Wednesday, February 9, 2011

दुल्हन

कुछ सहमी कुछ सकुचाई
जब तुम बैठी हो शरमाई
जब ह्रदय में तुम्हारे हो स्पंदन
अंग अंग में हो प्रीत का गुंजन
जब सांस में तुम्हारी हो गरमाहट
मन में भी जब हो अकुलाहट
नयन करे जब नयनों से बातें
जगते जगते  कटती हो रातें

मन में जब कोई प्यास जगी हो
आने की किसी की आस लगी हो
यूँ ही जब तुम मुस्काती हो
अपने से ही जब तुम शरमाती हो


तब प्रीत की डोली लेकर
मैं द्वार तुम्हारे आऊंगा
अपने अरमानों के वरमाला से
दुल्हन तुम्हें बनाऊंगा 

13 comments:

Rohit, we the people of India.............. said...

unda..........

डॉ. मनोज मिश्र said...

यह भी अच्छी रचना.

Dr. Mukul Srivastava said...

@रोहित जी मनोज जी शुक्रिया आपका

archit pandit said...

काश कोई हमारे लिए होती
जो कुछ सहमी होती
जिसकी सांसो में गर्माहट होती
जिसकी पलके झुकी होती
जो हलके से मुस्कुराती फिर शर्माती
और वरमाला लेकर आती
मै उसके नैनो से घायल होता
उसमे ऐसी अदा होती
काश कोई हमारे लिए होती

virendra kumar veer said...

kash koi kare humra bhi iantjar,
karenge hum unko itna pyar,
duniya ko teri ankhi se dekhenge,
teri har muskurahat par jindagi luta denge,
dil me jo tere ane ki aass lagi hai,
tujhe lene ke liye pyarki doli leke aunga, aur tujhe apni dulhan banaunge.

AAGAZ.. said...

as always.... a very nice poem of yours..

CHANDNI GULATI said...

well written

archana chaturvedi said...

Dhulhan ka itna jivaant chitrad bhut hi unda

ARUSHIVERMA said...

awesome lines.

sana said...

really awesome

samra said...

dulhan ki man ki bhavnaye ache se darshayi hai aapne sir..:)

chetna gupta said...

this is nice sir...
i think you can explain it more sir..

yashaswi mathur said...

मैं दुल्हन के लिबाज़ में सपने बहुत सजाती हूँ,
अपनों का संग छोड़ तुम्हारी ओर आती हूँ।
हो सार्थक यूँ मेरा अबके बरस जाना,
लिए सम्मान की वरमाला तुम सामने आ जाना।

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