Thursday, February 3, 2011

सुर्ख़ियों का चलन


मीडिया यूँ तो हमेशा दूसरों की खबरों को हमारे सामने लाता है पर हाल के दिनों में एक नए तरीके का चलन शुरू हुआ वह है मीडिया पर मीडिया बात को थोडा आसान करते हैं|पिछला दशक मीडिया के विस्तार का दशक रहा है और इस विस्तार का असर मीडिया के विभिन्न माध्यमों में भी दिखता है अखबार जहाँ इस विषय पर नियमित लेख छाप रहे हैं कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया में क्या दिखाया जा रहा है वहीं इलेक्ट्रोनिक मीडिया अखबारों की सुर्ख़ियों पर ध्यान डे रहा है और इस चलन से हिंदी फ़िल्में भी अछूती नहीं रहीं.आमतौर पर हमारी फिल्मों के कथानक में मीडिया की कोई भूमिका नहीं रहा करती थी  पर अब  यह स्थिति बदली है खबरों में मनोरंजन कहें या मनोरजन में ख़बरें पिछले एक दशक में इनके बीच की सीमा रेखा और पतली हुई है एक तरफ फिल्मों में समाचार पत्र और चैनलों को ध्यान में रखकर फ़िल्में बनीं तो वहीं दूसरी और समाचार चैनलों व समाचार पत्रों में मनोरंजन की दुनिया की खबरों की भरमार हुई .इसी साल प्रदर्शित हुई फिल्म नो वन किल्ड जेसिका एक ऐसी ही फिल्म है जिसका विषय मीडिया से जुड़ा हुआ है मीडिया एक्टि विसम से ही जेसिका के हत्यारों को सजा हुई.
पिछले साल आयी  फिल्म रण का पूरा कथानक भारतीय इलेक्ट्रोनिक मीडिया के इर्द गिर्द घूमता है शायद इसके पीछे यही कारण हो कि अब टेलीविजन लगातार चलता रहता है वो वक्त अब इतिहास हो चुका है जब टेलीविजन देखने का एक वक्त हुआ करता था और इस फैलाव का असर पूरी दुनिया पर हो रहा है इस फिल्म में पहली बार समाचारों के  परदे के पीछे की सच्चाइयों से दर्शकों को रुबरु कराया गया यानि खबरों  की दुनिया में किस तरह काम होता है और हर खबर को दिखाने के पीछे एक मकसद होता है अपने आप में मीडिया के प्रति काफी  आलोचनात्मक  रही ये फिल्म ने एक नयी बहस को जनम दिया इसके बाद आयी फिल्म पीपली लाइव ने एक संवेदनशील विषय को उठाया ही नहीं बल्कि उसका प्रस्तुतीकरण भी जोरदार था किसान की समस्याओं के बहाने इस फिल्म ने स्ट्रिंगरों की खराब हालत का जिक्र किया और दिखाया कि वो कैसे बड़े पत्रकारों के शोषण का शिकार होते हैं इसी कड़ी में २००७ में प्रदर्शित हुई फिल्म शोबिज़ का नाम भी महत्व पूर्ण है जिसमे टी वी चैनल टी आर पी प्राप्त करने के लिए किस तरह के हथकंडे अपनाते हैं इस बात को फिल्म का कथानक बनाया गया था हालांकि फिल्म बहुत सफल नहीं रही थी . ये बात तो थी इलेक्ट्रोनिक मीडिया की पर भारत में पहली बार किसी फिल्म में प्रिंट मीडिया की ताकत को जिस फिल्म में दिखाया गया था उसका नाम है न्यू दिल्ली टाईम्स अपने समय की विवादस्पद फिल्म में भ्रष्ट राजनीतिज्ञों और पत्रकारों के गठजोड़ को एक संपादक तोड़ता है जिसकी उसे काफी कीमत चुकानी पड़ती है १९८६ में प्रदर्शित हुई इस फिल्म को तीन राष्ट्रीय पुरूस्कार मिले थे चूँकि उस वक्त प्रिंट मीडिया का ही बोलबाला था इसलिए पहली बार समाचार पत्र को किसी फिल्म के कथानक का आधार बनाया गया था .
१९८९ में अमिताभ बच्चन् की बहुचर्चित फिल्म मैं आज़ाद हूँ भी ऐसी ही फिल्मों की श्रेणी में आती है जिसमे अपनी खबर के लिए एक पत्रकार गाँव के एक भोले भाले व्यक्ति को आत्म हत्या करने के लिए मजबूर किया जाता है  पर आलोचकों की नज़र में मीडिया के विषय को ध्यान में रखकर फ़िल्में बनाना सराहा गया वहीं  समाचार चैनलों पर फ़िल्में और उससे जुडे समाचारों पर हाय तौबा मच जाती है यहाँ हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि खबर और मनोरंजन के बीच मुख्या विभाजन क्या है असल में फ़िल्में भले ही वास्तविकता के कितने करीब हों पर उन्हें फंतासी ही माना जाता है वहीं समाचारों के साथ प्रामाणिकता जुडी होती है जैसे जैसे दुनिया बदली मीडिया भी लोगों की प्राथमिकता में आ गया और एक नए तरह के सूचना समाज का निर्माण हुआ ये फिल्म कुछ बानगी है जो ये बताती हैं कि एक तरफ हमारा फिल्म मीडिया कितना सजग है जो समाज में हो रही है हर छोटी बड़ी घटना  पर पैनी नज़र रखता है.
आई नेक्स्ट में ३ फरवरी २०११ को प्रकाशित 

12 comments:

Saumitra verma said...

sir bahut accha lekh hai no qone killed jessica media ke paksh me bani vakai ek acchi film hai

डॉ. मनोज मिश्र said...

सटीक चिंतन,आभार.

Marziya Jafar said...

raised

Marziya Jafar said...

very nice article ... sir... you have raised facts of media in this article...

आग़ाज़.....नयी कलम से... said...

badhiya sirji.....

VIKAS KUMAR said...

aaj ki e. media ke sachai ran movie me dikhayi gai hai,lekinkisi bhi mudde ka sirf ek hi pach dikhana jayaj nahi hai. jb bhi hm media ka vishlesadn karte hai tb uske negative point ko hi dekhte hai, jabki media sirf ndtv ya india tv nahi hai.

virendra kumar veer said...

jis tarah se media aage ja raha hai uski sachai dikhai gaye hai. aur media ko ye samjhna cahiye. filme samaj ka aina hoti hai. kisi bhi film me kisi ee pach ko dikhan sahi nahi hai usse negativ aur positive doni dekhya jana cahiye.

AAGAZ.. said...

आज मीडिया एक ऐसा फील्ड बन गया है जहाँ हर कोई अपनी किस्मत आजमाना चाहता है.. इसलिए , फिल्मो के निर्माता, निर्देशक भी मीडिया की चमक से अछूते नहीं रहे हैं.. और देखा जाये तो ठीक ही है कि मीडिया और फिल्मो का सम्मिश्रण जनता को मनोरंजन और जानकारी, दोनों के मामले में फायदा पहुंचा रहा है.

CHANDNI GULATI said...

Very nice write up sir,yahan tak ki MY NAME IS KHAN aur NO ONE KILLED JESSICA si filmon mein bhi MEDIA ne apne responsible hone ka proof diya..........

ARUSHIVERMA said...

nice article.

sana said...

sir jis tarah ajkl ki hmari normal life me media itna havi ho chuka h usi vajah se films b isse achuti nai h chahe wo page 3 ho ya no one killed jessica......sab media ki popularity ko bhunane me lage hai

Suraj Verma said...

मीडिया हमारी फिल्मो मे छा सी गई है,यही वजह है कि बॉलीवुड में मीडिया को महत्व दिया जाने लगा है, और इसी का असर है कि पिपली लाइव जैसी फिल्में बनने लगी है जो मीडिया को दिखाती है । मीडिया को स्वतंत्र होना चाहिए,न की किसी के आधीन । खासकर आज के इस समय में मीडिया का एक अहम् रोल हो गया है हमारी लाइफ में ।

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