Friday, May 17, 2013

जीवन बंधन


एक रात उनींदी पलकों ने
मीठा सा एक स्वप्न बुना
जीवन की मधुर स्मृतियों में से
महका सा एक पुष्प चुना
फिर तुम्हारी यादें तुम्हारी बातें
मीठी रातें स्वप्निल सौगातें
नदी किनारा साथ तुम्हारा
सुंदर उपवन
महका तन मन
हाथों की नरमी
साँसों की गर्मी
तुम्हारा आलिंगन
जीवन बंधन
ढेरों बातें ढेरों कहानी
तुम सुनते थे मेरी जबानी

3 comments:

Bhawna Tewari said...

ढेरों बातें ढेरों कहानी...
kavita kahani ko zubaan de rhi h sir ji..

Rajeev Ranjan said...

अनुभव का बेहतरीन कोलाज। बीते दिन इसी तरह महकते हैं-भावों में, शब्दों में, वाक्यों में। यह जताते हैं कि आप बीते लम्हों में क्या कुछ देख-गुन चुके हैं....ये बातें शिद्दत से याद आती हैं। अपने यादास्त को ‘कोल्डड्रिंक’ पिलाने की जरूरत नहीं पड़ती है।

Sumbul said...

यह कविता दर्शाती है कि कैसे पुरानी यादें आज भी रातों की नींद चुरा सकती हैं। लेखक आज भी पुरानी बातों को याद कर ग़महीन हो जाता है, और कैसे उसे अपने प्रिय के साथ बिताए सारे लम्हे ऐसे याद हैं जैसे की कल की ही बात हो।

-Sumbul Imran

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