग आगे के लेख का इंतज़ार है सर

पसंद आया हो तो