Wednesday, November 16, 2016

शहरी खांचे से नहीं निकला ऍफ़ एम्


सूचना और प्रसारण मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार अभी वर्तमान में   215 शहर रेडियो की एफ एम् सेवा का लुत्फ़ उठा रहे है और तृतीय चरण की नीलामी के पश्चात सौ ऍफ़ एम् चैनल जल्दी ही शुरू होने वाले हैं|इसके बाद भारत में कुल एफ एम् चैनलों की संख्या 345 हो जाने की उम्मीद है| भारत में एफ एम् प्रसारण की शुरुआत   23 जुलाई 1977 में तत्कालीन मद्रास(अब चेन्नई ) केंद्र से की थी पर लागत की अधिकता के कारण इस प्रयोग को पूरे भारत में प्रोत्साहित नहीं किया गया | नब्बे के दशक में आकाशवाणी ने देश के चार बड़े शहरो में एफ एम् सेवा प्रारम्भ की बाद में निजी प्रसारकों के इस क्षेत्र में उतरने से यह क्षेत्र एक बड़े बाजार में तब्दील हो गया है | एफ एम् स्टेशन  म्यूजिक रेडियो और टाक रेडियो  के बीच संतुलन नहीं बना पाए हैं|तथ्य यह भी है कि एक माध्यम के रूप में ऍफ़ एम् रेडियो अभी भी एक गंभीर माध्यम के रूप में जड़ नहीं जमा पाया है | एक पूर्णता शहरी माध्यम के रूप में शुरू हुए रेडियो के इस नए अवतार को हाथों हाथ लिया गया पर लगभग आज दो दशक बीतने के बाद भी यह माध्यम इन्फोटेंमेन्ट माध्यम के रूप में उभरने की बजाय मात्र एक अगम्भीर  संगीत माध्यम के रूप में ही अपनी पहचान के लिए संघर्षरत है |
                     इस नीलामी के बाद एफ एम् चैनलों की पहुँच में  कई नए शहर आयेंगे व्यवसाय की दृष्टि से भले ही यह फायदे का सौदा हो पर कंटेंट के स्तर पर भारत के एफ एम् चैनल   एक ठहरे मनोरंजक  माध्यम के रूप में तब्दील हो गए हैं जो  पिछले बीस   सालों में सिर्फ मनोरंजन के नाम पर हमें फ़िल्मी गाने और प्रेम समस्याओं को ही सुना रहे हैं|तकनीकी तेजी ने मीडिया के अन्य रूपों में  बहुत बदलाव ला दिया है|पर भारत में अभी एफ एम् रेडियो की ताकत का दोहन होना बाकी है |इसका एक बड़ा कारण ऍफ़ एम् अपने शहरी माध्यम की छवि को तोड़ नहीं पाया है |पहला कारण पूरी तरह व्यवसायिक  माध्यम होने के कारण यह मात्र विज्ञापनदाताओ पर निर्भर है दूसरा निजी  ऍफ़ एम् चैनलों पर समाचारों का प्रसारण निषिद्ध होना |समाचारों का प्रसारण न होना एक नीतिगत मसला है पर सरकारों का निजी ऍफ़ एम् पर समाचारों के प्रसारण से डरना अपने आप में यह बताता है कि सरकार इस माध्यम की ताकत और संवेदनशीलता से परिचित है | जाहिर है कि सरकार रेडियो के मामले में कोई बदलाव नहीं चाहती वह यही चाहती है कि रेडियो श्रोता उन्हीं ख़बरों को जाने सुने जो वह लोगों को बताना चाहती है इसका बेहतरीन उदाहरण प्रधानमंत्री मोदी का मन की बात कार्यक्रम है जिसे सारे निजी ऍफ़ एम् चैनल प्रसारित करते हैं पर इस कार्यक्रम का विश्लेषण टीवी समाचार चैनलों में होता है |
                      भारत में हुई मोबाईल क्रांति ने ऍफ़ एम् रेडियो को हर हाथ में पहुंचा दिया है पर कंटेंट के नाम पर नए गाने फ़िल्मी गॉसिप और युवाओं की प्रेम संबंधी समस्याओं पर आधारित कार्यक्रम,ऐसे कार्यक्रम देश की युवा पीढी को एक ऐसा नागरिक बना रहे हैं जो जहनी तौर पर एकदम खाली हो जिसे सवाल करना न आता हो जिसके लिए भारत का मतलब महज फ़िल्में और उनकी व्यक्तिगत समस्याएं हों जिनमें सामूहिकता के लिए कहीं कोई जगह न हो |ऐसा भी नहीं है कि समाचारों के प्रसारण पर रोक के कारण कोई नवाचरिता निजी ऍफ़ एम् चैनल कर ही नहीं सकते पर उनकी तरफ से घिसा हुआ तर्क आता है कि लोग सुनना ही नहीं चाहते पर इसी कड़ी में लोक प्रसारक आकाशवाणी का मनोरंजक चैनल विविध भारती अपवाद है |विविधभारती की स्थापना विशुद्ध मनोरंजक चैनल के रूप में की गयी थी पर जिन जिन शहरों में विविध भारती ऍफ़ एम् बैंड पर सुनायी पड़ रहा है वहां वहां उसने निजी ऍफ़ एम् चैनलों को अकेले कड़ी टक्कर दी है और अपने मनोरंजक स्वरुप को बरकरार रखते हुए अपने कार्यकर्मों में पर्याप्त विविधता रखते हुए  अपनी सामजिक जिम्मेदारी को भी निभाया है और इन्फोटेंमेन्ट का सही संतुलन भी बनाया है  मतलब यह तर्क कि लोग सस्ती बातें और फ़िल्मी गानें ही सुनना चाहते हैं भोथरा हो जाता है |रेडियो और साहित्य के बीच कड़ी का काम करने वाली विधा रेडियो नाटक आज सिर्फ विविधभारती के सहारे जिन्दा है |तीसरे चरण के नए ऍफ़ एम् केन्द्रों के खुलने के बाद जब ऍफ़ एम् कस्बों और छोटे शहरों में पहुंचेगा तब क्या ये अपना शहरी चरित्र बदलते हुए वास्तविक भारत का प्रतिनिधित्व करेगा या उसे जाने पहचाने फोर्मुले पर चलेगा जिसका प्रयोग बड़े शहरों में किया जाता रहा है ,इसका फैसला होना बाकी है |
अमर उजाला में 16/11/15 में प्रकाशित 



Wednesday, November 9, 2016

छोटा सा घर है मगर

कभी कभी जिंदगी के बड़े सवालों का जवाब बहुत छोटी सी चीज़ में मिल जाता वो जो हमारे आस पास होती हैं पर हमारा ध्यान उन पर जाता ही नहीं लिखने बैठा तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था क्या लिखूं तभी कुछ पंक्तियाँ कानो में पडी   “ हर घर चुपचाप ये कहता है इस घर में कौन रहता है ,छत बताती है ये किसका आसमान है रंग कहते हैं किसका ये जहाँ है कौन चुन चुन कर प्यार से इसे सजाता है कौन इस मकान में अपना घर बसाता है” हाँ ये घर ही तो है जिससे सब कुछ है |घर के बगैर सोचिये हमारा जीवन कैसा होता |घर से परिवार और परिवार से रिश्ते नातों का सफर सब कैसे आपस में कैसे जुड़े हैं  |इंसान की सामजिकता का आधार घर है  |विकास के क्रम में हमारी सारी तरक्की का केंद्र  घर ही तो है |आदि मानव अगर घर ही न बनाता तो आज दुनिया इतनी खूबसूरत न होती |दिन भर की भाग दौड के बाद हम सब अपने घर जाने को उतावले होते है वो जगह जो आपकी अपनी है जहाँ हम सुकून पाते हैं |
सुकून और घर के इस सफर में अगर हम संगीत को अपना हमसफर बना लें और ये गाना सुने तो सुकून दोगुना हो जाएगा “लोग जहाँ पर रहते हैं उस जगह को वो घर कहते हैं हम जिस घर में रहते हैं उसे प्यार का मंदिर कहते हैं”(प्यार का मंदिर ) सही ही तो है घर अगर मंदिर है तो वहां शांति होगी बड़े बुजुर्गों का साथ होगा |अगर कभी आपको अपने घर से दूर जाना पड़े तो आप ही नहीं आपका घर भी आपको याद करता है क्योंकि घर तो रिश्तों से बनता है ईंट पत्थरो से तो मकान बनता है  “घर कब आओगे तुम बिन ये घर सूना सूना है” (बोर्डर ) पर आगे बढ़ने के लिए घर छोडना ही पड़ता है और हम इस दुनिया में अपना आशियाना बनाने अपने सपनों को सच करने  निकल पड़ते हैं |माता- पिता के प्यार से दूर, अपने अपनों का साथ छोड़ पर एक घर से दूसरे घर तक का ये सफर आसान नहीं होता पर इंसान बहुत फ्लैक्सेबल जीव होता है बहुत जल्दी हम कुछ नए रिश्ते बना लेते हैं और तब दिल अचानक गा उठता है “ये तेरा घर ये मेरा घर किसी को देखना हो गर तो पहले आके मांग ले तेरी नज़र मेरी नज़र” (साथ –साथ) पर ये घर यूँ ही नहीं बन जाता इसमें इंसानी रिश्तों के सारे रंग होते कहीं प्यार कहीं तकरार आपसी रिश्तों की खूबसूरती का एहसास घर ही कराता है |रक्षा बंधन में बहन भाई का अपने घर आने का इन्तिज़ार करती है वहीं त्योहारों में माँ बाप को अपने बेटे बेटियों के घर आने का इन्तिज़ार रहता है और कहीं एक पत्नी रोज शाम को अपने पति का घर लौटने का इन्तिज़ार करती है |
दुनिया बदल रही है अगर पति -पत्नी दोनों वर्किंग है तो छोटे बेटे बेटियों को अपने माता पिता के घर लौटने का इन्तिज़ार रहता है |देखा जाए तो रिश्ते तो बहाना है इन्तिज़ार तो घर करता है जिनके होने से कोई मकान घर बन जाता है |असल में रिश्तों की खूबसूरती को महसूस घर ही कराता है जहाँ कोई अनजाना आकर  रिश्तों की डोर में बंध जाता  |घर घर होता है वो छोटा हो या बड़ा इससे फर्क नहीं पड़ता अगर उसमे रहने वाले लोग आपस में रिश्तों की मीठी डोर से बंधे हैं “छोटा सा घर है ये मगर तुम इसको पसंद कर लो” (डर ) तो घर के बहाने ही सही घर के उन रिश्तों पर भी ध्यान दीजिए जो बिना शर्त आपको प्यार दिए जा रहे हैं अपने अपनों का ख्याल कीजिये वो कोई भी हो सकता है वो बूढ़े माता पिता  आपका बेटा या बेटी या फिर पति पत्नी जिन्हें जीवन की भाग दौड में आप शायद उतना वक्त नहीं दे पा रहे हैं तो आज उन लोगों को शुक्रिया कहिये जिनके कारण आपका घर , घर है |
प्रभात खबर में 09/11/16 को प्रकाशित 

Monday, November 7, 2016

वर्च्युल दुनिया में भी भेदभाव झेल रही हैं भारतीय महिलाएं

असमानता कैसी भी हो उसका असर समाज के हर हिस्से पर पड़ता है |भारत में स्त्री –पुरुष समाज के समान धरातल पर नहीं खड़े हैं लैंगिक नजरिये से यह कोई नया तथ्य नहीं है कि भारत में महिलाओं को समाज में अपनी जगह बनाने के लिए पुरुषों से कहीं ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है बात चाहे शिक्षा की हो या करियर या फिर जीवन साथी का चुनाव |सूचना क्रान्ति के इस युग में सोशल मीडिया के आगमन के साथ इस धारणा को बल मिला कि तकनीक इस लैंगिक असामनता को कम करने में कुछ मददगार होगी और इसमें अहम् योगदान फेसबुक जैसी सोशल मीडिया साईट्स देंगी | फेसबुक के ही आंकड़ों के मुताबिक भारत में पंद्रह  करोड़ तीस लाख लोग इसका इस्तेमाल कर रहे थे पर यहाँ भी  विकसित देशों के विपरीत पुरुष वर्चस्व कायम है |भारत की महिलायें यहाँ भी उस पुरुषवादी मानसिकता का शिकार हैं जिसका सामना उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में करना पड़ता है यूनाइटेड किंगडम की संस्था “वी आर द सोशल” की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में फेसबुक का इस्तेमाल करने वाली कुल आबादी में महिलाओं का हिस्सा मात्र चौबीस प्रतिशत है यानि तीन पुरुष प्रयोगकर्ताओं के मुकाबले एक महिला प्रयोगकर्ता |एक ऐसा देश जो दुनिया में दूसरे स्थान पर सबसे ज्यादा स्मार्ट फोन प्रयोग करता है वहां महिलाओं के सम्बन्ध में ऐसे आंकड़े चौंकाते नहीं पर परेशान जरुर करते हैं | देश में इस समय दुनिया की सबसे युवा आबादी बसती है जो सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा प्रयोग करती है |पर विभिन्न आयु वर्गों के फेसबुक इस्तेमाल में 18 से 24 और 24 से 35 में यह अंतर सबसे ज्यादा है |वैसे भी फेसबुक एक शहरी और पढ़े लिखे लोगों का माध्यम है यह वह आबादी है जो पढी लिखी है और आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में है वहां  भी महिलायें पुरुषों के मुकाबले चुप हैं |तकनीक लिंग निरपेक्ष होती है पर उसका इस्तेमाल प्रयोग करने वाले की मानसिकता पर निर्भर करता है |
पितृ सत्तामक ढांचा और वित्तीय आत्मनिर्भरता का न होना
आंकड़ों के संदर्भ में अगर हम देखें तो चूंकि भारतीय सामाजिक ढांचा पितृ सत्तात्मक है और ज्यादातर  महिलाओं को वित्तीय आत्मनिर्भरता हासिल नहीं है इसलिए किसी भी घर में जब कोई नयी तकनीक आती है तो उसका पहला उपभोक्ता पुरुष ही होता है क्योंकि उसके पास वित्तीय आत्म निर्भरता है |स्मार्ट फोन आमतौर पर सामान्य फोन के मुकाबले थोड़े महंगे होते हैं तो महिलाओं को या तो घर के किसी पुरुष के छोड़े हुए मोबाईल मिलते हैं या सस्ते वाले बगैर इंटरनेट के फोन इस धारणा के साथ कि वे इंटरनेट वाले फोन का क्या करेंगी |वैसे भी फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफोर्म अपने आप को व्यक्त करने का मौका देते हैं पर एक आम हिन्दुस्तानी महिला को पत्नी या बहन के रूप में घरेलू निर्णय प्रक्रिया में वो स्थान नहीं दिया जाता (अपवादों को छोड़कर सम्पूर्ण भारत के सम्बन्ध में  ) जिसकी हकदार वो हैं ऐसी स्थिति में वो आत्मविश्वास की कमी का शिकार हो जाती हैं |ऐसे में वो फेसबुक जैसे माध्यमों  पर या तो आने से हिचकती हैं और अगर आती हैं तो ज्यादा सक्रिय नहीं रहती हैं क्योंकि उन्हें डर लगता है कि पता नहीं वो सही कह रही हैं या गलत |शिक्षा का पहला मौका किसी भी परिवार में लड़कों को पहले मिलता है तो लड़कियों का शिक्षित न होना भी उन्हें तकनीक से दूरी बनाये रखने में मदद करता है क्योंकि स्मार्ट फोन तकनीकी रूप से थोड़े जटिल होते हैं और उसके इस्तेमाल को सीखने में किसी कम पढ़े लिखे या अशिक्षित व्यक्ति को ज्यादा परेशानी होगी  |
सोशल मीडिया पर सुरक्षित नहीं हैं महिलायें और सामाजिक वर्जनाएं
तथ्य यह भी है कि महिलाओं के मुकाबले पुरुष भारत में किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर ज्यादा सुरक्षित है वो कुछ भी लिख सकता है कैसी भी तस्वीरें डाल सकता है पर अगर महिलाएं फेसबुक पर पुरुषों जितनी बिंदास हो जाएँ तो उन्हें तुरंत चरित्र प्रमाण पत्र मिलने लग जाते हैं इसलिए कम ही महिलाएं फेसबुक पर ज्यादा मुखर रह पाती हैं और सामान्य महिलायें निजता के हवाले से या तो इससे दूर रहना पसंद करती हैं या फेसबुक का बहुत नियंत्रित उपयोग करती हैं |किसी सामान्य पुरुष के मुकाबले महिलायें ज्यादा खतरे में रहती हैं |मोर्फिंग के डर से अकेले की तस्वीरें कम डालना ,क्या लिखें क्या न लिखें इस संशय में रहना , लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे अगर मैंने यह तस्वीर लगा दी, अगर मेरा अकाउंट हैक हो गया तो ऐसी पीडायें हैं जिनसे एक पुरुष का सामना कभी नहीं होता है |समाचार पत्रों में अक्सर ऐसी घटनाओं का ब्यौरा रहता है जब किसी न किसी महिला को इन सबसे गुजरना पड़ता है कुछ तो सामाजिक तिरस्कार के डर से आत्महत्या तक कर लेती हैं | भारत में किसी भी महिला को पुरुषों के मुकाबले ज्यादा अजनबियों के मित्रता निवेदन मिलते हैं |समाज वैसे भी महिलाओं की यौनिकता को नियत्रण में रखना चाहता है इसलिए महिलाओं के मिलने जुलने ,हंसने ,उठने बैठने तक सभी स्तरों पर उनके लिए एक आदर्श मानक बनाये गए हैं जिससे अच्छी महिला और बुरी महिला का प्रमाण पत्र दिया जा सके और ये मानक फेसबुक जैसे सोशल प्लेटफोर्म पर भी लागू रहते हैं | पति के फेसबुक का पासवर्ड पत्नी को न पता हो पर पत्नी का पासवर्ड पति को पता होना चाहिए ऐसे बहुत से तुच्छ मानक आचरण भी महिलाओं के फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफोर्म से दूरी के कारण है |महिलाओं के प्रति असमान व्यवहार की जो लड़ाई जमीन पर चल रही थी अब उसकी शुरुआत वर्च्युल दुनिया में भी हो गयी है |महिलायें यह लड़ाई शिक्षा और वित्तीय आत्मनिर्भरता से ही जीत सकती हैं | 
नवभारत टाईम्स में 07/11/2016 को प्रकाशित 

Monday, October 31, 2016

अब आपकी मुट्ठी में है मनोरंजन की दुनिया



कल तक स्क्रीन का मतलब घरों में सिर्फ टीवी ही  होता था पर आज उस स्क्रीन के साथ एक और स्क्रीन हमारी जिन्दगी का अहम् हिस्सा बन गयी है वो है हमारे स्मार्ट फोन की स्क्रीन जहाँ मनोरंजन से लेकर समाचारों का सारा खजाना  मौजूद है रही सही कसर फेस्वुक लाईव फीचर ने पूरी कर दी है | ऑनलाईन मनोरजन उद्योग भारत में बगैर हलचल के तेजी से पैर पसार रहा है | मनोरंजन के लिए हमारी निर्भरता का प्राथमिक माध्यम  टेलीविजन पिछड़ रहा  है |समाचारों के मामले में हमारी निर्भरता टीवी और समाचार पत्रों पर कम हुई है और इसकी जगह विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पहले ही ले चुके हैं पर मनोरजन के क्षेत्र में टीवी की बादशाहत बरकरार रही पर इसको असली टक्कर इंटरनेट में 4 जी तकनीक और डाटा पैक के साथ मनोरंजन के विभिन्न एप से मिलनी शुरू हो गयी है |शुरुआत यूट्यूब के वीडियो से हुई |आज लगभग छ करोड़ भारतीय (60 मिलीयन ) महीने में अडतालीस घंटे यूट्यूब पर वीडियो देखने में बिताते हैं |ये इस ओर इशारा करता है कि भारतीय दर्शकों की मनोरंजन जरूरतों को टीवी अकेले पूरा करने में अक्षम है दूसरा अपनी मनोरंजन जरूरतों को पूरा करने के लिए दर्शक टेलीविजन की  बंधी बंधाई समय सारिणी  से निजात चाहता है |यानि पसंद का कंटेंट दर्शकों के पसंद के समय के हिसाब से |गूगल के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल  देश से वीडियो अपलोड होने की संख्या में नब्बे प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है और वीडियो देखने के समय में अस्सी प्रतिशत का इजाफा हुआ है |तथ्य यह भी यूट्यूब पर वीडियो देखने के समय में इजाफा स्मार्ट फोन की बढ़ती संख्या के साथ हुआ है | मनोरंजन उद्योग से जुड़े हुए सभी बड़े समूह अपने यूट्यूब चैनल के साथ मैदान में मौजूद हैं |भारतीय वीडियो देखना बहुत पसंद कर रहे हैं आंकड़े भी इसकी पुष्टि कर रहे हैं |2015 के आंकड़ों के मुताबिक यूट्यूब भारत के कुल स्मार्टफोन उपभोक्ता मे से साठ प्रतिशत यूट्यूब के एप का नियमित रूप से इस्तेमाल करते हैं और कुल छाछट प्रतिशत उपभोक्ता नियमित रूप से इंटरनेट पर यूट्यूब के इतर वीडियो देखते हैं साल 2014 में यह आंकड़ा उनचास प्रतिशत था |आंकड़ों का विश्लेषण करते वक्त हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तब 4जी तकनीक देश में शुरू हुई नहीं थी |इण्डिया मोबाईल ब्रोड्बैंड इंडेक्स 2016 और के पी एम् जी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल नेट डाटा उपभोग का अडतीस से बयालीस प्रतिशत हिस्सा वीडियो और ऑडियो पर खर्च किया जाता है | डिजीटल विज्ञापनों पर बढ़ता खर्च भी इसी तथ्य को इंगित कर रहा है साल 2015 में जहाँ इन पर 6010 करोड़ रुपये खर्च किये गये जिसके साल 2020 तक करीब चार गुना 25,520 करोड़ रुपये हो जाने की उम्मीद है |
हिन्दुस्तान में 31/10/16 को प्रकाशित 

Tuesday, July 19, 2016

तकनीक से बनती भाषा ने बदला संवाद

तकनीक और का संगम  मोर्स कोड की उत्पत्ति के साथ शुरू हुआ  जब १९०० के दशक में मोर्स कोड द्वारा “प्रेम एवं चुम्बन”, “साभार”, “ढेर सारी सफलता”  जैसी भावनाओं को व्यक्त करने की कोशिश की गयी| परन्तु इस कोशिश को सच्ची सफलता मिली १९८२ में ऑनलाइन इमोटिकॉन्स के पदार्पण के  साथ  शीघ्र ही इनका काफी प्रसार हो गया | इसके बाद जापानी मोबाइल कंपनियों द्वारा नामकरण किये गए इमोजी प्रचलन में आये |  सच यह है कि आज जिस तरह साइबर दुनिया में  ईमोजी के प्रयोग को बढ़ावा मिल रहा है वह एक मूक क्रांति है एक नयी भाषा के उदय होने की |सम्प्रेषण के लिए भाषा की आवश्यकता है,वाचिक भाषा में भावों को संचारित करना आसान होता है क्योंकि शब्दों को देह भाषा का साथ मिलता है पर लिखित भाषा में भावों को संचारित करने की एक सीमा होती है|इस सीमा को ख़त्म करने के लिए विराम चिन्हों का प्रयोग शुरू हुआ जो भावों के उतार चढ़ाव को व्यक्त करते हैं |सोशल नेटवर्किंग साईट्स के उदय और नयी सूचना तकनीक ने अभिव्यक्ति को क्लास से निकाल कर मास तक पहुंचा दिया है| सही विराम चिन्हों के इस्तेमाल का अज्ञान  और लोगों के पास घटता समय वो कारक रहे जिन्होंने ईमोजी की लोकप्रियता को बढाया | इसकी खासियत भाषा और भावों का परस्पर संचार है चित्र आधारित इस भाषा को आप आसानी से आप किसी भी भाषा में समझ सकते हैं क्योंकि मानवीय भाव सार्वभौमिक रूप से एक होते हैं मसलन रोता हुआ चेहरा किसी भी भाषा में आपके दुखी होने की निशानी है | इमोजी पात्र आपको देखने में मामूली लग सकते हैं परन्तु वे बड़ी तेज़ी से ऑनलाइन संचार की आधारशिला बनते जा रहे हैं और एक नयी भाषा के निर्माण की आधारशिला रख रहे है| विगत वर्ष केवल ट्विटर पर ही १००० करोड़(दस बिलियन )इमोजी भेजे गए| यदि इन्स्टाग्राम की बात की जाए तो पिछले वर्ष इस पर की जाने वाली पोस्टों में से लगभग पांच सौ  करोड़  में इमोजी का प्रयोग किया गया था|इस समय लगभग 1601 इमोजी चिन्हों का प्रयोग किया जा रहा है और इनकी संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है|ईमोजी जापनी भाषा के दो शब्दों ‘ई’ और ‘मोजी’ से मिल कर बना है, ‘ई’ का मतलब है इमेज यानी चित्र और ‘मोजी’ का मतलब है भाषा या लिपि| इमोटिकौन्स इमोशन (भाव) और आइकन (संकेत) से मिल कर बने हैं| इमोजी की इस प्रसिद्धि का एक कारण यह भी है कि हम लोग आमतौर पर लिखे हुए शब्दों का सही भावार्थ नहीं निकाल पाते हैं| इलिनॉय विश्वविद्यालय द्वारा कराये गए एक शोध के अनुसार केवल ५० प्रतिशत से कुछ ही अधिक लोग लिखे हुए शब्दों का सही भावार्थ लगा पाते हैं| इस शोध के दौरान केवल ५६ प्रतिशत लोग ही किसी लेख में अन्तर्निहित व्यंग्य अथवा गंभीरता के भाव का सही आंकलन कर पाए| जब यही लेख उन्हें रिकॉर्ड कर के सुनाया गया तो यह प्रतिशत लगभग एक चौथाई बढ़ गया| वैसे भी भावनात्मक रूप से जटिल सन्देश केवल शब्दों के माध्यम से भेजना एक दुरूह कार्य है|भाषा-वैज्ञानिकों के अनुसार इमोजियों की संख्या में लगातार वृद्धि होना एवं इनका और जटिल होते जाना इस बात का घोतक है कि आने वाले समय में यह एक भाषा का रूप ले सकते हैं| उनका यह भी मानना है कि इमोजी भाषा मिश्र की चित्रलिपि से भी अधिक उन्नत एवं परिष्कृत होगी|
पर जैसे-जैसे डिजिटल संचार आमने-सामने के संचार की जगह लेता जा रहा है, वैसे ही इन पर किया जाना शोध भी बढ़ रहा है जो यह बता रहा है कि इस आकार लेती नयी भाषा में कई सारी विसंगतियां भी हैं|जिससे ओनलाईन चैट और सोशल मीडिया में इनके इस्तेमाल से अक्सर भ्रम की स्थिति बन जाती है | ईमोजी भले ही भाषा के स्तर पर चित्रात्मक पर इसमें चित्र लिपि जैसी विविधता अभी तक नहीं आ पायी है और भावों के उतार चढ़ाव नहीं प्रदर्शित होता है
अमेरिका की मिनेसोटा विश्वविद्यालय में किये गए एक शोध में यह खुलासा हुआ है कि लोग रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाले बिम्बों के जो अर्थ निकलते हैं उसमें तमाम विसंगतियां हैं| लोग अक्सर एक ही इमोजी को भिन्न-भिन्न तरीके से समझते हैं| कुछ लोग एक इमोजी को सकारात्मक मानते हैं तो दुसरे उसी इमोजी को या तो नकारात्मक अथवा तटस्थ समझते हैं|शोध के दौरान यह भी सामने आया कि भ्रम की यह स्थिति तब और भी बढ़ जाती है जब एक ही इमोजी के अलग-अलग संस्करण लोगों के सामने  रखे जाते हैं| उदहारण के लिए मुस्कराते हुए चेहरे और हंसती हुई आँखों वाले इमोजी के लगभग १७ भिन्न-भिन्न संस्करण हैं| यह सभी सोशल  मीडिया एवं स्मार्टफोन पर विभिन्न कंपनियों जैसे एप्पल, सैमसंग आदि द्वारा भिन्न-भिन्न रूप में दर्शाए जाते हैं| जब इसी इमोजी का एप्पल द्वारा बनाया गया संस्करण जिसमें कि पात्र दांतों के साथ मुस्कराता है उसे अधिकतर लोगों ने नकारात्मक माना जबकि इसका अर्थ उन्हें सकारात्मक लगना चाहिए था|
मुद्रण कला से जुड़े लोग काफी समय से इस प्रयास  में लगे हैं कि किस प्रकार भावनाओं को विरामचिन्हों के माध्यम से व्यक्त किया जाये| यदि वे अपनी इस कोशिश में सफल रहते हैं तो आने वाले समय में इमोजी केवल एक बिम्ब न रहकर एक पूर्ण भाषा का दर्जा हासिल कर लेंगे और यह एक ऐसी भाषा होगी जिसे संसार के सभी भागों के लोग समझ सकेंगे|
अमर उजाला में 19/07/16 को प्रकाशित 

Tuesday, May 31, 2016

फिल्मों से गायब होते जानवर

अभी हाल ही में आयी डिज्नी की फिल्म जंगलबुक ने सिर्फ तीन दिन में बॉक्स ऑफिस परअभी हाल ही में आयी डिज्नी की फिल्म जंगलबुक ने सिर्फ तीन दिन में बॉक्स ऑफिस पर 40|19 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की है।जो भारत में प्रदर्शित किसी भी हॉलीवुड फिल्म के एक दिन में सबसे अधिक कमाई का रिकॉर्ड है।भारत में हौलीवुड की इस फिल्म को हाथों हाथ लिया गया |खास बात ये है कि काफी समय बाद इस फिल्म में इंसान के साथ जानवर भी मुख्य भूमिका में हैं |कुछ ऐसा ही स्वागत साल 2012 में आयी जानवर और इंसान के रिश्तों पर बनी आंग ली निर्देशित  फिल्म "लाइफ ऑफ पाई" का भी हुआ था इस फिल्म ने भी भारत में खासी कमाई की थी |उल्लेखनीय तथ्य यह है कि दोनों फ़िल्में भारत केन्द्रित इंसान और जानवर के रिश्तों पर बनी थी और दोनों ही हॉलीवुड के निर्माताओं की देन थी,इस जानकारी में कुछ भी नया नहीं है पर जब हम दुनिया में सबसे ज्यादा फ़िल्में बनाने वाले देश की फिल्म इंडस्ट्री पर नजर डालते हैं तो हम पाते हैं हमारी फिल्मों से जंगल और जानवर लगातार गायब होते जा रहे हैं और उनकी जगह हमें दिख रही है मानव निर्मित कृत्रिमता,पर हमेशा से ऐसा नहीं था | हिन्दी फिल्मों में जानवरों का इस्तेमाल उतना ही पुराना है, जितना इसका इतिहास। अगर आप हिन्दी सिनेमा की पहली फिल्म राजा हरीशचंद्र भी देखें, तो वहां भी दृश्यों में जानवर नजर आएंगे। यह विकास और प्रगति की  चाह में बगैर सोचे भागने का साईड इफेक्ट है |यह स्थापित तथ्य है इंसान और जानवर अलग होकर वर्षों तक नहीं जी सकते और शायद इसीलिये हिन्दी फिल्मों में जानवर लंबे समय तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे| फिल्मों में जानवरों की उपस्थिति 1930 और 40 के दशक में  नाडिया की फिल्मों में देखी जा सकती है पर उसके बाद ये सिलसिला बहुत तेजी से आगे बढ़ा जिसमे रानी और जानी, धरम वीर,  मर्द, खून भरी मांग, तेरी मेहरबानियां, दूध का कर्ज़, कुली  और अजूबा, जैसी फ़िल्में शामिल हैं|दो हजार के दशक में अक्षय कुमार अभिनीत “इण्टरतेन्मेंट” ही एक मात्र उल्लेखनीय फिल्म रही जिसमें इंसान के साथ साथ जानवर भी अहम् भूमिका में था,इसके अलावा सुंदर बन के बाघों पर बनी फिल्म रोर का भी उल्लेख किया जा सकता है |   एक वक्त में जानवरों के  चरित्र की व्यापकता को देखते हुए  इन्हें  सहनायक या जानवर मित्र की संज्ञा मिली थी | जो वर्षों तक हमारी   फिल्मों का प्रभावकारी हिस्सा रहे|वो हमें कहीं हंसा रहे थे तो कहीं भावनात्मक रूप से संबल भी दे रहे थे|पिछले दो दशकों में ऐसी फिल्मों की संख्या में काफी कमी आयी है|यह मनुष्य और प्रकृति  के कमजोर होते सम्बन्धों का सबूत है| प्रकृति से हमारा ये जुड़ाव सिर्फ मनोहारी दृश्यों तक सीमित हो गया है|हमें बिलकुल भी एहसास नहीं हुआ कि कब हमारे जीवन में प्रमुख स्थान रखने वाले जानवर सिल्वर स्क्रीन से कब गायब हो गए|आज  फिल्मों  में आधुनिकता के सारे नए प्रतीक दिखते हैं|मॉल्स से लेकर चमचमाती गाड़ियों तक ये उत्तर उदारीकरण के दौर का सिनेमा हैं|  समीक्षक हिन्दी सिनेमा से जानवरों के गायब हो जाने के पीछे कड़े होते जाते वन्य जीव कानून का हवाला देते हैं और मानते हैं कि निर्माता कानूनी पचड़ों में नहीं पड़ना चाहते इसलिए फिल्मों में जानवरों का कम इस्तेमाल होने लगा है|पर तर्क यह भी है कि हॉलीवुड तकनीक के सहारे नियमित अंतराल पर जानवर और इंसान के रिश्तों पर फिल्म बना सकता है तो भारतीय फिल्म उद्योग क्यों नहीं ?
इसका एक कारण उदारीकरण के पश्चात जीवन का अधिक पेचीदा हो जाना और मशीनों पर हमारी बढ़ती निर्भरता है|याद कीजिये फिल्म “नया दौर” को जिसमें जानवर और मशीन के बीच फंसे इंसान के चुनाव के विकल्प का द्वन्द दिखाया गया था जिसमें आखिर में जीत जानवर की होती है पर विकास की इस दौड़ में जैसे जैसे हमारी मशीनों पर निर्भरता बढी जानवरों से हमारा रिश्ता कम होता चला गया |इस तथ्य को नाकारा नहीं जा सकता कि विकास जरुरी है और अवश्यम्भावी भी पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विकास प्रकृति और जानवरों की कीमत पर न हो |इसमें कोई शक नहीं है कि जंगल कम हुए हैं और जानवरों की बहुत सी प्रजातियाँ लुप्त होने की कगार पर हैं |भारत में “सेव द टाइगर”कैम्पेन इसका उदाहरण है |जंगल और जानवर तभी बचेंगे जब हम इनको लेकर जागरूक और जिम्मेदार बनेंगे और फ़िल्में इस जागरूकता को बढ़ाने का एक अच्छा माध्यम हो सकती हैं | पिछले दो साल में ही देश के 728 वर्ग किलोमीटर भू-भाग से जंगलों का खात्मा हो चुका है। जंगलों की इस कहानी में नटखट बंदरों का जिक्र इसलिए जरूरी है कि वे सिर्फ एक उपमा  हैं, यह बताने का कि वन्य जीवन जब असंतुलित होता है तो हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करता है आजकल समाचार पत्र इस तरह की अक्सर सूचनाएं देते है कि अमुक क्षेत्र में तेंदुवा ने लोगों का शिकार किया या बंदरों के उत्पात से लोग परेशान |ऐसी ख़बरें  साफ़ इशारा कर रही हैं कि इंसान और जानवरों के बीच बना संतुलन बिगड़ रहा है |
गौरतलब है कि इन मशीनों ने सिनेमा को तकनीकी तौर पर बेहतर किया है अब जानवरों को परदे पर दिखाने के लिए असलियत में उनकी जरुरत भी नहीं इसके लिए एनीमेशन और 3 डी तकनीक का सहारा लिया जा रहा है|दर्शकों की रूचि मानव निर्मित सभ्यता के नए प्रतीकों को देखने में ज्यादा है|उपभोक्तावाद ने हमें इतना अधीर कर दिया है कि विकास का मापदंड सिर्फ भौतिकवादी चीजें और पैसा ही रह गया है|हमारी फ़िल्में भी इसका अपवाद नहीं हैं आखिर सिनेमा को समाज का दर्पण यूँ ही नहीं कहा गया है| वैचारिक रूप से परिपक्व होते हिन्दी सिनेमा में जंगल और जानवरों के लिए जगह नहीं है यह उत्तर उदारीकरण के दौर का असर है या कोई और कारण यह शोध का विषय हो सकता है  पर असल जीवन में कटते पेड़ और गायब होते जानवरों  के प्रति संवेदना को बढ़ाने का एक तरीका सिनेमा की दुनिया में उनका लगातार दिखना एक अच्छा उपाय हो सकता है |
अमर उजाला में 31/05/16 को प्रकाशित 

Tuesday, May 3, 2016

इंटरनेट के साईड इफेक्ट

जब कोई नयी तकनीक हमारे सामने आती है तो वह सबसे पहले अपनी ताकत से हमें परिचित कराती है उसके बाद शुरू होता है चुनौतियों का सिलसिला उन चुनौतियों से हम कैसे  निपटते हैं उससे उस तकनीक की सफलता या असफलता निर्भर करती है इंटरनेट ने उम्र का एक चक्र पूरा कर लिया है। इसकी खूबियों और इसकी उपयोगिता की चर्चा तो बहुत हो ली, पर अब वक्त है इसके और आयामों पर चर्चा करने का |आज हमारी  पहचान का एक मानक वर्च्युअल वर्ल्ड में हमारी उपस्थिति भी है और यहीं से शुरू होता है फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग से जुड़ने का सिलसिला, भारत में फेसबुक के सबसे ज्यादा प्रयोगकर्ता हैं पर यह तकनीक अब भारत में एक चुनौती बन कर उभर रही है चर्चा के साथ साथ आंकड़ों से मिले तथ्य साफ़ इस ओर इशारा कर रहे हैं  कि स्मार्टफोन व इंटरनेट लोगों को व्यसनी बना रहा है| कहा जाता है कि मानव सभ्यता शायद पहली बार एक ऐसे नशे से सामना कर रही है, जिसका भौतिक इस्तेमाल नहीं दिखता पर यह असर कर रहा है यह नशा है डिजीटल सामग्री के सेवन का जो न खाया जा सकता है, न पिया जा सकता है,और न ही सूंघा जा सकता है फिर भी यह लोगों को लती बना रहा है | चीन के शंघाई मेंटल हेल्थ सेंटर के एक अध्ययन के मुताबिक, इंटरनेट की लत शराब और कोकीन की लत से होने वाले स्नायविक बदलाव पैदा कर सकती है|
मोबाइल ऐप (ऐप्लीकेशन) विश्लेषक कंपनी फ्लरी के मुताबिक, हम मोबाइल ऐप लत की ओर बढ़ रहे हैं। स्मार्टफोन हमारे जीवन को आसान बनाते हैं, मगर स्थिति तब खतरनाक हो जाती है, जब मोबाइल के विभिन्न ऐप का प्रयोग इस स्तर तक बढ़ जाए कि हम बार-बार अपने मोबाइल के विभिन्न ऐप्लीकेशन को खोलने लगें। कभी काम से, कभी यूं ही। फ्लरी के इस शोध के अनुसार, सामान्य रूप से लोग किसी ऐप का प्रयोग करने के लिए उसे दिन में अधिकतम दस बार खोलते हैं, लेकिन अगर यह संख्या साठ के ऊपर पहुंच जाए, तो ऐसे लोग मोबाइल ऐप एडिक्टेड की श्रेणी में आ जाते हैं। पिछले वर्ष इससे करीब 7.9 करोड़ लोग ग्रसित थे। इस साल यह आंकड़ा बढ़कर17.6 करोड़ हो गया है, जिसमें ज्यादा संख्या महिलाओं की है।
 वी आर सोशल की डिजिटल सोशल ऐंड मोबाइल 2015 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं के आंकड़े काफी कुछ कहते हैं| इसके अनुसार, एक भारतीय औसतन पांच घंटे चार मिनट कंप्यूटर या टैबलेट पर इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। इंटरनेट पर एक घंटा 58 मिनट, सोशल मीडिया पर दो घंटे 31 मिनट के अलावा इनके मोबाइल इंटरनेट के इस्तेमाल की औसत दैनिक अवधि है दो घंटे 24 मिनट| इसी का नतीजा हैं तरह-तरह की नई मानसिक समस्याएं- जैसे फोमो, यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट, सोशल मीडिया पर अकेले हो जाने का डर। इसी तरह फैड, यानी फेसबुक एडिक्शन डिसऑर्डर| इसमें एक शख्स लगातार अपनी तस्वीरें पोस्ट करता है और दोस्तों की पोस्ट का इंतजार करता रहता है। एक अन्य रोग में रोगी पांच घंटे से ज्यादा वक्त सेल्फी लेने में ही नष्ट कर देता है। इस वक्त भारत में 97|8 करोड़ मोबाइल और14 करोड़ स्मार्टफोन कनेक्शन हैं, जिनमें से 24|3 करोड़  इंटरनेट पर सक्रिय हैं और 11|8 करोड़ सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं|
लोगों में डिजिटल तकनीक के प्रयोग करने की वजह बदल रही है। शहर फैल रहे हैं और इंसान पाने में सिमट रहा है|नतीजतन, हमेशा लोगों से जुड़े रहने की चाह उसे साइबर जंगल की एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां भटकने का खतरा लगातार बना रहता है| भारत जैसे देश में समस्या यह है कि यहां तकनीक पहले आ रही है, और उनके प्रयोग के मानक बाद में गढ़े जा रहे हैं| कैस्परस्की लैब द्वारा इस वर्ष किए गए एक शोध में पाया गया है कि करीब 73 फीसदी युवा डिजिटल लत के शिकार हैं, जो किसी न किसी इंटरनेट प्लेटफॉर्म से अपने आप को जोड़े रहते हैं| साल 2011 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलंबिया द्वारा किए गए रिसर्च में यह निष्कर्ष निकाला गया था की युवा पीढ़ी किसी भी सूचना को याद करने का तरीका बदल रही है, क्योंकि वह आसानी से इंटरनेट पर उपलब्ध है। वे कुछ ही तथ्यों को याद रखते हैं, बाकी के लिए इंटरनेट का सहारा लेते हैं| इसे गूगल इफेक्ट या गूगल-प्रभाव कहा जाता है|
इसी दिशा में कैस्परस्की लैब ने साल 2015 में डिजिटल डिवाइस और इंटरनेट से सभी पीढ़ियों पर पड़ने वाले प्रभाव के ऊपर शोध किया है| कैस्परस्की लैब ने ऐसे छह हजार लोगों की गणना की, जिनकी उम्र 16-55 साल तक थी। यह शोध कई देशों में जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन आदि देशों के 1,000 लोगों पर फरवरी 2015 में ऑनलाइन किया गया| शोध में यह पता चला की गूगल-प्रभाव केवल ऑनलाइन तथ्यों तक सीमित न रहकर उससे कई गुना आगे हमारी महत्वपूर्ण व्यक्तिगत सूचनाओं को याद रखने के तरीके तक पहुंच गया है| शोध बताता है कि इंटरनेट हमें भुलक्कड़ बना रहा है, ज्यादातर युवा उपभोक्ताओं के लिए, जो कि कनेक्टेड डिवाइसों का प्रयोग करते हैं, इंटरनेट न केवल ज्ञान का प्राथमिक स्रोत है, बल्कि उनकी व्यक्तिगत जानकारियों को सुरक्षित करने का भी मुख्य स्रोत बन चुका है| इसे कैस्परस्की लैब ने डिजिटल एम्नेशिया का नाम दिया है| यानी अपनी जरूरत की सभी जानकारियों को भूलने की क्षमता के कारण किसी का डिजिटल डिवाइसों पर ज्यादा भरोसा करना कि वह आपके लिए सभी जानकारियों को एकत्रित कर सुरक्षित कर लेगा। 16 से 34 की उम्र वाले व्यक्तियों में से लगभग 70 प्रतिशत लोगों ने माना कि अपनी सारी जरूरत की जानकारी को याद रखने के लिए वे अपने स्मार्टफोन का उपयोग करते है| इस शोध के निष्कर्ष से यह भी पता चला कि अधिकांश डिजिटल उपभोक्ता अपने महत्वपूर्ण कांटेक्ट नंबर याद नहीं रख पाते हैं|एक यह तथ्य भी सामने आया कि डिजिटल एम्नेशिया लगभग सभी उम्र के लोगों में फैला है और ये महिलाओं और पुरुषों में समान रूप से पाया जाता है|
वर्चुअल दुनिया में खोए रहने वाले के लिए सब कुछ लाइक्स व कमेंट से तय होता है|वास्तविक जिंदगी की असली समस्याओं से वे भागना चाहते हैं और इस चक्कर में वे इंटरनेट पर ज्यादा समय बिताने लगते हैं, जिसमें चैटिंग और ऑनलाइन गेम खेलना शामिल हैं। और जब उन्हें इंटरनेट नहीं मिलता, तो उन्हें बेचैनी होती और स्वभाव में आक्रामकता आ जाती है और वे डिजीटल डिपेंडेंसी सिंड्रोम (डी डी सी ) की गिरफ्त में आ जाते हैं |इससे निपटने का एक तरीका यह है कि चीन से सबक लेते हुए भारत में डिजिटल डीटॉक्स यानी नशामुक्ति केंद्र खोले जाएं और इस विषय पर ज्यादा से ज्यादा जागरूकता फैलाई जाए| 
 ज्यादा प्रयोग के कारण डिजिटल डिवाइस से हमारा एक मानवीय रिश्ता सा बन गया है, पर तकनीक पर अधिक निर्भरता हमें मानसिक रूप से पंगु भी बना सकती है। इसलिए इंटरनेट का इस्तेमाल जरूरत के वक्त ही किया जाए|
राष्ट्रीय सहारा में 03/05/16 को प्रकाशित लेख 

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