इंटरनेट ने उम्र
का एक चक्र पूरा कर लिया है। इसकी खूबियों और इसकी उपयोगिता की चर्चा तो बहुत हो
ली, अब इसकी सामाजिक उपयोगिता
पर भी चर्चा होनी चाहिए । पिछले तकरीबन एक दशक से भारत
को किसी और चीज ने उतना नहीं बदला, जितना
मोबाइल फोन और इंटरनेट ने बदल दिया है। संचार ही नहीं, इससे दोस्ती और रिश्ते तक बदल गए हैं। इतना ही नहीं, देश में अब मोबाइल बात करने का माध्यम भर नहीं है, बल्कि यह यह हमारे दैनिक जीवन को आसान बनाने में बहुत बड़ी भूमिका रही है |यूँ तो तकनीक निरपेक्ष होती है पर भारत में
इंटरनेट उन बहुत से लोगों को सबल बनाने का माध्यम बना जिनको समसामयिक दुनिया में
हाशिये पर माना जाता है खासकर महिलाओं के संदर्भ में किचन से लेकर मनचाही
शादी करने तक भारत में बराबरी के समाज निर्माण में इंटरनेट क्रांतिकारी भूमिका
निभा रहा है |इसने ने लोक व
लोकाचार के तरीकों को काफी हद तक बदल दिया है। बहुत-सी परंपराएं और बहत सारे रिवाज
अब अपना रास्ता बदल रहे हैं।
मेट्री मोनी
वेबसाइट के माध्यम से महिलायें चुन रही हैं वर
अब लोग
मैट्रीमोनी वेबसाइट की सहायता से जोड़ियां ही नहीं बना रहे, शादियां भी रचा रहे हैं। देश की
ऑनलाइन मैट्रीमोनी का कारोबार अगले तीन साल में 1,500 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के
अनुसार, वैवाहिक वेबसाइटों पर साल 2013 में 8.5लाख प्रोफाइल अपलोड की गई, जिनकी संख्या साल 2014 में बढ़कर 19.6 लाख हो गई। यानी एक साल में 130 प्रतिशत
का इजाफा । सामाजिक रूप से देखें, तो जहां पहले
शादी के केंद्र में लड़का और लड़की का परिवार रहा करता था,जिसमें
भी लड़के की इच्छा ज्यादा महत्वपूर्ण रहा करती थी | अब वह
धुरी खिसककर लड़के व लड़की की इच्छा पर केंद्रित होती दिखती है। यह अच्छा भी है, क्योंकि शादी जिन लोगों को करनी है, उनकी सहमति
परिवार में एक तरह के प्रजातांत्रिक आधार का निर्माण करती है, न कि उस पुरातन परंपरा के आधार पर, जहां
माता-पिता की इच्छा ही सब कुछ होती थी। इस पूरी प्रक्रिया में महिलाओं को अपना
जीवन साथी चुनने का अधिकार देने वाला इंटरनेट और शादी करने वाले विभिन्न एप बन रहे
हैं |
रसोई घर में भी
हो रही है ई क्रांति
हमारे रसोई घर
इनोवेशन का माध्यम भी हो सकते हैं इस ओर कभी ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया तभी तो
दादी नानी के हाथों के बने विभिन्न व्यंजन उनके जाने के साथ इतिहास हो गये पर जब
हमारे रसोईघरों को इंटरनेट का साथ मिला तो भारत में एक नई तरह की खाना क्रांति
आकार लेने लगी|ताजा उदाहरण है भारत में एप के माध्यम
से घर में बने खाने का तेजी से बढ़ता व्यापार,बदलती जीवन शैली, बढ़ता माध्यम वर्ग और काम काजी महिलाओं की संख्या में इजाफा और दुनिया में
दुसरे नंबर पर सबसे ज्यादा स्मार्ट फोन धारकों की उपस्थिति ये कुछ ऐसे कारक हैं
जिनसे घर पर खाना बनाने की प्रवर्ति प्रभावित हुई है | बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के अनुसार भारत में खाने का बाजार जो साल 2014 में
तेइस लाख करोड़ रुपये का था | साल 2020 में
इस बाजार के बयालीस लाख करोड़ रुपये हो जाने की उम्मीद है और इसमें सबसे बड़ी भूमिका
खाने के विभिन्न एप निभा रहे हैं जो घर पर बना खाना वाजिब कीमत पर आपकी मनपसंद जगह
पर पहुंचा रहें हैं |भारत की सबसे बड़ी घर पर बने
खाने का व्यवसाय करने वाली वेबसाईट व्हाट्स कुकिंग डॉट कॉम अभी मात्र एक साल की है
जिसके पास तीन हजार एक सौ अस्सी घर पर खाना बना कर पहुंचाने वाले लोग हैं और
यह देश के तीस जगहों से अपनी सेवा दे रही है |ऐतिहासिक
रूप से भारत में घर पर खाना बनाना कभी आर्थिक गणना में शामिल नहीं रहा पर एप
के माध्यम से खाने का बढ़ता कारोबार इस मिथक को तोड़ रहा है |आंकड़ों में घोषित तौर पर भारत की
पंद्रह प्रतिशत महिलायें रोजगार में हैं इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है इनकी बढ़ती
संख्या घर में बने खाने की मांग को बढ़ा रही है जिसका इंटरनेट अच्छा माध्यम बना है |इससे पहले घर में बने खाने का विकल्प
गरीब तबके की महिलायें ही हुआ करती थीं जो घर में आकर खाना बनाती थी और उनके कोई
श्रमिक अधिकार नहीं थे पर अब इसमें मध्यम वर्ग की उन महिलाओं का आगमन तेजी से हुआ
है जिन्हें आमतौर पर होम मेकर की संज्ञा दी जाती हैं जो घर पर रहती हैं और पति की
आमदनी पर निर्भर रहती हैं |एप आधारित खानों का यह व्यापार ऐसी महिलाओं को रोजगार से जोड़कर स्वावलंबन
का अहसास करा रहा है जिनके पास खाना बनाने का अलावा और कोई हुनर नहीं है |एप जैसे किचन ,फ्रॉम होम , साइबर सेफ ,मील टेंगो ,यम्मी किचन ,बाईट क्लब आदि के ग्राहकों की
बढ़ती संख्या यह इंगित कर रही है लोग बाहर का खाना तो पसंद कर रहे हैं पर गुणवत्ता
घर के बने खाने जितनी चाहते हैं|इस स्थिति में अपने
अपने घरों से यह महिलायें अपने संसधानों आपका मनपसन्द खाना एप के माध्यम से लोगों
तक पहुंचा रही हैं| इस व्यवसाय का बिजनेस मॉडल ओला या
उबेर जैसी टैक्सी कम्पनियों की तरह है मुनाफे में बंटवारा एप निर्माता कम्पनियों
और खाना बनाने वालों के बीच बंट जाता है |
बात चाहे मनपसंद
जीवन साथी चुनने की हो या घर का वह उपेक्षित हिस्सा जहाँ महिलायें महज खाना
बनाती हैं इंटरनेट के कारण अब महिलाओं के स्वावलंबन और सशक्तीकरण का जरिया बन रहा
है बदलाव की शुरुवात हो चुकी है पर फिर भी अभी लंबा रास्ता तय करना है |
नवभारत टाईम्स में 02/05/16 को प्रकाशित



