Monday, November 7, 2016

वर्च्युल दुनिया में भी भेदभाव झेल रही हैं भारतीय महिलाएं

असमानता कैसी भी हो उसका असर समाज के हर हिस्से पर पड़ता है |भारत में स्त्री –पुरुष समाज के समान धरातल पर नहीं खड़े हैं लैंगिक नजरिये से यह कोई नया तथ्य नहीं है कि भारत में महिलाओं को समाज में अपनी जगह बनाने के लिए पुरुषों से कहीं ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है बात चाहे शिक्षा की हो या करियर या फिर जीवन साथी का चुनाव |सूचना क्रान्ति के इस युग में सोशल मीडिया के आगमन के साथ इस धारणा को बल मिला कि तकनीक इस लैंगिक असामनता को कम करने में कुछ मददगार होगी और इसमें अहम् योगदान फेसबुक जैसी सोशल मीडिया साईट्स देंगी | फेसबुक के ही आंकड़ों के मुताबिक भारत में पंद्रह  करोड़ तीस लाख लोग इसका इस्तेमाल कर रहे थे पर यहाँ भी  विकसित देशों के विपरीत पुरुष वर्चस्व कायम है |भारत की महिलायें यहाँ भी उस पुरुषवादी मानसिकता का शिकार हैं जिसका सामना उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में करना पड़ता है यूनाइटेड किंगडम की संस्था “वी आर द सोशल” की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में फेसबुक का इस्तेमाल करने वाली कुल आबादी में महिलाओं का हिस्सा मात्र चौबीस प्रतिशत है यानि तीन पुरुष प्रयोगकर्ताओं के मुकाबले एक महिला प्रयोगकर्ता |एक ऐसा देश जो दुनिया में दूसरे स्थान पर सबसे ज्यादा स्मार्ट फोन प्रयोग करता है वहां महिलाओं के सम्बन्ध में ऐसे आंकड़े चौंकाते नहीं पर परेशान जरुर करते हैं | देश में इस समय दुनिया की सबसे युवा आबादी बसती है जो सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा प्रयोग करती है |पर विभिन्न आयु वर्गों के फेसबुक इस्तेमाल में 18 से 24 और 24 से 35 में यह अंतर सबसे ज्यादा है |वैसे भी फेसबुक एक शहरी और पढ़े लिखे लोगों का माध्यम है यह वह आबादी है जो पढी लिखी है और आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में है वहां  भी महिलायें पुरुषों के मुकाबले चुप हैं |तकनीक लिंग निरपेक्ष होती है पर उसका इस्तेमाल प्रयोग करने वाले की मानसिकता पर निर्भर करता है |
पितृ सत्तामक ढांचा और वित्तीय आत्मनिर्भरता का न होना
आंकड़ों के संदर्भ में अगर हम देखें तो चूंकि भारतीय सामाजिक ढांचा पितृ सत्तात्मक है और ज्यादातर  महिलाओं को वित्तीय आत्मनिर्भरता हासिल नहीं है इसलिए किसी भी घर में जब कोई नयी तकनीक आती है तो उसका पहला उपभोक्ता पुरुष ही होता है क्योंकि उसके पास वित्तीय आत्म निर्भरता है |स्मार्ट फोन आमतौर पर सामान्य फोन के मुकाबले थोड़े महंगे होते हैं तो महिलाओं को या तो घर के किसी पुरुष के छोड़े हुए मोबाईल मिलते हैं या सस्ते वाले बगैर इंटरनेट के फोन इस धारणा के साथ कि वे इंटरनेट वाले फोन का क्या करेंगी |वैसे भी फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफोर्म अपने आप को व्यक्त करने का मौका देते हैं पर एक आम हिन्दुस्तानी महिला को पत्नी या बहन के रूप में घरेलू निर्णय प्रक्रिया में वो स्थान नहीं दिया जाता (अपवादों को छोड़कर सम्पूर्ण भारत के सम्बन्ध में  ) जिसकी हकदार वो हैं ऐसी स्थिति में वो आत्मविश्वास की कमी का शिकार हो जाती हैं |ऐसे में वो फेसबुक जैसे माध्यमों  पर या तो आने से हिचकती हैं और अगर आती हैं तो ज्यादा सक्रिय नहीं रहती हैं क्योंकि उन्हें डर लगता है कि पता नहीं वो सही कह रही हैं या गलत |शिक्षा का पहला मौका किसी भी परिवार में लड़कों को पहले मिलता है तो लड़कियों का शिक्षित न होना भी उन्हें तकनीक से दूरी बनाये रखने में मदद करता है क्योंकि स्मार्ट फोन तकनीकी रूप से थोड़े जटिल होते हैं और उसके इस्तेमाल को सीखने में किसी कम पढ़े लिखे या अशिक्षित व्यक्ति को ज्यादा परेशानी होगी  |
सोशल मीडिया पर सुरक्षित नहीं हैं महिलायें और सामाजिक वर्जनाएं
तथ्य यह भी है कि महिलाओं के मुकाबले पुरुष भारत में किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर ज्यादा सुरक्षित है वो कुछ भी लिख सकता है कैसी भी तस्वीरें डाल सकता है पर अगर महिलाएं फेसबुक पर पुरुषों जितनी बिंदास हो जाएँ तो उन्हें तुरंत चरित्र प्रमाण पत्र मिलने लग जाते हैं इसलिए कम ही महिलाएं फेसबुक पर ज्यादा मुखर रह पाती हैं और सामान्य महिलायें निजता के हवाले से या तो इससे दूर रहना पसंद करती हैं या फेसबुक का बहुत नियंत्रित उपयोग करती हैं |किसी सामान्य पुरुष के मुकाबले महिलायें ज्यादा खतरे में रहती हैं |मोर्फिंग के डर से अकेले की तस्वीरें कम डालना ,क्या लिखें क्या न लिखें इस संशय में रहना , लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे अगर मैंने यह तस्वीर लगा दी, अगर मेरा अकाउंट हैक हो गया तो ऐसी पीडायें हैं जिनसे एक पुरुष का सामना कभी नहीं होता है |समाचार पत्रों में अक्सर ऐसी घटनाओं का ब्यौरा रहता है जब किसी न किसी महिला को इन सबसे गुजरना पड़ता है कुछ तो सामाजिक तिरस्कार के डर से आत्महत्या तक कर लेती हैं | भारत में किसी भी महिला को पुरुषों के मुकाबले ज्यादा अजनबियों के मित्रता निवेदन मिलते हैं |समाज वैसे भी महिलाओं की यौनिकता को नियत्रण में रखना चाहता है इसलिए महिलाओं के मिलने जुलने ,हंसने ,उठने बैठने तक सभी स्तरों पर उनके लिए एक आदर्श मानक बनाये गए हैं जिससे अच्छी महिला और बुरी महिला का प्रमाण पत्र दिया जा सके और ये मानक फेसबुक जैसे सोशल प्लेटफोर्म पर भी लागू रहते हैं | पति के फेसबुक का पासवर्ड पत्नी को न पता हो पर पत्नी का पासवर्ड पति को पता होना चाहिए ऐसे बहुत से तुच्छ मानक आचरण भी महिलाओं के फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफोर्म से दूरी के कारण है |महिलाओं के प्रति असमान व्यवहार की जो लड़ाई जमीन पर चल रही थी अब उसकी शुरुआत वर्च्युल दुनिया में भी हो गयी है |महिलायें यह लड़ाई शिक्षा और वित्तीय आत्मनिर्भरता से ही जीत सकती हैं | 
नवभारत टाईम्स में 07/11/2016 को प्रकाशित 

1 comment:

shivam pandey said...

भारत जैसे देश में महिलाओं के साथ ऐसा व्यवहार बहुत ही पीडात्मक है देश को आज़ादी तो 1947 में मिल गयी थी पर देश की महिलाओं को आज़ादी सोशल साइट्स अभी भी नहीं मिली है उनके फ़ेसबुक एकाउन्ट पर नज़र रखना ये बेहद ही ग़लत नज़रिया है पुरूषों का ।
महिलाओं को इस बात का खुल कर विरोध करना अति आवश्यक हो गया है भारत देश जब विकसित देश होने की होड़ में लगा परन्तु ऐसे देश देश विकसित नहीं हो सकता
पहले इस असमानता कोँ ख़त्म करना होगा तब ही देश तेज़ी के साथ प्रगति के पथ पर आगे बढेगा

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