Thursday, April 7, 2022

अनछुए पहलुवो को उभारता हिन्दी सिनेमा

 स्त्रैण  हाव भाव वाले पुरुष चरित्र हिन्दी फिल्मों में हमेशा हास्य पैदा करने के माध्यम रहे हैं|चाहे वो शोले का वह कैदी हो जय वीरू को जेलर के खबरी का पता देता हो या  बोल बच्चन में अब्बास अली  हो या फिर  गैंग्स ऑफ वासेपुर में आइटम बॉय का चरित्र | ये तीनो  फ़िल्में अलग अलग दर्शक वर्ग के लिए अलग अलग समय में बनाई गयीं पर तीनों  में एक समानता हैवो है समलैंगिक किरदार|रिश्तों को अपनी कहानियों का हिस्सा बनाता आया हिंदी सिनेमा पिछले सालों में  काफी  बोल्ड हुआ और ऐसे अनछुए पहलूओं को सिनेमा के परदे  पर दर्शकों के सामने परोसने का साहस कर पाया। इन फिल्मों में रिश्तों की उलझन जटिलता उसका मर्म और दिल में दबे रहने वाले ऐसे जज्बातों को गूंथा गया जिसे आम तौर पर सभी के सामने कहने की हमारे समाज में परंपरा कभी नहीं रही है।  कुछ ने उसे अश्लीलता कहते हुए नकार दिया लेकिन सच को समाज का हिस्सा मानने वालों ने उस पर अपनी पसंद की मुहर भी लगाई।अभी रिलीज हुई फिल्म बधाई दो इसी कड़ी में एक शानदार पहल है | हिंदी सिनेमा अब केवल शादीब्याहप्रेम कहानियों में बताए जाने वाले रिश्तों तक सीमित नहीं रहना चाहता। संवेदनशील विषयों को कहने से हम अब भी झिझकते हैं.खास तौर पर वह जो हमारे समाज का छिपा सच हैं। बोल्ड का मतलब केवल अभिनेता-अभिनेत्री के अंतरंग दृश्य नहीं हैंरिश्तों की बारीकी भी है। 1990 से हिंदी सिनेमा में कथ्य और शिल्प के स्तर पर प्रयोगधर्मिता बढी है।सहजीवन,समलैंगिकता पुरूष स्ट्रीपर्स सेक्स और विवाहेतर संबंध और प्यार की नई परिभाषा से गढ़ी कहानियां फिल्मों के नए विषय हैं।जिस तेजी से समाज बदल रहा है. उतनी तेजी से फिल्मों में ये विषय नहीं आ रहे हैं।समलैंगिकता समाज का सच है पर इस मुद्दे की गंभीरता को अभी भी समझा नहीं जा रहा है इंसानी समाज का ये पक्ष अभी भी बहस के मुद्दे से दूर है | सेक्‍स को हमेशा प्रमुखता से प्रस्तुत  करने वाली हमारी फिल्मों में (कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाएतो बॉलीवुड में यौन विषयों पर आधारित तार्किक फिल्‍में कम ही बनी हैं) यह तथ्य अलग है कि आइटम डांस का तडका लगाये बिना  कोई फिल्म पूरी नहीं होती और फिल्म निर्माता हमेशा इस विषय से भय ही खाते रहे है।

मगर कुछ निर्देशक ऐसे हैं जिन्होंने समलैंगिकता जैसे संवेदनशील मुददे पर काम किया है|खासकर युवाओं ने जिन्हें समाज में वर्जित माने जाने वाले मुददों को दिखाने से कोई गुरेज नहीं। फिल्मों में गे और लेस्बियन किरदारों को या तो प्रोटागोनिस्ट दोस्तों की तरह दिखाया जाता है या फिर ड्रेस-डिजाइनर के किरदार में। समय के साथ और दर्शकों की रुचि देखते हुए बॉलीवुड खुले तौर पर सामने आ रहा है। फायरमाई ब्रदर निखिलदोस्तानाफ्रेंडशिप,फैशन  और पेज ३ में समलैंगिकों के लिए समाज का नजरिया दिखाने की कोशिश की गई है।कुछ फिल्मों ने समलैंगिकों के लिए आम आदमी का नजरिया बदला है फिर भी समाज का एक बड़ा तबका उन्हें असामान्य ही मानता है।फिल्मों में समलैंगिक किरदारों को स्वीकार तो किया जा रहा है लेकिन उन्हें ज्यादातर फैशन या मीडिया जगत से जुड़ा दिखाया जाता है।इस विषय की पहली मेनस्ट्रीम हिंदी मूवी ओनीर निर्देशित माय ब्रदर निखिल रही है|फिल्म 'बॉम्बे टॉकीज़में करण जौहर की कहानी में रणदीप हुड्डा और साकिब सलीम का प्रसंग, 'कपूर एंड सन्समें फव्वाद ख़ान का किरदारकल्कि की 'मार्गरीटा विद स्ट्रॉसहित कई फिल्मों में रिश्तों को गंभीरता से दिखाया गया|

 निर्देशक करण राजदान की गर्लफ्रेंड में लेस्बियन रिश्तों पर फोकस है। करण जौहर निर्देशित दोस्ताना गे-कॉमेडी थी। यह फिल्म दर्शकों को काफी रास आई यह फिल्म इसलिए भी चर्चित रही कि इसमें पहली बार दो पुरुषों के चुम्बन द्रश्य को दिखाया गया । लेस्बियन लव स्टोरी 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगाफिल्म में इस तरह के  रिश्ते को लेकर स्पष्टता और निडरता देखी जा सकती है | आयुष्यमान खुराना और जितेन्द्र कुमार की 'शुभ मंगल ज्यादा सावधानभी इसी दिशा में समाज की बदलती सोच को दिखाने में सफल रही|

 बहुत से फिल्म निर्माता समलैंगिकता को केवल हास्य के रूप में इसलिए रखते हैं ताकि उन्हें फिल्म की रिलीज के दौरान दिक्कत न हो इसलिये फिल्मों में ऐसे चरित्र तो बढ़ रहे हैं जिनके हाव भाव समलैंगिकों वाले हैं पर उनकी यौन रूचि पर सीधे कोई बात नहीं की जाती और फिल्मों के कथ्य में वो महज मजाक बन कर रह जाते हैं|भले ही फिल्मों का विषय और प्रस्तुति काल्पनिक हो लेकिन कोई भी फिल्म अपने समय से निरपेक्ष नहीं रह सकती हर फिल्म पर उस समय का असर जरुर होता है जिस समय वह निर्मित की जा रही होती हैसमलैंगिक किरदारों को हास्य के साथ प्रस्तुत करना समाज में उनके प्रति गलत छवि का निर्माण करता है |यह समलैंगिकों के साथ अन्याय भी है ।लिसा रे और शीतल सेठ की आइ कांट थिंक स्ट्रेट स्त्री समलैंगिकता पर आधारित थी। शमीम शरीफ निर्देशित फिल्म में दोनों अभिनेत्रियां अपनी यौन पहचान समझने की कोशिश में रहती हैं। फिल्म् “डू नो वाय... न जाने क्यों” पुरुषों के समलैंगिक रिश्तों की कहानी है। जो विषमलैगिक ढांचे के अनुसार नहीं चलते हैंपश्चिमी देशों में पुरुष और स्त्री को अपने सेक्स रिश्ते के चुनाव की पूरी आजादी हैं। इसे विचार अभिव्यक्ति का ही हिस्सा माना जाता है पर भारत में स्थिति अलग है|यहाँ सेक्स अभी भी टैबू है जिस पर बात करना वर्जित है | हम भारत से बाहर की फिल्में देखकर ऐसे बोल्ड विषयों को कहने के साहस पर खुश होते है लेकिन वही काम अगर भारत में हो तो पचा नहीं पाते। निर्देशकों के चरित्र उसकी प्रवृत्ति पर सवाल खड़े का कर देते हैं।साल 2015 में  आई मनोज बाजपेयी की अलीगढ़ ने समलैंगिकता पर चल रही बहस को न सिर्फ एक नया मोड़ दिया बल्कि यह इस मामले में हिन्दी  सिनेमा के गंभीर  हो जाने की दिशा में बड़ा हस्तक्षेप  था |

 समलैंगिकों की  स्थिति का काफी दस्तावेजीकरण हो रहा हैजिनसे पता चलता है कि गे ,लेस्बियन हिजडाट्रांसजैन्डर्डऔर बाईसेक्स्युअल लोगों की मानव प्रतिष्ठा का बार-बार किस प्रकार उल्लंघन किया जाता है। उल्लंघनों का क्षेत्र व्यापक है। किन्नरों का सेक्स रैकेट के रूप में प्रयोग और पुलिसवालों द्वारा उनके बार-बार बलात्कार की घटनाएं हैं और उनके मानवाधिकारों का हनन भी शामिल है ।बहरहाल समलैंगिकता पूरी दुनिया में हमेशा मौजूद रही है परंतु इसे हमने सामाजिक कालीन के नीचे छिपा दिया था जो अब प्रकट हो रहा है। हाल ही में ऐसी फिल्मों की बढ़ती तादाद और प्रमुख अभिनेताओं द्वारा समलैंगिक किरदारों का निभाया जाना इस ओर इशारा करता है कि बॉलीवुड भी इस गंभीर मुद्दे की ओर उन्मुख है। समलैंगिकता को देश में कानूनी मान्यता मिल गई है तो उम्मीदें भी बढ़ी हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि हिंदी फिल्मकार किस तरह से इसको अपने विषयों का हिस्सा बनाते हैं। क्या वह दबी आवाजें कुचले रिश्ते संबंधों की कसमसाहट और समाज की नैतिकता किस चोले में रजत पटल का हिस्सा बनेगी|

 दैनिक जागरण में 07/04/2022 को प्रकाशित 

Tuesday, April 5, 2022

रेखाएं बेहद अहम हैं

 


नवरात्रि में घर की सफाई में एक पुरानी किताब मिली जानते हैं उसका विषय था ज्योमेट्री जी हाँ रेखा गणित और क्या कुछ आँखों के आगे घूम गया वो स्कूल के दिन वो एल एच एस इस ईक्युल टू आर एच एस और इतिसिद्धम. तब लगता था हम ये सब क्यूँ पढते हैं वैसे भी गणित मुझे बहुत बोर करती थी. जिंदगी तो आगे बढ़ चली पर अब समझ आ रहा है जीवन में रेखा का क्या महत्व हैक्योंकि इसी पर जिंदगी का गणित टिका हुआ है. रेखा मतलब लाइनलिमिट ,सीमा या फिर कुछ आड़ी तिरछी सीधी पंक्ति वैसे इनका कोई मतलब नहीं है पर इन्हें सिलसिलेवार लगा दिया जाए तो किसी के घर का नक्शा बन जाता है. तो कोई कुछ ऐसा जान जाता है जिसे कल तक कोई नहीं जानता था.रेखा ही है वो टूल है जिससे आप अपने सपनों को वास्तविकता का जामा पहना सकते हैं पर ये ध्यान रहे कि उस रेखा का डायरेक्शन किस तरफ है क्योंकि वो चाहे गणित का सवाल हो या जिंदगी की उलझन काफी कुछ आपके दिमाग के डायरेक्शन पर निर्भर करता है.

विषय कोई भी हो चाहे इतिहासभूगोल गणित या फिर साहित्य बगैर रेखाओं के इनका कोई अस्तित्व नहीं है अब देखिये ना लिपि या स्क्रिप्ट भी तो कुछ रेखाओं का कॉम्बिनेशन है यानि दुनिया को समझने के लिए हमें रेखाओं की जरुरत है. इतिहास में समयरेखा है तो भूगोल में अक्षांश और भूमध्य जैसी रेखाएं. कॉपियों में लिखने का अभ्यास पहले लाईनदार पन्नों से होता है बाद में जब हम अभ्यस्त हो जाते हैं तो उनकी जगह सफ़ेद पन्ने ले लेते है और तब हम कितनी भी जल्दी क्यूँ ना लिखें शब्द अपनी जगह से नहीं भागते. वे उसी तरह लिखें जाते हैं जैसे हम लाईनदार कॉपियों में लिखते हैं.

क्यूँ कुछ तस्वीर साफ़ हो रही है.जीवन में इन रेखाओं का कितना बड़ा दायरा है वो जीवन की रेखा से लेकर गरीबी रेखा तक देखा और समझा जा सकता है. जीवन  में स्वछंदता और उन्मुक्तता मौज मस्ती अच्छी है पर उसकी एक सीमा होनी चाहिए और इस रेखा को हमें ही खींचना चाहिए. त्यौहार  हमें जश्न मनाने का जहाँ  मौका देते हैं. वहीं ये भी बताते हैं कि जीवन महज मौजमस्ती का नाम नहीं बल्कि समाज में हमारा सकारात्मक योगदान  भी  है.महत्वपूर्ण है कि ये बात कोई दूसरा हमें ना बताये क्योंकि सेल्फ रेग्युलेशन,खुद  से ही आता है और यही सेल्फ रेग्युलेशन जो हमें अनुशासित करता है.जब हम दूसरे की सीमाओं का सम्मान करेंगे तो लोग खुद ब खुद हमें अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र छोड़ देंगे पर हम ये सोचें कि हम सबके बारे में कुछ भी गॉसिप कर सकते हैं पर कोई हमारे बारे में कोई कुछ नहीं बोलेगा ऐसा होना मुश्किल है. सफल होने की कोई सीमा नहीं है पर ख्वाब अगर हकीकत के आइने में देखें जाएँ तो उनके सफल होने की गुंजाईश ज्यादा होती है. मतलब अपनी सीमाओं को जानकर उसके हिसाब से जब योजनाएं बनाई जाती हैं तो वो निश्चित रूप से सफल होती हैं. तो मुझे तो अपनी सीमाओं  का अंदाजा है और अपनी जीवन रेखा को इसी तरह बना रहा हूँ कि मेरी जिंदगी के कुछ मायने निकले पर आप क्या कर रहे हैं यह जरुर बताइयेगा.

प्रभात खबर में 05/04/2022 को प्रकाशित 

 

Friday, April 1, 2022

फैसलों का लम्बा खिंचता इन्तजार

 विधि द्वारा स्थापित व्यवस्था में जेल(कारागार) किसी भी अपराध का दंड है यानि जेलतंत्र का वो अंग है जो इस दर्शन पर आधारित है कि अपराधियों को समाज से दूर रखकर एक ऐसा वातावरण दिया जाए जहाँ वह आत्म चिंतन कर सकें ,पर  क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है

सरकार ने लोकसभा में 25 मार्च  को जानकारी दी है कि देश की विभिन्न अदालतों में 4|70 करोड़ से अधिक मुकदमे अटके हुए हैंसुप्रीम कोर्ट में ही 70,154 मुकदमे लंबित हैदेश की 25 हाईकोर्ट में भी 58 लाख 94 हजार 60 केस अटके हुए हैंइन लंबित मुकदमों की संख्या दो मार्च तक की है| इनमें से कुछ मामले पचास साल से भी ज़्यादा पुराने हैं|भारत में जेल सुधारों की  त्वरित आवश्यकता है |जिसका एक बड़ा कारण लंबित मुकदमों का बढ़ना ,न्यायाधीशों की कमी और सभी जेलों का क्षमता से ज्यादा भरा होना है|जिसका परिणाम कैदियों के खराब  मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के रूप में आ रहा है|जेल में यंत्रणा आम है| राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट  ‘जेल सांख्यिकी भारत 2020' के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिकभारत की जेलों में बंद हर चार में से तीन कैदी ऐसे हैं जिन्हें विचाराधीन कैदी के तौर पर जाना जाता हैदूसरे शब्दों में कहेंतो इन कैदियों के ऊपर जो आरोप लगे हैं उनकी सुनवाई अदालत में चल रही हैअभी तक इनके ऊपर लगे आरोप सही साबित नहीं हुए हैं|रिपोर्ट में यह जानकारी भी दी गई है कि देश के जिला जेलों में औसतन 136 प्रतिशत  की दर से कैदी रह रहे हैइसका मतलब यह है कि 100 कैदियों के रहने की जगह पर 136 कैदी रह रहे हैंफिलहालभारत के 410 जिला जेलों में 4,88,500 से ज्यादा कैदी बंद हैं| 2020 मेंजेल में बंद कैदियों में 20 हजार से ज्यादा महिलाएं थीं जिनमें से 1,427 महिलाओं के साथ उनके बच्चे भी थेमानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि भारत में विचाराधीन कैदियों की संख्या दुनिया भर के अन्य लोकतांत्रिक देशों की तुलना में काफी ज्यादा है|

  31 दिसंबर 2021 तक सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़ न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 21.03 है जो  आबादी के अनुपात  को देखते हुए  प्रति दस लाख में करीब 21 न्यायाधीश होता हैउच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 और 25 उच्च न्यायालयों में 1098 हैउच्च न्यायालयों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिकदिसंबर 2021 तक 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 898 फास्ट ट्रैक अदालतें काम कर रही हैं न्यायाधीशों की संख्या बढ़ानाउस समस्या के हल का एक पक्ष हो सकता हैजो भारत की खराब जेल व्यवस्था का एक बड़ा कारण है|जजों की संख्या कम होने से जेल में लंबित कैदियों की संख्या बढती जाती|जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है । इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2020 के आंकड़ों के मुताबिक भारत की जेलों में बंद 69 प्रतिशत कैदी विचाराधीन हैंयानी कि भारत की जेलों में बंद हर दस  में से सात  कैदी मुकदमे की सुनवाई पूरी होने के इन्तजार में है | इस समस्या के सामाजिक आर्थिक पक्ष भी हैं |देश में गरीब व्यक्ति के लिए इंसाफ की लड़ाई ज्यादा  कठिन हैजिन्हें अच्छे और महंगे वकील मिल जाते हैं उनकी जमानत आसानी से हो जाती हैबहुत मामूली से अपराधों के लिए भी गरीब लोग लम्बे समय तक जेल में सड़ने को विवश होते हैं|स्वतंत्रता के पचहतर वर्ष के  बाद भी जेलों और कैदियों की दुर्दशा पर किसी ठोस और निर्णायक कार्रवाई का इन्तजार जारी  हैजेलों में भ्रष्टाचारगैरकानूनी गतिविधियांकमजोर और गरीब कैदियों का शोषणभेदभाव और उनसे सांठगांठ और दबंग अपराधियों के लिए सुरक्षित ठिकाने की तरह इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगते रहते  हैं|

 आपराधिक मुकदमों  में ज्यादातर के पूरा होने में औसत रूप से तीन से दस साल का समय  लगता हैहालांकि दोष सिद्धि का समय मुकदमों के लिए जेल में बिताए समय  से घटा दिया जाता हैलेकिन इसकी वजह से कई निर्दोषों को बगैर किसी अपराध के जेल की सज़ा काटनी पड़ती है,पिछले दशक में विशेष अपराधों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन कर इस मुद्दे को हल करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैंजिससे सुनवाई का इंतज़ार कर रहे लंबित मामलों में कमी आएगी पर फास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन समस्या का एकमात्र हल नहीं है |इस व्यवस्था में जोर न्याय की बजाय समय पर होगा जो किसी भी दशा में  उचित नहीं माना जाएगा|दोषी पाए गए अधिकतर  कैदी बहुत गरीब हैंजेलों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपेक्षित मुद्दा हैजिनके अभाव में कई बार कैदी गंभीर रोगों का शिकार हो जाते हैं खासकर एचआईवी पोसिटिव कैदियों को  इलाज के लिए जिला अस्पतालों के भरोसे रहना पड़ता है| यह मानसिकता कि जो जेल में रहते हैं वे सुविधाओं के लायक नहीं हैं।समस्या को और गंभीर बना देती है |सुप्रीम कोर्ट ने जेल सुधारों की सिफारिश करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अमिताभ रॉय की अध्यक्षता वाली समिति देश भर की जेलों की समस्याओं को देख रही है और उनसे निपटने के उपाय सुझा रही है।मार्च की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने इस समिति को अगले छ माह में अपनी रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है |तब तक जेलों में बंद कैदियों का इन्तजार जारी रहने वाला है |

 अमर उजाला में 01/04/2022 को प्रकाशित 

Thursday, March 31, 2022

बेनकाब होता पश्चिमी मीडिया

 

साम्राज्यवाद  किसी भी रूप में इस बहुलता वाली दुनिया में स्वीकार्य नहीं है पर जब ये साम्राज्यवाद  सूचना के साथ जुड़ जाए तो स्थितियां काफी जटिल हो जाती हैं|सोशल  मीडिया  के आने से पहले दुनिया के  पास ऐसा कोई पैमाना नहीं था जिससे घटनाओं के विभिन्न आयामों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा जा सके क्योंकि जो बीत चुका था उसको रीयल टाईम में सहेजने   की कोई तकनीक हमारे समक्ष नहीं थी पर सोशल मीडिया ने दुनिया को नए सिरे से  ध्वनि चित्र और शब्दों के माध्यम से घटनाओं परिद्रश्यों को रीयल टाईम में सहेजने की सहूलियत दे दी |जिसका परिणाम यह हुआ कि आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई नेरेटिव गढ़ना उतना आसान नहीं है जितना आज से पन्द्रह  साल  पहले हुआ करता था |रूस युक्रेन  युद्ध हर मायने में  ग़लत है और इसका समर्थन कोई भी नहीं करेगालेकिन  इस मामले में ख़ुद पश्चिमी देशों का रिकार्ड भी बहुत खराब रहा है यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आक्रामक रुख़ की आलोचना निंदा  के बीच पहली बार पश्चिमी मीडिया  की नीति और निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं|हमले की कवरेज में पश्चिमी मीडिया के कथित पूर्वाग्रह की कलई अब धीरे धीरे खुल रही है  पश्चिमी मीडिया  रूस को विलेन बनाने की कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैंजबकि अभी जारी संकट में अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों की भी भूमिका है |मुख्य धारा का पश्चिमी मीडिया कुछ महत्वपूर्ण अपवादों को छोड़कर घटनाओं को सही ऐतिहासिक संदर्भ में नहीं प्रस्तुत कर  रहा है। उनके अनुसार  रूस के राष्ट्रपति  व्लादिमीर पुतिन एक "ठगतानाशाह और हत्यारे" हैं। इस संघर्ष को बाइबिल में वर्णित डेविड बनाम गोलियथ  युद्ध के आधुनिक संस्करण के रूप में चित्रित किया जा रहा है। जिसमें एक असहाय छोटे देश को एक शिकारी पड़ोसी द्वारा कुचला जा रहा है।

इन सारी घटनाओं के बीच इस तथ्य को अक्सर भुला दिया गया  है कि पश्चिमी नेताओं द्वारा रूस के पूर्व राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव को सुरक्षा गारंटी का आश्वासन दिया गया था कि उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन या नाटोकम्युनिस्ट ब्लॉक से लड़ने के लिए एक ट्रांस-अटलांटिक सैन्य गठबंधन का  विस्तार नहीं करेगा और पूर्वी ब्लॉक के देशों को  सदस्यों के रूप में ग्रहण नहीं करेगा। नाटो यूरोप में साम्यवाद के विस्तार से लड़ने के लिए एक गठबंधन था। कम्युनिस्टों की हार और पूर्व सोवियत संघ के टूटने से अब यूरोप के लिए कोई खतरा नहीं था। हालाँकिशीत युद्ध के समय की मानसिकता पूरे यूरोप में बनी रही। न तो राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और न ही उनके उत्तराधिकारी या यूरोपीय नेता इसके लिए तैयार थे।

पोलैंडहंगरी और रोमानिया जैसे सभी पूर्व कम्युनिस्ट देशों में नाटो के तेजी से विस्तार  के समाचार को बहुमत से पश्चिमी मीडिया के द्वारा छोड़ दिया गया। अमेरिका और ब्रिटिश अखबारों और चैनलों के वर्चस्व वाले अंतरराष्ट्रीय प्रेस ने कमोबेश जो बाइडेन के प्रशासन की शीत युद्ध वाली  मानसिकता को इस युद्ध में भी आगे बढाया गया  है। पश्चिमी मीडिया हमेशा चीन विरोधी से ज्यादा रूस विरोधी रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हमेशा आलोचना की जाती हैलेकिन कभी भी उस लहजे  में नहीं जैसी  व्लादिमीर पुतिन के लिए की जा रही है । दूसरा दुखद तथ्य यह है कि जमीन पर मौजूद कुछ पत्रकार अपनी स्वाभाविक नस्लवादी मानसिकता को छुपा  नहीं पाए हैं। सीमा पार से अन्य यूरोपीय देशों में भागने के लिए मजबूर यूक्रेनी नागरिकों के लिए सहानुभूति उमड़ रही है। तथ्य यह है कि यूक्रेनी शरणार्थी साथी कोकेशियान हैं|अमेरिका का एक प्रमुख चैनल  सीबीएस न्यूज जिसे  फॉक्स न्यूज की तरह दक्षिणपंथी विचारधारा का नहीं माना जाता है। यहाँ वरिष्ठ विदेशी संवाददाता चार्ली डी अगाटा ने ट्वीट किया, "अब रूसियों  के आगे बढ़ने के साथहजारों लोगों शहर से भागने की कोशिश में है। लोग छिपे हुए हैं," उन्होंने आगे कहा, "लेकिन यह पूरे सम्मान के साथ इराक या अफगानिस्तान नहीं हैजहां दशकों से संघर्ष चल रहा है। यह एक अपेक्षाकृत सभ्यअपेक्षाकृत यूरोपीय शहर है जहां आप उम्मीद नहीं करेंगे कि यह होने जा रहा है।"अगर सोशल मीडिया का जमाना न होता तो उनकी यह टिप्पणी इतनी सुर्खियाँ  न बटोरती जैसे ही उन्होंने ट्विट किया बहुत से लोग तथ्यों के साथ उन्हें आईना दिखाने लगे |

वो चाहे ईराक पर हमला हो या सीरिया पर अमेरिकी नाटो बमबारी या फिर लीबिया में हमला पश्चिमी मीडिया अपने देशों की सरकारों के निर्णयों को जायज ठहराने में ऐसे नेरेटिव गढ़ता है कि ये देश स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व के पैरोकार लगते हैं जबकि इनके देशों की सरकारों के कर्मों से लाखों बेगुनाह भी मारे जाते हैं एस्सेल समूह के स्वामित्व एवं ज़ी मीडिया नेटवर्क के चैनलों का हिस्सा विओन चैनल ने रूसी विदेश मंत्री के बयान को अपने यूट्यूब चैनल पर दिखाया तो यूट्यूब ने विओन के यूट्यूब चैनल को ब्लोक कर दिया गया |

यह सोशल मीडिया का कमाल है कि अब पश्चिमी मीडिया के दोहरे चरित्र को उजागर करने वाली सारी बातें लोगों के बीच पहुँच रही हैं और शायद यही कारण है कि अब लोगों के सामने काउंटर नेरेटिव  सामने आ रहा है |2003 में अमेरिका के ईराक पर हमले के समय सोशल मीडिया नहीं था इसलिए पश्चिमी मीडिया ने जैसा बताया वो मान लिया गया था |

युक्रेन में भारी तबाही हो रही है लेकिन उसके प्रति दया करुणा के वो भाव सारी दुनिया में देखने को नहीं मिल रहे हैं कारण सीधा है रूस का पक्ष चैनलों से पूरी तरह से गायब है और पश्चिमी मीडिया के दोहरे चरित्र के कारण अब लोगों का उन पर यकीन नहीं होता है |इनके  समानता स्वतंत्रता  और बन्धुत्व के मानक अलग अलग देशों के लिए अलग हैं और अब दुनिया के यह बात भी समझ में आने लगी है |

 दैनिक जागरण में 31/03/2022 को प्रकाशित 

Thursday, March 10, 2022

गुस्से की सही वजह हो

 


खुश रहो न यार , छोडो न यार सब चलता है , गुस्साने से क्या होगा . ये कुछ ऐसी सीख हैं जो जिंदगी के किसी न किसी मोड पर आपको जरुर मिली होगी .चलिए थोड़ी देर ये मानकर देखते हैं कि ये सब बातें सही हैं मतलब गुस्साने से कोई फायदा नहीं होता . ज्यादा गुस्सा शरीर के लिए नुकसानदायक होता है . गुस्सा क्या है? गुस्सा एक साइकोलोजिकल स्टेट ऑफ माईंड, जब हम अपने आस पास की चीजों और व्यवहार से संतुष्ट नहीं होते हैं तब गुस्सा आता है. अब जरा मेडिकल साइंस की बात कर ली जाए. गुस्सा आना आपके नोर्मल होने की निशानी है पर ज्यादा गुस्सा आना ठीक नहीं है, लेकिन अगर आपको गुस्सा आता ही नहीं है. तो ये गुस्सा आने से ज्यादा खतरनाक है. गुस्सा दबाना शरीर और दिमाग पर बुरा इफेक्ट डालता है. जिससे नींद कम हो जाती है.  गुस्से को दबाने का शरीर और मन, दोनों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। नींद नहीं आती, थकान होती है, एकाग्रता कम होती है और इन सबका परिणाम अवसाद, चिंता और अनिद्रा के रूप में सामने आ सकता है. जिनसे कई गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं पर गुस्से के कई कुछ सकारात्मक पहलू  भी है .बात न तो नयी और न ही अनोखी. हाँ बस जरा सा नजरिया बदला है .इस दुनिया में बहुत कुछ बुरा है पर जो कुछ अच्छा है या हो रहा है वो कुछ लोगों के गुस्से के कारण ही है . जो स्टेटस-को मेंटेन नहीं रखना चाहते हैं जो गलत बात के आगे झुकना नहीं चाहते हैं. आइये देखते हैं गुस्सा किस तरह दुनिया और समाज को बदल रहा है अब जरा उन दिनों को याद करिये जब आपके घर में टीवी नहीं था और आपको पड़ोसी के घर टीवी देखने जाना पड़ता था. तब कैसा लगता था  बहुत गुस्सा आता था न लेकिन आपके गुस्से ने घर वालों को एहसास कराया कि घर में टी वी की जरुरत है .आइये थोडा पीछे चलते हैं बात महात्मा गाँधी की साऊथ अफ्रीका में उन्हें इसलिए ट्रेन से उतार दिया जाता है कि वो एक हिन्दुसतानी हैं. उन्हें भी गुस्सा आया था पर इस गुस्से को व्यक्त करने का तरीका उनका थोडा अलग रहा अहिंसा  का इस्तेमाल करके उन्होंने देश को आज़ाद कराने की कोशिश की .जिसमें वो कामयाब भी रहे .अक्सर गुस्से का सम्बन्ध संतुष्टि के स्तर से जुड़ा होता है. अब अगर आप संतुष्ट हो गए तो जो चीजें हमें मिली हैं. हम उन्हें वैसे ही स्वीकार कर लेंगे फिर न विकास की कोई गुंजाईश होगी और न बदलाव की. पर इसका मतलब ये मत निकालिए कि हमें बेवजह गुस्सा करने का हक मिल गया है कई बार गुस्सा हमारी सोच के गलत होने के कारण भी आता है. जिस चीज को आप पसंद नहीं करते अगर आप वही दूसरों के साथ कर रहे हैं तो इसका मतलब आपकी सोच सही नहीं है. ऐसे में आप के द्वारा यूँ ही लोगों पर सिस्टम पर गुस्सा करना गलत है. इसलिए गुस्सा  करते वक्त अपने दिमाग को खुला रखिये अगर आपका दिमाग कह रहा है कि आप सही हैं तो बिलकुल आपको गुस्सा करने का हक है. ऐसे में अपने गुस्से को निकालिए पर हाँ सभ्यता से गुस्से में आपको कुछ भी करने या बोलने का हक नहीं मिल जाता. आपके बॉस ने आपको डाटा आप बॉस का कुछ नहीं कर पा रहे हैं तो ऑटो वाले पर अपना गुस्सा निकाल दिया. ये सही तरीका नहीं है. अपने एंगर का मैनजमेंट सही तरीके से अगर आप कर पायेंगे तो आपको लगेगा कि दुनिया को बेहतर बनाने में आपका योगदान दूसरों से कहीं ज्यादा होगा .क्या कहेंगे आप इस गुस्से के किस्से पर ..............

प्रभात खबर में 10/03/2022 को प्रकाशित 

Monday, March 7, 2022

सामरिक हथियार बनी सूचनाएं


 युक्रेन और रूस में युद्ध जारी है और सारी दुनिया की निगाहें इन दो देशों की तरफ हैं पर युद्ध सिर्फ रूस और युक्रेन के बीच में नहीं चल रहा है एक और युद्ध भी है जो चल रहा है साइबर मैदान में जिसे हम सूचना युद्ध के नाम से जानते हैं|जहाँ इंटरनेट और मीडिया कम्पनियों के सहारे छवि निर्माण की होड़ मची है |एक तरफ है अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के देश जो ये मानते है कि रूस के राष्ट्रपति पुतिन सारी दुनिया के लिए खतरा हैं |वही दूसरी तरफ रूस के राष्ट्रपति पुतिन सारी दुनिया को यह समझाने में लगे हैं कि रूस का गौरव   सर्वोपरि है | तथ्य यह भी है कि युद्ध अपने आप में खुद समस्या है और इससे किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता लेकिन जनमत निर्माण सिर्फ कुछ ओपीनियन लीडर्स के भरोसे इंटरनेट के दौर में नहीं छोड़ा जा सकता |पहले यह समझते है कि रूस ने यूक्रेन पर हमला क्यों किया साल 2014 में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था. उस वक़्त रूस समर्थित विद्रोहियों ने देश के पूर्वी हिस्से में एक अच्छे खासे इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया थाउस वक़्त से लेकर आज तक इन विद्रोहियों की यूक्रेन की सेना से भिड़ंत लगातार जारी हैदोनों देशों के बीच टकराव टालने के लिए मिन्स्क का शांति समझौता भी हुआलेकिन उसके बाद भी टकराव ख़त्म नहीं हुआ|पुतिन का मानना  है कि इसी वजह से वो सेना को यूक्रेन में हमला करने  को मजबूर हैदूसरी  संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने रूस द्वारा यूक्रेन के अलगाववादी राज्यों में 'शांति कायमकरने के उद्देश्य से सेना भेजने के तर्क को सिरे से खारिज किया है|

फरवरी के आख़िरी हफ्ते में ट्विटर ने बताया कि रूस में इसकी वेबसाइट को प्रतिबंधित किया जा रहा है। ट्विटर ने ट्वीट कर बताया, 'हम इस बात से अवगत हैं कि रूस में कुछ लोगों के ट्विटर अकाउंट को बंद किया जा रहा है ओर हम सर्विस को सबकी पहुंच के दायरे में रखने व इसे सुरक्षित रखने के लिए काम कर रहे हैं। इससे पहले फेसबुक ने रूस की स्थानीय मीडिया पर यूक्रेन में इसके सैन्य कार्रवाई पर विज्ञापन चलाने को लेकर रोक लगाई थी।  इसके जवाब में रूस ने फेसबुक के इस्तेमाल पर पाबंदीलगा दी । दरअसल यूक्रेन में रूसी सैन्य कार्रवाई के बाद फेसबुक ने रूस समर्थित मीडिया संस्थानों के विभिन्न अकाउंट पर रोक लगा दी थी। रूस की सरकारी संचार एजेंसी 'रोसकोमनादजोरने फेसबुक पर ‘रूसी नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता’ के उल्लंघन का आरोप लगाया।वहीं गूगल ने रशिया टुडे और स्पुतनिक के यूट्यूब चैनल को ब्लॉक कर दिया है। इससे पहले मेटा(फेसबुक ) ने भी पूरे यूरोपीय संघ में रूसी राज्य मीडिया आउटलेट आरटी और स्पुतनिक को ब्लॉक किया है।इस सारे घटनाक्रम में कुछ मुद्दे विचारणीय है जब कोई दो देश युद्ध कर रहे हैं तो सूचनाओं में इंटरनेट का एल्गोरिदम महत्वपूर्ण  हो जाता है|2018 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में फर्जी जनमत निर्माण में कई सोशल मीडिया कम्पनियों की भूमिका पर सवाल उठे थे |किसी युद्ध में हम जब किसी देश के बारे में राय बनाते हैं |उसमें मीडिया की बड़ी भूमिका होती खासकर इंटरनेट की |ज़रा याद कीजिये |2003 में अमेरिकी नेत्रत्व में गठबंधन देशों की सेनाओं ने ईराक पर कुछ इसी तरह से हमला किया था जैसा आज रूस ने यूक्रेन में किया हैऐसा ही तर्क अमेरिकी सेना ने ईराक हमले के वक्त दिया था |इराक में जन तबाही करने वाले हथियारों के ज़खीरे को लेकर जो भी फैसले लिए गए और इन्हें जिस तरह से पेश किया उसे किसी भी तरह से तर्कसंगत और न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है|बाद के घटनाक्रम ने इस तथ्य को सिद्ध ही किया कि ईराक पर हमला एक गठबंधन देशों की भूल थी |तब सोशल मीडिया का जन्म नहीं हुआ था और सूचना का मुक्त प्रवाह पश्चिमी चश्मे से ही देखा जाता था और सद्दाम हुसैन का पक्ष दुनिया के सामने वही आया जो पश्चिमी मीडिया ने दिखाया|इंटरनेट ने खेल भले ही पलट दिया हो लेकिन यहाँ फिर एल्गोरिद्म महत्वपूर्ण हो उठता है | अमेरिका का इतिहास बताता है कि वो ऐसी नीतियां बनाता है जो उसके व्यवसायिक हितों की पूर्ति करे और ऐसी संस्थाओं का संरक्षण करता है जो उसके हित लाभ के साधन में मदद करे |तस्वीर का एक रुख विकिलीक्स से जुड़ा है|बात भले छोटी हो पर इसके निहितार्थ बड़े हैंविकिलीक्स का जन्म ही इंटरनेट की ताकत और विस्तार के कारण हुआ और इस पर सबसे बड़ी चोट अमेरिका ही ने पहुंचाई |विकिलीक्स के द्वारा जारी किये गए सैकड़ों गोपनीय कूटनीतिक संदेशो से सारी दुनिया अमेरिका के दोहरे रवैये को जान गयी वहीं इस खुलासे से वेब पत्रकारिता को नया आयाम मिला आमतौर पर समाचार पोर्टल टीवी और अखबार की सामग्री से ख़बरें बनाते थे पर मानव सभ्यता के इतिहास में पहली बार वेब से आयी सामग्री टीवी और अख़बारों की ख़बरों का आधार बनीरूस यूक्रेन युद्ध  को रोकने की दिशा में अमेरिकाजर्मनीब्रिटेन समेत तमाम देश  रूस और उसके सहयोगियों पर आर्थिक प्रतिबंध लगा रहे हैं और उसी के साथ जनमत बनाने का खेल भी चल रहा है | कूटनीति में कोई भी फैसले दो दूनी चार नहीं होते और कोई भी पक्ष पूरी तरह से दोषी या निर्दोष नहीं होता है |यह साल 2003 नहीं जब दुनिया के कुछ ताकतवर राष्ट्र एक अनाम रिपोर्ट पर एक देश को युद्ध में झोंक देते हैं |

पश्चिमी मीडिया के इस नजरिये का शिकार भारत भी रहा है |साल 2012 में असम में हुई समस्या और भारत के कई शहरो से उत्तर पूर्व के निवासियों का पलायन हुआ | सरकार ने इसके लिए इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर फ़ैली अफवाहों और भडकाऊ तस्वीरों को दोषी माना और कार्यवाही करते हुए 245 वेबसाइट-वेब पन्नों को ब्लॉक कर दिया गया|आश्चर्यजनक रूप से तेजी दिखाते हुए सरकार के इस  फैसले के बाद अमरीकी विदेश मंत्रालय की तत्कालीन प्रवक्ता विक्टोरिया नूलैंड ने बयान दिया  कि अमरीका इंटरनेट की आजादी के पक्ष में हैभारत  सरकार से निवेदन किया कि वो मूलभूत अधिकारोंकानून और मानवाधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जारी रखे|

भारत को मानवाधिकार और इंटरनेट की आजादी का पाठ पढाने वाले इस बयान को जरा इन आंकड़ों के संदर्भ में पढ़ें तो एक बार फिर अमेरिका का व्यवसायिक नजरिया स्पष्ट हो जाएगा | सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था विकास केंद्रित हुई है|  आर्थिक विकास की गति को बढ़ाने में इन्टरनेट की भूमिका में  अमेरिका के व्यवसायिक हित सम्मिलित हैं ,इंटरनेट के अस्तित्व में आने से इस पर हमेशा अमेरिकी सरकारकंपनियोंऔर प्रयोगकर्ताओं  का अधिपत्य  रहा है लेकिन अब इसमें तेजी से बदलाव आ रहा है जिसका केंद्र भारत और ब्राजील जैसे देश शामिल हैंजहाँ इंटरनेट तेजी से फल फूल रहा है जिसमे बड़ी भूमिका फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवकिंग साईट्स निभा रही है |सोशल नेटवर्किंग साईट्स के प्रभाव का आंकलन करते वक्त हम इसके व्यवसायिक पक्ष को  दरकिनार नहीं कर सकते |जो अमेरिका की अर्थव्यवस्था में अपना अहम योगदान दे रही हैं क्योंकि सभी बड़ी सफल सोशल नेटवर्किंग साईट्स का उद्गम अमेरिका ही है फेसबुक का मतलब महज सोशल नेटवर्किंग नहीं है बल्कि  ये विज्ञापन ,मीडिया और नए रोजगार के निर्माण से भी सम्बन्धित है | फेसबुक को अन्य देशों की क्षेत्रीय सोशल नेटवर्किंग साइट जैसे दक्षिण कोरिया में सिवर्ल्डजापान की मिक्सीरूस में वोकांते से कड़ी टक्कर  मिल रही सूचना क्रांति ने लोगों के  मूलभूत अधिकारों,और मानवाधिकारों को एक बड़े बाजार में तब्दील कर दिया है|यह भी सूचना क्रांति का एक पक्ष है |

 दैनिक जागरण में 07/03/2022 को प्रकाशित 

Wednesday, February 9, 2022

जाड़ों का मौसम और यादों का पिटारा


 बहुत ठण्ड है. ऐसे मौसम को आप भी एन्जॉय कर रहे होंगे.सारी दुनिया में ठण्ड की चर्चा है,कोहरा,धुंध और ढेर सारी ठण्ड.यूँ तो ऐसे भी जाड़े का मौसम बहुत खास होता है खाने पीने से लेकर पहनने और घूमने का असली लुत्फ़ तो जाड़े में ही आता है. दिन छोटे और रातें बड़ी हों तो कहने ही क्या.      जाड़े का हमारे जीवन से और गहरा  रिश्ता है.जी हाँ वो रिश्ता है यादों का,यूँ तो यादों का कोई मौसम नहीं होता पर जाड़े के मौसम में जब माहौल सर्दी का हो तो यादें जी उठती हैं. साउथ हैम्पटन विश्वविद्यालय द्वारा कराई गई रिसर्च के अनुसार  दिल को गर्माहट देने वाली यादें हमें ठंड सहने की क्षमता देती हैं और हम शारीरिक रूप से गर्म महसूस करते हैं.अब समझे आप कि जाड़ा दूसरे मौसम से क्यूँ अलग है.वैसे भी आजकल की फास्ट लाईफ में किसी के पास इतनी फुर्सत कहाँ है कि थोडा थम कर सुस्ताया जाए और जिंदगी का लुत्फ़ लिया जाए .

लेकिन  जाड़े का ये मौसम हमें  रुक कर  सोचने के लिए  मजबूर कर ही देता है.वैसे भी यादों के बगैर जीवन का कोई मतलब ही नहीं होगा.इंसान एक सोशल एनीमल है जो बगैर रिश्ते बनाये रह ही नहीं सकता और जब रिश्ते बनेंगे तो यादें भी होंगी. रिश्ते नाम के लिए नहीं बनाये जाते बल्कि एहसास  के लिए बनाये जाते हैं वो एहसास ही तो है जो किसी आम से रिश्ते को ख़ास बना देता है. क्या आप किसी ऐसे शख्स को जानते हैं जिसके पास यादों का कोई खज़ाना न हो.सोचिये जरा कि जाड़े की सुबह,दोपहर और शाम से हम सबकी कितनी सुहानी यादें जुडी हैं. वो कोहरे में डूबी अलसाई सुबह हो जब बिस्तर छोड़ने का मन नहीं करता, या गुनगुनी धूप में नहाई दोपहर जिसकी याद अभी तक आपके दिल में ताज़ा है, या फिर वो सुहानी शाम जब आप पहली बार किसी से मिले थे.मौसम में भले ही ठंडक थी पर दिल किसी के साथ के एहसास से दहक रहे थे.

आपकी यादें भले ही मेरी यादों से अलग हों पर उनका एहसास सबको एक सा ही होता है. बीता वक्त तो अब लौट कर नहीं आ पायेगा पर बीती यादों को वो एहसास हमें अपने आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करेगा.कोई कितना भी अकेला क्यूँ हो न पर उसके साथ हमेशा कुछ बीती यादें जरुर होती हैं. तो अगली बार फीलिंग लोनली का स्टेटस अपडेट करने से पहले जरा एक बार सोचियेगा क्या वाकई आप अकेले हैं? आपके साथ कितनी यादें हैं उनमें से कुछ मीठी यादों को अपने आप से ही चुरा लीजिए और आँखें बंद कर खो जाइए अपनी दुनिया में. विश्वास जानिये ये पल जिंदगी को बेहतर बनाने का हौसला देंगे और इन सब के लिए जाड़े के मौसम से भला और कुछ क्या हो सकता है. लोग घरों में बंद हों सड़कें वीरान सब तरफ सन्नाटा आप हों और आप की तन्हाई.

वैसे भी बहुत दिन हुए जब आपने किसी याद को जी भर के नहीं जीया तो इस जाड़े को जीने के लिए किसी पुरानी याद को फिर से जीया जाए क्यूंकि ये जाड़ा भी हर जाड़े की तरह चला जाएगा आपको हर बार की तरह एक नयी याद देकर. पर जाड़े की इन यादों से अपने तन मन को गरम रखियेगा क्यूंकि गर्मियां आते ही आपको जाड़े की याद आनी शुरू हो जायेगीतो इससे पहले ये सर्दियाँ आपकी यादों के एल्बम का हिस्सा बन जाएँ इनको जी लीजिए.

 प्रभात खबर में 09/02/2022 को प्रकाशित 

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