Friday, October 14, 2022

दीपावली का रात कनेक्शन

 


दीपावली आ रही है पर मैं आप को याद क्यूँ दिला रहा हूँ,आप की समझदारी पर मुझे हमेशा भरोसा रहा है.हम तो आपको कुछ और याद दिला रहे हैं अच्छा ये तो आप सब जानते हैं कि दीपावली रात का त्यौहार है पर जरा गौर करिये हम जब दीपावली के बारे में किसी से पूछते हैं तो क्या कहते हैं अरे दीपावली किस दिन है. कहानी में यहीं ट्विस्ट है जब रात का त्यौहार है तो दिन की बात क्यूँ ? तो दीपावली के बहाने ही सही  मैंने जरा सा रात के बारे में सोचा तो न जाने क्या क्या याद आया, वैसे याद से कुछ आपको याद आया क्या ?भाई याद का सीधा कनेक्शन रात से है.जब आप मन से अकेले होते हैं तो कितना कुछ याद आता है. रात के सन्नाटे में मन के किसी कोने से कितनी यादें निकल पड़ती हैं. रात अपने आप में एक फीलिंग है सुबह का इंतज़ार करते हुए रात काटना और बात है लेकिन रात को जीते हुए रात काटना बिल्कुल अलग मामला  है.

 हमारे जीवन में रात और दिन की समान जगह  है पर जब भी हम जीवन  की बात करते हैं तो बात सिर्फ दिन की होती है. बात समझे दिन इसलिए दिन है क्योंकि रात है. मैं बात को थोडा और सिंपल करता हूँ जब हम काले रंग के बारे में जानेगे तभी तो ये जान पायेंगे कि कौन कितना गोरा है.यानि इस जीवन में सबकी अपनी अपनी उपयोगिता  है और कोई भी बेकार  नहीं है.मैंने कहीं पढ़ा था बुराई कि सबसे बड़ी अच्छाई ये है कि वो बुराई है तो अगर कोई आगे बढ़ रहा है और आप उस जगह नहीं पहुँच पा रहें तो फ्रस्टेट न हों,अपने आप को पहचाने हो सकता हो आप उस काम के लिए बने न हों और वो काम करें जिसके लिए आप बने हों.जैसे रात, दिन नहीं हो सकती और दिन, रात नहीं. भाई इस फेस्टिव सीजन में मैं अपनी बात को फेस्टिवल के थ्रू ही कहूँगा तब शायद आप मुझे समझें तो मामला यूँ है कि आप होली में  पटाखे छुडाएं तो लोग आपको क्या कहेंगे?

 कोई भी काम शुरू करते जोश के साथ होश का भी इस्तेमाल करें महज इसलिए कि आजकल इसका बड़ा क्रेज है ,इसमें पैसा बहुत है जैसी बातों को ध्यान में रखकर कोई काम मत शुरू कर दीजिए. जिस तरह सारे दिन एक जैसे नहीं होते हैं और उसी तरह से सारी रातें भी एक जैसी नहीं होती हैं. किसी रात आप अपने किसी अज़ीज़ दोस्त की पार्टी में नाच गा रहे होतें तो किसी रात आप बिस्तर पर स्ट्रेस के कारण जगते हुए काट देते हैं और किसी रात आप ऐसा खूबसूरत सपना देखते हैं कि सुबह होने ही नहीं देना चाहते हैं.सबसे इम्पोर्टेंट हमारी जिंदगी में बहुत सारे ऐसे लोग है जिनका हमारी सफलता में योगदान होता है तो उनको भी नहीं भूलना चाहिए याद है न रात है तभी तो दिन है,तो दीपावली आपने हर साल मनाई होगी इस साल दीपावली की रात अपने उन दोस्तों के साथ मनाई जाए जो आपकी खुशी के लिए कुछ भी कर सकते हैं. अब तो आप मान ही लीजिए कि दीपावली तभी तक प्रकाश का त्यौहार है जब तक इस धरती पर अँधेरा है क्यूंकि कोई दिन में कोई पटाखे नहीं फोड़ता. तो कैसा लगा आपको दीपावली का रात कनेक्शन .

प्रभात खबर में 14/10/2022 को प्रकाशित 

Wednesday, June 29, 2022

खाने और गाने का कनेक्शन


 बचपने में सुनी एक कहावत भूख लगे तो खाना खाओ और डर लगे तो गाना गाओ अब ये कहाँ तक सही है. ये तो पता नहीं पर खाने और गाने का भी कोई सम्बन्ध हो सकता है भला. आइये जरा आज इस पर नज़र डालते हैं कि फ़िल्मी गाने इस सम्बन्ध को कैसे देखते हैं . तो भला इतना महत्वपूर्ण हिस्सा गानों से कैसे छूटा रह सकता था. वैसे वक्त के साथ साथ हमारे गाने और खाने के तरीके बदले हैं  . वैसे भी स्वस्थ खाओ तन मन जगाओ की बात कोई नयी नहीं है. इसी लिए ये गाना कहता है दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ (संत ज्ञानेश्वर ).  खाने में कुछ भी मिले मन से खाइए और अगर खिलाने  वाला कोई अपना साथी हो तो क्या कहने "रुखी सूखी रोटी तेरे हांथों  की खा के आया मज़ा बड़ा" (नायक ). वैसे भी खाने से पहले अगर नाश्ते की बात कर ली जाए तो कैसा रहेगा. डॉक्टर भी कहते हैं खाली पेट नहीं रहना चाहिए तो चने के बारे में क्या ख्याल है चना जोर गरम बाबू मैं  लाया मजेदार (क्रांति ) .खाना अगर अपनी मेहनत का मिले तो उसका क्या कहना क्योंकि "खून पसीने की जो मिलेगी तो खायेंगे नहीं तो यारों हम भूखे ही सो जायेंगे" (खून पसीना ).  नमक अगर खाने में न हो तो खाना बेस्वाद होता है. वैसे ही जिन्दगी में अगर उतार चढाव न हो तो ऐसी जिन्दगी का क्या मतलब. पर अति किसी चीज़ की अच्छी नहीं होती तो क्यों न थोडा सी  मिर्च खा ली जाए "उफ़ ये मिर्ची है ये मिर्ची "(बीवी न. वन )पर कभी ऐसा भी होता है कि हम घर पर नहीं होते हैं या किसी काम से बाहर का खाना खाना पड़ता है. जिसे हम स्ट्रीट फ़ूड कहते हैं "मैं तो रस्ते से जा रहा था मैं तो भेल पूड़ी खा रहा था(कुली  न. वन ) ". खाइए जरूर खाइए रोज रोज एक सा खाना भी मज़ा नहीं देता है तो इसका भी लुत्फ़ उठाइए, पर स्वास्थ्य  और सफाई   की कीमत पर नहीं अगर खाना साफ़ सुथरा है तो किसी को भी मिर्ची लगे. आप परवाह मत कीजिये .  खाना तभी आपके लिए बेहतर होगा  जब उसमे पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक तत्व   होंगे. इसके जरुरी है कि खाने में फल और कुछ जरुरी चीजों की सही मात्रा हो. फल में तो गीतकारों का सबसे प्रिय फल है “अंगूर”. ये गाना जिन्दगी और खाने के फलसफे को कितनी खूबसूरती से बयां कर रहा है "ये जीना है अंगूर का दाना कुछ पक्का है कुछ कच्चा है. ध्यान दीजियेगा अधपका खाना आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं है. खाना कुछ भी खाएं पर ठीक से पका कर खाएं .  हिन्दुस्तानी खाना बिना मिठाई के पूरा नहीं होता तो कुछ मीठा हो जाये ये अलग बात है कि इस बदलते वक्त में मीठे के प्रकार बदले है पर उनकी मिठास नहीं बदली है मिठाईयों की जगह चोकलेट और आईस क्रीम ने ले ली है तभी तो   “चोकलेट आइस क्रीम लाइम जूस और टोफियाँ पहले जैसे मेरे शौक अब हैं कहाँ” (हम आपके हैं कौन ).जी हाँ शौक तो बदलते रहते हैं वो चाहे गाने के हों या खाने के पर चलते चलते खाने के बाद अगर पान की बात न की जाए तो लगता है खाना पूरा नहीं हुआ तो “खायके पान बनारस वाला खुल जाए बंद अक्ल का ताला “(डान)

गर्मी के इस मौसम में डिफ्रेन्ट स्वाद के खानों का तड़का लगाते रहिये और जीते रहिये 

प्रभात खबर में 29/06/2022 को प्रकाशित 

Friday, May 27, 2022

स्वरोजगार की दिशा

   स्व रोजगार ये शब्द वर्ष 2020 के बाद से अचानक बहुत से ऐसे लोगों की जुबां आ गया है जो कभी किसी निश्चित आय और नौकरी के साथ जिदंगी गुजर बसर कर रहे थे।इन्वेस्टोपीडिया वेबसाइट के मुताबिक स्व रोजगार से जुड़ा व्यक्ति किसी नियोक्ता और निश्चित सैलरी के लिये कार्य नहीं कर रहा होता है। स्व रोजगार से जुड़ा व्यक्ति खुद ही अपनी विशेष स्किल के लिये जरिये अपनी आय जुटाता है। अब सवाल उठता है कि स्वरोजगार क्या होता है और किसे स्वरोजगार माने और किसे न मानें।सवाल उठ रहा है तो मतलब जवाब भी आपके आस पास ही होगा। स्वरोजगार से जुड़े व्यक्ति शैक्षिक और गैर ​शैक्षिक वर्ग दोनों से हो सकते हैं। मसलन अगर कोई व्यक्ति ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं, फिर भी वो अपनी सब्जी की दुकान के ​जरिये अपनी आजीविका चला रहा है और वहीं एक पढ़ा लिखा व्यक्ति जिसने ग्राफिक डिजाइनिंग में महारत हासिल है, वो अपनी स्क्लि के जरिये खुद का अपना काम करके या फ्रीलासिंग के जरिये अपनी आजीविका चला रहा है।


स्वरोजगार करने वालों में चाय वाले, किराना स्टोर, टैक्सी ड्राइवर ओला और उबर, रेहड़ी पटरी पर दुकान लगाने वाले, फूड कियोस्क, प्लंबर, इलेक्ट्रशियिन, इंश्योरेंस एजेंट, वित्तीय सलाहकार, वकील समेत विभिन्न क्षेत्रों के लोग जुड़े हुये हैं जो खुद ही अपनी आय का इंतजाम करते हैं।एक समय था जब जॉब मार्केट में इतनी ज्यादा प्रतियोगिता नहीं थी। लोग कम थे और नौ​करियों के अवसर ज्यादा थे। पर कोविड 19 महामारी के दौर ने एक बार फिर से सबको सिखा दिया है कि खुद के द्वारा शुरू किये कार्य और उससे मिलने वाली आजीविका की बात ही कुछ और है।कोविड 19 महामारी के दौर में आप सबको अपने घर के पास खुली जनरल मर्चेंट की दुकानों की महत्ता तो पता ही चल चुकी होगी, जब सब कुछ बंद था तो इन छोटी—छोटी लाखों दुकानों ने ही करोड़ों लोगों को समय से दैनिक जीवन में उपयोग आने वाली चीजें मुहैया कराई थीं।

क्या आपको पता है कि इन देश में कितने ड्राइवर हैं जो अपनी स्किल के बदौलत अपनी आजीविका चला रहे हैं?

आईटीआई, पॉलीटेक्निक, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, स्किल इंडिया जैसी योजनाएं और कार्यक्रम अब प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में रोजगार दिलाने का कार्य कर रहे हैं। इन कार्यक्रमों में अपनी मनपसंद ट्रेड चुनकर एक तरफ युवा खुद को जॉब मार्केट के लिये तैयार कर रहा है। वहीं बेहतर स्किल पाकर खुद का कार्य भी शुरू कर रहा है।   रेहड़ी-पटरी वालों को आत्मनिर्भर बनाने की पहल करते हुये आर्थिक मदद के लिए 2 जुलाई 2020 को प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि योजना को पेश किया गया। पीएम स्वनिधि योजना के तहत इसकी शुरुआत से लेकर अब तक 34 लाख से अधिक रेहड़ी-पटरी वालों को 3,628 करोड़ रुपये का कर्ज मंजूर किया जा चुका है। प्रधानमंत्री स्वनिधि स्कीम को आवास व शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा आत्मनिर्भर भारत अभियान के हिस्से के रूप में लॉन्च किया गया है। योजना के तहत रेहड़ी-पटरी या खोमचे वाले पहली बार में 10,000 रुपये तक का कर्ज प्राप्त कर सकते हैं।उपरोक्त आंकड़े बताते हैं कि इतने कम समय में ​34 लाख लोगों ने रेहड़ी पटरी पर खुद का कार्य शुरू या​ फिर शुूरू किये गये कार्य को आगे बढ़ाने के लिये 10,000 रूपये को लोन लिया। सीधे तौर पर इन 34 लाख लोगों के परिवार भी अपने जीविकोपार्जन के लिये इस कार्य पर ही निर्भर होंगे।

मैला ढोने वाले स्वच्छकारों के पुनर्वास के लिए स्वरोजगार योजना सरकारी क्षेत्र के बैंकों के लिए लागू है। इस योजना के तहत मैला ढोने वाले लोगों को मुख्यधारा में लाना है जिससे समाज में वो एक बेहतर जिंदगी जी सके और इज्जत के साथ अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर सकें।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत नारे का मकसद भी यही है कि रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत जरूरतों के अलावा भी लोगों की सबसे बड़ी जरूरत रोजगार को भी पूरा किया जा सके। इसी बात को ध्यान में रखते हुए वर्तमान में केंद्र सरकार ‘प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम’ जैसी योजना चला रही है।‘प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम’ जहां एक ओर देश के युवाओं को रोजगार मुहैया करा रहा है तो वहीं दूसरी ओर कोविड संकट और लॉकडाउन के बाद सुस्त पड़ चुके तमाम कार्यक्षेत्रों को फिर से नई गति भी प्रदान कर रहा है।

खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) ने वित्त वर्ष 2021-22 में पीएमईजीपी के तहत अब तक के सबसे अधिक रोजगारों का सृजन करके पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं। आयोग ने वित्त वर्ष 2021-22 में प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत 8.25 लाख का अब तक का सबसे अधिक रोजगार सृजन दर्ज किया है। इसके साथ ही आयोग ने अभूतपूर्व रूप से 1.03 लाख नई विनिर्माण और सेवा इकाइयों की भी स्थापना की।पीएमईजीपी के तहत शुरू की गई इकाई को तीन साल तक सफलतापूर्वक चलाने के बाद दोबारा इकाई के विस्तार के लिए एक करोड़ रुपए का लोन फिर से लिया जा सकता है। इस पर भी 15 फीसदी सब्सिडी सरकार की ओर से दी जाती है। अधिक जानकारी के लिए आप kviconline.gov.in पर भी विजिट कर सकते हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की ओडीओपी योजना भी स्वरोजगार को बढ़ावा देने वाली है। इस योजना के तहत हर जिले के प्रमुख उत्पाद के ​जरिये ​वहां के लोगों को स्वरोजगार से जोड़ा जायेगा। साथ ही प्रत्येक जिले के उत्पाद विशेषों की बिक्री बढ़ाने के लिये ई कॉमर्स वेबसाइट के साथ—साथ हर जिले के उत्पादों को वहां के रेलवे स्टेशन ब्रिकी और मार्केटिंग के लिये उचित स्थान भी मुहैया कराया जायेगा। आज का समय ऐसा है कि उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले युवा भी स्वरोजगार की तरफ प्रेरित हो रहे हैं। बहुत से युवा उद्यमशीलता की तरफ जा रहे हैं तो बहुत से युवा खुद से स्वरोजगार की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। आज से 10 साल पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि लखनउ जैसे शहर में एक चटोरी गली होगी और   वहां लगने वाली सैंकड़ों दुकानों को पढ़े—लिखे युवा चला रहे होंगे। या​ फिर एक एमबीए चाय वाला पूरे भारत में  प्रसिद्ध हो जायेगा।

किसी भी पौधे को पेड़ बनने में समय लगता है। साथ ही उस पौधे को सही देख—रेख के साथ पानी, हवा, धूप की भी जरूरत होती है। तभी वह पौधा बड़ा होकर फल देता है। ऐसे ही स्वरोजगार योजनाओं से जुड़े युवाओं और अन्य लोगों को भी आर्थिक सलाह और सुरक्षा देनी होगी जिससे वो किसी से रोजगार न मांगकर खुद के स्वरोजगार को ज्यादा से ज्यादा फैलाने में लगे रहें।

आकाशवाणी लखनऊ से 26/05/2022 को प्रसारित वार्ता 

https://youtu.be/0E6-CVLvLLo

Friday, May 13, 2022

पुरानी चीजों की अहमियत

 


बदलाव प्रकृति का नियम है पर ये बदलाव  हमें इस बात का एहसास भी कराता है कि हम आगे बढ़ रहे हैं. परिवर्तन का मतलब पुरानी चीजों से पीछा छुड़ाना नहीं है. सुनहरे  वर्तमान की नींव इतिहास पर ही रखी जाती है.मैं बिलकुल भारी भरकम बात करके आपको बोर नहीं करना चाहता .आज की दुनिया इंटरनेट की दुनिया जिसमे काफी कुछ आभासी है. कितना कुछ इसने बदल दिया है पर ये बदलाव यूँ ही नहीं हुआ है एक छोटा सा उदाहरण है इंटरनेट ने कागज़ पर हमारी निर्भरता को कम किया है. वो कागज़ जिससे हमारी ना जाने कितनी यादें जुडी हैं. वो स्कूल की नयी किताबें जिससे आती खुशबू आज भी हमें अपने बचपने में ले जाती है.हम उस दौर को एक बार फिर जी लेना चाहते हैं .वो कॉलेज की डिग्री का कागज़.  जिसने हमें पहली बार एहसास कराया कि हमने जीवन का अहम पड़ाव पार कर लिया. फिर वो शादी के कार्ड का कागज. जब हम एक से दो हो गए, अपने  पहले अपोइंटमेंट लैटर  को कौन भूल सकता है. जब आपने पहली बार वित्तीय स्वतंत्रता  का लुत्फ़ उठाया, और ये सिलसिला चलता रहता है. पर अब सबकुछ ऑन लाइन है .लेकिन  कभी कभी तो प्रिंट आउट भी  निकलना पड़ता है. भले ही सब कुछ ऑन लाइन हो रहा है. फिर भी  कागज़ तो हमारे जीवन का हिस्सा है ही ना. अब इस लेख को कुछ लोग अखबार में पढेंगे. कुछ नेट पर तो हो गया न ऑन लाइन और ऑफ लाइन का कोम्बिनेशन .तो ये पेज जल्दी ही इतिहास का हिस्सा हो जायेंगे जब बच्चे लिखना पढ़ना कॉपी और कागज़ से नहीं टेबलेट और लैपटॉप पर सीखेंगे, अब ग्रीटिंग कार्ड से लेकर शादी के कार्ड और अपोइंटमेंट लेटरसीधे   ई मेल या व्हाट्स एप  किये जाते हैं पर वो कागज़ के कुछ टुकड़े ही थे. जिन पर भविष्य के कंप्यूटर और इंटरनेट की इबारत लिखी गयी. बोले तो कागज़ ही ने  जिन्होंने हमें ऑफ लाइन से ऑन लाइन होने का जरिया दिया तभी तो किसी भी वेबसाईट के खास हिस्से को वेबपेज ही कहते हैं.  जबकि इस वेब पेज में उस पेज जैसा कुछ नहीं होत. जिसे हम जानते हैं तो सीधे दिल से जब हम जड़ों से जुड़े रहेंगे तो आगे बढते रहेंगे पर उनसे कट कर हम कभी तरक्की के रास्ते पर नहीं बढ़ पायेंगे .

पर ये तो आधी बात हुई मैं तो कुछ और ही कहना चाहता हूँ  कि जीवन में कितनी बातें ऐसी होती हैं. जिन्हें हम ऑबियस मानकर छोड़ देते हैं पर जरा सा दिमाग पर जोर डालने से  हमें पता पड़ता है कि उनकी हमारे जीवन में कितनी अहमियत होती है. कागज़ तो बहाना भर है आपको ये समझाने को हम कितने भी आगे क्यों  ना निकल जाएँ  पर अपने बेसिक्स को न भूलें.  मॉडर्न हो जाने का मतलब पुरानी चीजों  को भूल जाना नहीं है बल्कि उनको याद करके आने वाली दुनिया को और बेहतर करना है.अब उस मामूली कागज़ को लीजिए उसके साथ हम क्या करते हैं.हर मेल का प्रिंट आउट निकलना जरूरी तो नहीं है .प्रिंट आउट निकले पन्ने के दूसरी तरफ भी कुछ लिखा जा सकता है. पर हम उन्हें रद्दी मानकर फैंक देते हैं .हम जितना कागज़ ज्यादा इस्तेमाल करते हैं उतना ही पेड ज्यादा काटे जाते हैं तो कागज का इस्तेमाल सम्हाल कर कीजिये तभी हम अपने  पर्यावरण को बचा पायेंगे तो कागज़ की इस कहानी के साथ आज के लिए इतना ही....

प्रभात खबर में 13/05/2022 को प्रकाशित 

Thursday, April 7, 2022

अनछुए पहलुवो को उभारता हिन्दी सिनेमा

 स्त्रैण  हाव भाव वाले पुरुष चरित्र हिन्दी फिल्मों में हमेशा हास्य पैदा करने के माध्यम रहे हैं|चाहे वो शोले का वह कैदी हो जय वीरू को जेलर के खबरी का पता देता हो या  बोल बच्चन में अब्बास अली  हो या फिर  गैंग्स ऑफ वासेपुर में आइटम बॉय का चरित्र | ये तीनो  फ़िल्में अलग अलग दर्शक वर्ग के लिए अलग अलग समय में बनाई गयीं पर तीनों  में एक समानता है| वो है समलैंगिक किरदार|रिश्तों को अपनी कहानियों का हिस्सा बनाता आया हिंदी सिनेमा पिछले सालों में  काफी  बोल्ड हुआ और ऐसे अनछुए पहलूओं को सिनेमा के परदे  पर दर्शकों के सामने परोसने का साहस कर पाया। इन फिल्मों में रिश्तों की उलझन जटिलता उसका मर्म और दिल में दबे रहने वाले ऐसे जज्बातों को गूंथा गया जिसे आम तौर पर सभी के सामने कहने की हमारे समाज में परंपरा कभी नहीं रही है।  कुछ ने उसे अश्लीलता कहते हुए नकार दिया लेकिन सच को समाज का हिस्सा मानने वालों ने उस पर अपनी पसंद की मुहर भी लगाई।अभी रिलीज हुई फिल्म बधाई दो इसी कड़ी में एक शानदार पहल है | हिंदी सिनेमा अब केवल शादी, ब्याह, प्रेम कहानियों में बताए जाने वाले रिश्तों तक सीमित नहीं रहना चाहता। संवेदनशील विषयों को कहने से हम अब भी झिझकते हैं.खास तौर पर वह जो हमारे समाज का छिपा सच हैं। बोल्ड का मतलब केवल अभिनेता-अभिनेत्री के अंतरंग दृश्य नहीं हैं, रिश्तों की बारीकी भी है। 1990 से हिंदी सिनेमा में कथ्य और शिल्प के स्तर पर प्रयोगधर्मिता बढी है।सहजीवन,समलैंगिकता पुरूष स्ट्रीपर्स सेक्स और विवाहेतर संबंध और प्यार की नई परिभाषा से गढ़ी कहानियां फिल्मों के नए विषय हैं।जिस तेजी से समाज बदल रहा है. उतनी तेजी से फिल्मों में ये विषय नहीं आ रहे हैं।समलैंगिकता समाज का सच है पर इस मुद्दे की गंभीरता को अभी भी समझा नहीं जा रहा है इंसानी समाज का ये पक्ष अभी भी बहस के मुद्दे से दूर है | सेक्‍स को हमेशा प्रमुखता से प्रस्तुत  करने वाली हमारी फिल्मों में (कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए, तो बॉलीवुड में यौन विषयों पर आधारित तार्किक फिल्‍में कम ही बनी हैं) यह तथ्य अलग है कि आइटम डांस का तडका लगाये बिना  कोई फिल्म पूरी नहीं होती और फिल्म निर्माता हमेशा इस विषय से भय ही खाते रहे है।

मगर कुछ निर्देशक ऐसे हैं जिन्होंने समलैंगिकता जैसे संवेदनशील मुददे पर काम किया है|खासकर युवाओं ने जिन्हें समाज में वर्जित माने जाने वाले मुददों को दिखाने से कोई गुरेज नहीं। फिल्मों में गे और लेस्बियन किरदारों को या तो प्रोटागोनिस्ट दोस्तों की तरह दिखाया जाता है या फिर ड्रेस-डिजाइनर के किरदार में। समय के साथ और दर्शकों की रुचि देखते हुए बॉलीवुड खुले तौर पर सामने आ रहा है। फायर, माई ब्रदर निखिल, दोस्ताना, फ्रेंडशिप,फैशन  और पेज ३ में समलैंगिकों के लिए समाज का नजरिया दिखाने की कोशिश की गई है।कुछ फिल्मों ने समलैंगिकों के लिए आम आदमी का नजरिया बदला है फिर भी समाज का एक बड़ा तबका उन्हें असामान्य ही मानता है।फिल्मों में समलैंगिक किरदारों को स्वीकार तो किया जा रहा है लेकिन उन्हें ज्यादातर फैशन या मीडिया जगत से जुड़ा दिखाया जाता है।इस विषय की पहली मेनस्ट्रीम हिंदी मूवी ओनीर निर्देशित माय ब्रदर निखिल रही है|फिल्म 'बॉम्बे टॉकीज़' में करण जौहर की कहानी में रणदीप हुड्डा और साकिब सलीम का प्रसंग, 'कपूर एंड सन्स' में फव्वाद ख़ान का किरदार, कल्कि की 'मार्गरीटा विद स्ट्रॉ' सहित कई फिल्मों में रिश्तों को गंभीरता से दिखाया गया|

 निर्देशक करण राजदान की गर्लफ्रेंड में लेस्बियन रिश्तों पर फोकस है। करण जौहर निर्देशित दोस्ताना गे-कॉमेडी थी। यह फिल्म दर्शकों को काफी रास आई यह फिल्म इसलिए भी चर्चित रही कि इसमें पहली बार दो पुरुषों के चुम्बन द्रश्य को दिखाया गया । लेस्बियन लव स्टोरी 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा' फिल्म में इस तरह के  रिश्ते को लेकर स्पष्टता और निडरता देखी जा सकती है | आयुष्यमान खुराना और जितेन्द्र कुमार की 'शुभ मंगल ज्यादा सावधान' भी इसी दिशा में समाज की बदलती सोच को दिखाने में सफल रही|

 बहुत से फिल्म निर्माता समलैंगिकता को केवल हास्य के रूप में इसलिए रखते हैं ताकि उन्हें फिल्म की रिलीज के दौरान दिक्कत न हो इसलिये फिल्मों में ऐसे चरित्र तो बढ़ रहे हैं जिनके हाव भाव समलैंगिकों वाले हैं पर उनकी यौन रूचि पर सीधे कोई बात नहीं की जाती और फिल्मों के कथ्य में वो महज मजाक बन कर रह जाते हैं|भले ही फिल्मों का विषय और प्रस्तुति काल्पनिक हो लेकिन कोई भी फिल्म अपने समय से निरपेक्ष नहीं रह सकती हर फिल्म पर उस समय का असर जरुर होता है जिस समय वह निर्मित की जा रही होती है| समलैंगिक किरदारों को हास्य के साथ प्रस्तुत करना समाज में उनके प्रति गलत छवि का निर्माण करता है |यह समलैंगिकों के साथ अन्याय भी है ।लिसा रे और शीतल सेठ की आइ कांट थिंक स्ट्रेट स्त्री समलैंगिकता पर आधारित थी। शमीम शरीफ निर्देशित फिल्म में दोनों अभिनेत्रियां अपनी यौन पहचान समझने की कोशिश में रहती हैं। फिल्म् “डू नो वाय... न जाने क्यों” पुरुषों के समलैंगिक रिश्तों की कहानी है। जो विषमलैगिक ढांचे के अनुसार नहीं चलते हैं| पश्चिमी देशों में पुरुष और स्त्री को अपने सेक्स रिश्ते के चुनाव की पूरी आजादी हैं। इसे विचार अभिव्यक्ति का ही हिस्सा माना जाता है पर भारत में स्थिति अलग है|यहाँ सेक्स अभी भी टैबू है जिस पर बात करना वर्जित है | हम भारत से बाहर की फिल्में देखकर ऐसे बोल्ड विषयों को कहने के साहस पर खुश होते है लेकिन वही काम अगर भारत में हो तो पचा नहीं पाते। निर्देशकों के चरित्र उसकी प्रवृत्ति पर सवाल खड़े का कर देते हैं।साल 2015 में  आई मनोज बाजपेयी की अलीगढ़ ने समलैंगिकता पर चल रही बहस को न सिर्फ एक नया मोड़ दिया बल्कि यह इस मामले में हिन्दी  सिनेमा के गंभीर  हो जाने की दिशा में बड़ा हस्तक्षेप  था |

 समलैंगिकों की  स्थिति का काफी दस्तावेजीकरण हो रहा है| जिनसे पता चलता है कि गे ,लेस्बियन हिजडा, ट्रांसजैन्डर्ड, और बाईसेक्स्युअल लोगों की मानव प्रतिष्ठा का बार-बार किस प्रकार उल्लंघन किया जाता है। उल्लंघनों का क्षेत्र व्यापक है। किन्नरों का सेक्स रैकेट के रूप में प्रयोग और पुलिसवालों द्वारा उनके बार-बार बलात्कार की घटनाएं हैं और उनके मानवाधिकारों का हनन भी शामिल है ।बहरहाल समलैंगिकता पूरी दुनिया में हमेशा मौजूद रही है परंतु इसे हमने सामाजिक कालीन के नीचे छिपा दिया था जो अब प्रकट हो रहा है। हाल ही में ऐसी फिल्मों की बढ़ती तादाद और प्रमुख अभिनेताओं द्वारा समलैंगिक किरदारों का निभाया जाना इस ओर इशारा करता है कि बॉलीवुड भी इस गंभीर मुद्दे की ओर उन्मुख है। समलैंगिकता को देश में कानूनी मान्यता मिल गई है तो उम्मीदें भी बढ़ी हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि हिंदी फिल्मकार किस तरह से इसको अपने विषयों का हिस्सा बनाते हैं। क्या वह दबी आवाजें कुचले रिश्ते संबंधों की कसमसाहट और समाज की नैतिकता किस चोले में रजत पटल का हिस्सा बनेगी|

 दैनिक जागरण में 07/04/2022 को प्रकाशित 

Tuesday, April 5, 2022

रेखाएं बेहद अहम हैं

 


नवरात्रि में घर की सफाई में एक पुरानी किताब मिली जानते हैं उसका विषय था ज्योमेट्री जी हाँ रेखा गणित और क्या कुछ आँखों के आगे घूम गया वो स्कूल के दिन वो एल एच एस इस ईक्युल टू आर एच एस और इतिसिद्धम. तब लगता था हम ये सब क्यूँ पढते हैं वैसे भी गणित मुझे बहुत बोर करती थी. जिंदगी तो आगे बढ़ चली पर अब समझ आ रहा है जीवन में रेखा का क्या महत्व हैक्योंकि इसी पर जिंदगी का गणित टिका हुआ है. रेखा मतलब लाइन, लिमिट ,सीमा या फिर कुछ आड़ी तिरछी सीधी पंक्ति वैसे इनका कोई मतलब नहीं है पर इन्हें सिलसिलेवार लगा दिया जाए तो किसी के घर का नक्शा बन जाता है. तो कोई कुछ ऐसा जान जाता है जिसे कल तक कोई नहीं जानता था.रेखा ही है वो टूल है जिससे आप अपने सपनों को वास्तविकता का जामा पहना सकते हैं पर ये ध्यान रहे कि उस रेखा का डायरेक्शन किस तरफ है क्योंकि वो चाहे गणित का सवाल हो या जिंदगी की उलझन काफी कुछ आपके दिमाग के डायरेक्शन पर निर्भर करता है.

विषय कोई भी हो चाहे इतिहास, भूगोल गणित या फिर साहित्य बगैर रेखाओं के इनका कोई अस्तित्व नहीं है अब देखिये ना लिपि या स्क्रिप्ट भी तो कुछ रेखाओं का कॉम्बिनेशन है यानि दुनिया को समझने के लिए हमें रेखाओं की जरुरत है. इतिहास में समयरेखा है तो भूगोल में अक्षांश और भूमध्य जैसी रेखाएं. कॉपियों में लिखने का अभ्यास पहले लाईनदार पन्नों से होता है बाद में जब हम अभ्यस्त हो जाते हैं तो उनकी जगह सफ़ेद पन्ने ले लेते है और तब हम कितनी भी जल्दी क्यूँ ना लिखें शब्द अपनी जगह से नहीं भागते. वे उसी तरह लिखें जाते हैं जैसे हम लाईनदार कॉपियों में लिखते हैं.

क्यूँ कुछ तस्वीर साफ़ हो रही है.जीवन में इन रेखाओं का कितना बड़ा दायरा है वो जीवन की रेखा से लेकर गरीबी रेखा तक देखा और समझा जा सकता है. जीवन  में स्वछंदता और उन्मुक्तता मौज मस्ती अच्छी है पर उसकी एक सीमा होनी चाहिए और इस रेखा को हमें ही खींचना चाहिए. त्यौहार  हमें जश्न मनाने का जहाँ  मौका देते हैं. वहीं ये भी बताते हैं कि जीवन महज मौजमस्ती का नाम नहीं बल्कि समाज में हमारा सकारात्मक योगदान  भी  है.महत्वपूर्ण है कि ये बात कोई दूसरा हमें ना बताये क्योंकि सेल्फ रेग्युलेशन,खुद  से ही आता है और यही सेल्फ रेग्युलेशन जो हमें अनुशासित करता है.जब हम दूसरे की सीमाओं का सम्मान करेंगे तो लोग खुद ब खुद हमें अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र छोड़ देंगे पर हम ये सोचें कि हम सबके बारे में कुछ भी गॉसिप कर सकते हैं पर कोई हमारे बारे में कोई कुछ नहीं बोलेगा ऐसा होना मुश्किल है. सफल होने की कोई सीमा नहीं है पर ख्वाब अगर हकीकत के आइने में देखें जाएँ तो उनके सफल होने की गुंजाईश ज्यादा होती है. मतलब अपनी सीमाओं को जानकर उसके हिसाब से जब योजनाएं बनाई जाती हैं तो वो निश्चित रूप से सफल होती हैं. तो मुझे तो अपनी सीमाओं  का अंदाजा है और अपनी जीवन रेखा को इसी तरह बना रहा हूँ कि मेरी जिंदगी के कुछ मायने निकले पर आप क्या कर रहे हैं यह जरुर बताइयेगा.

प्रभात खबर में 05/04/2022 को प्रकाशित 

 

Friday, April 1, 2022

फैसलों का लम्बा खिंचता इन्तजार

 विधि द्वारा स्थापित व्यवस्था में जेल(कारागार) किसी भी अपराध का दंड है यानि जेल, तंत्र का वो अंग है जो इस दर्शन पर आधारित है कि अपराधियों को समाज से दूर रखकर एक ऐसा वातावरण दिया जाए जहाँ वह आत्म चिंतन कर सकें ,पर  क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है| 

सरकार ने लोकसभा में 25 मार्च  को जानकारी दी है कि देश की विभिन्न अदालतों में 4|70 करोड़ से अधिक मुकदमे अटके हुए हैं| सुप्रीम कोर्ट में ही 70,154 मुकदमे लंबित है| देश की 25 हाईकोर्ट में भी 58 लाख 94 हजार 60 केस अटके हुए हैं| इन लंबित मुकदमों की संख्या दो मार्च तक की है| इनमें से कुछ मामले पचास साल से भी ज़्यादा पुराने हैं|भारत में जेल सुधारों की  त्वरित आवश्यकता है |जिसका एक बड़ा कारण लंबित मुकदमों का बढ़ना ,न्यायाधीशों की कमी और सभी जेलों का क्षमता से ज्यादा भरा होना है|जिसका परिणाम कैदियों के खराब  मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के रूप में आ रहा है|जेल में यंत्रणा आम है| राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट  ‘जेल सांख्यिकी भारत 2020' के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, भारत की जेलों में बंद हर चार में से तीन कैदी ऐसे हैं जिन्हें विचाराधीन कैदी के तौर पर जाना जाता है| दूसरे शब्दों में कहें, तो इन कैदियों के ऊपर जो आरोप लगे हैं उनकी सुनवाई अदालत में चल रही है| अभी तक इनके ऊपर लगे आरोप सही साबित नहीं हुए हैं|रिपोर्ट में यह जानकारी भी दी गई है कि देश के जिला जेलों में औसतन 136 प्रतिशत  की दर से कैदी रह रहे है| इसका मतलब यह है कि 100 कैदियों के रहने की जगह पर 136 कैदी रह रहे हैं| फिलहाल, भारत के 410 जिला जेलों में 4,88,500 से ज्यादा कैदी बंद हैं| 2020 में, जेल में बंद कैदियों में 20 हजार से ज्यादा महिलाएं थीं जिनमें से 1,427 महिलाओं के साथ उनके बच्चे भी थे| मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि भारत में विचाराधीन कैदियों की संख्या दुनिया भर के अन्य लोकतांत्रिक देशों की तुलना में काफी ज्यादा है|

  31 दिसंबर 2021 तक सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़ न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 21.03 है जो  आबादी के अनुपात  को देखते हुए  प्रति दस लाख में करीब 21 न्यायाधीश होता है| उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 और 25 उच्च न्यायालयों में 1098 है| उच्च न्यायालयों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर 2021 तक 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 898 फास्ट ट्रैक अदालतें काम कर रही हैं|  न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना, उस समस्या के हल का एक पक्ष हो सकता है, जो भारत की खराब जेल व्यवस्था का एक बड़ा कारण है|जजों की संख्या कम होने से जेल में लंबित कैदियों की संख्या बढती जाती|जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है । इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2020 के आंकड़ों के मुताबिक भारत की जेलों में बंद 69 प्रतिशत कैदी विचाराधीन हैं| यानी कि भारत की जेलों में बंद हर दस  में से सात  कैदी मुकदमे की सुनवाई पूरी होने के इन्तजार में है | इस समस्या के सामाजिक आर्थिक पक्ष भी हैं |देश में गरीब व्यक्ति के लिए इंसाफ की लड़ाई ज्यादा  कठिन है| जिन्हें अच्छे और महंगे वकील मिल जाते हैं उनकी जमानत आसानी से हो जाती है| बहुत मामूली से अपराधों के लिए भी गरीब लोग लम्बे समय तक जेल में सड़ने को विवश होते हैं|स्वतंत्रता के पचहतर वर्ष के  बाद भी जेलों और कैदियों की दुर्दशा पर किसी ठोस और निर्णायक कार्रवाई का इन्तजार जारी  है| जेलों में भ्रष्टाचार, गैरकानूनी गतिविधियां, कमजोर और गरीब कैदियों का शोषण, भेदभाव और उनसे सांठगांठ और दबंग अपराधियों के लिए सुरक्षित ठिकाने की तरह इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगते रहते  हैं|

 आपराधिक मुकदमों  में ज्यादातर के पूरा होने में औसत रूप से तीन से दस साल का समय  लगता है, हालांकि दोष सिद्धि का समय मुकदमों के लिए जेल में बिताए समय  से घटा दिया जाता है, लेकिन इसकी वजह से कई निर्दोषों को बगैर किसी अपराध के जेल की सज़ा काटनी पड़ती है,पिछले दशक में विशेष अपराधों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन कर इस मुद्दे को हल करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, जिससे सुनवाई का इंतज़ार कर रहे लंबित मामलों में कमी आएगी पर फास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन समस्या का एकमात्र हल नहीं है |इस व्यवस्था में जोर न्याय की बजाय समय पर होगा जो किसी भी दशा में  उचित नहीं माना जाएगा|दोषी पाए गए अधिकतर  कैदी बहुत गरीब हैं, जेलों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपेक्षित मुद्दा है| जिनके अभाव में कई बार कैदी गंभीर रोगों का शिकार हो जाते हैं खासकर एचआईवी पोसिटिव कैदियों को  इलाज के लिए जिला अस्पतालों के भरोसे रहना पड़ता है| यह मानसिकता कि जो जेल में रहते हैं वे सुविधाओं के लायक नहीं हैं।समस्या को और गंभीर बना देती है |सुप्रीम कोर्ट ने जेल सुधारों की सिफारिश करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अमिताभ रॉय की अध्यक्षता वाली समिति देश भर की जेलों की समस्याओं को देख रही है और उनसे निपटने के उपाय सुझा रही है।मार्च की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने इस समिति को अगले छ माह में अपनी रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है |तब तक जेलों में बंद कैदियों का इन्तजार जारी रहने वाला है |

 अमर उजाला में 01/04/2022 को प्रकाशित 

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