Monday, April 22, 2019

धरती के प्रति कब बढ़ेगी हमारी सजगता ?

विश्व पृथ्वी दिवस  22 अप्रैल को दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्थन देने  के लिए मनाया  जाता है। इसकी शुरुआत  अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रूप की थी। अब इसे 192 से अधिक देशों में प्रति वर्ष मनाया जाता है और भारत इसमें अपवाद नहीं है |वर्ल्ड हेल्थ ओर्गानाईजेशन   ने प्रदूषण पर अपनी ताज़ा ग्लोबल रिपोर्ट में चेताया है कि दुनिया के बीस  सबसे प्रदूषित शहरों में से चौदह   भारत में हैं. भारत दुनिया का सबसे प्रदूषित देश है जहां हर साल बीस  लाख से ज़्यादा लोग प्रदूषित हवा की वजह से मरते हैं. ये संख्या  दुनिया में सबसे ज़्यादा है.इन सबके बावजूद इस धरती को बचाने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं .देश में चुनाव जारी हैं पर पर्यावरण और धरती का बचाव कहीं कोई मुद्दा नहीं है .
लेंसेट काउंट डाउन रिपोर्ट 2018 के अनुसार प्रदुषण और क्लाइमेट चेंज  से होने वाले खतरे की आशंका पहले के अनुमानों से कहीं अधिक है। इस रिपोर्ट में दुनिया के 500 शहरों में किए गए सर्वे के बाद निष्कर्ष निकाला गया कि उनका सार्वजनिक स्वास्थ्य आधारभूत ढांचा जलवायु परिवर्तन के कारण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है जो यह बताता है कि संबंधित रोगियों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है .उस तेजी से रोगों से निपटने के लिए दुनिया के हॉस्पिटल  तैयार नहीं हैं। इसमें विकसित और विकासशील दोनों देश शामिल हैं. बीती गर्मियों में चली गर्म हवाओं ने सिर्फ इंग्लैंड में ही सैकड़ों लोगों को अकाल मौत का शिकार बना डाला। दरअसल इंग्लैंड के अस्पताल क्लाइमेट  में अचानक हुए इस परिवर्तन के कारण बीमार पड़े लोगों से निपटने के लिए तैयार नहीं थे.वर्ष 2017 में अत्यधिक गर्मी के कारण 153 बिलियन घंटों का नुकसान दुनिया के खेती में लगे लोगों को उठाना पड़ा. कुल नुकसान का आधा हिस्सा भारत ने उठाया जो यहां की कुल कार्यशील आबादी का सात प्रतिशत है जबकि चीन को 1.4 प्रतिशत का ही नुकसान हुआ। रिपोर्ट बताती है कि प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिग दो अलग मसले नहीं हैं, बल्कि आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.
पर्यावरण के मामले में भारत दुनिया के बेहद असुरक्षित देशों में है। अधिकांश उद्योग पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी से चल रहे हैं . देश की आबोहवा लगातार खराब होती जा रही है। शोध अध्ययन से यह पता चला है कि कम गति पर चलने वाले यातायात में विशेष रूप से भीड़ के दौरान जला हुआ पेट्रोल /डीजल  चार से आठ गुना अधिक वायु प्रदूषण उत्पन्न करता है, क्योंकि डीजल और पेट्रोल  से निकले धुएं में 40 से अधिक प्रकार के प्रदूषक होते हैं.यह तो रही शहर की बात जहां यातायात प्रदूषण एक ग्लोबल समस्या के रूप में लाइलाज बीमारी बनी हुई है.विकासशील देशों में आने के नाते हमारी हालत अन्य विकास शील देशों जैसी ही है जो जल्दी विकसित होने की चाह में प्लास्टिक और पौलीथीन का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं और फिर उनसे निकले कूड़े का कोई उचित प्रबन्धन नहीं है .आधुनिक विकास की अवधारणा के साथ ही कूड़े की समस्या मानव सभ्यता के समक्ष आयी .जब तक यह टेंडेंसी नेचर फ्रैंडली  थी परेशानी की कोई बात नहीं रही क्योंकि ऐसे कूड़े को प्रकृति आसानी से पचा लेती थी  पर इंसान जैसे जैसे नेचर  को चुनौती देता गया और विज्ञान आगे बढ़ता गया. कई ऐसे कूड़े मानव सभ्यता के सामने आये जिनको प्रकृति अपने में समाहित नहीं कर सकती और  कूड़ा प्रबंधन एक गंभीर समस्या में तब्दील होता गया क्योंकि मानव ऐसा कूड़ा छोड़ रहा था जो प्राकृतिक तरीके से समाप्त  नहीं होता या जिसके नष्ट होने में समय लगता है और उसी बीच कई गुना और कूड़ा इकट्ठा हो जाता है, जो इस प्रोसेस  को और लम्बा कर देता है जिससे कई तरह के प्रदुषण का जन्म होता है . पिछले एक दशक  में भारतीय रहन सहन में पर्याप्त बदलाव आये हैं और लोग प्लास्टिक की बोतल और प्लास्टिक में लिपटे हुए उत्पाद सुविधाजनक होने के कारण ज्यादा प्रयोग करने लग गए हैं . नतीजा शहरों में गर्मी का लगातर  बढ़ना इण्डिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार भारत के शहर लगातार गर्म होते जा रहे हैं कोलकाता में पिछले बीस सालों में फारेस्ट डेंसटी 23.4प्रतिशत से गिरकर 7.3 प्रतिशत हो गया है. वहीं निर्माण क्षेत्र में 190 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. साल2030 तक कोलकाता के कुल क्षेत्रफल का मात्र 3.37 प्रतिशत हिस्सा ही वनस्पतियों के क्षेत्र के रूप में ही बचेगा .अहमदाबाद में पिछले बीस सालों में फारेस्ट डेंसटी 46 प्रतिशत से गिरकर 24 प्रतिशत पर आ गया है जबकि निर्माण क्षेत्र में 132 प्रतिशत की  वृद्धि हुई है साल 2030 तक वनस्पतियों के लिए शहर में मात्र तीन प्रतिशत जगह बचेगी .भोपाल में पिछले बाईस वर्षों में फारेस्ट डेंसटी छाछट प्रतिशत से गिराकर बाईस प्रतिशत हो गया है.वनों में कमी का मतलब वर्षा में कमी जो अंत में जल की कमी के रूप में समाने आता है | जल संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 2001 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता के  आंकड़ों के सन्दर्भ में 2025 तक इसमें छतीस प्रतिशत की कमी आयेगी. वहीं2050 तक जब भारत की जनसँख्या 1.7 बिलियन होगी साठ प्रतिशत प्रति व्यक्ति कम जल की उपलब्धता  होगी .चेतावानी की घंटी बज चुकी है अब यह हमें तय करना है हम प्रकृति के साथ सबका विकास चाहते हैं या ऐसा विकास जो सिर्फ आर्थिक रूप से समर्द्ध लोगों के लिए हो .भारत जैसे दुनिया के तमाम अल्पविकसित देश विकास के इस खेल में अपनी जमीनों को कंक्रीट और डामर के घोल पिलाते जा रहे हैं जिसका नतीजा तापमान में बढ़ोत्तरी गर्मियां ज्यादा गर्म और ठण्ड और ज्यादा ठंडी .पेड़ ,घास झाड़ियाँ और मिट्टी सूर्य ताप को अपने में समा लेती हैं जिससे जमीन ठंडी रहती है पर इस कंक्रीट केन्द्रित विकास में यह सारी चीजें हमारे शहरों से लगातार कम होती जा रही हैं . लेकिन इस धुंधली तस्वीर का दूसरा पहलू यह बता रहा है कि भारत सरकार गैर-परंपरागत ऊर्जा नीतियों को लेकर काफी गंभीर है. देश में सोलर एनर्जी  की संभावनाएं भी काफी अच्छी हैं. हैंडबुक ऑन सोलर रेडिएशन ओवर इंडिया के अनुसार, भारत के अधिकांश भाग में एक वर्ष में 250 से 300 धूप निकलने वाले दिनों सहित प्रतिदिन प्रति वर्गमीटर चार से सात किलोवॉट घंटे का सौर विकिरण प्राप्त होता है. राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में यह स्थिति अन्य राज्यों की अपेक्षा ज्यादा है.
जागरण /आईनेक्स्ट में 22/04/2019 को प्रकाशित 

Wednesday, April 17, 2019

पर्यावरण पर भारी पड़ते चुनाव

पूरा देश  इस समय चुनावी उत्सव में सराबोर है लोग बढ़ चढ़ कर इसमें हिस्सा ले रहे हैं |तमाम  राजनैतिक पार्टियाँ अपनी उपलब्धियों एवं वायदों का प्रचार प्रसार कर रही हैं जाहिर है सोशल मीडिया के आने से प्रचार के लिए पारम्परिक माध्यमों के अलावा एक नया विकल्प मिला है पर फिर भी चुनाव प्रचार  का  अभी भी मुख्य माध्यम   बैनर होर्डिंग  ही हैं |वो चाहे किसी पार्टी की रैली हो या किसी उम्मीदवार का अपने पक्ष में माहौल बनाना वो बैनर होर्डिंग  का ही सहारा लेता है |बदलते वक्त के साथ बैनर होर्डिंग  भी बदले हैं पर इनके बदलाओं पर लोगों ने ज्यादा गौर नहीं किया |किया भी क्यों जाए साफ़ पर्यावरण कभी भी भारत की चिंता में नहीं रहा |पिछले एक दशक में बैनर होर्डिंग का स्थान कपड़ों और पेंट की जगह फ्लेक्स ने ले लिया है जो पीवीसी (पोलीविनाईल क्लोराईड ) प्लास्टिक से बने होते हैं और यह  एक बड़ी स्वास्थ्य और पर्यावरणीय समस्या है|कुछ ही हफ्तों में लोकसभा चुनाव सम्पन्न होने हैं| ऐसे में ये समस्या बढना लाज़मी है|तथ्य यह भी है कि चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों से प्रचार के दौरान प्लास्टिक और पौलीथीन का इस्तेमाल करने से बचने की हिदायत दी है पर आयोग का ये सुझाव आदर्श  चुनाव आचार संहिता के अंतर्गत नही आता है|शायद इसीलिये सभी राजनैतिक पार्टियों के कार्यालय इन बैनर और होर्डिंग से भरे हुए हैं |
मूडी की एक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी कंपनी आई सी आर ए (ICRA )के मुताबिक भारत में सालाना नब्बे  प्रतिशत आउटडोर विज्ञापन पीवीसी  पर प्रिंट होते हैं जिनकी खपत 18000 टन मासिक है  जो साल भर में216,000 टन हो जाता है |इसमें वो सभी छोटे बड़े विज्ञापन शामिल हैं वो चाहे किसी नए फोन का लांच होना हो या कोई मोटरबाईक या फिर नए फ़्लैट का सपना दिखाते लुभावने विज्ञापन | पीवीसी (पोलीविनाईल क्लोराईड ) दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा प्लास्टिक पोलीमर है जिसका इस्तेमाल बैनर होर्डिंग  में होता है अपने नॉन बायो डीग्रिडेबल प्रकृति के कारण इनको खत्म करने के लिए या तो इन्हें जलाना पड़ता है या लैंडफिल में डाल दिया जाता है |एक प्रतिशत से भी कम पीवीसी को रिसाइकिल किया जाता है| जलता हुआ पीवीसी बहुत सी जहरीली गैस छोड़ता है जो हवा से भारी होता है जो ऑक्सीजन की मात्रा को कम कर देता है जिससे कैंसर होने की संभावना होती है और उसकी राख जमीन और पानी को भी प्रदूषित कर देती है |सुचना के अधिकार से से 2018 में मिली जानकारी के अनुसार अप्रैल 2017 और मार्च 2018 के बीच भाजपा ने अकेले आउटडोर प्रचार पर 147.10 करोड़ रुपये (21 मिलियन डॉलर) खर्च किए |जाहिर है इसमें से एक बड़ा हिस्सा  बैनर और होर्डिंग्स पर खर्च  किया गया होगा |एक अनुमान के अनुसार इन दो या तीन महीनों में (चुनाव प्रक्रिया के दौरान), प्लास्टिक की खपत इतनी होती है जितनी दो या तीन गैर-चुनावी वर्षों में होती है|ये एक कैंसरकारी तत्व  है जिसके कारण  देशभर में राज्य सरकारें इसके उपयोग में कटौती करने के लिए प्रेरित हो  रही हैं. द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टीईआरआई) के अनुसार, केंद्र सरकार ने भी एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने के लिए 2022 का लक्ष्य रखा है, जिसका 13.4 मिलियन टन प्रति वर्ष देश में निर्मित किया जाता है| प्रचार विज्ञापनों के लिए कपड़े और पुनर्नवीनीकरण कागज जैसे विकल्प ज्यादा पर्यावरण मैत्री  हो सकते हैं |पीवीसी के लिए पचास साल की तुलना में सूती कपड़े को सड़ने में केवल पांच से छह महीने का समय लगता है |इन सब चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों को मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के हित में चुनाव के दौरान अभियान सामग्री (पोस्टर, बैनर, आदि) के रूप में एकल-उपयोग प्लास्टिक का उपयोग नहीं करने के लिए पर्याप्त कदम उठाने की सलाह दी थी |लेकिन क्या महज सलाह देने से ही राजनीतिक दल कार्रवाई करेंगे?यह एक बड़ा प्रश्न है अगर यह प्रतिबंध आदर्श आचार संहिता का हिस्सा बन जाता है, तो इसे (प्लास्टिक) सीमित करने का एक निश्चित तरीका जरुर बन सकता है | इस बीच केरल उच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों को दक्षिणी राज्य में पीवीसी-आधारित प्रचार सामग्री से बचने का निर्देश दिया है |तस्वीर का दूसरा हिस्सा यह भी है कि देश में लोग न तो पर्यावरण की कीमत समझते हैं और न ही इंसानी जान की|इको-फ्रेंडली उत्पाद विनाइल फ्लेक्स बोर्डों की तुलना में अधिक महंगे हैं और लोग इसी बात पर पीवीसी(पोलीविनाईल क्लोराईड ) प्लास्टिक से बने बैनर होर्डिंग के इस्तेमाल करते रहते हैं |यह चुनाव, चुनाव प्रचार में व्यवहार परिवर्तन और नई  प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए शानदार अवसर हो सकते हैं पर फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा है |
अमर उजाला में 17/04/2019 में प्रकाशित 


Thursday, April 4, 2019

बहुत कुछ कहता है काला तिल

आपके शरीर पर कहीं कोई तिल है क्या?अरे तिल बोले तो वो काला चिन्ह  जो आपकी खूबसूरती को बढा देता है.यानि हर काली चीज ख़राब नहीं होती. आप सबने कभी न कभी वोट जरुर दिया होगा और अगर न दिया हो तो इस बार वोट देने जरुर जाइएगा.हाँ हाँ मुझे पता है कि मैं न तो कोई सेलीब्रिटी हूँ न कोई बड़ा प्लेयर जिसकी बात आप मानें,मैं तो ये निवेदन  महज इसलिए कर रहा हूँ जिससे आगे जो मैं कहना चाह रहा हूँ वो आप समझ सकें.वैसे आपके चेहरे होंठ  या चेहरे पर कहीं ऐसी जगह वो प्यारा सा काला तिल है तो आप बड़ा गर्व महसूस  करते हैं और उस ऊपर वाले को शुक्रिया कहना नहीं भूलते. जिसने आपको जीवन दिया,पर वो देश जिसने आपको उस जीवन के अलावा बहुत सी चीजें दी हैं. कभी उसको थैंक यू कहने का मन नहीं करता. हाँ तो मैं वोट की बात कर रहा था तो वोट देते वक्त हम सबकी उंगली पर एक निशान लगाया जाता है जो इस बात की तस्दीक करता है कि हमने अपना वोट दे दिया है मतलब स्याही की तरह का एक केमिकल, जब आप वोट देते हैं तब उसका रंग नीला होता है और फिर जैसे जैसे दिन बीतते जाते हैं वो काला हो जाता है.
हम  अपना घर और अपने शरीर को साफ़ रखते हैं फिर रोज रोज क्यूँ नहाते हैं या घर में झाड़ू पोंछा क्यूँ करते हैं,इसलिए न कि गंदगी जमें नहीं. रोज जब हम नहाते हैं या घर साफ़ करते हैं तो न तो कपडे काले होते हैं न शरीर पर लगने वाले साबुन का झाग. क्यूंकि कोई भी चीज हमेशा के लिए साफ़ नहीं रह सकती है गंदगी जीवन का हिस्सा है पर उसे साफ़ किया जा सकता है .इससे ये  साबित हुआ कि अगर सफाई नहीं होगी तो गंदगी खेल कर जायेगी. अब जब आप सफाई करते हैं तो क्या होता है ?भाई थोड़े बहुत तो हम भी गंदे होते हैं,कपडे गंदे होते हैं और शरीर भी.गंदे शरीर पर जब हम साबुन लगाते हैं तो पहले उसका झाग भी काला होता जैसे जैसे शरीर साफ़ होता जाता है.झाग भी सफ़ेद होता जाता है.कन्फ्यूज मत होइए वोट देते वक्त आपकी उंगली पर लगने वाला वो छोटा सा काला निशान बहुत कुछ कहता है पर हम समझ नहीं पाते.पहली बात गंदगी की सफाई,गंदगी में उतर कर ही की जा सकती है यनि अगर आपको लगता है कि देश की राजनीति  गंदी हो रही है.गलत लोग चुनाव जीत कर आ रहे हैं तो इसमें आपको उतरना ही पड़ेगा.इसका सिर्फ ये मतलब नहीं कि आप सबकुछ छोड़कर राजनीति में कूद पड़ें.आप अपना करियर बनायें पर देश की  गंदगी को लगातार साफ़ करते रहने के लिए  जब भी वोट देने का मौका मिले अपने वोट का इस्तेमाल जरुर करें.
 अगर आप वोट नहीं देंगे तो गंदगी जमा होती रहेगी. जब हम  पासपोर्ट से लेकर पिक्चर के टिकट तक हर जगह लाइन में लग सकते हैं तो वोट देने के लिए क्यूँ नहीं.जब वोट देंगे तो आपकी उंगली पर लगा वो ब्लैक मार्क आपको इस बात का एहसास कराएगा कि देश को बेहतर बनाने और देश की सफाई करने में आपने अपना योगदान दिया है.अब आप समझ रहे होंगे मैंने शुरुआत में अपनी बात एक छोटे से काले तिल से अपनी बात क्यूँ शुरू की थी.जी वो छोटा सा काला तिल आपको स्मार्ट बना देता है . इस बार के चुनाव में वोटिंग इंक के इस काले चिन्ह  को फैशन स्टेटमेंट बनाइये खुद भी वोट दीजिये और दूसरों को भी दिलवाइये .
प्रभात खबर में 04/04/2019 को प्रकाशित 

Saturday, March 30, 2019

सोशल मीडिया में भी छाये चीनी


इंटरनेट पर वीडियो की धूम है पर अब जमाना माइक्रो वीडियो का मतलब ऐसे वीडियो जो एक मिनट से कम के हों और  उनमें रोचकता हो |ऐसा ही एक माइक्रो वीडियो एप है टिक टोक |चीन जिस तरह से स्मार्ट फोन की मैन्युफैक्चरिंग में सारी दुनिया को पछाड़ते हुए नंबर एक पर पहुँच गया है| अब उसकी नजर है एप की विशाल दुनिया में तहलका मचाने की,साल 2017 में जहाँ भारत में प्ले स्टोर से सबसे ज्यादा डाउनलोड होने वाले प्रमुख दस एप में मात्र दो ही चीन के थे| वहीं 2018 में प्रमुख दस एप में से पांच चीन के हो चुके थे जिनमें तीन टिक- टोक,लाईक और हीलो जैसे  वीडियो एप थे |जाहिर है इसके केंद्र में भारत ही है क्योंकि चीन ने अपना इंटरनेट बाजार फेसबुक और गूगल जैसी कम्पनियों के लिए बंद कर रखा है पर भारत का बाजार सभी के लिए खुला है |
जिस तरह से टिक टोक के प्रयोगकर्ता बढ़ रहे हैं उसने इंटरनेट की नामी कम्पनियों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है |फेसबुक ने टिक टोक को टक्कर देने के लिए चुपचाप लासो वीडियो एप लॉन्च कर दिया है फिलहाल अभी यह अमेरिका के लोगों के लिए ही उपलब्ध है पर भारत में जिस तरह फेसबुक लोगों का पसंदीदा एप बना हुआ है जल्दी ही ‘लासो’ भारत में भी उपलब्ध होगा |
2016 में लॉन्च हुए टिक टोक वीडियो एप को 2018 के गूगल प्ले अवार्ड में  भारत के सबसे मनोरंजक एप का खिताब मिला अगस्त 2018 में दुनिया के दो सबसे तेजी से उभरते हुए शोर्ट वीडियो एप म्यूजिकल डॉट एल वाई और टिक टोक ने मिलकर एक नई वैश्विक एप टिक टोक बनाया | छोटे वीडियो बनाने वाला यह एप यूटयूब ट्विटर और इन्स्टाग्राम से पूरे सोशल मीडिया पर तहलका मचाये हुए है |दुनिया की कई बड़ी हस्तियों ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म को लोकप्रिय बनाने के लिए इस एप का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है | टिक टोक की चर्चा करते वक्त हमें देश में एप के समाज शास्त्र को समझना अत्यंत आवश्यक है जहाँ फेसबुक इन्स्टाग्राम जैसे एप देश के क्लास तबके सम्बन्ध रखते हैं जहाँ देश के बड़े शहरों में रहने वाले लोग ज्यादा सक्रिय है| वहीं टिक टोक एप के वीडियो कंटेंट में असली भारत दिख रहा है | जहाँ गाँव है धूल मिट्टी है और सुअर,कुत्ते जैसे जानवर और वो लोग जिन्हें हम मास या जनता  कहते हैं यानि इस एप के कंटेंट क्रियेटर टियर टू और टियर थ्री जैसे छोटे शहरों और कस्बों में रहने वाले ऐसे लोग हैं जो अपनी क्षेत्रीय भाषाएं बोलते हैं दिखने में मीडिया द्वारा गढ़े गए सुन्दरता के मानकों के हिसाब से नहीं दिखते |जिसका प्रमुख कारण सस्ता इंटरनेट और स्मार्ट फोन हैं और देश की बड़ी युवा आबादी इन्हीं शहरों में रहती है |
इस तरह के वीडियो कंटेंट की शुरुआत सबसे पहले डब्स्मास ने शुरू की थी|जिसमें पहले से दिए गए ऑडियो पर लोग अपने चेहरे के साथ एक नया वीडियो बनाते थे | वो ऑडियो किसी फिल्म का संवाद या गाना हो सकता है या फिर इंटरनेट पर वाइरल हो रहे किसी वीडियो कंटेंट का ऑडियो पर डब्स्मास ज्यादा सफल नहीं हो पाया क्योंकि उसके पास बनाये गए कंटेंट को प्रमोट करने का कोई अपना कोई प्लेटफोर्म नहीं था यानि यूजर को अपने कंटेंट को प्रमोट करने के लिए किसी अन्य सोशल मीडिया प्लेटफोर्म का सहारा चाहिए होता जबकि टिकटोक जहाँ वीडियो कंटेंट बनाने में मदद करता है वहीं उसे अपने प्लेटफोर्म पर प्रमोट भी करता है |फैक्टर्स डेली वेबसाईट के मुताबिक़ टिक टोक ने देश के दस प्रतिशत इंटरनेट उपभोक्ताओं में अपनी पैठ बना ली है हालाँकि यह पैठ गूगल ,फेसबुक ,इन्स्टाग्राम के यूजर बेस के मुकाबले कम है|टिक टोक  एप के सारी दुनिया में पांच सौ मिलियन प्रयोगकर्ता हैं| जिसमें से उनतालीस प्रतिशत भारत से आते हैं | इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि साल भर के अंदर ही इस एप के अपने स्टार भी हो गए हैं |अवेज दरबार नाम के एक व्यक्ति के 4.2 मिलीयन फालोवर हैं | इसमें लाईव फीचर एक हजार फोलोवर बनने के बाद ही एक्टिवेट होता है | हालाँकि यह कहना अभी जल्दीबाजी होगी कि भविष्य में क्या टिक टोक जैसे एप यूट्यूब को नष्ट कर देंगे  पर जिस तरह से चीन के वीडियो एप ऐसी अनगढ़ प्रतिभाओं को सबके  सामने ला रहे हैं  उससे इस तथ्य को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता  |पर कुछ ऐसे मुद्दें हैं जिन पर देश को अभी सोचना है अभी तक भारत सरकार की नीतियां फेसबुक और अमेजन जैसी अमेरिकी वैश्विक कम्पनियों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही थीं जिसके मूल में भारतीय स्टार्ट अप की मदद करना भी शामिल था पर चीन की कम्पनियों के दखल से परिद्रश्य बदल गया है |पिछले साल जुलाई में इंडोनेशिया ने आपत्तिजनक सामाग्री के प्रसारण के कारण टिक टोक को बैन कर दिया था |देश में सोशल मीडिया पर फेक न्यूज से लेकर आपत्तिजनक वीडियो के मामले सामने आते रहते हैं जिसमें सरकार सम्बन्धित कम्पनियों को तलब भी करती रहती है यूजर जेनरेटेड कंटेंट में  लोगों के डाटा की सुरक्षा से जुड़ा मामला  भी एक बड़ा मुद्दा है |चीन की कम्पनियों का इस मामले में रिकॉर्ड काफी अच्छा नहीं है |हालांकि लोग अपनी जानकारियों को लेकर सतर्क जरूर हुए हैं, पर यह सतर्कता भारत में केवल एक तबके तक ही सीमित है क्योंकि यह जागरूकता अभी बड़े शहरों में आनी शुरू हुई है पर छोटे शहरो और कस्बों में लोग इससे बिलकुल अनजान हैं |टिक टोक जैसे एप रजिस्ट्रेशन के लिए उपभोक्ता का नाम फोन नम्बर और ई मेल जैसी जानकारियाँ जुटा रहे हैं पर उनके सर्वर भारतीय सीमा में नहीं है |चीन की सरकार अपने नागरिकों के डाटा को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है| वहीं भारत में इस संबंध में ड्राफ्ट डाटा प्रोटेक्शन बिल 2018 को जस्टिस कृष्णा कमेटी ने इलेक्ट्रॉनिक एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रलय को भेजा है जिसका मुख्य मकसद उस समस्या से निजात दिलाना है जो विदेशों में इंडियन डाटा सेव है। उसमें कहा गया कि हर वेब कंपनी का जो डाटा विदेश में सेव है उसकी एक कॉपी भारत में भी सेव करनी पड़ेगी।

नवभारत टाईम्स में 30/03/2019 को प्रकाशित 

Friday, March 29, 2019

जाड़े की चिट्ठी

प्यारी गर्मी
फिजाओं में प्यार है शायद ये तुम्हारे आने का असर है कि बर्फ पिघल रही है और रिश्तों के साथ साथ मौसम में भी गर्मी आ रही है तुम भी सोच रही होगी कि आज अचानक इतने दिन के बाद मैं तुम्हें चिठी क्यूँ लिख रहा हूँ.तुम ये तो जानती हो कि मैं ज्यादा बोल नहीं पाता इसलिए लोग मुझे जाड़ा कहते हैं मेरा नेचर ठंडा है पर मैं लोगों को गर्मी की अहमियत समझाता हूँ कि तुम मेरे लिए खास हो  बस तो मैंने सोचा अपने दिल  की भावनाओं को लिख कर तुम्हें बताऊँ जिससे जब तुम आओ तो लोग तुमको वो इज्ज़त दें जिसकी तुम हकदार हो. वैसे भी तुमको गुस्सा जल्दी आता है आये भी क्यूँ न तुम तो गर्मी हो पर तुम खास हो मेरे लिए अब देखो न जब सारी दुनिया वेलेन्टाईन डे यानि प्यार का दिन मनाती है तब न पूरी तुम होती हो न पर लोग कितना एन्जॉय करते हैं तो तुम ये तो मानोगी कि हमारी तुम्हारी जोड़ी भले ही थोड़े समय के लिए बने पर होती गज़ब की है.वैसे बसंत और होली के दो त्यौहार ऐसे मौके पर ही पड़ते हैं जब पूरा देश कुछ तुम्हारे और कुछ मेरे होने के अहसास का जश्न त्यौहार मना कर करता है . भारत में इन दो त्योहारों का ख़ास महत्व है.जहाँ बसंत में फूलों पर बहार आ जाती, खेतों में हरी सरसों के पीले फूल सोना बनके चमकने लगता  हैं.  जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं। वैसे भंवरों के गुन गुन करने का भी तो यही मौसम होता है .वैसे बसंत के जश्न में जब सारी दुनिया डूबी होती है तो हम भी भूल जाते हैं कि हमारे बिछड़ने का समय आ रहा है | मुश्किल तो यही है तुम मेरी बात मानती कहाँ हो ?तुम्हारे आने की आहट मिलते ही लोग जश्न मनाने की तैयारी करने लग जाते हैं.उस जश्न को दुनिया होली  के नाम से जानती है जब धूप का मखमलापन कम होता है और उसके चुभन बढ़ने की शुरुआत होने लगती है.
अब तुम तो जानती हो जैसे होली में रंग बिरंगे रंगों का इस्तेमाल होता है वैसे ही जिन्दगी में भी कई रंग होते हैं गुस्सा, ख़ुशी, दुःख, अपना पन, प्यार और न जाने क्या क्या. दो रंगों को मिला देने से जैसे एक नया रंग बन जाता है वैसे जिन्दगी के भी रंग बड़े अनोखे होते हैं .अब मूड ऑफ हो जाना जिन्दगी के दो रंगों का मिल जाना ही है तो है. आप एकदम ठीक हैं किसी तरह की कोई प्रॉब्लम नहीं है लेकिन न जाने क्यों काम में मन नहीं लगता. देखा न बन गया जिन्दगी का नया रंग. कोई रंग न जाने क्यों हमें किसी की याद दिला देता है और हम यादों के समंदर में डूबने लगते हैं तो कोई रंग हम किसी के होने का एहसास कराता है. यूँ कहें कि हर रंग की अलग कहानी होती है जो सीधे सीधे हमारी जिन्दगी  से जुडी होती हैं. वो कहते हैं न मेड फॉर ईच अदर .पर होली के बीत जाने का  मतलब ये नहीं कि हमारे जीवन  से रंग की चमक  कम हो जाए,तो होली के बाद मैं धीरे –धीरे अपने सारे सामान समेट कर जाने की  तैयारी करता हूँ.ये जाना भी कैसा एहसास होता है .आखिर बसंत के इस सुहाने के अहसास और होली की इस मस्ती को छोड़कर भला कौन जाना चाहेगा ?मुझे तो जाना ही होता है क्योंकि अगर मैं जाऊँगा नहीं तो दुनिया को इस मिलने बिछुड़ने का फलसफा कैसे समझ आएगा.वैसे मुझे इस मस्ती और खुमारी से भरे मौसम में जाना इसलिए ज्यादा नहीं खलता क्योंकि लोगों के चेहरे पर खुशी देखकर अच्छा लगता है .



 पर मेरी प्यारी गर्मी इस जश्न को देख कर ये मत समझ लेना कि लोग तुम्हें ज्यादा पसंद करते हैं क्यूंकि तुम जैसे जैसे बढ़ोगी लोग तुम्हारे जाने का इन्तजार करने लग जायेंगे यही तो जीवन का खेल है जो आया है वो जाएगा पर मेरा तुम्हारा रिश्ता अनोखा है.हम बार बार जायेंगे लेकिन आने के लिए तो जब तुम आओगी मैं जा चुका हूँगा पर मैं फिर आऊंगा ये वादा रहा.ये उम्मीद मेरा जाना थोड़ा आसान कर देती है.अब मैं तो रहूँगा नहीं तुम्हें सम्हालने के लिए तो इस बात का ख्याल रखना कि रिश्ते ऐसे बनाना जिसमें गए हुए लोगों के आने की गुंजाईश रहे और तुम अगर ऐसा नहीं कर पायी तो समझ लेना तुमने जिंदगी से कुछ नहीं सिखा और रिश्ते मतलब से बनाये.कोई तुमको मतलबी कहेगा तो मुझे बहुत बुरा लगेगा. तुम गुस्सा हो कर अक्सर कहा करती थी कि किसी के आने जाने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं जी लूंगी अपनी जिंदगी पर मेरी “प्यारी गर्मी” तुम मानो या न मानो पर लोगों के आने जाने से फर्क जरुर पड़ता है.मैं जा तो रहा हूँ पर बड़े भारी मन से.काश ये काश मेरे जीवन का सच है.अब देखो न मैं और तुम कभी नहीं मिल पाते हैं जब तक मैं अपने जाड़े होने पर इतराता रहता हूँ और तुम अपनी गर्मी को अपनी ताकत मानती रहती हो पर जब ये मैं हम बन जाता है तो वेदर कितना खूबसूरत हो जाता है. थोडा मेरा और थोडा तुम्हारा तो बन गया न हमारा.मेरी सुबह सुहानी होती है तो तुम्हारी शाम पर जब बसंत आता है तो पूरा दिन वंडरफुल हो जाता है.मुझे पता है कि तुम्हें मेरी लंबी चिठ्ठी बोर करती है कितना लड़ते थे तुम मेरे लंबे खर्रे से.अच्छा सुनो न... कितना कुछ हमारे तुम्हारे बीच में हमेशा अनकहा रह जाता है.हमें एक दूसरे के साथ कभी फेस टू फेस बात करने का मौका ही नहीं मिलता तो कम्युनिकेशन गैप से कहीं तुम किसी गलतफहमी का शिकार न हो जाओ इसलिए मुझे चिठ्ठी लिखनी पडी जिससे मैं तुम्हें अपनी भावनाएं  बता सकूँ, तुम गर्मी हो ये तुम्हारा स्वभाव  है और मैं जाड़ा ये मेरी प्रकृति. मेरे मौसम में लोग तुम्हें याद करते हैं और तुम्हारे मौसम में मुझे. हमारी यही नियति  है. हम एक दूसरे को हमेशा याद  ही करते रहेंगे. तुम्हारे जीवन में बहुत से लोग आयेंगे पर जाड़े की वो शाम नहीं आयेगी.मेरे जीवन में बहुत सी सुबह आयेंगी पर वैसी सुबह नहीं आयेगी और हम दोनों बस याद ही करेंगे. वैसे भी तुम्हारी यादों  का कॉपीराइट तो मेरे पास ही है .
हम भले ही अलग अलग हों और कभी भी मिल न पायें पर क्या कभी तुमने सोचा कि कितना कुछ कॉमन है हमारे बीच में ज्यादा ठण्ड में लोग अपनी पूरी बॉडी को कवर करते हैं खासकर सिर और जब ज्यादा गर्मी पड़ती तो भी लोग सबसे पहले सिर ही ढकते हैं.आईसक्रीम स्वाद में ठंडी होती है पर उसकी तासीर गर्म होती है इसलिए जाड़ा हो या गर्मी लोग दोनों मौसम में इसे एन्जॉय करते हैं.जाड़ा और गर्मी तभी बढ़ती है जब हवाएं चलती हैं गर्मी में वही हवा लू बन जाती है तो जाड़े में शीत लहर.मौसम कैसा भी हो जिंदगी तो चलती रहती है हम भले ही कभी नहीं मिल पाते पर हमारे कारण ही लोगों को जीवन के मायने मिलते हैं और मिलने मिलाने के मौके भी .फिलहाल चलता हूँ पर इतना विश्वास दिलाता हूँ मैं कहीं भी रहूँ तुम्हें हमेशा याद करता रहूँगा.होली की शुभकामनाओं के साथ
विदा
सिर्फ तुम्हारा जाड़ा
प्रभात खबर के होली विशेषांक में मार्च 2019 को प्रकाशित 

Wednesday, March 27, 2019

सिर्फ अधिकार नहीं कर्तव्यों की भी हो बात

दिल को खुश रखने को ये ख्याल अच्छा है ,लिखने वाले ने जब ये पंक्तियाँ लिखी होंगी तो ये नहीं सोचा होगा कि  दिल के खुश रखने को क्या ख्याल अच्छा हो सकता है पर दुनिया बहुत तेजी से  बदल रही है अब दिल को खुश रखने को क्या ख्याल अच्छा हो सकता है उसके कई सारे पैमाने है और उन्हीं के आधार पर सारी दुनिया के देशों का खुशहाली का इंडेक्स जारी किया जाता है | सामान्य  शब्दों में औसत रूप में दुनिया के सारे देशों के निवासी किस पैमाने पर सबसे ज्यादा खुश हैं यही है खुशहाली का पैमाना | संयुक्त राष्ट्र संघ  के वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स में भारत 140वें पायदान के साथ दुनिया के सबसे दुखी देशों में शामिल है. इस हैप्पीनेस इंडेक्स के  मुताबिक बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान में लोग भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा खुश हैं. 159 देशों की सूची में साल 2013 में भारत 111वें पायदान पर था इसके बाद साल 2016 में यह 118वें पायदान पर आ गया। 2017 में भारत 122 वें पायदान पर आ गया। इसके बाद 2018 में 133वें पायदान पर और अब 2019 में यह 140वें पायदान पर पहुंच गया।
इस बार लगातार दूसरे साल फिनलैंड पहले नंबर पर है। उसके बाद डेनमार्क, नॉर्वे, आइसलैंड और नीदरलैंड का स्थान है. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2012 में 20 मार्च को विश्व खुशहाली दिवस घोषित किया था.संयुक्त राष्ट्र की ये सूची 6 पैमानों  पर तय की जाती है. इसमें आय, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, सामाजिक साथ साथ , आजादी, विश्वास और उदारता शामिल हैं.
संयुक्त राष्ट्र की सातवीं वार्षिक विश्व खुशहाली रिपोर्ट, जो दुनिया के 156 देशों को इस आधार पर रैंक करती है कि उसके नागरिक खुद को कितना खुश महसूस करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान 67 वें, बांग्लादेश 125 वें और चीन 93 वें स्थान पर है. युद्धग्रस्त दक्षिण सूडान के लोग अपने जीवन से सबसे अधिक नाखुश हैं, इसके बाद मध्य अफ्रीकी गणराज्य (155), अफगानिस्तान (154), तंजानिया (153) और रवांडा (152) हैं. दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक होने के बावजूद, अमेरिका खुशहाली के मामले में 19 वें स्थान पर है. क्यों दुखी है भारत ऐसा नहीं है कि भारत सभी पैमानों पर इतना पिछड़ा हुआ है । यह ठीक है कि हमारी प्रति व्यक्ति और सकल उत्पाद में वृद्धि हुई है लेकिन आर्थिक उन्नति ही सुखी होने का एकमात्र साधन नहीं है. यह रिपोर्ट अपने आप में अंतिम नहीं है लेकिन यह हमें सोचने पर मजबूर जरूर करती है की आखिर वसुधैव कुटुंबकम की बात करने वाला देश अचानक इतना दुखी क्यों हो गया और दुनिया भर में  आतंक को निर्यात करने वाला देश पाकिस्तान क्या वास्तव में हमसे ज्यादा खुशहाल है   ?ऐसे सारे प्रश्नों के जवाब छिपे हैं दुनिया की आधुनिक व्यवस्था में जहाँ हर चीज बाजार तय करती है और भारत भी अपवाद नहीं है.खुशी एक मानसिक अवस्था है जिसका वास्तविकता से एकदम दो दूनी चार वाला संबंध हो ये जरूरी नहीं है। अनुभव यह बताता है कि  आप खुश किसी भी परिस्थिति में रह सकते हैं और वैसा  दुखी होने के मामले में है ,.फिर भी  इस तथ्य को नाकारा नहीं जा सकता है कि  हम खुशहाली के पैमाने पर फिसले हैं।
आज देश की बहुसंख्यक जनता के साथ -साथ देश को नेत्तृत्व देने वाली सरकारें भी दुबिधा में है की वो किस राह चलें वहीं भारत जैसे विविधता वाले देश में जनता के सामान्य व्यवहार का समान्यीकरण नहीं किया जा सकता। सरकारों के ऊपर जहाँ लोक लुभावन योजनाएं चलाने की मजबूरी रहती है वहीं दूसरी ओर  देश को विकास के पथ पर अग्रसर करने का दायित्व भी।
लोग जहाँ आजादी के नाम पर सिर्फ अधिकारों की बात करते हैं पर जब कर्तव्यों का मामला आता है तो उसकी जिम्मेदारी सरकारों पर छोड़ देते हैं और इस मनोवृत्ति से जो निर्वात उतपन्न होता है ,वह होता है लोगों के दुखों का कारण लोगों को लगता है सरकार उनकी नहीं सुन रही वहीं सरकार चला रहे राजनैतिक दलों  को लगता है की जनता बदलना नहीं चाहती इसलिए जो चल रहा है वही चलाया जाए नहीं तो अगला चुनाव जीतना मुश्किल होगा। यही से शुरू होता है तदर्थवाद और तुष्टिकरण का सिलसिला। जिसकी चरम परिणीति लोगों के दुःख में इजाफा ही करती है |
किसी देश की खुशी का पैमाना वहां के निवासियों के कर्तव्यबोध और सरकारों के जनहितकारी कार्यों के सम्यक संतुलन से निर्धारित हो सकता है पर भारत में यह साम्य दूर की कौड़ी लगता है | अमीरी गरीबों के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। ऑक्सफैम के एक शोध के मुताबिक़ भारत की कुल संपत्ति के 73 प्रतिशत  हिस्‍से पर देश के 1 प्रतिशत अमीरों का कब्‍जा है। यह आंकड़ा बताता है कि देश में आय के मामले में असमानता बढ़ती जा रही है। यानी देश के अमीर और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब उस अनुपात में कम नहीं हो रहे हैं  .यह आंकड़ा तस्वीर की हकीकत बयान करने के लिए पर्याप्त है कि आजादी के बाद से देश की सरकारों की नीतियां किस तरह पूंजीपतियों की झोली भरती  चली आईं हैं। दूसरी  तरफ जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा सामजिक आर्थिक आधार पर लगातार पिछड़ता चला जा रहा है और हर चुनाव के बाद वो अपने आप को ठगा हुआ महसूस करता है जो लोग कड़ी मेहनत कर रहे हैं, देश के लिए अन्‍न उगा रहे हैं,  फैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं, वे अपने बच्‍चों की शिक्षा, परिवार के सदस्‍यों के लिए दवाएं खरीदने और दिन में दो बार का खाना जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आय के मोर्चे पर बढ़ती खाई लोकतंत्र को कमजोर करती है और भ्रष्‍टाचार को बढ़ावा देती है।    | दूसरा  कारण देश की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से का अभी नागरिक के तौर पर तैयार न हो पाना है जबकि वो अपने लिए उन सभी सुविधाओं की मांग करते हैं जो किसी भी देश के आदर्श नागरिकों को मिलनी चाहिए पर सुविधाओं की  मांग में वे नागरिक के तौर पर अपने कर्तव्य को भूल जाते हैं।
आई नेक्स्ट /दैनिक जागरण में 27/03/2019 को प्रकाशित 

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