Tuesday, September 10, 2024

जीवन की यात्रा

 

बचपन,जवानी ,और बुढ़ापा जीवन के ये तीन हिस्से माने गए हैं ,बचपन में बेफिक्री जवानी में करियर और बुढ़ापा मतलब जिन्दगी की शाम पर जीवन में एक वक्त ऐसा आता है जब न बचपने जैसी बेफिक्री रहती है न जवानी में करियर जैसा कुछ  बनाने की चिंता और न ही अभी जिन्दगी की शाम हुई होती है यानि बुढ़ापा .शायद यही है अधेड़ावस्था जब जिन्दगी में एक ठहराव होता है पर यही उम्र का वो मुकाम है जब मौत सबसे ज्यादा डराती है. उम्र के इस  पड़ाव पर जो कभी हमारे बड़े थे धीरे धीरे सब जा रहे हैं और हम बड़े होते जा रहे हैं. मुझे इतना बड़प्पन नहीं चाहिए कि हमारे ऊपर कोई हो ही न .मौत किसे नहीं डराती पर जिंदगी में एक वक्त ऐसा आता है. जब मौत के वाकये से आप रोज दो चार होने लगते हैं , मुझे अच्छी तरह याद है बचपन के दिन जब मैंने होश संभाला ही था. कितने खुशनुमा थे बस थोड़ा बहुत इतना ही पता था कि कोई मर जाता है पर उसके बाद कैसा लगता है उसके अपनों को ,कितना खालीपन आता है. जीवन में इस तरह के न तो कोई सवाल जेहन में आते थे और न ही कभी ये सोचा कि एक दिन हमको और हमसे  जुड़े लोगों को मर जाना है  हमेशा के लिए, मम्मी पापा का साथ दादी –बाबा  का सानिध्य,लगता था जिन्दगी हमेशा ऐसी ही रहेगी. हम सोचते थे कि जल्दी से बड़े हो जाएँ सबके साथ कितना मजा आएगा पर बड़ा होने की कितनी बड़ी कीमत हम सबको चुकानी पड़ेगी इसका रत्ती भर अंदाज़ा नहीं था . मौत से पहली बार वास्ता पड़ा 1989 में. बाबा जी का देहांत हुआ हालांकि वह ज्यादातर वक्त हम लोगों के साथ ही रहा करते थे पर अपनी मौत के वक्त गाँव चले गये थे. उनकी मौत की खबर आयी,गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थीं.  पहली बार किसी के जाने के खालीपन को महसूस किया शायद यह मेरे बड़े होने की शुरुआत थी .  जल्दी ही हम सब अपनी जिन्दगी में रम गए. तीन साल बाद फिर गर्मी की छुट्टियों में दादी की मौत देखी वह भी अपनी आँखों के सामने .उस दिन  जब मैं सुबह की सैर के लिए निकल रहा था दादी अपने कमरे में आराम से सो रही थी ,मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि अगली सुबह वह अपने बिस्तर पर नहीं बर्फ की सिल्लियों पर लेटी होंगी . जिन्दगी बहुत क्रूर होती है .दादी जल्दी ही यादों का हिस्सा बन गयीं .हम भी आगे बढ़ चले .जिन्दगी खुल रही थी ,भविष्य ,करियर ,परिवार के कई पड़ाव पार करते हुए जिन्दगी को समझते हुए बीच के कुछ साल फिर ऐसे आये जब हम भूल गए कि मौत सबकी होनी है.

बाबा की मौत के बाद से किसी अपने के जाने से उपजा खालीपन लगातार बढ़ता रहा. बचपन के दिन बीते,  हम जवान से अधेड़ हो गए और माता –पिता जी बूढ़े जिन्दगी थिरने लग गयी. अब नया ज्यादा कुछ नहीं जुड़ना है. अब जो है उसी को सहेजना है पर वक्त तो कम है आस –पास से अचानक मौत की ख़बरें मिलने बढ़ गईं हैं. पड़ोस के शर्मा जी हों या चाचा- मामा जिनके साथ हम खेले कूदे बड़े हुई धीरे –धीरे सब जा रहे हैं. सच कहूँ तो उम्र के इस पड़ाव पर अब मौत ज्यादा डराती है.

प्रभात खबर में 10/09/2024 को प्रकाशित 

 

 

Saturday, September 7, 2024

पोर्न कंटेंट के प्रति संवेदनशीलता

 

बीते माह कोलकाता में एक युवा महिला डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी और निर्मम हत्या ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। इस जघन्य अपराध के खिलाफ सड़कों पर लोगों का गुस्सा और विरोध प्रदर्शन तेज़ी से बढ़ रहा है। जहां हर कोई पीड़िता के दर्द से आहत था, वहीं कुछ विकृत मानसिकता वाले लोग इस भयावह घटना का फायदा उठाकर, तथाकथित रेप वीडियो के नाम पर सामग्री बेचने में जुट गये । इंटरनेट पर अचानक ऐसे वीडियो की माँग बढ़ गई, और कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और मैसेजिंग ऐप्स पर इन वीडियो को बेचने की कोशिशें शुरू हो गईं। इंटरनेट के इस भयावह चेहरे ने समाज की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं।9 अगस्त को हुई इस घटना के बाद से ही गूगल पर लोगों ने रेप से जुड़े वीडियो सर्च करना शुरू कर दिये। गूगल ट्रेंड्स पर पीड़िता के नाम, रेप वीडियो और कोलकाता रेप वीडियो जैसे कीवर्ड की खोजों में वृद्धि दर्ज की गई। पब्लिका की एक रिपोर्ट के मुताबिक पॉर्न साइट्स पर भी लोगों ने पीड़िता के नाम से वीडियो खोजने की कोशिश की। यह इस तरह का पहला मामला नहीं है, इससे पहले भी जब भी कोई रेप का मामला सुर्खियों में आता है, उस वक्त उस घटना से जुड़े तथाकथित वीडियो के नाम से गूगल पर सर्च की संख्या बढ़ जाती है। चाहे वह प्रज्जवल रेवन्ना के खिलाफ यौन हिंसा के आरोप हों या मणिपुर में महिलाओं को निर्वस्त्र करने का मामला, हर घटना के बाद इन सर्च ट्रेंड्स में इजाफा देखा गया है। इंटरनेट पर इस प्रकार की सामग्री की बढ़ती मांग ने एक नए प्रकार के घिनौने कारोबार को जन्म दिया है।टेलीग्राम जैसे मैसेजिंग ऐप्स पर एन्क्रिप्शन की आड़ में तथाकथित 'रेप' वीडियो के लिंक खुलेआम बेचे जा रहे हैं। इन एुप्स पर रेप, चाइल्ड पॉर्नोग्रॉफी जैसे वीडियो मामूली कीमत पर बेचे जाते हैं ।

 लिंक के लिए भुगतान करने के बाद  इच्छुक सब्सक्राइबर को टेराबॉक्स और पोर्न साइट्स जैसी क्लाउड एग्रीगेटर ऐप्स की ओर ले जाया जाता है। यह व्यापार इतनी तेजी से बढ़ता जा रहा है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियां भी इसे रोकने में असमर्थ नजर आ रही हैं। इन एन्क्रिप्टेड चैनलों को बंद करना भी एक अस्थायी समाधान है, क्योंकि नए चैनल्स कुछ ही मिनटों में शुरू हो जाते हैं। इस अनैतिक व्यापार ने न केवल कानून को चुनौती दी है, बल्कि समाज की नैतिकता और संवेदनशीलता को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है।इस कड़ी में एआई जैसी तकनीक आने से अपराधियों के हौसले और बढ़ गये हैं। जहाँ तकनीक की मदद से किसी भी शख्स की सामान्य तस्वीर को फेक न्यूड तस्वीरों और डीप फेक वीडियो में बदला जा सकता है। टेक रिसर्च संस्था वर्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को प्रशासन ने 18 वेबसाइट्स और ऐप्स के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है, जो इस तरह के न्यूड फेक वीडियो को बनाने में मदद करते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये वेबसाइट्स केवल 2024 के पहले छह महीनों में 200 मिलियन से अधिक बार देखी गई थीं। आज के दौर में किसी के भी शरीर का हक छीनकर उसकी इज्जत को तार तार किया जा सकता है, और तकनीक की मदद से इसे बेचना, फैलाना कितना आसान हो गया है।वहीं इस तरह के घटनाओं को अंजाम देने वाले अपराधी न सिर्फ व्यापार के लिए बल्कि पीड़िता को धमकाने और ब्लैकमेल करने के लिए वीडियो बनाते हैं, बीते माह मध्य प्रदेश के ग्वालियर में  कक्षा 9 की छात्रा का गैंगरेप कर उसे फोटो और वीडियो के जरिये ब्लैकमेल के मामले में यूपी पुलिस ने 6 आरोपियों को गिरफ्तार किया। वहीं आगरा में एक होमस्टे कर्मचारी को पाँच लोगों ने गैंगरेप का शिकार बनाया और वीडियो बनाकर उसे इंटरनेट पर डाल दिया। इस तरह की घटनाएं हमें रोज खबरों में दिखाई देती है। इस वीडियो के अमानवीय व्यापार से पीड़िता का आघात और अधिक बढ़ जाता है, जिससे वे कई बार अपनी जान तक दे देती हैं।यौन हिंसा के इन वीडियोज का एक बड़ा हिस्सा चाइल्ड पॉर्नोग्राफी का है,इस तरह के अमानवीय कृत्यों को मैसेजिंग एप्स पर ग्रुप्स और चैनलों की मदद से खरीदा-बेचा जाता है। साल 2023 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार ने सोशल मीडिया साइट्स जैसे फेसबुक, यूट्यूब और टेलीग्राम जैसी कंपनियों को इस तरह की सामग्री के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए नोटिस जारी किया था। इसके बाद यूट्यूब ने अपनी नई कम्युनिटी गाइड लाइन्स के मुताबिक अक्टूबर से दिसंबर माह के बीच करीब 25 लाख वीडियो को अपने प्लेटफॉर्म से हटाया था। वहीं, टेलीग्राम पर 'स्टॉप चाइल्ड अब्यूज' चैनल के डेटा के मुताबिक इस साल अब तक करीब 6 लाख 70 हजार चैनल्स को बैन किया जा चुका है, जिनमें अगस्त महीने में अकेले 52 हजार के करीब चैनलों को बैन किया गया।पॉर्नोग्राफी और इस तरह की यौन हिंसा के वीडियो देखने की आदत के बीच गहरा ताल्लुक है। 

मनोचिकित्सक मानते हैं कि इस तरह की सामग्री देखने से व्यक्ति की यौन और हिंसा के प्रति सामान्य दृष्टि विकृत हो गई है। भारत जैसे देश में जहां यौन शिक्षा की कमी भी इस समस्या को और गंभीर कर देती है। दुनियाभर में पॉर्न के उपभोग पर मंकी इंसाइडर नामक संस्था की एक रिपोर्ट में चौकाने वाला खुलासा सामने आया है, रिपोर्ट में कहा गया है कि पॉर्न वीडियो देखने के मामले में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर आता है। जिनमे 18 से 24 साल के युवाओं की संख्या 24 प्रतिशत है।ब्रिटिश जर्नल ऑफ क्रिमिनोलॉजी में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यधारा की पोर्न साइट्स पर पहली बार आने वाले हर आठ में से एक उपयोगकर्ता को ऐसे वीडियो दिखाए जाते हैं, जिनमें यौन हिंसा या बिना पीड़ित की सहमति के रिकॉर्ड की गई गतिविधियों का उल्लेख होता है। यह आंकड़ा हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि इंटरनेट पर इस तरह की सामग्री कितनी सामान्य होती जा रही है और किस हद तक हमारी मानसिकता और नैतिकता को प्रभावित कर रही है। इस समस्या का समाधान हम सिर्फ कानून से नहीं , बल्कि जागरूकता लाकर ही कर सकते हैं। ताकि हम न केवल इस तरह की सामग्री को नकारे, बल्कि इसके खिलाफ खड़े  हों। हमें समझना होगा कि इस तरह का हर क्लिक, हर शेयर किसी की जिंदगी को तबाह कर सकता है।  केवल तभी हम इस तरह के घिनौने व्यापार की रोकथाम कर सकते है।

 दैनिक जागरण में 07/09/2024 को प्रकाशित 


Monday, August 26, 2024

इंटरनेट पर प्रैंक कंटेंट का प्रभाव

 

आजकल फेसबुक, इंस्टाग्राम, और यूट्यूब पर संगीत के बाद सबसे अधिक देखे जाने वाले वीडियो में फनी वीडियो या प्रैंक वीडियो सबसे लोकप्रिय हैं। जब लोगों के पास खाली समय होता है और उनके हाथ में स्मार्टफोन होता है, तो वे अक्सर इन वीडियो की तलाश में रहते हैं। स्क्रोल करते समय कोई रोचक वीडियो दिखने पर लोग उसे देखना पसंद करते हैं। इंसान सदियों से एक दूसरे के साथ मजाक करता आ रहा है। जब हमें पहली बार यह एहसास हुआ कि अपनी सामाजिक शक्ति का हेर फेर करके दूसरों की कीमत पर मजाक उड़ाया जा सकता है, तब से प्रैंक या मजाक सांस्कृतिक मानकों द्वारा निर्धारित होते आए हैं, जिसमें टीवी, रेडियो, और इंटरनेट भी शामिल हैं। लेकिन जब सांस्कृतिक और व्यावसायिक मानक मजाक करते वक्त आपस में टकराते हैं और उन्हें जनमाध्यमों का साथ मिल जाता है, तो इसके परिणाम भयानक हो सकते हैं।

दिसंबर 2012 में, जैसिंथा सल्दान्हा नाम की एक भारतीय मूल की ब्रिटिश नर्स ने एक प्रैंक कॉल के बाद आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद दुनिया भर में बहस छिड़ गई कि इस तरह के मजाक को किसी के साथ करना और फिर उसे रेडियो, टीवी, या इंटरनेट के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना कितना जायज है। साल 2012 में इंटरनेट इतने बहुआयामी माध्यमों के साथ हमसे नहीं जुड़ा था, पर आज के हालात बिल्कुल अलग हैं। हिट्स और क्लिक से पैसे कमाए जा सकते हैं। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि क्या दिखाया जा रहा है, बस व्यूज मिलने चाहिए। ऐसी स्थिति में भारत एक खतरनाक स्थिति में पहुंच रहा है, जिसमें प्रैंक वीडियो एक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

दुनिया में ऑनलाइन प्रैंक वीडियो की शुरुआत यूट्यूब और फेसबुक जैसी साइट्स के आने से पहले हुई थी। साल 2002 में, एक इंटरैक्टिव फ्लैश वीडियो स्केयर प्रैंक के नाम से पूरे इंटरनेट पर फैल गया था। थॉमस हॉब्स उन पहले दार्शनिकों में से थे जिन्होंने माना कि मजाक के बहुत सारे कार्यों में से एक यह भी है कि लोग अपने स्वार्थ के लिए मजाक का इस्तेमाल सामाजिक शक्ति पदानुक्रम को अस्त-व्यस्त करने के लिए करते हैं। सैद्धांतिक रूप से, मजाक की श्रेष्ठता के सिद्धांतों को मनोविज्ञान और समाजशास्त्र के बीच संघर्ष और शक्ति संबंधों के संदर्भ में समझा जा सकता है। विद्वानों ने स्वीकार किया कि संस्कृतियों में, मजाक और प्रैंक का इस्तेमाल अक्सर हिंसा को सही ठहराने और मजाक के लक्ष्य को अमानवीय बनाने के लिए किया जाता है। इन सारी अकादमिक चर्चाओं के बीच भारत में इंटरनेट पर मजाक का शिकार हुए लोगों की चिंताएं गायब हैं।

सबसे मुख्य बात सही और गलत के बीच का फर्क मिटना है, जो सही है उसे गलत मान लेना और जो गलत है उसे सही मान लेना। जिस गति से देश में इंटरनेट पैर पसार रहा है, उस गति से लोगों में डिजिटल साक्षरता नहीं आ रही है, इसलिए निजता के अधिकार जैसी आवश्यक बातें कभी विमर्श का मुद्दा नहीं बनतीं। किसी ने किसी से फोन पर बात की और अपना मजाक उड़ाया, यह मामला तब तक व्यक्तिगत रहा। फिर वही वार्तालाप इंटरनेट के माध्यम से सार्वजनिक हो गया। जिस कंपनी के सौजन्य से यह सब हुआ, उसे हिट्स, लाइक्स, और पैसा मिला, पर जिस व्यक्ति के कारण यह सब हुआ, उसे क्या मिला? यह सवाल अक्सर नहीं पूछा जाता। इंटरनेट पर ऐसे सैकड़ों ऐप हैं, जिनको डाउनलोड करके आप मजाकिया वीडियो देख सकते हैं और ये वीडियो आम लोगों ने ही अचानक बना दिए हैं। कोई व्यक्ति रोड क्रॉस करते वक्त मेन होल में गिर जाता है और उसका फनी वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो जाता है और फिर अनंतकाल तक के लिए सुरक्षित भी हो जाता है।

हमने उस वीडियो को देखकर कहकहे तो खूब लगाए, पर कभी उस परिस्थिति में अपने आप को नहीं देखा और सोचा। इंटरनेट के फैलाव ने बहुत सी निहायत निजी चीजों को सार्वजनिक कर दिया है। ये सामाजिक दृष्टि से निजी चीजें जब हमारे चारों ओर बिखरी हों, तो हम उन असामान्य परिस्थितियों में घटी घटनाओं को भी सार्वजनिक जीवन का हिस्सा मान लेते हैं, जिससे एक परपीड़क समाज का जन्म होता है। शायद यही कारण है कि अब कोई दुर्घटना होने पर लोग मदद करने की बजाय वीडियो बनाने में लग जाते हैं। मजाकिया और प्रैंक वीडियो पर कहकहे लगाइए, पर जब उन्हें इंटरनेट पर डालना हो, तो क्या जाएगा और क्या नहीं, इसका फैसला कोई सरकार नहीं, हमें और आपको करना है। इसी निर्णय से तय होगा कि भविष्य का हमारा समाज कैसा होगा।

दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में 26/08/2024 को प्रकाशित 


Tuesday, August 13, 2024

स्क्रीन टाईम पर बच्चों पर प्रभाव

स्मार्टफोन ने एक चक्र पूरा कर लिया है .अब समय है इस मुद्दे पर चर्चा की जानी चाहिए कि हमारे बच्चों को इसकी कितनी जरूरत है |दुर्भाग्य से भारत में इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है | कॉमन सेंस मीडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 10 साल की उम्र में आज 42 प्रतिशत बच्चों के पास स्मार्टफोन है. 12 साल की उम्र तक यह 71 प्रतिशत तक पहुंच जाता है और 14 की उम्र तक 91 प्रतिशत बच्चों के हाथ में मोबाइल फोन होता है|इस डिजिटल दुनिया ने हमारे युवाओं में चिंता,डिप्रेशन और आत्महत्या जैसी विकृतियों से भर दिया है। 2000 के 2010 के दशक की शुरुआत तक, हाई स्पीड इंटरनेट और सोशल मीडिया ऐप्स से लैस स्मार्टफोन हर तरफ फैल गये।भारत भी इसमें अपवाद नहीं है |दुनिया में दुसरे नम्बर पर सबसे ज्यादा मोबाईल धारकों वाले देश में बच्चे मोबाइल के साथ क्या कर रहे हैं|इसकी चिंता किसी को नहीं है |मोबाइल फोन की घंटी  एक  नशे की लत की तरह है, लगातार बच्चों का ध्यान भटकाती है और बच्चों को उस दुनिया में ले जाती है जो हमारे नियंत्रण से बाहर है।बच्चों के ध्यान भटकाने के लिए सिर्फ फोन ही नहीं, बल्कि असली(रीयल)  खेल आधारित बचपन का खत्म हो जाना भी एक बड़ा कारण है|

भारत में यह बदलाव २००० के दशक से  शुरु हुआ जब अभिभावकों ने अपने बच्चों की किडनैपिंग और अनजान खतरों से बचाने के लिए भय आधारित पैरंटिंग करना शुरू कर दिया , जिसका परिणाम हुआ  कि बच्चों के अपने खेलने का समय घटता चला गया और उनकी गतिविधियों पर माता पिता का नियंत्रण बढ़ गया।इसका दूसरा बड़ा कारण शहरों में खेल के मैदानों का खत्म हो जाना भी है |अनियोजित शहरीकरण ने बच्चों के खेलने की जगह खत्म कर दी |इसका असर बच्चों के मोबाईल स्क्रीन में खो जाने में हुआ |आज के बच्चे और उनके माता-पिता एक तरह के डिफेंस मोड में फंसे हुए हैं, जिससे बच्चे चुनौतियों का सामना करने, जोखिम उठाने और नई चीजें एक्सप्लोर करने से वंचित रह जाते हैं, जो उनको  मानसिक रूप से मजबूत करने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए जरूरी है। अभिभावक हम अपने बच्चों को एक बढ़ई की तरह, बड़ा कर रहे हैं जो अपने सांचों को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में आकार देता है।

 असली  दुनिया में हम अपने बच्चों को अधिक सुरक्षा प्रदान करते हैं लेकिन डिजिटल दुनिया में उन्हें अपने हाल पर छोड़ देते हैं,जो कि उनके लिए खतरनाक साबित हो रहा है। स्मार्टफोन और अत्याधिक सुरक्षात्मक पालन पोषण के इस मिश्रण ने बचपन की संरचना को बदल दिया है और नई मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दिया है। जिनमें जीवन के प्रति असुरक्षा , कम नींद आना और नशे की लत शामिल हैं। तथ्य यह भी है कि हम सभी ने बहुत लंबे समय तक बिना फोन के और बिना माता-पिता से त्वरित संपर्क किये, ठीक ठाक जीवन जीया और काम किया है |।संयुक्त राष्ट्र की शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति एजेंसी यूनेस्को ने कहा कि इस बात के प्रमाण मिले हैं कि मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग शैक्षणिक प्रदर्शन में कमी से जुड़ा है तथा स्क्रीन के अधिक समय का बच्चों की भावनात्मक स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है |भारत में इस दिशा में अभी तक कोई ठोस पहल न होना चिंता का विषय है |इसके कई कारण भी है जिसमें तकनीक का अचानक हमारे जीवन में आना और छा जाना भी शामिल है| 

प्रभात खबर में 13/08/2024  को प्रकाशित 


Thursday, August 8, 2024

एआई के ऊर्जा खपत के आंकड़े चौंकाते हैं

 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब  हमारे दैनिक जीवन का एक अहम हिस्सा बनती जा रही हैं। वर्चुअल असिस्टेंट से लेकर स्मार्ट होम तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हर जगह है। चाहे चैट जीपीटी जैसे एआई जनित प्लेटफार्म पर हमे जटिल प्रश्नों के हल जानना हो या गूगल और एलेक्सा जैसे वर्चुअल असिस्टेंट्स पर अपनी आवाज भर से कोई काम कराना हो, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस धीरे धीरे हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बनने की ओर अग्रसर है।

 मगर क्या इस अचंभित कर देने वाली तकनीक के कुछ और पहलू हो सकते हैं? जो भविष्य में पर्यावरण और मानव सभ्यता के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं?इस साल जारी हुई गूगल की वार्षिक पर्यावरण रिपोर्ट में चौकाने वाले आंकड़े सामने आये हैं, साल 2022  के मुकाबले 2023 में गूगल के डाटा सेंटर पर कार्बन उत्सर्जन फुटप्रिंट में तेरह प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है । यह वृद्धि मूल रूप से उसके डेटा सेंटरों और आपूर्ति श्रृंखलाओं में बिजली की खपत बढ़ने के कारण हुई। कंपनी का कहना है कि साल 2023 में उसके डेटा सेंटरों ने पहले की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक बिजली का उपयोग किया और एआई टूल्स का उपयोग होने के कारण यह वृद्धि आने वाले सालों में और बढ़ेगी।जाहिर है कि एआई के उपयोग कई क्षेत्रों में परिवर्तनकारी बदलाव लाने के लिए किया जा रहा है, जिनमें जलवायु परिवर्तन से जुड़े समाधान भी शामिल हैं। लेकिन बढ़ती एआई तकनीक ने एक भारी कार्बन उत्सर्जन फुटप्रिंट जैसी समस्या उत्पन्न कर दी है। अध्ययनों से पता चलता है कि एआई चैटबॉट चैट-जीपीटी पर पूछी गई एक साधारण क्वेरी, गूगूल खोज की तुलना में 10 से 33 गुना अधिक ऊर्जा का उपयोग करती है। वहीं इमेज आधारित प्लेटफार्म पर इससे कहीं अधिक ऊर्जा खर्च होती है।  

 दरअसल एआई मॉडल सामान्य गूगल खोज की तुलना में अधिक डेटा को प्रोसेस और फिल्टर करते हैं, अधिक काम का मतलब है कि कंप्यूटर को डेटा प्रोसेसिंग, स्टोरिंग और रिट्रीविंग के समय अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी। वहीं अधिक काम करने से उत्पन्न गर्मी को कम करने के लिए डेटा सेंटर्स पर अधिक शक्तिशाली एयर कंडीशनिंग  और अन्य ठंडे उपाय किये जाते हैं।यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया रिवरसाइड के एक अध्ययन के मुताबिक़ साल 2022 में, गूगल ने अपने डेटा केंद्रों को ठंडा रखने के लिए लगभग 20 बिलियन लीटर ताजे पानी का उपयोग किया। वहीं बीते साल माइक्रोसॉफ्ट की जल खपत में पिछले वर्ष की तुलना में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वर्तमान में डेटा सेंटर्स की खपत वैश्विक बिजली की खपत का 1 से 1.3 प्रतिशत है, मगर जैसे जैसे एआई टूल्स का उपयोग बढ़ेगा यह खपत भी बढ़ती जाएगी। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी IEA के अनुसार 2 तक यह आंकड़ा दोगुना होकर 3 प्रतिशत तक जा सकता है। इसके विपरीत, बढ़ते इलेक्ट्रिक वाहनों के बावजूद, ई-वाहनों की वैश्विक बिजली खपत मात्र 0.5% है। वहीं कई कई देशों में डेटा सेंटर्स की ऊर्जा खपत उनकी राष्ट्रीय माँग की दहाई हिस्सेदारी तक पहुँच गई है। आयरलैंड जैसे देश जहाँ टैक्स में छूट और प्रोत्साहन के कारण डेटा सेंटर्स की संख्या असामान्य रूप से अधिक है, आयरलैंड सेंट्रल स्टैटिक्स ऑफिस रिपोर्ट 2023 के अनुसार   यह हिस्सेदारी 18 प्रतिशत पहुँच गई |

 भारत में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा सेंटर्स का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि भारत में डेटा सेंटर्स की ऊर्जा और जल खपत के आंकड़े अभी सीमित हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में AI के बढ़ते उपयोग के साथ, यह स्थिति बदल सकती है।भारत की सिलिकॉन वैली, बेंगलुरु पानी की भारी कमी से जूझ रही है, शहर में डिजिटल बुनियादी ढांचे को संचालित करने वाले डेटा केंद्रों के चलते यहाँ यह समस्या और बढ़ गई है। अकेले बेंगलुरु में डेटा सेंटर्स की संख्या सोलह  है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक बेंगलुरु के अलावा दिल्ली, चैन्नई और मुंबई जैसे महानगरों में भी डेटा सेंटर्स में पानी की खपत बढ़ गई है। भारत में स्थापित डेटा केंद्रों की क्षमता 2 हजार मेगावॉट से 2029 तक  4.77 हजार मेगावाट तक पहुँचने की उम्मीद है। जिससे पहले से पानी की कमी से जूझ रहे भारत के सिलिकन वैली की डिजिटल महत्वाकांक्षाओं पर  संकट खड़ा हो जाएगा। 

इस समस्या के समाधान के लिए गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों डेटा केंद्रों के शीतलन के लिए  अपशिष्ट जल को पुनर्नवीनीकृत कर इस्तेमाल कर रही हैं। वहीं भारतीय डेटा केंद्र अभी भी ताजे  पानी की आपूर्ति पर निर्भर हैं।यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि   केवल बिजली खपत की बात नहीं हैं, डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए पानी के संसाधनों की माँग बढ़ती जा रही है। जो भविष्य में भारत के जल संसाधनों पर दबाव डाल सकती है। हालांकि डेटा सेंटर्स पर पानी की खपत को लेकर अभी पर्याप्त डेटा सामने नहीं आया है, डेन मोइन्स रिवर पर एसोसिएटेड प्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के आयोवा शहर में OpenAI के GPT-4 मॉडल को सेवा देने वाला एक डेटा सेंटर उस जिले की पानी की आपूर्ति का करीब 6 प्रतिशत  उपयोग करता है। वहीं इस मामले में कुछ विशेषज्ञों ने एक वैकल्पिक दृष्टिकोण पेश किया है| 

बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के  एक अध्ययन के अनुसार,  AI के कॉर्पोरेट और औद्योगिक कामों के उपयोग से 2030 तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में 5-10 प्रतिशत की कमी हो सकती है , वहीं 1.3 ट्रिलियन से 2.6 ट्रिलियन डॉलर के राजस्व की भी बचत हो सकती है।

 इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, हमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विकास के साथ-साथ इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों पर भी ध्यान देना चाहिए। जिससे हम एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए एआई के फायदों का लाभ उठा सकते हैं और इसके पर्यावरणीय असर को कम कर सकते हैं। ऐसा कर हम एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, जहाँ तकनीक और प्रकृति दोनों के बीच तालमेल बना रहे।

अमर उजाला में 08/08/2024 को प्रकाशित 

Saturday, July 13, 2024

यूजर्स के बीच बढ़ती अरुचि

 


साल 2010 साल 2010 में जो सोशल मीडिया आशाओं का अग्रदूत बन कर उभर रहा था वो साल 2020 तक आते –आते फेक न्यूज और लोगों की राजनीतिक विचारों को प्रभावित करने जैसे आरोपों का शिकार  हो चुका था | सोशल मीडिया की आंधी आये हुए महज दस साल में ही लोग अपनी राय पोस्ट करने में अब कम लोग ही सक्रिय हैं|पोस्ट करने से आशय टेक्स्ट इमेज फॉर्म में अपने आपको व्यक्त करने से है |सोशल  मीडिया पर रोज  बहुत सारे लोग लॉग इन करते हैं, पर  वास्तव में बहुत कम लोग ही पोस्ट कर रहे हैं।

हम  प्रतिदिन लगभग दो घंटे इंस्टाग्राम फेसबुक या ट्विटर  पर स्क्रॉल करते हुए समय बिताते हैं, लेकिन उनके मुख्य फ़ीड पर उनकी आखिरी पोस्ट एक साल पहले की थी। कभी कभी लोग सोशल मीडिया स्टोरीज जरुर शेयर करते हैं ,जो चौबीस  घंटों के बाद गायब हो जाती हैं। सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल ने लोगों को अब यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अब जीवन में और अधिक झगड़े जोड़ने की जरूरत नहीं है और लोगों को इस बात पर झगड़ने की ज़रूरत नहीं है कि मैंने किसे वोट दिया या मैं क्या सोचता हूँ।अब वह वह आमने-सामने और समूह चैट को प्राथमिकता देता है—जिसे अब  "निजी नेटवर्किंग" कहा जा रहा है। उपयोगकर्ताओं के सर्वेक्षण और डेटा-एनालिटिक्स फर्मों के शोध के अनुसार, अरबों लोग मासिक रूप से सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, लेकिन सोशल मीडिया उपयोगकर्ता कम पोस्ट कर रहे हैं और अधिक निष्क्रिय अनुभव का आनंद  ले रहे हैं।इसे दुसरे शब्दों में यूँ समझा जा सकता है कि ऐसा नहीं है लोगों का सोशल मीडिया से मोह  भंग हो रहा है वे अभी भी लोगों की सोशल मीडिया फीड देखने या राष्ट्रीय समय पास करना बन चुका शगल ,रील देखने में समय बिता रहे हैं पर वे अब अपनी राय रखने में उतने सक्रिय नहीं रहे हैं |डेटा-इंटेलिजेंस कंपनी मॉर्निंग कंसल्ट की अक्टूबर रिपोर्ट में,सोशल-मीडिया अकाउंट वाले 61 प्रतिशत अमेरिकी वयस्क उत्तरदाताओं ने कहा कि वे जो पोस्ट करते हैं उसके बारे में वे अधिक चयनात्मक हो गए हैं यनि अब लोग क्या पोस्ट करना है उसके बारे में सोचने लग गए है ।

भारत भी अपवाद नहीं है|भले ही अपने विशाल सोशल मीडिया यूजर बेस के कारण यहाँ ऐसा नहीं दिखता पर अब लोग सोशल मीडिया पर कम पोस्ट शेयर कर रहे हैं | इसके कई कारण हैं इस शोध के हिसाब से लोग ये मानने लगे हैं  कि वे जो सामग्री देखते हैं उसे नियंत्रित नहीं कर सकते। वेअपने जीवन को ऑनलाइन साझा करने को लेकर अधिक सुरक्षात्मक हो गए हैं और अब उन्हें अपनी निजता की भी चिंता होने लग गयी हैं ।सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स की बढ़ती संख्या के कारण लोगों का मजा किरकिरा भी हुआ है |सारे मेटा प्लेटफोर्म  (इन्स्टाग्राम और फेसबुक )में यह गुप्त प्रवृत्ति जिसमें टिकटोक और एक्स(ट्विटर ) इन सभी के व्यवसाय के लिए ख़तरा है। उपयोगकर्ताओं के ज्यादा से  ज्यादा शेयर करने के कारण वे दुनिया की सबसे शक्तिशाली कंपनियों और प्लेटफार्मों में से बन गए हैं।मजेदार तथ्य यह है कि इनमें से कोई भी कम्पनी  कोई उत्पाद नहीं बनाती है,फिर भी ये  नई कम्पनियां दुनिया की बड़ी और लाभकारी कम्पनियां बन गयीं है|

 सिर्फ यूजर जेनरेटेड कंटेंट जाहिर है लोगों की कहने की आदत के कारण|भारत अभी अमेरिका जैसी गंभीर स्थिति में नहीं है पर यह साफ़ तौर पर अब देखा जा सकता है कि लोग अपनी निजता और सब कुछ सोशल मीडिया पर डालने की मानसिकता से किनारा  कर रहे हैं |इसका एक बड़ा कारण सोशल मीडिया अकाउंट का उपयोग मार्केटिंग और ब्रांडिग के लिए किया जाना इसके अलावा मीडिया लिट्रेसी का प्रचार प्रसार भी है | वैसे  भी सोशल मीडिया पर आते ही उपभोक्ता डाटा में तब्दील हो जाता है| फिर उस डाटा ने और डाटा ने पैदा करना शुरू कर दिया |इस तरह देश में हर सेकेण्ड असंख्य मात्रा में डाटा जेनरेट हो रहा है पर उसका बड़ा फायदा इंटरनेट के व्यवसाय में लगी कम्पनियों को हो रहा है | यूजर जेनरेटेड कंटेंट से चलने वाली इन कम्पनियों की कमाई का बड़ा फायदा उपभोक्ताओं को नहीं होता |

आधिकारिक तौर पर सोशल मीडिया से भारत मे  कितने रोजगार पैदा हुए इसका विशेष उल्लेख नही मिलता क्योंकि ये सारी कम्पनियां इन से सम्बन्धित आंकड़े सार्वजनिक रूप से नहीं जारी करतीं । साथ ही प्रत्यक्ष रोजगार के काफी कम होने का संकेत इन कम्पनीज के एम्प्लाइज की कम संख्या से प्रमाणित होता  है । ऐसा भी नहीं कि ये सोशल मीडिया कंपनियां इस तथ्य से अनजान हैं |अब वे सोशल मीडिया के उपभोक्ताओं को ज्यादा पर्सनलाइज्ड अनुभव देने की ओर अग्रसर हैं |वे मैसेजिंग जैसे अधिक निजी उपयोगकर्ता अनुभवों में निवेश कर रहे हैं और बातचीत को अधिक सुरक्षित बना रहे हैं। जिसमें  लोगों को अधिक अंतरंग साथियों के लिए पोस्ट करने के लिए प्रोत्साहित करना भी शामिल है  - जैसा कि इंस्टाग्राम के हाल ही में जारी किये गए  क्लोज फ्रेंड्स फीचर के साथ हुआ है।इन सबके बावजूद सोशल मीडिया से लोगों की बढ़ती अरुचि किसी नए माध्यम के विकास का बहाना बनेगी या नए यूजर  की बढ़ती संख्या इस प्रक्रिया को चलायमान रखेगी यह देखना दिलचस्प होगा |में जो सोशल मीडिया आशाओं का अग्रदूत बन कर उभर रहा था वो साल 2020 तक आते –आते फेक न्यूज और लोगों की राजनीतिक विचारों को प्रभावित करने जैसे आरोपों का शिकार  हो चुका था | सोशल मीडिया की आंधी आये हुए महज दस साल में ही लोग अपनी राय पोस्ट करने में अब कम लोग ही सक्रिय हैं|पोस्ट करने से आशय टेक्स्ट इमेज फॉर्म में अपने आपको व्यक्त करने से है |सोशल  मीडिया पर रोज  बहुत सारे लोग लॉग इन करते हैं, पर  वास्तव में बहुत कम लोग ही पोस्ट कर रहे हैं।

हम  प्रतिदिन लगभग दो घंटे इंस्टाग्राम फेसबुक या ट्विटर  पर स्क्रॉल करते हुए समय बिताते हैं, लेकिन उनके मुख्य फ़ीड पर उनकी आखिरी पोस्ट एक साल पहले की थी। कभी कभी लोग सोशल मीडिया स्टोरीज जरुर शेयर करते हैं ,जो चौबीस  घंटों के बाद गायब हो जाती हैं। सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल ने लोगों को अब यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अब जीवन में और अधिक झगड़े जोड़ने की जरूरत नहीं है और लोगों को इस बात पर झगड़ने की ज़रूरत नहीं है कि मैंने किसे वोट दिया या मैं क्या सोचता हूँ।अब वह वह आमने-सामने और समूह चैट को प्राथमिकता देता है—जिसे अब  "निजी नेटवर्किंग" कहा जा रहा है। उपयोगकर्ताओं के सर्वेक्षण और डेटा-एनालिटिक्स फर्मों के शोध के अनुसार, अरबों लोग मासिक रूप से सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, लेकिन सोशल मीडिया उपयोगकर्ता कम पोस्ट कर रहे हैं और अधिक निष्क्रिय अनुभव का आनंद  ले रहे हैं।इसे दुसरे शब्दों में यूँ समझा जा सकता है कि ऐसा नहीं है लोगों का सोशल मीडिया से मोह  भंग हो रहा है वे अभी भी लोगों की सोशल मीडिया फीड देखने या राष्ट्रीय समय पास करना बन चुका शगल ,रील देखने में समय बिता रहे हैं पर वे अब अपनी राय रखने में उतने सक्रिय नहीं रहे हैं |डेटा-इंटेलिजेंस कंपनी मॉर्निंग कंसल्ट की अक्टूबर रिपोर्ट में,सोशल-मीडिया अकाउंट वाले 61 प्रतिशत अमेरिकी वयस्क उत्तरदाताओं ने कहा कि वे जो पोस्ट करते हैं उसके बारे में वे अधिक चयनात्मक हो गए हैं यनि अब लोग क्या पोस्ट करना है उसके बारे में सोचने लग गए है ।

भारत भी अपवाद नहीं है|भले ही अपने विशाल सोशल मीडिया यूजर बेस के कारण यहाँ ऐसा नहीं दिखता पर अब लोग सोशल मीडिया पर कम पोस्ट शेयर कर रहे हैं | इसके कई कारण हैं इस शोध के हिसाब से लोग ये मानने लगे हैं  कि वे जो सामग्री देखते हैं उसे नियंत्रित नहीं कर सकते। वेअपने जीवन को ऑनलाइन साझा करने को लेकर अधिक सुरक्षात्मक हो गए हैं और अब उन्हें अपनी निजता की भी चिंता होने लग गयी हैं ।सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स की बढ़ती संख्या के कारण लोगों का मजा किरकिरा भी हुआ है |सारे मेटा प्लेटफोर्म  (इन्स्टाग्राम और फेसबुक )में यह गुप्त प्रवृत्ति जिसमें टिकटोक और एक्स(ट्विटर ) इन सभी के व्यवसाय के लिए ख़तरा है। उपयोगकर्ताओं के ज्यादा से  ज्यादा शेयर करने के कारण वे दुनिया की सबसे शक्तिशाली कंपनियों और प्लेटफार्मों में से बन गए हैं।मजेदार तथ्य यह है कि इनमें से कोई भी कम्पनी  कोई उत्पाद नहीं बनाती है,फिर भी ये  नई कम्पनियां दुनिया की बड़ी और लाभकारी कम्पनियां बन गयीं है|

 सिर्फ यूजर जेनरेटेड कंटेंट जाहिर है लोगों की कहने की आदत के कारण|भारत अभी अमेरिका जैसी गंभीर स्थिति में नहीं है पर यह साफ़ तौर पर अब देखा जा सकता है कि लोग अपनी निजता और सब कुछ सोशल मीडिया पर डालने की मानसिकता से किनारा  कर रहे हैं |इसका एक बड़ा कारण सोशल मीडिया अकाउंट का उपयोग मार्केटिंग और ब्रांडिग के लिए किया जाना इसके अलावा मीडिया लिट्रेसी का प्रचार प्रसार भी है | वैसे  भी सोशल मीडिया पर आते ही उपभोक्ता डाटा में तब्दील हो जाता है| फिर उस डाटा ने और डाटा ने पैदा करना शुरू कर दिया |इस तरह देश में हर सेकेण्ड असंख्य मात्रा में डाटा जेनरेट हो रहा है पर उसका बड़ा फायदा इंटरनेट के व्यवसाय में लगी कम्पनियों को हो रहा है | यूजर जेनरेटेड कंटेंट से चलने वाली इन कम्पनियों की कमाई का बड़ा फायदा उपभोक्ताओं को नहीं होता |

आधिकारिक तौर पर सोशल मीडिया से भारत मे  कितने रोजगार पैदा हुए इसका विशेष उल्लेख नही मिलता क्योंकि ये सारी कम्पनियां इन से सम्बन्धित आंकड़े सार्वजनिक रूप से नहीं जारी करतीं । साथ ही प्रत्यक्ष रोजगार के काफी कम होने का संकेत इन कम्पनीज के एम्प्लाइज की कम संख्या से प्रमाणित होता  है । ऐसा भी नहीं कि ये सोशल मीडिया कंपनियां इस तथ्य से अनजान हैं |अब वे सोशल मीडिया के उपभोक्ताओं को ज्यादा पर्सनलाइज्ड अनुभव देने की ओर अग्रसर हैं |वे मैसेजिंग जैसे अधिक निजी उपयोगकर्ता अनुभवों में निवेश कर रहे हैं और बातचीत को अधिक सुरक्षित बना रहे हैं। जिसमें  लोगों को अधिक अंतरंग साथियों के लिए पोस्ट करने के लिए प्रोत्साहित करना भी शामिल है  - जैसा कि इंस्टाग्राम के हाल ही में जारी किये गए  क्लोज फ्रेंड्स फीचर के साथ हुआ है।इन सबके बावजूद सोशल मीडिया से लोगों की बढ़ती अरुचि किसी नए माध्यम के विकास का बहाना बनेगी या नए यूजर  की बढ़ती संख्या इस प्रक्रिया को चलायमान रखेगी यह देखना दिलचस्प होगा |

दैनिक जागरण में 13/07/2024 को प्रकाशित 

Tuesday, July 9, 2024

आख़िरी बार कोई किताब पूरी कब पढी थी

 

क्या आपको याद है आखिरी बार आपने कोई किताब पूरी कब पढ़ी थी, या अपने किसी मित्र के लिए पत्र कब लिखा था, आप में से कई लोगों के लिए यह अंतराल हफ्ते, महीने और कुछ के लिए साल भी हो सकता है। आज के डिजिटल युग में हमारी रोजमर्रा की जिंदगी पर तकनीक ने खासा प्रभाव डाला है, इस बदलती दुनिया में हम चारों तरफ स्मार्टफोन, टैबलैट, कम्यूटर जैसे तमाम इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से घिर गये हैं।चैटिंग एप्स पर कुछ लिखने की बजाय वायस  नोट्स भेजे रहे हैं |वीडियो काल की बाढ़ आई हुई है |  इस बदलते दौर में विजुअल मीडिया यानि वीडियो  का बोलबाला है, ओटीटी पर बिंज वॉचिंग(किसी लम्बे वीडियो को बगैर रुके पूरा देखना ) से लेकर सोशल मीडिया साइट्स पर अनगिनत रील स्क्रॉल करने तक, विजुअल मीडिया हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा हो चला है। विजुअल कंटेट की ओर इस बढ़ते झुकाव ने शोधकर्ताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हम पढने के दौर से आगे निकल जाने वाले हैं |हाल ही में मार्केटिंग फर्म इन-मोबी की मोबाइल मार्केटिंग हैंडबुक-2024 की ताजा रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें कहा गया है कि एक औसत भारतीय 4 घंटे से अधिक समय रोजाना स्मार्टफोन पर बिताता है, जो वैश्विक औसत से लगभग एक घंटे ज्यादा है |यह आंकड़ा दिखाता है कि हम अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा डिजिटल स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं। इस बढ़ते स्क्रीन टाइम और वीडियो कंटेंट के बढ़ते उपभोग से हमारे दिमाग पर संज्ञानात्मात्क प्रभाव पड़ा है। इससे ना केवल हमारे दिमागी कौशल बल्कि हमारी पढ़ने और लिखने की आदतें बदलने के साथ साथ ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता भी कम हो रही है |

 स्मार्ट फोन  और स्ट्रीमिंग साइट्स जैसे प्लेटफार्म्स से हमारी किसी चीज को गौर से  समझने की  अवधि कम हो गई है। माइक्रोसॉफ्ट कॉर्पोरेशन के एक अध्ययन के अनुसार लोग आम तौर पर आठ सैकेंड के बाद एकाग्रता खो देते हैं, जो मस्तिष्क पर तेजी से डिजिटल होती जीवनशैली के प्रभावों को उजागर करता है। इस शोध में कहा गया मनुष्यों की ध्यान अवधि एक गोल्ड फिश से भी कम हो गई है। अमेरिका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर डॉ ग्लोरिया मार्क का कहना है कि शॉर्ट वीडियोज एप ने ध्यान अवधि में होने वाली गिरावट में अहम भूमिका निभाई है, वहीं लंबे समय तक वीडियो देखने और स्क्रीन टाइम बढ़ने से हमारी एकाग्रता और स्मृति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उनके शोध के अनुसार 2004 में, स्क्रीन पर औसत ध्यान अवधि औसतन ढाई मिनट थी  2012 में  यह 75 सेकंड हो गयी और फिर पिछले पांच, छह वर्षों में, यह औसत लगभग 47 सेकंड का हो चुका है|

जिसके कारण  लोगों की रुचि पढ़ने से ज्यादा देखने और सुनने की ओर बढ़ रही है|यह बदलाव सामाजिक, तकनीकी और मनोवैज्ञानिक कारणों से हो रहा है। रॉयटर्स की डिजिटल रिपोर्ट के मुताबिक इकहत्तर  प्रतिशत भारतीय ऑनलाइन समाचार  देखना पसंद करते हैं, वहीं केवल उनतीस  प्रतिशत लोग ही अखबार पढ़ते हैं। लोगों के पास समय कम होने के कारण वे लंबे लेखों और किताबों को पढ़ने के बजाय वीडियो और ऑ़डियो क्लिप के माध्यम से जानकारी प्राप्त करना पसंद कर रहे हैं |

इसने  हमारे पढ़ने के तरीकों पर भी खासा प्रभाव डाला है, युवा पाठक ई-बुक्स और ऑडियोबुक को प्रकाशित  किताबों की तुलना में अधिक पसंद कर रहे हैं। इसका एक कारण है कि ई-बुक और ऑडियोबुक, प्रिंटेड किताबों की तुलना में कम खर्चीले होते हैं और उन्हे आसानी से कहीं भी पढ़ा और सुना जा सकता है। कोविड महामारी के बाद भारत में भी ई-बुक्स और ऑडियोबुक का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, वहीं पारंपरिक किताबों के प्रति लोगों का रुझान कम होता नजर आ रहा है। सिरकाना बुकस्कैन की एक रिपोर्ट में सामने आया कि साल 2023 में 2022 के मुकाबले प्रिंट किताबों की बिक्री में 2.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, वहीं इसके विपरीत शोध वेबसाइट स्टेस्टिका के मुताबिक भारत में ऑडियोबुक का बाजार हर साल 10.51 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि लोगों का रुझान अब किताबों के इतर ऑडियोबुक्स की ओर बढ़ रहा है।

स्टेस्टिका की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या 100 करोड़ के पार पहुँच गई है, जिनमें 90 प्रतिशत यूजर्स वीडियो कंटेंट देखते हैं। हालांकि वीडियो कटेंट मनोरंजक होते हैं और दर्शकों को आकर्षित करते हैं और पढ़ने की तुलना में अधिक मनोरंजक  अनुभव प्रदान करते हैं। वहीं इस तकनीकी दुनिया में शैक्षिक पढ़ाई के तरीके भी बदलते जा रहे हैं, किताबों और लेखों की जगह अब वीडियो लेक्चेर्स और डिजिटल मीडिया ने ले ली है। जहाँ एक ओर विजुअल और ऑडियो से जानकारी को समझना और सीखना आसान हो जाता है वहीं इससे छात्रों की पढ़ाई की आदतों पर प्रभाव पड़ सकता है। भारत की दिग्गज ऑनलाइन लर्निंग कंपनी अनएकेडमी के मुताबिक उनके पास 5 करोड़ से अधिक एक्टिव लर्नस पढ़ाई करते हैं। वहीं यूट्यूब जैसे स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म्स पर पढ़ने वालों की संख्या इससे कहीं अधिक है।

 जाहिर है वीडियो और ऑडियो कंटेंट  मनोरंजक होते हैं और लोगों को आकर्षित करते हैं। वे कहानियों को रोचक दृश्यों, संगीत और ध्वनि प्रभावों के साथ प्रस्तुत करते हैं, जो पढ़ने की तुलना में अधिक मनोरंजक अनुभव प्रदान करते हैं।यह सच है कि लोग आजकल पढ़ने की बजाय देखना-सुनना ज़्यादा पसंद करते हैं। आंकड़े भी इस बात का समर्थन करते हैं कि लोग वीडियो, फिल्में, टीवी शो और ऑडियोबुक पर अधिक समय बिता रहे हैं। लेकिन अगर ऐसा चलता रहा तो हमारी लिखने और पढ़ने की आदत धीरे धीरे महज शैक्षाणिक कामों और लिखने पढ़ने से जुड़े अन्य पेशों तक ही सीमित हो जाएगी।  हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पढ़ने के भी अनेक लाभ हैं।पढ़ना लोगों की कल्पना शक्ति को परिष्कृत करता है जिससे सृजनात्मकता बढ़ती है तर्कशीलता का विकास होता है |इसलिए  पढ़ने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में हम मशीनों के गुलाम भर न बने रह जाए क्योंकि साहित्य संगीत और कला की धुरी पढ़ना है और इससे विहीन मनुष्य  पशु के समान होता है 

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 अमर उजाला में 09/07/2024 को प्रकाशित 

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