Sunday, November 20, 2016

शौचालय निर्माण तो स्वच्छ भारत का "पहला पड़ाव"

मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही स्वच्छ भारत अभियान को अपनी प्राथमिकता में सबसे ऊँची पायदान पर रखा जिसमें साल 2014-15 में सरकार ने पचास लाख अस्सी हजार (5.8 मिलियन ) शौचालय बनाने का  लक्ष्य रखा था| स्वच्छ भारत मिशन के दो वर्ष के दौरान देश के शहरी क्षेत्रों में 22,97,389 व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों का निर्माण किया गया है। पहले दो वर्षो अर्थात मिशन की 40 प्रतिशत अवधि में 35 प्रतिशत लक्ष्य पूरा किया गया है। ऐसा खुले में शौच की प्रथा को समाप्त करने के लिए किया जा रहा है।
बयान के अनुसारगुजरात और आंध्र प्रदेश ने इस वर्ष सितंबर तक तीन वर्ष पहले ही मिशन लक्ष्य पूरा कर लिया है। गुजरात में 4,06,388 शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य पूरा किया गया हैजबकि आंध्र प्रदेश ने शहरी क्षेत्रों में 1,93,426 शौचालयों का निर्माण कर अपने आप को शहरी क्षेत्रों को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया है।सरकार को उम्मीद थी कि शौचालयों के निर्माण से देश स्वच्छता के मामले में बेहतर स्थिति में आ जाएगा पर व्यवहार में ऐसा होता नहीं दिख रहा है |इस समस्या के और भी पहलू हैं जिनको शौचालय निर्माण प्रक्रिया के साथ देखा जाना चाहिए |
अभी  आयी  भारत सरकार की स्वच्छता स्थिति रिपोर्ट” भारत में सफाई की समस्या के एक नए रुख की ओर इशारा कर रही है कि महज शौचालयों के निर्माण से भारत स्वच्छ नहीं हो जाएगाइस रिपोर्ट में भारतीय आंकड़ा सर्वेक्षण कार्यालय (एन एस एस ओ ) से प्राप्त आंकड़ों को आधार बनाया गया है |देश में कूड़ा प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) एक बड़ी समस्या है |ग्रामीण भारत में तरल कूड़े के लिए कोई कारगर व्यवस्था नहीं है जिसमें मानव मल भी शामिल है देश के 56.4 प्रतिशत शहरी वार्ड में सीवर की व्यवस्था का प्रावधान है आंकड़ों के मुताबिक़ देश का अस्सी प्रतिशत कूड़ा नदियों तालाबों और झीलों में बहा दिया जाता है|यह तरल कूड़ा पानी के स्रोतों को प्रदूषित कर देता है|यह एक गम्भीर समस्या है क्योंकि भूजल ही पेयजल का प्राथमिक स्रोत है |प्रदूषित पेयजल स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की समस्याएं पैदा करता है जिसका असर देश के मानव संसधान पर भी पड़ता है |
गाँव के 22.6 प्रतिशत वार्ड और शहर के 8.6 प्रतिशत वार्ड में एक भी स्वच्छ शौचालय लोगों के इस्तेमाल के लिए नहीं है |गंदे शौचालय महिलाओं में मूत्र संबंधी संक्रमण और त्वचा संबंधी रोगों का एक बड़ा कारण है |देश के 22.6 सामुदायिक शौचालय कभी साफ़ ही नहीं किये जाते हैं गाँवों में कूड़ा प्रबंधन का कोई तंत्र नहीं है लोग कूड़ा या तो घर के बाहर या खेतों ऐसे ही में डाल देते हैं |शहरों की हालत गाँवों से थोड़ी बेहतर है जहाँ 64 प्रतिशत वार्डों में कूड़ा फेंकने की जगह निर्धारित है लेकिन उसमें से मात्र 48 प्रतिशत ही रोज साफ़ किये जाते हैं |देश के तैंतालीस प्रतिशत शहरी वार्ड में घर घर जाकर कूड़ा एकत्र करने की सुविधा उपलब्ध है |पर जनवरी 2016 तक देश में एकत्रित कुल कूड़े का मात्र अठारह प्रतिशत का ही निस्तारण किया जा सका है|पर्याप्त कूड़ा प्रबन्धन(वेस्ट मैनेजमेंट ) के अभाव में शौचालय निर्माण प्रक्रिया के औचित्य पर सवालिया निशान लग जाते हैं |कूड़ा और मल का अगर उचित प्रबंधन नहीं हो रहा है तो भारत कभी स्वच्छ नहीं हो पायेगा |दिल्ली और मुमबई जैसे भारत के बड़े महानगर वैसे ही जगह की कमी का सामना कर रहे हैं वहां कूड़ा एकत्र करने की कोई उपयुक्त जगह नहीं है ऐसे में कूड़ा किसी एक खाली जगह डाला जाने लगता है वो धीरे –धीरे कूड़े के पहाड़ में तब्दील होने लग जाता है और फिर यही कूड़ा हवा के साथ उड़कर या अन्य कारणों से साफ़ –सफाई को प्रभावित करता है जिससे पहले हुई सफाई का कोई मतलब नहीं रहा जाता |इस व्यवस्था को यूँ भी समझा जा सकता है कि बारिश से पहले शहरों    के नगर निगम नाले की सिल्ट निकालते हैं और उस सिल्ट को नाले के किनारे ही छोड़ देते हैं और धीरे धीरे निकाली गयी सिल्ट फिर नाले में चली जाती है |
वेस्ट टू एनर्जी  रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी कोलम्बिया विश्वविद्यालय के एक  शोध के मुताबिक  भारत में अपर्याप्त कूड़ा  प्रबन्धन  बाईस बीमारियों का वाहक बनता है |शौचालय निर्माण स्वच्छता मापने का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता |शौचालय तो मानव मल को एक जगह एकत्र करके उसे आगे बढ़ा देता है पर महत्वपूर्ण सवाल ये है कि इस मानव मल का होता क्या है शहरों में यह मानव मल एसटीपी में जाता है और अगर एस टी पी नहीं है या काम नहीं कर रहा है तो इसे नदियों तालाबों में बहा दिया जाता है जो जल को प्रदूषित कर देता है स्वच्छ भारत का यह मिशन तभी अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगा  जब उचित कूड़ा और मल प्रबन्धन के तरीकों के साथ शौचालयों का निर्माण हो और उनकी साफ़ सफाई की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए |
नवोदय टाईम्स में 20/11/16 को प्रकाशित 

5 comments:

shivam pandey said...

सरकार के साथ -साथ आम आदमी को भी आगे आना चाहिए और इस पर गम्भीरता पूर्वक कार्य करना होगा
जितनी ज़िम्मेदारी सरकार की है उतनी ही आम आदमी की
कैसे का उपयोग कर के बीमारियों से बचा जाये इस पर सरकार को और तेज़ी से कार्य करने होगे । आम आदमी बताना होगा इसके साथ -साथ आम आदमी को इस नैतिक ज़िम्मेदारी को पूर्ण इमानदारी के साथ कार्य करने होंगे यदि इस ज़िम्मेदारी को आम आदमी ने अभी नहीं स्वीकार किया तो यह भविष्य में इतनी बड़ी समस्या बनकर उभरेगी जितना की सोच भी नहीं सकते ।
सरकार के दिशा निर्देशों को ध्यान में रख कर आम आदमी को इस भीषण समस्या का हल निकालना ही होगा

Aishwarya Shukla said...

sarkar key sath aam aadmi ko bhi aagey ana chaiyeh.. tabhi desh ko iss dikhat se nijat mileyga

chaudhary king arjan said...

abhi isme lucknow ke metro jitna time lage ga sir ....bahart me acha kam dire dire hi hota hai ....ARJAN CHAUDHARY

Md Imran Khan said...

बहुत सही बात कहीं है आपने | वृहद् स्तर पर शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम को स्थापित करना एवं लोगों में वेस्ट रीसाइक्लिंग एवं इसके प्रबंधन में व्यवहार परिवर्तन लाने की ज़रुरत है | स्वच्छता के नाम पर सरकार का सारा ध्यान केवल शौचालय बनाने और आंकड़ों के प्रदर्शन पर है| यही नहीं शौचालय के बनने में और लोगों द्वारा उसके निरंतर इस्तेमाल में भी एक लम्बा फासला होता है जिसपे सरकार ध्यान नहीं दे रही है| आखिर सालों की आदत को बदलने के लिए भी प्रयास करना होगा | कहीं ऐसा न हो की शौचालय बनवाने के बावजूद स्वाथ्य मानकों एवं बीमारियों पर इसका कोई प्रभाव ही न पड़े| ऐसा हुआ तो सरकार ने जैसे इस मुहीम को एक तमाशा बनाया है वह खुद ही तमाशा बन के न रह जाए|

anil kumar gautam said...

हाल ही में भारत के स्वच्छ भारत अभियान की राष्ट्रीय विशेषज्ञ रागिनी जैन ने कचरा निष्पादन से जुड़ा एक ऐसा उपाय प्रस्तुत किया है, जो सुरक्षित और लाभकारी सिद्ध हो सकता है।

इस प्रक्रिया में कूड़े के पहाड़ों को अलग-अलग भागों में एक प्रकार से काटकर उन्हें सीढ़ीनुमा बना दिया जाता है। इससे उनके अंदर पर्याप्त वायु प्रवेश कर पाती है और लीचेट नामक द्रव अंदर भूमि में जाने के बजाय बहकर बाहर आ जाता है। कूड़े के हर ढेर को सप्ताह में चार बार पलटा जाता है। उस पर कॅम्पोस्ट माइक्रोब्स का छिड़काव किया जाता है, जिससे उसे जैविक मिश्रण के रूप में बदला जा सके। इस चार बार के चक्र में कूड़े का ढेर 40 प्रतिशत कम हो जाता है। इस प्रकार उसका जीवोपचारण कर दिया जाता है। लीचेट के उपचार के लिए भी कुछ सूक्ष्म जीवाणुओं का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद जैव खनन के द्वारा इसका उपयोग खाद, सड़कों की मरम्मत, रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल पैलेट, प्लास्टिक की रिसाइक्लिंग और भूमि भराव के लिए किया जा सकता है।जीवोपचार से कचरा निष्पादन करने के प्रयास में अनेक उद्यमी एवं अन्वेषक लगे हुए हैं। इस प्रकार के उपचार से कचरे से पटी भूमि अन्य कार्यों के भी उपयुक्त हो जाती है। यह सुरक्षित, सरल और मितव्ययी प्रणाली है।यह कहने की तो ज़रूरत है ही नहीं कि बड़े शहरों और कस्बों के गंदे नाले यमुना जैसी देश की प्रमुख नदियों में गिराए जा रहे हैं | चाहे विभिन्न प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हों और चाहे पर्यावरण पर काम करने वाली स्वयमसेवी संस्थाएँ – और चाहे कितनी भी चिंतित सरकारें – ये सब गंभीर मुद्रा में ‘चिंता’ करते हुए तो दिखते हैं लेकिन सफाई जैसी बहुत छोटी ? या बहुत बड़ी ? समस्या पर ‘चिंताशील’ कोई नहीं दिखता | अगर ऐसा होता तो ठोस कचरा प्रबंधन, औद्योगिक कचरे के प्रबंधन, नदियों के प्रदूषण स्वच्छता और स्वास्थ के सम्बन्ध जैसे विषयों पर भी हमें बड़े अकादमिक आयोजन ज़रूर दिखाई देते हैं | विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय दिवसों और राष्ट्रीय दिवसों पर सरकारी पैसे से कुछ सेमीनार और शोध सम्मलेन होते ज़रूर हैं लेकिन उनमें समस्याओं के विभिन्न पक्षों की गिनती से ज्यादा कुछ नहीं हो पाता | ऐसे आयोजनों में आमंत्रित करने के लिए विशेषज्ञों का चयन करते समय लालच यह रहता है कि सम्बंधित विशेषज्ञ संसाधनों का प्रबंध करने में भी थोड़ा बहुत सक्षम हो | और होता यह है कि ऐसे समर्थ विशेषज्ञ पहले से चलती हुई यानी चालु योजना या परियोजना के आगे सोच ही नहीं पाते | जबकि जटिल समस्याओं के लिए हमें नवोन्मेषी मिज़ाज के लोगों की ज़रूरत पड़ती है | विज्ञान और प्रोद्योगिकी संस्थानों, प्रबंधन प्रोद्योगिकी संस्थानों और चिंताशील स्वयंसेवी संस्थाओं के समन्वित प्रयासों से, अपने अपने प्रभुत्व के आग्रह को छोड़ कर, एक दुसरे से मदद लेकर ही स्वच्छता जैसी बड़ी समस्या का समाधान खोजा जा पायेगा |

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