Wednesday, July 17, 2019

एंटी सोशल एलिमेंट से साइबर स्पेस की सुरक्षा

बचपने से पढते चले आ रहे हैं मनुष्य एक सामजिक प्राणी है और इसी सामजिकता के तहत वो लोगों से रिश्ते बनाता है रिश्तों का आधार संचार ही होता है जिसमे छिपा होते हैं भाव एक दूसरे के प्रति प्यार और यही से शुरुवात होती है बतकही की एक दौर हुआ करता था जब कस्बों और गांवों  के नुक्कड़ चौपालों से गुलज़ार रहा करते थे पर अब दुनिया बदल चुकी है और वक्त भी  अब इन बैठकों की जगह वर्चुअल हो गयी है घर के आँगन कंप्यूटर की स्क्रीन में सिमट गए देह भाषा को कुछ संकेत चिन्हों में समेट दिया गया| समाज में जब भी कोई बदलाव आता है तो सबसे ज्यादा प्रभावित मध्यवर्ग होता है और ऐसा ही कुछ हुआ है हमारे सम्प्रेषण पर देश का मध्यवर्ग और खासकर युवा  चकल्लस के नए अड्डे से संक्रमित है जिसे सोशल नेटवर्किंग साईट्स का नाम दिया गया है अब चक्कलस  करने के  के लिए न तो किसी बुज़ुर्गियत की ज़रुरत है और न ही किसी पुराने निबाह की. ये वो अड्डे हैं जिनके नाम तक उल्टे पुल्टे हैं. कोई कई चेहरों वाली किताब है तो कोई ट्विटीयाने वाली चिड़िया बनने को बेताब है. फेसबुक, गूगल प्लस,ट्विटर और फ्लिकर जैसे तमाम चकल्लस के लोकप्रिय अड्डे बनकर उभरे हैं. इसका हिस्सा बनने के लिए किसी तरह के बौद्धिक दक्षता के प्रमाण की आवश्यकता नहीं है. बस आपको अपनी बात दूसरों तक पहुँचाने का हुनर आना चाहिए.ट्यूनीशिया का एक युवा जब वहां की पुलिस के कारण बेरोजगार हो जाता है तो वह अपनी लडाई में सोशल नेटवर्किंग साईट्स को अपना हथियार बनाता है.पिछले दिनों एक शादी सोशल मीडिया पर बहुत विवादों में रही.
एक प्रेम विवाह से जुड़ा मामला ,घर परिवार ,लोक संस्कार और न जाने कितने मुद्दों पर मोर्चेबंदी का शिकार हुआ . भारत में सूचना क्रांति अपना असर दिखा रही है .शहरों में इन  वर्चुअल अड्डों ने पुराने  हो चुके संस्कारों और रुढियों की सड़ांध में दम तोड़ते समाज के सपनों को पंख लगा दिए हैं.जिन मुद्दों पर घर और समाज में दबी ज़बान से भी बोलने तक की मनाही है वहांये  वर्चुअल अड्डे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पर्याय बन चुके हैं.सोशल मीडिया की तमाम साईट्स वर्चुअल अड्डेबाजों  का तीर्थ  सिद्ध हुआ है.हर कोई यहाँ डूबकी लगाकर इंटरनेट तकनीक का आशीर्वाद पा लेने को बेताब है. बोलना हम सब चाहते हैं पर क्या इसमें मामला मुश्किल तब पड़ जाता है कि क्या बोला जाए और कैसे . अब जरा ध्यान दिया जाए कि इस दुनिया में हर कोई बोले जा रहा है. फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साईट्स से लेकर टिवटर तक हर जगह उन्हीं का बोलबाला है जो बोल रहे हैं कह रहें हैं अच्छा है बात से बात निकलनी चाहिए पर सोसायटी में ऐसे भी लोग होते हैं जो क्या कहना और कैसे कहना है  इसका सलीका नहीं जानते हैं . टेक्नोलोजी हमारे जीवन का अहम हिस्सा बनती जा रही है पर क्या उसके सही इस्तेमाल के लिए हम तैयार हैं ना जाने कितने मैनर्स हमें सिखाये जाते हैं पर अब वक्त है इंटरनेट मैनर्स सीखने का है .मेरे जीवन का अब तो नियम बन गया है सुबह कंप्यूटर खोलते ही फेसबुक पर अनचाहे टैग हटाना अनर्गल कमेन्ट को डिलीट करना और ना जाने क्या क्या महज इसलिए कि अभी बहुत से लोगों को इंटरनेट मैनर्स सीखना है .आइये आपको आस पास के माहौल से समझाते हैं . आपने शादी में शौकिया नाचने वालों को देखा होगा इनकी भी अलग दुनिया होती है इनमे से कुछ बहुत कमेन्ट करने वालो की तरह होते हैं बोले तो बैंड बजा नहीं और ये चालू, कुछ ऐसे लोग भी होते है जो पहचान के संकट के शिकार होते हैं यानि आइडेंटिटी क्रायसिस इन्हें ये पता नहीं कि नाचना कैसे है, बस नाचना है ऐसे लोग सोशल नेटवर्किंग साईट्स की दुनिया में भी होते हैं जो बस कुछ भी बोलते हैं कुछ भी लिखते हैं कुछ भी करते हैं.
अरे भाई कहो खूब कहो पर पर्सनल और पब्लिक इस्शुज  को अलग अलग कर जब इन दोनों को मिला दिया जाएगा तो समस्या आयेगी ही . अगर आप चाहते हैं कि लोग आपके विचार को पसंद करें आपको सराहें पर उसके लिए पहल आपको करनी पड़ेगी कुछ कहना पड़ेगा यानि सुनना और कहना टू वे है.आप कुछ कह रहे हैं तो दूसरों को सुने भी और उसके बाद जब आप कुछ कहेंगे तो उसका असर होगा.अपने दर्द को दुनिया के साथ बांटिये शायद इनमे कोई शख्स मिल जाए जो आपकी परेशानी को कम कर सके.बहुत खुश हैं तो उसको बांटिये लोगों को बताइए कि आप खुश हैं फिर खुशियाँ बांटने से बढ़ती हैं.हम खुशनसीब हैं जो इस तरह की दुनिया में रहते हैं जहाँ हम ग्लोबल कनेक्टेड हैं समय और स्थान की दूरियां मिट गयी हैं .
लोग तभी सुनेंगे जब आप कुछ कहेंगे और जब आप सुनेंगे तो लोग कहेंगे तो अपनी ऑनलाइन प्रोफाईल पर कुछ वक्त बिताइये लोगों को पढ़ने में बिना समझे कुछ भी मत कहिये.अनर्गल बातें टैग मत कीजिये किसी के व्यक्तिगत जीवन में क्या चल रहा है अगर इसको मुद्दा बनायेंगे तो कल को आपके बारे में कोई कुछ भी बोलेगा और तब आप कहेंगे कि दुनिया बड़ी खराब है.सायबर स्पेस को साफ़ सुथरा रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है अगर यहाँ भी कोई एंटी सोशल एलीमेंट आ गया है तो उसे निकाल फेंकिये अपनी मित्रता सूची से रीयल वर्ल्ड को बेहतर बनाने का जरिया साइबर वर्ल्ड भी है अगर यहाँ गंदगी बढ़ेगी तो उसका असर हमारी रीयल लाईफ पर भी पड़ेगा तो घर की साफ़ सफाई के साथ सायबर वर्ल्ड की सफाई भी जरूरी है. तो फेक प्रोफाईल रिक्वेस्ट को रिजेक्ट कीजिये और गंदगी फ़ैलाने वालों को ब्लौक तो अपने आस पास के लोगों को इंटरनेट मैनर्स सीखाइये फिर देखिये दुनिया कैसे बदलती है .
 दैनिक जागरण /आई नेक्स्ट में 17/07/2019 को प्रकाशित 

Saturday, July 13, 2019

जैविक नमूनों से आसान होगी पहचान


डीएनए प्रोफाइलिंग विधेयक पिछली सरकार के कार्यकाल में नौ जनवरी को लोकसभा से पारित हो गया था किन्तु राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण यह बिल कानून न बन सका |मोदी सरकार को मिले नए जनादेश से यह उम्मीद की जा रही है कि यह बिल अब जल्दी ही कानून का रूप ले सकता है | देश में हर वर्ष लाखों लावारिश लाशें मिलती हैं जिनकी कोई पहचान नहींहोती और हजारों लोग लापता होते हैं पर सरकार के पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है जिससे यह पता चल सके कि कितने लापता अकाल काल कवलित हो गए  और न ही कोई आँकड़ा उपलब्ध है| प्रश्न  यह है कि इन लाशों की पहचान कैसे हो? बात चाहे केदार नाथ में आई आपदा की हो या जम्मू कश्मीर में आई बाढ़ ऐसी कई आपदाओं में सैंकड़ों लोगों की मौत हो जाती है और हजारोंलोग लापता हो जाते हैं| इनमें से कई मामलों में न तो व्यक्ति की पहचान हो पाती है और न ही उनके परिचित की जानकारी मिल पाती है| ऐसा ही कुछ बहुत सी अपराधिक घटनाओं के साथ होता है जिनकी गुत्थी  अनसुलझी ही रह जाती  है |ऐसे कई सवालों के जवाब डीएनए जांच में मिल सकते हैं लेकिन सरकार के पास अपने नागरिकों का कोई आधिकारिक डीएनए आंकड़ानहीं है | डीएनए की खोज पहली बार जेम्स वाटसन और फ्रांसिस क्रिक ने 1953 में की थी और साल 1985 में ब्रिटिश वैज्ञानिक एलेक जेफ्रीज ने डीएनए  प्रोफाईल की आधुनिक तकनीक की खोज की|उसी  साल 1985 में देश  में पहली बार कानूनी कार्रवाई में डीएनए  जाँच को  विधिक मान्यता मिली और 1988 में पहली बार डीएन ए जांच के बाद किसी दोषी को सजा मिलीलेकिन तब से लेकर आज तक इसके लिए कोई ठोस विधिक तंत्र  का विकास नहीं हो पाया. आलोचकों का मानना है कि ऐसा कानून व्यक्ति की निजता का उल्लंघन है और उसके मानवाधिकारों का हनन भी |ऐसी ही सवालों के कारण डीएनए प्रोफाईल विधेयक को कानूनी रूप देने की सरकार की कोशिशे परवान न चढ़ सकीं | ये प्रावधान इतना विवादास्पद हो चुका  है कि सरकार2007,2012,2015,2016 और फिर 2017 में प्रस्तुत ड्राफ्ट में कई संशोधन कर चुकी है| भारत में यह प्रावधान पहले से ही है कि ज़रूरत पड़ने पर न्यायिक मजिस्ट्रेट को जानकारी देकर कई अपराधों के मामलों में संदिग्धों की डीएनए प्रोफ़ाइल बनाने के लिए जैविक नमूने लिए जा सकते हैं| कई लैबोरेट्री में डीएनए प्रोफ़ाइल से जुड़ी जांच करने की व्यवस्था है|
 डीएनए प्रोफाइलिंग क्या है : यह किसी व्यक्ति की पहचान की ऐसी फोरेंसिक तकनीक है जिसके जरिये जैविक नमूनों जैसे त्वचा, बाल, रक्त या लार की बूँदें लेकर किसी भी व्यक्ति की पहचान की जा सकती है. फिर उसके डीएनए सैम्पल के आधार पर उसकी एक विशिष्ट डीएनए प्रोफाईल  बनाई जाती है.यह प्रोफाईल एकदम विशिष्ट होगी और ऐसी कोई दूसरी प्रोफाईल सारीदुनिया में कोई और नहीं हो सकती |इस प्रोफाईल के जरिये किसी व्यक्ति की किसी स्थान और जगह विशेष पर उपस्थिति या अनुपस्थिति सुनिश्चित की जा सकती है | 99.9% डीएनए सभी व्यक्तियों में एक जैसा होता है| केवल 0.1प्रतिशत  अंतर के कारण प्रत्येक व्यक्ति का डीएनए एक-दूसरे से अलग होता है और इसी के आधार पर किसी व्यक्ति की पहचान की जा सकती है|उन्नाव में परियर गांव से सटे परियर घाट पर गंगा नदी में मिले दो सौ  से ज्यादा शव और उनके अवशेष मिले| उन्नाव की तत्कालीन डीएम सौम्या अग्रवाल के आदेश पर शवों को नदी के किनारे बालू खोदकर दफना दिया गया । अनुमान के मुताबिक बरामद शव छह महीने से लेकर एक साल पुराने हो सकते हैं। यही वजह है कि लाशों का पोस्टमार्टम नहीं कराया जा सका क्योंकिशव बहुत ज्यादा गल चुके थे और उन्हें उठाने पर शरीर के हिस्से अलग हो रहे हैं।यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि ये शव किसके थे |क्योंकि सरकार के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है | इस कानून के बनने के बाद डीएनए के नमूने लेना और डीएनए बैंक को स्थापित करना आसान हो जाएगा|डीएनए नमूनों का गलत इस्तेमाल रोका जा सकेगा|गलत इस्तेमाल करने वालों को सजादिलाई जा सकेगी|इसके साथ ही यह कानून लावारिश लाशों की पहचान करने में मददगार साबित होगा.बलात्कार  जैसे गंभीर आपराधिक मामलों में अपराधियों की पहचान की जा सकेगी चाहे यह मामला कितना भी पुराना क्यों न हो| किसी भी आपदा में शिकार हुए लोगों की पहचान हो  सकेगी|लापता लोगों की तलाश, अपराध नियंत्रण और अपराधियों की पहचान की जासकेगी|  डीएनए तकनीक का प्रयोग सिविल वाद को  सुलझाने के लिए भी किया जा सकता है जिनमें बच्चे के जैविक माता-पिता की पहचान,आव्रजन  केस और मानव अंगों के ट्रांसप्लांट जैसे कुछ महत्वपूर्ण आयाम भी  शामिल हैं।  इस कानून के समर्थकों का मानना है कि किसी की अनुवांशिक जानकारी इकठ्ठा करना किसी की  निजता को भंग करने जैसा मामला नहीं है |इसीआधार पर शुरुआत में लोगों ने आधार का भी विरोध किया था हालांकि लोगों की गोपनीय जानकारी सामने आने के तथ्य कई बार प्रकाश में आये पर यह भी सत्य है कि आधार के सरकारी योजनाओं में जुड़ने से भ्रष्टाचार में कमी आई है और सही लाभार्थी को लाभ मिलना सुनिश्चित हुआ |सरकार के पास पर्याप्त संख्या में आंकड़े आये जिससे नीतियां बनाने और उनके पालन करानेमें आसानी हुई है | इस बिल के कानून बन जाने के बाद यह उम्मीद की जा सकती है कि नए भारत में कोई अपराधी अपराध करके बच जाएगा| एक बोर्ड की मदद से डीएनए प्रोफ़ाइलिंग के काम में लगी प्रयोगशालाओं और उनसे जुड़े लोगों का स्तर तय करना; एक राष्ट्रीय डीएनए डेटा बैंक की स्थापना, इकट्ठा किए गए नमूनों की सुरक्षा |इसमें नमूनों के अनधिकृत या ग़लत तरीके सेइस्तेमाल करने पर सज़ा की व्यवस्था होगी और दोषी क़रार दिए जाने के बाद लोगों को ये मौका भी दिया जाएगा कि वो डीएनए जांच के ज़रिए ख़ुद को बेकसूर साबित कर सकें| वहीं हमारी पुलिसिंग भी ज्यादा वैज्ञानिक तरीके से अपराधों की जांच कर पायेगी और विज्ञान जनित साक्ष्य यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई निर्दोष जेल की काल कोठरी में न सड़े|लेकिन सरकार को भी इसबात का ख्याल रखना होगा कि डीएनए बैंक में संरक्षित डीएनए पूरी तरह से सुरक्षित हाथों में रहे और लोगों के निजता के अधिकार जैसी चिंताओं का तार्किक तरीके से समाधान करना होगा | हमारी पुलिस व्यवस्था जो अभी भी अंग्रेजों के ज़माने के तौर तरीके से चल रही है उसे भी प्रशिक्षित किये जाने की जरुरत है |
 दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में 13/07/2019 को प्रकाशित 


Friday, July 5, 2019

साइबर अपराधियों पर हो सख्त शिकंजा

आज का दौर आंकड़ों का दौर है .वो आंकड़े ही हैं  जो सूचनाओं से ज्यादा पुष्ट हैं और इसीलिये जीवन के हर क्षेत्र में इनका महत्त्व बढ़ता जा रहा है .समय   बदला और तकनीक भी .भारत इस वक्त चीन के बाद दूसरे नम्बर का स्मार्ट फोन धारक देश है और इंटरनेट का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है जिसने सोशल मीडिया के प्रयोग को काफी बढ़ावा दिया है .सोशल मीडिया पर होना एक तरह से समाज में आपकी स्वीकार्यता को बढ़ावा देता है .समाज में किसी की हैसियत सोशल मीडिया में उसके फोलोवर से तय की जाने लगी है .सोशल मीडिया पर आने से जिस तथ्य को हम नजरंदाज करते हैं वह है हमारी निजता का मुद्दा और हमारे दी जाने वाली जानकारी.जब भी हम किसी सोशल मीडिया से जुड़ते हैं हम अपना नाम पता फोन नम्बर ई मेल उस कम्पनी को दे देते है.असल समस्या यहीं से शुरू होती है .  इस तरह देश के सभी नागरिकों का आंकड़ा संग्रहण कर लिया गया .उधर इंटरनेट के फैलाव  के साथ आंकड़े बहुत महत्वपूर्ण हो उठें .लोगों के बारे में सम्पूर्ण जानकारियां को एकत्र करके बेचा जाना एक व्यवसाय बन चुका है और  इनकी कोई भी कीमत चुकाने के लिए लोग तैयार बैठे हैं .कई बार एक गलती  किसी कंपनी की उस लोकप्रियता  पर भारी पड़ जाती है जो उसने एक लंबे समय में अर्जित की होती है. पिछले साल  पहले कैंब्रिज एनालिटिका मामला सोशल नेटवर्किंग साईट  फेसबुक के लिए ऐसा ही रहा. इस कंपनी पर आरोप है कि इसने अवैध तरीके से फेसबुक के करोड़ों यूजरों का डेटा हासिल किया और इस जानकारी का इस्तेमाल अलग-अलग देशों के चुनावों को प्रभावित करने में किया. इनमें 2016 में हुआ अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव भी शामिल  है. इस काण्ड के सामने आने के बाद फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने कहा है कि उनकी कंपनी ग्राहकों की निजता को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध है ऐसा प्लेटफॉर्म का निर्माण किया जा रहा है, ताकि फेसबुक समेत उसके सहयोगी प्लेटफॉर्म मेसेंजर, वॉट्स एप और इंस्टाग्राम पर लोगों द्वारा की जा रही बात गोपनीय रहे और यूजर्स का डाटा सिक्योर  रहे.इस मामले ने फेसबुक की विश्वसनीयता को भी काफी गंभीर नुकसान पहुंचाया. कंपनी के प्रमुख  मार्क जुकरबर्ग को बार –बार सफाई देनी  पड़ीं.विभिन्न रिपोर्ट्स के मुताबिक़ विवाद सामने आने के दस  दिन के अंदर कंपनी को 9,000 करोड़ डॉलर (5,82,615 करोड़ रुपये) का नुक़सान हो गया, अमेरिका के फ़ेडरल ट्रेड कमीशन ने जांच बिठा दी और अमेरिकी सीनेट ने डेटा सुरक्षा के मुद्दे पर मार्क जुकरबर्ग को गवाही देने के लिए बुला लिया था.
किसी भी ऑनलाइन कम्पनी का विज्ञापन कारोबार तभी तेजी से बढेगा जब उसके पास ग्राहकों की गोपनीय जानकारी हो जिससे वह उनके शौक रूचि आदतों के हिसाब से विज्ञापन दिखा सकेगी वहीं साईबर अपराधियों की निगाह भी ऐसे आंकड़ों पर रहती है,पर ऐसी घटनाएँ न हों और अगर हों तो दोषियों पर कड़ी दंडात्मक कार्यवाही हो ऐसा कोई भी प्रावधान अभी तक भारतीय संविधान मे नहीं किया गया है .अभी तक ऐसे किसी मामले को निजता के अधिकार के  हनन के तहत देखा जाता है .नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है. किसी नागरिक की आधार सूचना हो या कोई अन्य किस्म की डिजीटल सूचना- उन पर सेंध लगाने की कोशिश  अंततः नागरिक गरिमा ही नहीं, राष्ट्रीय संप्रभुता को भी ठेस पहुंचाएगी. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी एन श्री कृष्णा की अध्यक्षता में गठित समिति ने पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल का ड्राफ्ट बिल सरकार को सौंप दिया है .इस बिल में “निजी” शब्द को परिभाषित किया गया है.इसके अतिरिक्त इसमें सम्वेदनशील निजी डाटा को बारह  भागों में विभाजित किया गया है.जिसमें पासवर्ड,वित्तीय डाटा,स्वास्थ्य डाटा,अधिकारिक नियोक्ता,सेक्स जीवन,जाति/जनजाति,धार्मिक ,राजनैतिक संबद्धता जैसे क्षेत्र जोड़े गए हैं.इस बिल को अगर संसद बगैर किसी संशोधन के पास कर देती है तो देश के प्रत्येक नागरिक को अपने डाटा पर चार तरह के अधिकार मिल जायेंगे .जिनमें पुष्टिकरण और पहुँच का अधिकार, डाटा को सही करने का अधिकार, डाटा पोर्टेबिलिटी और डाटा को बिसरा देने जैसे अधिकार शामिल हैं .इस समिति की  रिपोर्ट के अनुसार यदि इस बिल का कहीं उल्लंघन होता है तो सभी कम्पनियों और सरकार को स्पष्ट रूप से उन व्यक्तियों को सूचित करना होगा जिनके डाटा की चोरी या लीक हुई है कि चोरी या लीक हुए डाटा की प्रकृति क्या है ,उससे कितने लोग प्रभावित होंगे ,उस चोरी या लीक के क्या परिणाम हो सकते हैं और प्रभावित लोग जिनके डाटा चोरी या लीक हुए हैं वे क्या करें .ऐसी स्थिति में जिस व्यक्ति का डाटा चोरी या लीक हुआ है वह उस कम्पनी से क्षतिपूर्ति की मांग भी कर सकता है .फिलहाल यह बिल संसद की मंजूरी के इन्तजार में है,लेकिन सिर्फ़ कानून के बन जाने से सबकुछ ठीक हो जाए, ऐसा संभव नहीं है. इसके लिए लोगों को भी जागरूक होना होगा. इस कानून का उद्देश्य  आम लोगों को यह जानकारी देना है कि आपका डाटा कौन ले रहा है और उसका इस्तेमाल कौन कर रहा है.क़ानून के तहत लोगों का निजी डेटा केवल पहले से बताए गए उद्देश्यों के लिए किया जा सकेगा. कंपनियों को यह बताना होगा कि वो डेटा की जानकारी कैसे और क्यों ले रहे हैं. कंपनियों को यूज़र्स का डेटा सुरक्षित करने की ज़रूरत है और अगर उनका डेटा लीक होता है तो उन्हें बताना होगा कि यह उनके लिए कितना ख़तरनाक हो सकता है.भारत ने इस दिशा में काफी देर से ही एक सार्थक कदम उठाया है .इसके साथ ही लोगों को भी सोशल मीडिया के प्रयोग करते वक्त सावधानी बरतनी होगी कि उन्हें कितनी जानकारी लोगों को देनी है .वक्त बे वक्त चेक इन्स की जानकारी हो या घर से दूर छुट्टियाँ मनाने का मामला ,हमें यह बात हमेशा जहन में रखनी होगी इंटरनेट पर कुछ भी गोपनीय नहीं है .
आई नेक्स्ट /दैनिक जागरण में 05/07/2019 को प्रकाशित 

Saturday, June 29, 2019

फेक न्यूज पर लगाम लगाना बड़ी चुनौती

फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने कहा है कि 2016 में अमेरिकी चुनाव के बाद फर्जी राजनीतिक समाचारों पर अमेरिकी सरकार की तरफ से कार्रवाई में नाकामी के कारण ऑनलाइन स्तर पर गलत सूचनाओं की बाढ़ आ गई और एक निजी कम्पनी होने के नाते इसे रोकने के हमारे पास ज्यादा टूल्स नहीं थे. उन्होंने कहा यह तय करना हमारा काम नहीं है कि कौन सी जानकारी तथ्यात्मक रूप से सही और कौन सी गलत। कंपनी के मुताबिक यह काम तथ्य जांच करने वाले लोगों का है जुकरबर्ग के इस बयान के बाद फेक न्यूज पर लगाम लगाने के लिए किसकी जवाबदेही होनी चाहिए ?यह बहस एक बार फिर से छिड़ गयी है. पिछले एक दशक में हुई सूचना क्रांति ने अफवाहों को तस्वीरें और वीडियों के माध्यम से ऐसी गति दे दी है जिसकी कल्पना करना मुश्किल है .वैसे भी  सरकारों ने हमेशा से ही काल्पनिक तथ्यों के जरिए प्रोपेगंडा को बढ़ावा दिया है। पर  सोशल मीडिया के तेज प्रसार और इसके आर्थिक पक्ष  ने झूठ को तथ्य बना कर परोसने की कला को नए स्तर पर पहुंचाया है और इस असत्य ज्ञान के स्रोत के रूप में फेसबुक और व्हाट्स एप नए ज्ञान के केंद्र के रूप में उभरे हैं . कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के एक शोध में सामने आया है कि लोगों को यदि गलत सूचनायें दी जाएं तो वैकल्पिक तथ्यों से ज्यादा उन पर थोपे गए तथ्यों पर विश्वास करते हैं. भारत फेक न्यूज की इस विकराल  समस्या का सामना इन दिनों कर रहा है. फेक न्यूज के चक्र को समझने के लिए मिसइनफॉर्मेशन और डिसइनफॉर्मेशन में अंतर समझना जरूरी है.मिसइनफॉर्मेशन का मतलब ऐसी सूचनाओं से है जो असत्य हैं पर जो इसे फैला रहा है वह यह मानता है कि यह सूचना सही है. वहीं डिसइनफॉर्मेशन का मतलब ऐसी सूचना से है जो असत्य है और इसे फैलाने वाला भी यह जानता है कि अमुक सूचना गलत है, फिर भी वह फैला रहा है. भारत डिसइनफॉर्मेशन और मिसइनफॉर्मेशन के बीच फंसा हुआ है.
 एसोचैम डेलायट की रिपोर्ट के  अनुसार देश में  इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या साल 2020 तक 60 करोड़ के पार  पहुंच जाएगी. फिलहाल इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की कुल संख्या 34.3 करोड़ है.इतनी बड़ी इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की  तो दुनिया के कई विकसित देशों की कुल आबादी की भी नहीं है.यानी इतने लोग कार्य, व्यापार व अन्य जरूरतों के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करते है. गलत सूचनाओं को पहचानना और उनसे निपटना आज के दौर के लिए एक बड़ा सबक है। फेक न्यूज आज के समय का सच है.फेक न्यूज की समस्या को डीप फेक वीडियो ने और ज्यादा गंभीर बना दिया है .असल में डीप फेक वीडियो में आर्टिफिसियल इंटेलीजेंस एवं आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के जरिए किसी वीडियो क्लिप पर किसी और व्यक्ति का चेहरा लगाने का चलन तेजी से बढ़ा है. इसके जरिए कृत्रिम तरीके से ऐसे क्लिप विकसित कर लिए जा रहे हैं जो देखने में बिल्कुल वास्तविक लगते हैं.‘डीपफेक' वीडियो एक बिल्कुल अगल तरह  की समस्या  है और इसे फेक न्यूज की वाले वीडियो की श्रेणी से अलग रखा जाना चाहिए.इसमें वीडियो सही होता है पर तकनीक से चेहरे या वातावरण बदल दिया जाता है और देखने वाले को इसका बिलकुल पता नहीं लगता कि वह डीप फेक वीडियो देख रहा है .एक बार ऐसे वीडियो जब किसी सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर आ जाते हैं तो उनकी प्रसार गति बहुत तेज हो जाती है.इंटरनेट पर ऐसे करोडो डीप फेक वीडियो मौजूद हैं .
तथ्य यह भी  आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है और ऐसे में इस तरह के वीडियो के संबंध में एक स्पष्ट नीति का विकास बहुत महत्वपूर्ण है. सस्ते फोन और इंटरनेट ने उन करोड़ों भारतीयों के हाथ में सूचना तकनीक पहुंचा दी है जो ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं। वे इंटरनेट पर मिली हर चीज को सच मान बैठते हैं और उस मिसइनफॉर्मेशन के अभियान का हिस्सा बन जाते हैं। दूसरी ओर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की साइबर आर्मी और ट्रोलर्स कई सारी ऐसी डिसइनफॉर्मेशन को यह जानते हुए फैलाते है कि वे गलत हैं या संदर्भ से कटी हुई हैं। इन सबके पीछे कुछ खास मकसद होता है। जैसे हिट्स पाना, किसी का मजाक उड़ाना, किसी व्यक्ति या संस्था पर कीचड़ उछालना, साझेदारी, लाभ कमाना, राजनीतिक फायदा उठाना, या दुष्प्रचार।
हालांकि फेसबुक इस तरह के वीडियो को बहुत गंभीरता से ले रहा है और वह इस बात का आंकलन कर रहा है कि कृत्रिम मेधा और आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के जरिए बिल्कुल वास्तविक लगने वाले फर्जी वीडियो (डीपफेक वीडियो) को रोकने के लिए किस प्रकार के कदम उठाये जाने चाहिए.फर्जी वीडियो को पहचानने के लिए इंटरनेट पर कुछ सुविधाएँ थी जैसे  किसी भी विडियो की जांच करने के लिए उसे ध्यान से बार-बार देखा जाना चाहिए। यह काम क्रोम ब्राउजर में इनविड (InVID) एक्सटेंशन जोड़ कर किया जा सकता है। इनविड जहां किसी भी विडियो को फ्रेम दर फ्रेम देखने में मदद करता है वहीं इसमें विडियो के किसी भी दृश्य को मैग्निफाई (बड़ा) करके भी देखा जा सकता है। यह विडियो को देखने की बजाय उसे पढ़ने में मदद करता है. मतलब, किसी भी विडियो को पढ़ने के लिए किन चीजों की तलाश करनी चाहिए, ताकि उसके सही होने की पुष्टि की जा सके। जैसे विडियो में पोस्टर-बैनर, गाड़ियों की नंबर प्लेट और फोन नंबर की तलाश की जानी चाहिए, ताकि गूगल द्वारा उन्हें खोज कर उनके क्षेत्र की पहचान की जा सके। कोई लैंडमार्क खोजने की कोशिश की जाए। विडियो में दिख रहे लोग कैसे कपड़े पहने हुए हैं, वे किस भाषा या बोली में बात कर रहे हैं, उसको देखा जाना चाहिए। इंटरनेट पर ऐसे कई सॉफ्टवेयर मौजूद हैं जो विडियो और फोटो की सत्यता पता लगाने में मदद कर सकते हैं। फेक न्यूज से बचने का एकमात्र तरीका है, अपनी सामान्य समझ का इस्तेमाल और थोड़ी सी जागरूकता। उल्लेखनीय है कि डीपफेक वीडियो से जु़ड़ा खतरा हाल ही में उभरा है और इससे निपटने के लिए फेसबुक सहित अन्य सोशल मीडिया कंपनियों के पास अभी कोई नीति नहीं है.

आई  नेक्स्ट /दैनिक जागरण में 29/06/2019 को प्रकाशित 


Wednesday, June 19, 2019

इलेक्ट्रिक वाहन का समय अ गया है



वर्ल्ड हेल्थ ओर्गानाईजेशन   ने प्रदूषण पर अपनी ताज़ा ग्लोबल रिपोर्ट में चेताया है कि दुनिया के बीस  सबसे प्रदूषित शहरों में से चौदह   भारत में हैं. भारत दुनिया का सबसे प्रदूषित देश है जहां हर साल बीस  लाख से ज़्यादा लोग प्रदूषित हवा की वजह से मरते हैं. पर्यावरण के मामले में भारत दुनिया के बेहद असुरक्षित देशों में है। अधिकांश उद्योग पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी से चल रहे हैं . देश की आबोहवा लगातार खराब होती जा रही है। शोध अध्ययन से यह पता चला है कि कम गति पर चलने वाले यातायात में विशेष रूप से भीड़ के दौरान जला हुआ पेट्रोल /डीजल  चार से आठ गुना अधिक वायु प्रदूषण उत्पन्न करता है, क्योंकि डीजल और पेट्रोल  से निकले धुएं में 40 से अधिक प्रकार के प्रदूषक होते हैं.भारत ने 2013 में 'नेशनल इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन प्लान (NEMMP) 2020' का निर्माण भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए प्रदुषण की स्थिति से निपटने के लिए किया गया . जिसका  मकसद राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा, वाहन-प्रदूषण और घरेलू विनिर्माण क्षमताओं के विकास जैसे मुद्दों का समाधान करना था. जिसके तहत पेरिस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए, भारत सरकार ने 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) में एक बड़ा बदलाव लाने की योजना बनाई है. जिसमें प्रमुख है अगले दो दशकों में इलेक्ट्रिक कारों का प्रचलन बढ़ाने के लिए ई-कॉमर्स कंपनियां, रीवा इलेक्ट्रिक कार कंपनी (RECC) जैसी भारतीय कार निर्माता, और ओला जैसी भारतीय ऐप-आधारित परिवहन नेटवर्क कंपनियां काम कर रही हैं.

भारत की सबसे बड़ी घरेलू कैब कम्पनी  ओला का मानना है कि देश में  इलेक्ट्रिक वाहनों के चलने  से ग्राहकों को कहीं ज्यादा आर्थिक लाभ होगा और उन्हें  मौजूदा दर का एक तिहाई से भी कम भुगतान करना पड़ेगा. फिलहाल ईवी(इलेक्ट्रिक वेहिकल)  को ऑपरेट करने की कुल लागत का  30 प्रतिशत से अधिक लागत उनको चलाने में लगने वाली ऊर्जा की है.पर परिवहन प्रदुषण से होने वाले नुक्सान को कम करने के लिए क्या देश तैयार है ?भारत में ऊर्जा क्षेत्र अभी तक इस बदलाव के लिए तैयार नहीं हो सका है. इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) उद्योग को उपयुक्त क्षमता प्रदान करने के लिए भारत को अपने सभी पावर ग्रिड और सब-स्टेशनों में आमूल चूल परिवर्तन करना  होगा. ऐसे उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए विशेष जोर देने की आवश्यकता है. इसके लिए सरकार ने 2022 तक के लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किए हैं.

लेकिन समस्या का समाधान इतना आसान नहीं है. ब्लूमबर्ग न्यू एनर्जी फाइनेंस की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 57,000 पेट्रोल पंपों की तुलना में महज तकरीबन 350 ईवी चार्जर हैं. जबकि चीन के पास 2016 के अंत तक दो लाख से अधिक चार्जिंग प्वाइंट थे.टाटा पावर के अनुसार साल 2030 तक दिल्ली जैसे शहर में इस मान्यता के साथ कि शहर में दस लाख  से ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) हों तो तीन लाख से अधिक फास्ट चार्जर की जरूरत पड़ेगी. यह देश की विद्युत् व्यवस्था पर और ज्यादा बोझ डालेगी जो कि पहले से ही कृषि क्षेत्रों में अत्यधिक सब्सिडी ,ऊँची दर और बिजली चोरी जैसी समस्याओं से जूझ रही है |

30 से 40 किमी की दैनिक आवागमन वाली इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी)  को 6 से 8 किलो वॉट घंटा विद्युत् ऊर्जा की आवश्यकता होती है. सेंटर फॉर साइंस एंड रिसर्च के अनुसार यदि भारत में 80 प्रतिशत लोग ईवी को अपनाते हैं तो 2030 तक भारत की कुल ऊर्जा मांग में 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी.पहले ही  विद्युत् ऊर्जा की कमी झेल रहे देश के लिए ये एक बड़ी चुनौती होगी .

इस चुनौती से निपटने के लिए देश को विद्युत् उत्पादन बढ़ाना होगा और इस मुद्दे से भी निपटना होगा जहाँ एक ही चार्जिंग प्वाईंट पर बहुत से लोग अपनी गाड़ियों को चार्ज कर रहे होंगे .जहाँ एक ही  विद्युत् ग्रिड से बिजली आ रही होगी . इस अतिरिक्त बोझ के प्रबंधन के लिए बुद्धिमत्ता से मूल्य से बिजली दरों का निर्धारण कम से कम विद्युत् नेटवर्क निवेश के साथ  करना होगा.इसके लिए रेल में फ्लेक्सी किरायों के दरों के अभिनव प्रयोग को भी अपनाया जा सकता है जिसमें अलग –अलग समय के लिए अलग –अलग विद्युत् दरों का निर्धारण किया गया है |यानि जिस वक्त बिजली की मांग ज्यादा हो उस वक्त उसकी दरें बढ़ा दी जाएँ और जब मांग कम हो तो उसकी दरें कम हो .लेकिन व्यवहार में देखने में आया है कि देश में इस तरह के प्रयोगों को आम जनता प्रोत्साहित नहीं करती और इसे आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है. इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) की ज्यादा उपलब्धता बिजली कम्पनियों के लिए ज्यादा लाब पाने का मौका हो सकता है .अर्नेस्ट एंड यंग की एक रिपोर्ट के अनुसार बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल साल 2030 तक ग्यारह बिलियन डॉलर का लाभ बिजली कम्पनियों को करवा सकते हैं.यदि देश वास्तव में परिवहन प्रदूषण से निपटना चाहता है तो इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) के प्रयोग को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देना ही होगा ,लेकिन तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि इलेक्ट्रिक वाहन( ईवी) को स्वच्छ माना जा सकता है  लेकिन  यदि बिजली पैदा करने के लिए कोयले का ही इस्तेमाल किया जाएगा तो इसका परिणाम प्रदुषण को बढ़ाएगा ही इसलिए इलेक्ट्रिक वाहन के प्रयोग को बढाने के लिए बिजली बनाने के लिए ऊर्जा के गैर परम्परागत स्रोत का ही इस्तेमाल उचित होगा जिससे कार्बन उत्सर्जन कम हो, संयंत्र की क्षमता में सुधार हो, और समय-समय पर तकनीकी अपग्रेडेशन होता रहा. जिससे  भारतीय ऊर्जा क्षेत्र  बेहतर ढंग से विकसित हो सके और देश में ईवी का रास्ता पूरी तरह खुल सके.

 अमर उजाला में 19/06/2019 को प्रकाशित 

Tuesday, June 18, 2019

न हो दिल की गलियां सूनी

अभी  मेरे व्हाट्स एप पर एक मेसेजनुमा जोक आया “कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है... अगर तुम  १०:३० बजे ही सो जाती है तो तुम्हारे  व्हाट्सएप्प पर "लास्ट सीन २:३० ए एम" क्यों दिखाता है? हा हा और मेरे दिमाग की बत्ती जल गयी असल में नए नए मोबाईल एप हमारी जिन्दगी में किस तरह असर डाल रहे हैं इसका अंदाजा हमें खुद नहीं है.एसएमएस में तो आप झूठ बोल कर निकल सकते थे कि मेसेज नहीं मिला पर ये नए नए चैटिंग एप और लास्ट सीन और ब्ल्यू टिक वाला स्टेट्स आपकी सारी हकीकत आपके दोस्तों और परिचितों के सामने बयां कर देते हैं.अब सोचने की बारी आपकी है. यूँकि ये बात आपको क्यूँ बताई जा रही है और इससे आपको क्यूँ फर्क पड़े,अच्छा सवाल है  तो भाई मामला ये है कि परिवार नियोजन  वाला नारा  तो  आपने सुना ही होगा कि बच्चे दो ही अच्छे. हाँ भाई ज्यादा बच्चे आफ़त ही होते हैं उसी तरह से यारी दोस्ती करना अच्छी बात है पर यारी दोस्ती जब ज्यादा और गलत लोगों से हो जायेगी तो आपको समस्या आयेगी ही. एक ओर मोबाईल क्रान्ति  ने हमें ग्लोबली कनेक्टेड तो कर दिया ही है. वहीं कहीं हम नेट बैकवर्ड न घोषित कर दिए जाएँ इस चक्कर  में जितने चैटिंग एप इंटरनेट पर उपलब्ध हैं वो सबके सब हमारे मोबाईल पर होने चाहिए, इस ललक ने कब हमें इतना एक्सप्रेशन लेस कर दिया कि हमें अपने रीयल एक्सप्रेशन को भूल टेक्नीकल एक्सप्रेशन यानि इमोजीस के गुलाम बन गये हैं .हंसी आये या ना आये ‘हा’ ‘हा’ लिख कर कोई स्माईली बना दो सामने वाला यही समझेगा कि आप बहुत खुश हैं, पर क्या आप वाकई खुश हैं?
            क्यूँ अब मैं थोडा सा हंस लूँ, अक्सर हम चैट पर यही कर रहे होतें वर्च्युल चैटिंग में हम जीवन की असली समस्याओं  का हल  ढूंढने लग गए हैं .हमारी फोनबुक में बहुत से लोगों के नंबर सेव रहते हैं और हम जितने ज्यादा चैटिंग एप डाउनलोड करेंगे हम उतने ही ज्यादा खतरे में रहेंगे क्यूंकि कोई न कोई चैटिंग एप हर कूल डूड के मोबाईल में रहता है और इससे कोई भी ,कभी भी आपको संदेसा भेज सकता है. यह जाने बगैर कि आप बात करने के मूड में हैं या नहीं. दूसरी चीज है आपकी प्राइवेसी,चैटिंग एप और कुछ न बताएं तो भी ये तो सबको बता ही देते हैं कि आप किसी ख़ास एप पर कितने एक्टिव हैं अगर इससे बचना है तो कुछ और एप डाउनलोड कीजिये. ये तो आप भी मानेंगे कि बगैर काम की चैटिंग खाली लोगों का काम है या आप इमोशनली वीक है और रीयल लाईफ में आपके पास कोई नहीं हैं जिससे आपकी उँगलियाँ मोबाईल के की पैड पर भटकती रहती हैं कि कहीं कोई मिल जाए ?
मामले और भी हैं ज्यादा चैटिंग ये बताती है कि आप फोकस्ड नहीं हैं और आपके के पास कोई काम नहीं है. ये समय  कुछ पाने का ,कुछ कर दिखाने का है.बात जिन्दगी की हो या रिश्तों की हम जितने सिलेक्टिव रहेंगे उतना ही सफल रहेंगे और यही बात एप और चैटिंग पर भी लागू होती है,जो आपके अपने है उन्हें वर्च्युल एक्सप्रेशन नहीं रीयल एक्सप्रेशन की जरुरत है.ईमोजीस आँखों को अच्छी लगती हैं पर जरुरी नहीं कि दिल को भी अच्छी लगे. जो रिश्ते दिल के होते हैं उन्हें दिल से जोडिये नहीं तो एक वक्त ऐसा आएगा जब आप होंगे और आपकी तन्हाई. मोबाईल की फोनबुक भरी होगी पर दिल की गलियां सूनी होंगीं तो अपने अपनों से मिलने जुलने का सिलसिला बनाये रखिये बी सिलेक्टिव, बी फोकस्ड और हाँ दोस्ती  और चैटिंग कम ही अच्छी . 
प्रभात खबर में 18/06/2019 को प्रकाशित 

Thursday, May 30, 2019

विज्ञापनों में पापा

आजकल स्मार्ट होने का जमाना है वो चाहे फोन हो या टीवी या फ्रिज सब स्मार्ट होने चाहिए. शरीर और चीजों को  तो स्मार्ट बनाया जा सकता है और बनाया जा भी रहा है लेकिन जब बात महिलाओं की आती है तब हमें  एक बार सोचना पड़ता है कि क्या हम वाकई एक स्मार्ट एज में जी रहे हैं.तकनीक जितनी तेजी से बदल रही है अगर उतनी तेजी से हमारी मानसिकता बदलती तो दुनिया ज्यादा खुबसूरत दिखती.
एक छोटा सा उदाहरण  है मेरी तरह आपके पास बहुत से प्रमोशनल एस एम् एस आते होंगे.मेरे पास अक्सर एक एस एम् एस आता है. मेरा नाम ए बी सी (लडकी का नाम) अकेले हो,बोर हो रहे हो तो मुझे इस नंबर पर फोन करो.हम इस एस  एम् एस को पढ़कर बस डीलीट कर देते हैं.मेरे दिमाग में ऐसे मेसेज को देखकर ख्याल आया कि आखिर इस तरह के विज्ञापन संदेशों की जरुरत क्यों है.मजेदार बात है कि ऐसे एस एम् एस लड़कियों को भी भेजे जाते हैं कायदे से तो उनके पास लड़कों के नाम से एस एम् एस भेजे जाने चाहिए और दूसरी बात क्या बातें करने के लिए लड़कियां ही फ्री बैठी रहती हैं.ये छोटा सा एस एम् एस हमारे समाज के लोगों के जेहन में क्या चल रहा है ,उसकी बानगी भर है क्योंकि ऐसे एस एम् एस विज्ञापन हवा में नहीं बनते कहीं न कहीं समाज में एक सोच है कि लड़कियों से रोमांटिक बात करना पुरुषों का जन्मसिद्ध अधिकार है.पर यही हरकत अगर कोई लडकी करना शुरू कर दे तो क्या होता है उसको बताने की जरुरत नहीं.लड़कियों को जितनी तेजी से हमारा समाज कैरक्टर सर्टिफिकेट देता है,उसकी आधी तेजी लड़कों के लिए आ जाए तो देश की लड़कियों का जीवन थोडा बेहतर हो जाए.
अच्छा आप मेरी बात यूँ न मान लीजिये चलिए जरा याद कीजिये अपने मोहल्लों के चौराहों से लेकर दुकानों तक सुबह शाम लड़के झुण्ड लगाये आती जाती लड़कियों को घूरते ,फब्तियां कसते  अपने स्मार्ट फोन के साथ  जीवन का आनंद उठाते दिखते हैं कि नहीं दिखते.इससे एक बात तो साबित होती है कि हमारे समाज में लड़कियां नहीं लड़के ज्यादा फ्री रहते हैं ,न तो  उन्हें घर के सामान्य काम काज करने होते हैं न ही उनके किसी काम पर समाज से तुरंत कैरक्टर सर्टिफिकेट मिलने का डर होता है. अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए लड़कियों को अकेले छोड़ दिया जाता है.यानि विज्ञापन भी जेंडर स्टीरियो टाइपिंग का शिकार हैं क्योंकि उनको बनाने वाले भी इसी समाज के लोग हैं और उनका पालन पोषण इसी तरह की चीजों को देखते हुआ है और उनकी मानसिकता भी वैसी बन गयी है.एस एम् एस विज्ञापन से आगे टीवी विज्ञापनों पर चलें तो वहां भी कहानी कुछ ऐसी ही है जहाँ लैंगिक असमानता साफ़ साफ़ दिखती है.
आप यूँ भी समझ सकते हैं कि मैं अकेली हूँ बोर हो रही हूँ जैसे एस एम् एस विज्ञापनों की सोच को टेलीविजन पर असीमित विस्तार मिल जाता है,जहाँ किसी भी कमोडिटी को महिलाओं के साथ दिखाया जाना जरुरी है.आप भी सोच रहे होंगे कि बात तो स्मार्ट वाच और गैजेट से शुरू हुई थी पर मामला इतना गंभीर होगा आपने सोचा न था.जी हैं स्मार्ट टेक्नोलॉजी  स्मार्ट सोच के साथ अच्छी लगती है नहीं तो ‘ये बन्दर के हाथ में उस्तुरा’ जैसी बात हो जायेगी. जरा सोचिये कैसा हो जब किसी  सूप के ऐड मे छोटी छोटी भूख पापा शांत कराये और मेनी पोको पेंट्स में बच्चे  को पापा अच्छी नींद सुलायें.ह्रदय  को स्वस्थ रखने वाले विज्ञापन में पत्नी की सेहत का ख्याल पति भी करे.वाशिंग पाउडर से लेकर टॉयलेट सफाई  के विज्ञापन में महिलाओं के साथ –साथ पुरुष भी कदम से कदम मिलाकर चलते दिखें.
प्रभात खबर में 30/05/2019 को प्रकाशित 

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